उत्तराखंड में हजारों हेक्टेयर वन भूमि पर अवैध कब्जे के मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राज्य में कार्यकारी पद पर बैठे प्रत्येक व्यक्ति इस लापरवाही के लिए जिम्मेदार है। सुनवाई के दौरान अदालत ने सरकार को फटकार लगाते हुए पूछा कि अवैध कब्जे का पता लगाने में उन्हें 23 साल का समय कैसे लग गया।

साभार : एचटी
उत्तराखंड में हजारों हेक्टेयर वन भूमि पर हुए अवैध कब्ज़े के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार, 5 जनवरी को राज्य सरकार को कड़ी फटकार लगाई। अदालत ने सरकार से सवाल किया कि वर्ष 2000 में राज्य गठन के बाद अब तक अतिक्रमणकारियों के खिलाफ क्या ठोस कार्रवाई की गई है।
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, कोर्ट ने कहा कि राज्य में कार्यकारी पद पर बैठे प्रत्येक व्यक्ति इस लापरवाही के लिए जवाबदेह है।
भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की पीठ ने राज्य सरकार को दो सप्ताह के भीतर विस्तृत जवाबी हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है। इस हलफनामे में साइट प्लान के साथ-साथ राज्य में वन भूमि पर हुए अवैध निर्माणों से जुड़ी अनुमानित जानकारी देने को कहा गया है, ताकि यह तय किया जा सके कि मामले में आगे और गहन जांच की आवश्यकता है या नहीं।
गौरतलब है कि इससे पहले अतिक्रमित भूमि के स्वामित्व से संबंधित कुछ निजी व्यक्तियों द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय ने 22 दिसंबर को वन भूमि पर हुए अवैध अतिक्रमण को लेकर सरकार की ‘चुप्पी’ पर सवाल उठाए थे।
द वायर ने लिखा कि सुनवाई के दौरान कोर्ट ने टिप्पणी की थी कि यह बेहद हैरान करने वाला है कि उत्तराखंड राज्य और उसके अधिकारी मूकदर्शक बने हुए हैं, जबकि उनकी आंखों के सामने वन भूमि को योजनाबद्ध तरीके से कब्ज़े में लिया जा रहा है।
इस मामले में अदालत ने स्वतः संज्ञान लेते हुए उत्तराखंड के मुख्य सचिव और प्रधान मुख्य वन संरक्षक को सभी तथ्यों की जांच के लिए एक जांच समिति गठित करने तथा अंतरिम रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश दिया था।
सोमवार को सरकारी वकील ने पीठ को बताया कि अंतरिम रिपोर्ट दाखिल कर दी गई है। इस पर मुख्य न्यायाधीश ने टिप्पणी की, “राज्य सरकार के रूप में आपका जवाब आपकी लाचारी को दर्शाता है।”
सरकारी वकील ने आगे कहा कि वर्ष 1993 में इस संबंध में कार्रवाई की गई थी और 2023 में बेदखली के नोटिस जारी किए गए थे, लेकिन उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने उन पर रोक लगा दी थी।
इस दलील पर मुख्य न्यायाधीश ने टिप्पणी की, “तो राज्य ने केवल कभी-कभार, और वह भी महज़ औपचारिक रूप से, कार्रवाई की है। कृपया यह स्पष्ट करते हुए एक उचित हलफनामा दाखिल करें कि राज्य सरकार के तौर पर आपने अब तक क्या कदम उठाए हैं।”
राज्य के वकील ने बताया कि अंतरिम रिपोर्ट में उल्लेख किया गया है कि 1950 से संबंधित दस्तावेज़ों की आवश्यकता होने के कारण उत्तर प्रदेश सरकार को आवश्यक रिकॉर्ड उपलब्ध कराने के लिए पत्र भेजा गया है।
अधिकारियों की घोर लापरवाही और भूमि हड़पने वालों से कथित सांठगांठ
गौरतलब है कि वर्ष 2000 में उत्तराखंड राज्य का गठन उत्तर प्रदेश के उत्तर-पश्चिमी हिस्से को अलग करके किया गया था।
पीठ ने टिप्पणी की, “सबसे पहले आप अपने आचरण का स्पष्टीकरण दें। वर्ष 2000 में राज्य का गठन हुआ था, उसके बाद आपने क्या कदम उठाए? अन्यथा हम आप में से प्रत्येक से जवाबदेही तय करेंगे। आप लोगों को घर बनाने देते हैं, उनकी पीढ़ियों को वहां रहने देते हैं और फिर अचानक केवल अदालत के आदेश की आड़ लेकर उससे बचने की कोशिश करते हैं, जबकि अदालत सवाल उठा रही है।”
इस पर वकील ने दलील दी कि राज्य सरकार ने कथित अतिक्रमणकारियों को बेदखली के नोटिस जारी किए हैं। इसके जवाब में मुख्य न्यायाधीश ने टिप्पणी की, “तो क्या वर्ष 2000 से आपको यह समझने में 23 वर्ष लग गए कि आपकी भूमि पर कब्ज़ा हो चुका था?”
पीठ ने आगे कहा, “हम प्रत्येक अधिकारी की जवाबदेही तय करेंगे। यह ऊपरवाला ही जाने कि अतिक्रमणकारी कौन हैं, वे किस राजनेता या किस अधिकारी से जुड़े हैं, अथवा कौन-कौन से प्रभावशाली लोग उनके साथ सांठगांठ किए हुए हैं।”
अपने आदेश में अदालत ने कहा कि जांच समिति द्वारा प्रस्तुत अंतरिम रिपोर्ट का अवलोकन किया गया है। रिपोर्ट दशकों से सरकारी और वन भूमि की सुरक्षा में राज्य तंत्र की चौंकाने वाली विफलता को उजागर करती है। अदालत के अनुसार, जिन भूखंडों पर वर्षों से सुनियोजित तरीके से अतिक्रमण होता रहा, वहां अतिक्रमणकारियों के खिलाफ कार्रवाई की औपचारिकता वर्ष 2023 में कुछ नोटिस जारी कर पूरी की गई, जिसके बाद उच्च न्यायालय ने अंतरिम रोक लगा दी और अधिकारी फिर निष्क्रिय हो गए।
टाइम्स ऑफ इंडिया के अनुसार, अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि इस मामले में राज्य के अधिकारी लगातार और व्यवस्थित रूप से लापरवाह रहे हैं तथा यह मामला भूमि अतिक्रमणकारियों के साथ उनकी मिलीभगत और सांठगांठ की ओर संकेत करता है।
पीठ ने कहा, “हम राज्य में कुल भूमि का विवरण और उस पर कथित रूप से कब्जा करने वाले व्यक्तियों की संख्या जानना चाहेंगे। यदि आवश्यक हुआ, तो भूमि पर अतिक्रमण करने वालों की पहचान और उनके कब्ज़ों का पता लगाने के लिए गहन जांच का आदेश दिया जाएगा, ताकि यह निर्धारित किया जा सके कि क्या उन्हें उन अधिकारियों का मौन संरक्षण और समर्थन प्राप्त था, जिनसे सार्वजनिक संपत्तियों की सुरक्षा की अपेक्षा की जाती है।”
निर्माण गतिविधि पर प्रतिबंध जारी
उल्लेखनीय है कि 22 दिसंबर को अदालत ने सभी निजी व्यक्तियों को कथित अतिक्रमित भूमि का हस्तांतरण करने या किसी तीसरे पक्ष के अधिकार सृजित करने से रोक दिया था। साथ ही, अदालत ने यह भी निर्देश दिया था कि विवादित भूमि पर किसी भी प्रकार की निर्माण गतिविधि की अनुमति नहीं दी जाए। सोमवार को पीठ ने कहा कि ये निर्देश लागू रहेंगे।
राज्य ने सूचित किया कि उसने अतिक्रमणों के खिलाफ कार्रवाई शुरू कर दी है और यह अभियान लगातार जारी रहेगा। राज्य ने यह भी बताया कि अभियान के दौरान कुछ क्षेत्रों तक अधिकारियों की पहुंच भारी हिंसा के कारण संभव नहीं हो पाई।
हालांकि, मुख्य न्यायाधीश ने कहा, “हम यह नहीं कहेंगे कि आप आगे क्या करेंगे… हम देखेंगे कि अतीत में आपका आचरण कैसा रहा है। आज, सर्वोच्च न्यायालय के आदेश की आड़ लेकर आप सब कुछ पलटना चाहते हैं। अतीत में आप क्या करते रहे हैं?”
यह मामला ऋषिकेश में लगभग 2,866 एकड़ भूमि से संबंधित है, जिसे 1950 में भूमिहीन परिवारों को आवंटित करने के उद्देश्य से पशुलोक सेवा समिति को पट्टे पर दिया गया था। इसके बाद, 1984 में तत्कालीन उत्तर प्रदेश सरकार के वन विभाग ने यह आवंटन रद्द कर दिया और भूमि सरकार के अधीन वापस आ गई। इसके बावजूद, इस भूमि पर दशकों तक निजी कब्ज़ा जारी रहा।
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साभार : एचटी
उत्तराखंड में हजारों हेक्टेयर वन भूमि पर हुए अवैध कब्ज़े के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार, 5 जनवरी को राज्य सरकार को कड़ी फटकार लगाई। अदालत ने सरकार से सवाल किया कि वर्ष 2000 में राज्य गठन के बाद अब तक अतिक्रमणकारियों के खिलाफ क्या ठोस कार्रवाई की गई है।
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, कोर्ट ने कहा कि राज्य में कार्यकारी पद पर बैठे प्रत्येक व्यक्ति इस लापरवाही के लिए जवाबदेह है।
भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की पीठ ने राज्य सरकार को दो सप्ताह के भीतर विस्तृत जवाबी हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है। इस हलफनामे में साइट प्लान के साथ-साथ राज्य में वन भूमि पर हुए अवैध निर्माणों से जुड़ी अनुमानित जानकारी देने को कहा गया है, ताकि यह तय किया जा सके कि मामले में आगे और गहन जांच की आवश्यकता है या नहीं।
गौरतलब है कि इससे पहले अतिक्रमित भूमि के स्वामित्व से संबंधित कुछ निजी व्यक्तियों द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय ने 22 दिसंबर को वन भूमि पर हुए अवैध अतिक्रमण को लेकर सरकार की ‘चुप्पी’ पर सवाल उठाए थे।
द वायर ने लिखा कि सुनवाई के दौरान कोर्ट ने टिप्पणी की थी कि यह बेहद हैरान करने वाला है कि उत्तराखंड राज्य और उसके अधिकारी मूकदर्शक बने हुए हैं, जबकि उनकी आंखों के सामने वन भूमि को योजनाबद्ध तरीके से कब्ज़े में लिया जा रहा है।
इस मामले में अदालत ने स्वतः संज्ञान लेते हुए उत्तराखंड के मुख्य सचिव और प्रधान मुख्य वन संरक्षक को सभी तथ्यों की जांच के लिए एक जांच समिति गठित करने तथा अंतरिम रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश दिया था।
सोमवार को सरकारी वकील ने पीठ को बताया कि अंतरिम रिपोर्ट दाखिल कर दी गई है। इस पर मुख्य न्यायाधीश ने टिप्पणी की, “राज्य सरकार के रूप में आपका जवाब आपकी लाचारी को दर्शाता है।”
सरकारी वकील ने आगे कहा कि वर्ष 1993 में इस संबंध में कार्रवाई की गई थी और 2023 में बेदखली के नोटिस जारी किए गए थे, लेकिन उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने उन पर रोक लगा दी थी।
इस दलील पर मुख्य न्यायाधीश ने टिप्पणी की, “तो राज्य ने केवल कभी-कभार, और वह भी महज़ औपचारिक रूप से, कार्रवाई की है। कृपया यह स्पष्ट करते हुए एक उचित हलफनामा दाखिल करें कि राज्य सरकार के तौर पर आपने अब तक क्या कदम उठाए हैं।”
राज्य के वकील ने बताया कि अंतरिम रिपोर्ट में उल्लेख किया गया है कि 1950 से संबंधित दस्तावेज़ों की आवश्यकता होने के कारण उत्तर प्रदेश सरकार को आवश्यक रिकॉर्ड उपलब्ध कराने के लिए पत्र भेजा गया है।
अधिकारियों की घोर लापरवाही और भूमि हड़पने वालों से कथित सांठगांठ
गौरतलब है कि वर्ष 2000 में उत्तराखंड राज्य का गठन उत्तर प्रदेश के उत्तर-पश्चिमी हिस्से को अलग करके किया गया था।
पीठ ने टिप्पणी की, “सबसे पहले आप अपने आचरण का स्पष्टीकरण दें। वर्ष 2000 में राज्य का गठन हुआ था, उसके बाद आपने क्या कदम उठाए? अन्यथा हम आप में से प्रत्येक से जवाबदेही तय करेंगे। आप लोगों को घर बनाने देते हैं, उनकी पीढ़ियों को वहां रहने देते हैं और फिर अचानक केवल अदालत के आदेश की आड़ लेकर उससे बचने की कोशिश करते हैं, जबकि अदालत सवाल उठा रही है।”
इस पर वकील ने दलील दी कि राज्य सरकार ने कथित अतिक्रमणकारियों को बेदखली के नोटिस जारी किए हैं। इसके जवाब में मुख्य न्यायाधीश ने टिप्पणी की, “तो क्या वर्ष 2000 से आपको यह समझने में 23 वर्ष लग गए कि आपकी भूमि पर कब्ज़ा हो चुका था?”
पीठ ने आगे कहा, “हम प्रत्येक अधिकारी की जवाबदेही तय करेंगे। यह ऊपरवाला ही जाने कि अतिक्रमणकारी कौन हैं, वे किस राजनेता या किस अधिकारी से जुड़े हैं, अथवा कौन-कौन से प्रभावशाली लोग उनके साथ सांठगांठ किए हुए हैं।”
अपने आदेश में अदालत ने कहा कि जांच समिति द्वारा प्रस्तुत अंतरिम रिपोर्ट का अवलोकन किया गया है। रिपोर्ट दशकों से सरकारी और वन भूमि की सुरक्षा में राज्य तंत्र की चौंकाने वाली विफलता को उजागर करती है। अदालत के अनुसार, जिन भूखंडों पर वर्षों से सुनियोजित तरीके से अतिक्रमण होता रहा, वहां अतिक्रमणकारियों के खिलाफ कार्रवाई की औपचारिकता वर्ष 2023 में कुछ नोटिस जारी कर पूरी की गई, जिसके बाद उच्च न्यायालय ने अंतरिम रोक लगा दी और अधिकारी फिर निष्क्रिय हो गए।
टाइम्स ऑफ इंडिया के अनुसार, अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि इस मामले में राज्य के अधिकारी लगातार और व्यवस्थित रूप से लापरवाह रहे हैं तथा यह मामला भूमि अतिक्रमणकारियों के साथ उनकी मिलीभगत और सांठगांठ की ओर संकेत करता है।
पीठ ने कहा, “हम राज्य में कुल भूमि का विवरण और उस पर कथित रूप से कब्जा करने वाले व्यक्तियों की संख्या जानना चाहेंगे। यदि आवश्यक हुआ, तो भूमि पर अतिक्रमण करने वालों की पहचान और उनके कब्ज़ों का पता लगाने के लिए गहन जांच का आदेश दिया जाएगा, ताकि यह निर्धारित किया जा सके कि क्या उन्हें उन अधिकारियों का मौन संरक्षण और समर्थन प्राप्त था, जिनसे सार्वजनिक संपत्तियों की सुरक्षा की अपेक्षा की जाती है।”
निर्माण गतिविधि पर प्रतिबंध जारी
उल्लेखनीय है कि 22 दिसंबर को अदालत ने सभी निजी व्यक्तियों को कथित अतिक्रमित भूमि का हस्तांतरण करने या किसी तीसरे पक्ष के अधिकार सृजित करने से रोक दिया था। साथ ही, अदालत ने यह भी निर्देश दिया था कि विवादित भूमि पर किसी भी प्रकार की निर्माण गतिविधि की अनुमति नहीं दी जाए। सोमवार को पीठ ने कहा कि ये निर्देश लागू रहेंगे।
राज्य ने सूचित किया कि उसने अतिक्रमणों के खिलाफ कार्रवाई शुरू कर दी है और यह अभियान लगातार जारी रहेगा। राज्य ने यह भी बताया कि अभियान के दौरान कुछ क्षेत्रों तक अधिकारियों की पहुंच भारी हिंसा के कारण संभव नहीं हो पाई।
हालांकि, मुख्य न्यायाधीश ने कहा, “हम यह नहीं कहेंगे कि आप आगे क्या करेंगे… हम देखेंगे कि अतीत में आपका आचरण कैसा रहा है। आज, सर्वोच्च न्यायालय के आदेश की आड़ लेकर आप सब कुछ पलटना चाहते हैं। अतीत में आप क्या करते रहे हैं?”
यह मामला ऋषिकेश में लगभग 2,866 एकड़ भूमि से संबंधित है, जिसे 1950 में भूमिहीन परिवारों को आवंटित करने के उद्देश्य से पशुलोक सेवा समिति को पट्टे पर दिया गया था। इसके बाद, 1984 में तत्कालीन उत्तर प्रदेश सरकार के वन विभाग ने यह आवंटन रद्द कर दिया और भूमि सरकार के अधीन वापस आ गई। इसके बावजूद, इस भूमि पर दशकों तक निजी कब्ज़ा जारी रहा।
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