सामाजिक कार्यकर्ता हर्ष मंदर द्वारा असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा शर्मा की ‘मिया मुस्लिमों’ (बांग्ला भाषी मुसलमानों) के खिलाफ की गई विवादास्पद टिप्पणियों को लेकर दिल्ली के हौज खास थाने में शिकायत दर्ज कराए जाने के जवाब में शर्मा ने मंदर के खिलाफ सौ मामले दर्ज कराने की धमकी दी है। इस पर प्रतिक्रिया देते हुए मंदर ने कहा कि इन धमकियों का उनके काम पर कोई असर नहीं पड़ेगा।

असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा शर्मा की धमकियों पर प्रतिक्रिया देते हुए मानवाधिकार कार्यकर्ता हर्ष मंदर ने कहा कि इनका उनके काम पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा और वे अल्पसंख्यकों के अधिकारों के लिए पूरी मजबूती के साथ काम करते रहेंगे।
गौरतलब है कि इसी सप्ताह की शुरुआत में हर्ष मंदर ने मुसलमानों के खिलाफ की गई विवादास्पद टिप्पणियों को लेकर हिमंता बिस्वा शर्मा के विरुद्ध दिल्ली के हौज खास थाने में शिकायत दर्ज कराई थी।
इसके जवाब में शनिवार (31 जनवरी) को गोलाघाट ज़िले के खुमताई में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान शर्मा ने मंदर द्वारा दर्ज कराई गई शिकायत का उल्लेख करते हुए कहा, “उन्होंने मेरे खिलाफ सिर्फ एक मामला दर्ज कराया है। अब देखिए, मैं उनके खिलाफ कम से कम 100 मामले दर्ज कराऊंगा, क्योंकि इसके लिए मेरे पास पर्याप्त सामग्री है।”
द वायर हिंदी से बातचीत में मंदर ने कहा, “वे (हिमंता) रोज़ अपने ही नागरिकों के एक तबके के खिलाफ नफरती भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं—जैसे पांच लाख ‘मिया’ लोगों को एसआर से हटाने और उन्हें परेशान करने की अपील करना। एक संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति को इस तरह की नफरती भाषा बोलने का कोई अधिकार नहीं है। इसी कारण मैंने शिकायत दर्ज कराई है।”
मंदर ने आगे कहा, “अब मुख्यमंत्री मेरे खिलाफ केस दर्ज कराने की बात कर रहे हैं। इससे पहले भी उन्होंने विधानसभा में कहा था कि वे मुझे जेल भेज देंगे, क्योंकि मैंने मुसलमानों की मदद की है। यह बेहद विचित्र है कि पीड़ितों को इंसाफ दिलाने के लिए कानूनी मानवाधिकार सहायता पहुंचाना अपराध माना जा रहा है। देश के कानून में ऐसा कहीं नहीं है। अगर वे कोई नया कानून बना रहे हैं तो अलग बात है। किस कानून के तहत कौन-सा मामला दर्ज होगा, यह स्पष्ट नहीं है—यह महज़ एक धमकी है।”
शर्मा के बयानों को भाजपा-आरएसएस की विचारधारा से जोड़ते हुए मंदर ने कहा, “आरएसएस-भाजपा की विचारधारा में सौ साल से यह धारणा रही है कि एक मजहब, खासकर इस्लाम को मानने वाले लोग इस देश के बराबर के नागरिक नहीं हो सकते। गांधी जी की हत्या भी इसी सोच का परिणाम थी, क्योंकि उन्होंने कहा था कि यह देश सबके लिए बराबर है। हम भी मानते हैं कि यह देश सबका है। अगर किसी एक मजहब के लोगों के साथ सरकार नाइंसाफी करती है, तो यह देश की सभ्यता, हमारी आज़ादी की लड़ाई और गांधी जी की शहादत के खिलाफ है।”
अगस्त 2025 में शर्मा द्वारा मंदर को पाकिस्तान और बांग्लादेश की तरह असम को कमजोर करने वाला बताए जाने पर प्रतिक्रिया देते हुए मंदर ने कहा, “आजादी की लड़ाई के समय भी इन्हीं लोगों (आरएसएस-भाजपा) ने गांधी जी पर ऐसे ही आरोप लगाए थे। ये लोग हमारे नेताओं पर लगातार देशद्रोह जैसे आरोप लगाते रहे हैं। हम इस देश से बेहद प्यार करते हैं और इसलिए यह सुनिश्चित करने के लिए काम कर रहे हैं कि किसी के साथ कोई नाइंसाफी न हो।”
मुख्यमंत्री की हालिया धमकियों के संदर्भ में मंदर ने कहा, “इन धमकियों का मेरे काम पर कोई असर नहीं पड़ेगा। हम पूरी मजबूती के साथ काम करते रहेंगे।”
“एनआरसी की प्रक्रिया खराब कर दी”
31 जनवरी को मीडिया से बातचीत में शर्मा ने कहा कि एनआरसी के अपडेट के दौरान मंदर और कुछ अन्य लोग इस प्रक्रिया में शामिल थे और उन्होंने इसे “पूरी तरह से खराब कर दिया।” उन्होंने दावा किया कि यदि उस समय वे सत्ता में होते, तो इस पर कड़ी कार्रवाई की जाती।
शर्मा ने मंदर पर असम में राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) की प्रक्रिया को ‘नष्ट’ करने का आरोप लगाया। मुख्यमंत्री के अनुसार, एनआरसी को अपडेट करने की प्रक्रिया को पटरी से उतारने में मंदर की भूमिका रही और इस दौरान बड़े पैमाने पर अनियमितताएं हुईं।
मुख्यमंत्री ने यह भी आरोप लगाया कि एनआरसी अपडेट के दौरान अयोग्य आवेदकों के नाम सूची में शामिल कराने के लिए फर्जी संबंध (फेक लिंक) तैयार किए गए थे। उन्होंने दोहराया कि कार्यकर्ताओं की दखलअंदाजी के कारण पूरी प्रक्रिया की विश्वसनीयता प्रभावित हुई।
द वायर हिंदी से बातचीत में मंदर ने इन आरोपों का जवाब देते हुए कहा, “निश्चित रूप से मैंने कई वर्षों तक—जब असम में एनआरसी की प्रक्रिया चल रही थी—मुसलमानों को कानूनी प्रक्रिया में सहायता दी। एनआरसी एक लंबी और जटिल प्रक्रिया थी, जिसमें दस्तावेज प्रस्तुत करने होते थे। मेरा मुख्य काम डिटेंशन सेंटरों में था, जहां बहुत से गरीब और निरुद्ध लोग अपने दस्तावेज प्रस्तुत नहीं कर पा रहे थे।”
उन्होंने बताया, “राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने मुझे ‘मॉनिटर फॉर माइनॉरिटीज़’ के रूप में नियुक्त किया था। इसी हैसियत से मैंने डिटेंशन सेंटरों का दौरा किया, जहां कई लोगों को वर्षों तक जेल जैसी परिस्थितियों में रखा गया था।”
मंदर ने आगे कहा, “मैंने इस संबंध में एक रिपोर्ट तैयार की, जिसके आधार पर सुप्रीम कोर्ट में मामला दर्ज हुआ और यह कहा गया कि संदिग्ध लोगों को वर्षों तक जेल जैसी परिस्थितियों में रखना गैरकानूनी और असंवैधानिक है। मैंने डिटेंशन सेंटरों से रिहाई, एनआरसी में दस्तावेज प्रस्तुत कराने में मदद और आत्महत्या करने वाले लोगों के परिवारों के साथ भी काम किया। कई लोगों ने इसलिए आत्महत्या की क्योंकि वे अपनी नागरिकता साबित नहीं कर पा रहे थे। पूरी प्रक्रिया के दौरान मैं सबसे गरीब और हाशिये पर पड़े लोगों की सहायता करता रहा और मानवाधिकारों की रक्षा को अपनी जिम्मेदारी माना।”
गौरतलब है कि असम के नागरिकों की अंतिम सूची, यानी अपडेटेड एनआरसी, 31 अगस्त 2019 को जारी की गई थी। इस सूची में 3,11,21,004 लोगों को शामिल किया गया था, जबकि 19,06,657 लोगों को बाहर रखा गया। हालांकि, एनआरसी को अब तक आधिकारिक रूप से अधिसूचित नहीं किया गया है।
शर्मा के खिलाफ हर्ष मंदर की पुलिस शिकायत
हर्ष मंदर ने 27 जनवरी को मुख्यमंत्री द्वारा दिए गए सार्वजनिक बयानों के खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज कराई थी। मंदर का कहना है कि ये बयान “असम में बांग्ला भाषी मुसलमानों के खिलाफ नफरत, उत्पीड़न और भेदभाव को बढ़ावा देते हैं।”
मंदर ने दिल्ली के हौज खास थाने में दी गई शिकायत में भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की उन धाराओं के तहत एफआईआर दर्ज करने की मांग की है, जो दुश्मनी को बढ़ावा देने, राष्ट्रीय एकता के लिए हानिकारक दावे करने, सार्वजनिक उपद्रव भड़काने और धार्मिक भावनाओं को आहत करने से संबंधित हैं।
उन्होंने यह भी अनुरोध किया है कि मामले की निष्पक्ष जांच की जाए और असम में चल रही विशेष पुनरीक्षण (एसआर) प्रक्रिया के दौरान भविष्य में इस तरह के बयानों को रोकने के लिए तत्काल कदम उठाए जाएं।
गौरतलब है कि 27 जनवरी को शर्मा ने कहा था, “कांग्रेस मुझे जितना चाहे गाली दे, मेरा काम मिया लोगों की ज़िंदगी मुश्किल बनाना है।” उन्होंने लोगों से उस समुदाय को परेशान करने की अपील भी की थी। शर्मा ने कहा था, “अगर रिक्शा का किराया पांच रुपये है, तो उन्हें चार रुपये दीजिए। जब तक उन्हें परेशानी नहीं होगी, वे असम नहीं छोड़ेंगे।”
मुख्यमंत्री ने यह भी स्वीकार किया था कि मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण के दौरान भाजपा कार्यकर्ताओं को इस समुदाय के लोगों के खिलाफ शिकायतें और आपत्तियां दर्ज करने के निर्देश दिए गए थे।
उन्होंने कहा था, “हम सभी जानते हैं कि असम में बांग्लादेशी मिया मौजूद हैं। लेकिन अगर विशेष पुनरीक्षण के दौरान उनमें से किसी को भी नोटिस नहीं मिलता, तो इसका क्या मतलब होगा? इसका अर्थ यही होगा कि असम में कोई अवैध विदेशी नहीं है।”
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली पुलिस ने कहा है कि वह इस शिकायत की जांच कर रही है।
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असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा शर्मा की धमकियों पर प्रतिक्रिया देते हुए मानवाधिकार कार्यकर्ता हर्ष मंदर ने कहा कि इनका उनके काम पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा और वे अल्पसंख्यकों के अधिकारों के लिए पूरी मजबूती के साथ काम करते रहेंगे।
गौरतलब है कि इसी सप्ताह की शुरुआत में हर्ष मंदर ने मुसलमानों के खिलाफ की गई विवादास्पद टिप्पणियों को लेकर हिमंता बिस्वा शर्मा के विरुद्ध दिल्ली के हौज खास थाने में शिकायत दर्ज कराई थी।
इसके जवाब में शनिवार (31 जनवरी) को गोलाघाट ज़िले के खुमताई में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान शर्मा ने मंदर द्वारा दर्ज कराई गई शिकायत का उल्लेख करते हुए कहा, “उन्होंने मेरे खिलाफ सिर्फ एक मामला दर्ज कराया है। अब देखिए, मैं उनके खिलाफ कम से कम 100 मामले दर्ज कराऊंगा, क्योंकि इसके लिए मेरे पास पर्याप्त सामग्री है।”
द वायर हिंदी से बातचीत में मंदर ने कहा, “वे (हिमंता) रोज़ अपने ही नागरिकों के एक तबके के खिलाफ नफरती भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं—जैसे पांच लाख ‘मिया’ लोगों को एसआर से हटाने और उन्हें परेशान करने की अपील करना। एक संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति को इस तरह की नफरती भाषा बोलने का कोई अधिकार नहीं है। इसी कारण मैंने शिकायत दर्ज कराई है।”
मंदर ने आगे कहा, “अब मुख्यमंत्री मेरे खिलाफ केस दर्ज कराने की बात कर रहे हैं। इससे पहले भी उन्होंने विधानसभा में कहा था कि वे मुझे जेल भेज देंगे, क्योंकि मैंने मुसलमानों की मदद की है। यह बेहद विचित्र है कि पीड़ितों को इंसाफ दिलाने के लिए कानूनी मानवाधिकार सहायता पहुंचाना अपराध माना जा रहा है। देश के कानून में ऐसा कहीं नहीं है। अगर वे कोई नया कानून बना रहे हैं तो अलग बात है। किस कानून के तहत कौन-सा मामला दर्ज होगा, यह स्पष्ट नहीं है—यह महज़ एक धमकी है।”
शर्मा के बयानों को भाजपा-आरएसएस की विचारधारा से जोड़ते हुए मंदर ने कहा, “आरएसएस-भाजपा की विचारधारा में सौ साल से यह धारणा रही है कि एक मजहब, खासकर इस्लाम को मानने वाले लोग इस देश के बराबर के नागरिक नहीं हो सकते। गांधी जी की हत्या भी इसी सोच का परिणाम थी, क्योंकि उन्होंने कहा था कि यह देश सबके लिए बराबर है। हम भी मानते हैं कि यह देश सबका है। अगर किसी एक मजहब के लोगों के साथ सरकार नाइंसाफी करती है, तो यह देश की सभ्यता, हमारी आज़ादी की लड़ाई और गांधी जी की शहादत के खिलाफ है।”
अगस्त 2025 में शर्मा द्वारा मंदर को पाकिस्तान और बांग्लादेश की तरह असम को कमजोर करने वाला बताए जाने पर प्रतिक्रिया देते हुए मंदर ने कहा, “आजादी की लड़ाई के समय भी इन्हीं लोगों (आरएसएस-भाजपा) ने गांधी जी पर ऐसे ही आरोप लगाए थे। ये लोग हमारे नेताओं पर लगातार देशद्रोह जैसे आरोप लगाते रहे हैं। हम इस देश से बेहद प्यार करते हैं और इसलिए यह सुनिश्चित करने के लिए काम कर रहे हैं कि किसी के साथ कोई नाइंसाफी न हो।”
मुख्यमंत्री की हालिया धमकियों के संदर्भ में मंदर ने कहा, “इन धमकियों का मेरे काम पर कोई असर नहीं पड़ेगा। हम पूरी मजबूती के साथ काम करते रहेंगे।”
“एनआरसी की प्रक्रिया खराब कर दी”
31 जनवरी को मीडिया से बातचीत में शर्मा ने कहा कि एनआरसी के अपडेट के दौरान मंदर और कुछ अन्य लोग इस प्रक्रिया में शामिल थे और उन्होंने इसे “पूरी तरह से खराब कर दिया।” उन्होंने दावा किया कि यदि उस समय वे सत्ता में होते, तो इस पर कड़ी कार्रवाई की जाती।
शर्मा ने मंदर पर असम में राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) की प्रक्रिया को ‘नष्ट’ करने का आरोप लगाया। मुख्यमंत्री के अनुसार, एनआरसी को अपडेट करने की प्रक्रिया को पटरी से उतारने में मंदर की भूमिका रही और इस दौरान बड़े पैमाने पर अनियमितताएं हुईं।
मुख्यमंत्री ने यह भी आरोप लगाया कि एनआरसी अपडेट के दौरान अयोग्य आवेदकों के नाम सूची में शामिल कराने के लिए फर्जी संबंध (फेक लिंक) तैयार किए गए थे। उन्होंने दोहराया कि कार्यकर्ताओं की दखलअंदाजी के कारण पूरी प्रक्रिया की विश्वसनीयता प्रभावित हुई।
द वायर हिंदी से बातचीत में मंदर ने इन आरोपों का जवाब देते हुए कहा, “निश्चित रूप से मैंने कई वर्षों तक—जब असम में एनआरसी की प्रक्रिया चल रही थी—मुसलमानों को कानूनी प्रक्रिया में सहायता दी। एनआरसी एक लंबी और जटिल प्रक्रिया थी, जिसमें दस्तावेज प्रस्तुत करने होते थे। मेरा मुख्य काम डिटेंशन सेंटरों में था, जहां बहुत से गरीब और निरुद्ध लोग अपने दस्तावेज प्रस्तुत नहीं कर पा रहे थे।”
उन्होंने बताया, “राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने मुझे ‘मॉनिटर फॉर माइनॉरिटीज़’ के रूप में नियुक्त किया था। इसी हैसियत से मैंने डिटेंशन सेंटरों का दौरा किया, जहां कई लोगों को वर्षों तक जेल जैसी परिस्थितियों में रखा गया था।”
मंदर ने आगे कहा, “मैंने इस संबंध में एक रिपोर्ट तैयार की, जिसके आधार पर सुप्रीम कोर्ट में मामला दर्ज हुआ और यह कहा गया कि संदिग्ध लोगों को वर्षों तक जेल जैसी परिस्थितियों में रखना गैरकानूनी और असंवैधानिक है। मैंने डिटेंशन सेंटरों से रिहाई, एनआरसी में दस्तावेज प्रस्तुत कराने में मदद और आत्महत्या करने वाले लोगों के परिवारों के साथ भी काम किया। कई लोगों ने इसलिए आत्महत्या की क्योंकि वे अपनी नागरिकता साबित नहीं कर पा रहे थे। पूरी प्रक्रिया के दौरान मैं सबसे गरीब और हाशिये पर पड़े लोगों की सहायता करता रहा और मानवाधिकारों की रक्षा को अपनी जिम्मेदारी माना।”
गौरतलब है कि असम के नागरिकों की अंतिम सूची, यानी अपडेटेड एनआरसी, 31 अगस्त 2019 को जारी की गई थी। इस सूची में 3,11,21,004 लोगों को शामिल किया गया था, जबकि 19,06,657 लोगों को बाहर रखा गया। हालांकि, एनआरसी को अब तक आधिकारिक रूप से अधिसूचित नहीं किया गया है।
शर्मा के खिलाफ हर्ष मंदर की पुलिस शिकायत
हर्ष मंदर ने 27 जनवरी को मुख्यमंत्री द्वारा दिए गए सार्वजनिक बयानों के खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज कराई थी। मंदर का कहना है कि ये बयान “असम में बांग्ला भाषी मुसलमानों के खिलाफ नफरत, उत्पीड़न और भेदभाव को बढ़ावा देते हैं।”
मंदर ने दिल्ली के हौज खास थाने में दी गई शिकायत में भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की उन धाराओं के तहत एफआईआर दर्ज करने की मांग की है, जो दुश्मनी को बढ़ावा देने, राष्ट्रीय एकता के लिए हानिकारक दावे करने, सार्वजनिक उपद्रव भड़काने और धार्मिक भावनाओं को आहत करने से संबंधित हैं।
उन्होंने यह भी अनुरोध किया है कि मामले की निष्पक्ष जांच की जाए और असम में चल रही विशेष पुनरीक्षण (एसआर) प्रक्रिया के दौरान भविष्य में इस तरह के बयानों को रोकने के लिए तत्काल कदम उठाए जाएं।
गौरतलब है कि 27 जनवरी को शर्मा ने कहा था, “कांग्रेस मुझे जितना चाहे गाली दे, मेरा काम मिया लोगों की ज़िंदगी मुश्किल बनाना है।” उन्होंने लोगों से उस समुदाय को परेशान करने की अपील भी की थी। शर्मा ने कहा था, “अगर रिक्शा का किराया पांच रुपये है, तो उन्हें चार रुपये दीजिए। जब तक उन्हें परेशानी नहीं होगी, वे असम नहीं छोड़ेंगे।”
मुख्यमंत्री ने यह भी स्वीकार किया था कि मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण के दौरान भाजपा कार्यकर्ताओं को इस समुदाय के लोगों के खिलाफ शिकायतें और आपत्तियां दर्ज करने के निर्देश दिए गए थे।
उन्होंने कहा था, “हम सभी जानते हैं कि असम में बांग्लादेशी मिया मौजूद हैं। लेकिन अगर विशेष पुनरीक्षण के दौरान उनमें से किसी को भी नोटिस नहीं मिलता, तो इसका क्या मतलब होगा? इसका अर्थ यही होगा कि असम में कोई अवैध विदेशी नहीं है।”
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली पुलिस ने कहा है कि वह इस शिकायत की जांच कर रही है।
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