‘गंभीर शिकायतें’: बॉम्बे हाईकोर्ट ने छात्रों की चिंताओं का समर्थन किया, पुणे में MPSC के खिलाफ़ विरोध-प्रदर्शन जारी।

Written by sabrang india | Published on: October 8, 2026
बॉम्बे हाई कोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार को भर्ती बैकलॉग के बारे में बताने और लोगों का भरोसा बहाल करने का निर्देश दिया है; तीन में से दो प्रदर्शन स्थलों पर अभी भी प्रदर्शनकारी डटे हुए हैं, और रोहित पवार के नेतृत्व वाला आंदोलन वहां से हटने को तैयार नहीं है।


फोटो साभार : पीटीआई

पुणे में महाराष्ट्र लोक सेवा आयोग (MPSC) के खिलाफ विरोध प्रदर्शन गुरुवार, 8 अक्टूबर को भी जारी रहा, जबकि बॉम्बे हाई कोर्ट ने प्रदर्शनकारी छात्रों से अपनी पढ़ाई पर लौटने और सार्वजनिक सड़कों से हटकर प्रदर्शन करने की अपील की थी। तीन में से दो प्रदर्शनकारी समूहों ने हटने या जगह बदलने से इनकार कर दिया है, जो राज्य की भर्ती प्रक्रिया पर छात्रों के गहरे अविश्वास को दिखाता है। NCP (शरदचंद्र पवार) के विधायक रोहित पवार के नेतृत्व में एसएम जोशी ब्रिज पर हो रहा बड़ा विरोध प्रदर्शन 8 अक्टूबर को सातवें दिन में प्रवेश कर गया, जबकि लाल बहादुर शास्त्री रोड पर भी एक और प्रदर्शन जारी रहा। हालांकि, हाई कोर्ट की सुनवाई के बाद अल्का चौक पर हो रहा प्रदर्शन खत्म कर दिया गया।

एसएम जोशी ब्रिज पर हो रहे विरोध प्रदर्शन में छह लोगों के चार दिनों से भूख हड़ताल पर होने की खबर है। यह आंदोलन MPSC चेयरमैन विवेक भीमन्वार के इस्तीफे की मांग पर केंद्रित है। उन पर भर्ती प्रक्रिया में गड़बड़ी के आरोप हैं, जिसमें इस साल की शुरुआत में हुई ड्रग इंस्पेक्टर परीक्षा का पेपर लीक होने का आरोप भी शामिल है। 'इंडियन एक्सप्रेस' की रिपोर्ट के मुताबिक, इस विरोध प्रदर्शन में बड़ी संख्या में छात्र शामिल हुए हैं और राजनीतिक नेता भी लगातार वहां पहुंच रहे हैं।

पवार ने स्पष्ट कर दिया है कि प्रदर्शनकारियों की जगह बदलने की कोई योजना नहीं है। 'हिंदुस्तान टाइम्स' के अनुसार, समूह ने कहा, "हम MPSC चेयरमैन विवेक भीमन्वार के इस्तीफे तक इसी जगह पर अपना आंदोलन जारी रखेंगे।" पवार का कहना है कि प्रदर्शनकारियों ने इस जगह पर आंदोलन करने के लिए पुणे पुलिस कमिश्नर से अनुमति ली थी, इसलिए वे वहां से नहीं हटेंगे।

यह विरोध प्रदर्शन तब भी जारी है जब उस जगह के आसपास पुलिस की मौजूदगी बढ़ा दी गई है। इससे पहले, पुणे पुलिस कमिश्नर अमितेश कुमार ने इस आंदोलन को "गैर-कानूनी" बताया था और कहा था कि 70 से ज्यादा प्रदर्शनकारियों, कोचिंग क्लास और टेलीग्राम चैनलों को नोटिस जारी किए गए हैं। पुलिस ने कहा कि प्रदर्शनों से आने-जाने वालों को परेशानी हो रही है और चेतावनी दी कि कार्रवाई की जा सकती है।

कोर्ट ने माना कि छात्रों की शिकायतें गंभीर हैं

हालांकि, बुधवार को बॉम्बे हाई कोर्ट के दखल से छात्रों की शिकायतों का आधार खारिज नहीं हुआ। चीफ जस्टिस महेश चंद्र त्रिपाठी और जस्टिस अद्वैत सेठना की डिवीजन बेंच ने कहा कि पुणे के छात्र आम तौर पर अपनी पढ़ाई छोड़कर सड़कों पर उतरने के इच्छुक नहीं होते हैं। कोर्ट ने कहा कि अगर वे विरोध कर रहे हैं, तो इसका मतलब है कि उनकी शिकायतें गंभीर हैं।

लाइव-लॉ की रिपोर्ट के अनुसार, बेंच ने कहा, "पुणे राज्य का एजुकेशन हब है और पढ़ाई के लिए इस शहर में आने वाले छात्र अपनी पढ़ाई में सचमुच दिलचस्पी रखते हैं। वे अपनी मांगों के लिए सड़कों पर उतरने के शौकीन नहीं हैं, लेकिन अगर वे आंदोलन कर रहे हैं, तो इसका मतलब है कि कुछ गंभीर शिकायतें हैं; ऐसे छात्रों को असामाजिक नहीं कहा जा सकता।"

जजों ने इस सुझाव को भी खारिज कर दिया कि विरोध करने वाले छात्रों को असामाजिक तत्व माना जाए। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि जब छात्रों को लगता है कि परीक्षा में गड़बड़ी हुई है, तो उन्हें आंदोलन करने का अधिकार है।

लाइव-लॉ की रिपोर्ट के अनुसार, बेंच ने कहा, "वे छात्र हैं, असामाजिक तत्व नहीं... ऐसा ही होना चाहिए... जैसे ही कोई परीक्षा खत्म होती है और उन्हें पता चलता है कि प्रक्रिया में कुछ गड़बड़ी हुई है, तो छात्रों को आंदोलन करने का पूरा अधिकार है... आपने पहले ही बताया है कि 70,000 पद खाली दिखाए गए हैं... इसकी विस्तृत जांच होनी चाहिए। इस बात पर भी ध्यान दें कि देश के सभी माता-पिता मुश्किल दौर से गुजर रहे हैं।"

साथ ही, कोर्ट ने राज्य को MPSC भर्ती को लेकर भरोसे के संकट को दूर करने का निर्देश दिया। कोर्ट ने कहा कि 70,000 से ज्यादा खाली पदों का मामला दांव पर है और परीक्षाएं निष्पक्ष रूप से और बिना किसी गड़बड़ी के आयोजित की जानी चाहिए। महाराष्ट्र सरकार को निर्देश दिया गया है कि वह अपनी प्रस्तावित भर्ती प्रक्रिया और अलग-अलग विभागों में खाली पदों की संख्या का विवरण रिकॉर्ड पर रखे। राज्य को यह जानकारी देने के लिए तीन हफ्ते का समय दिया गया है।

विरोध प्रदर्शन किसी एक मांग को लेकर नहीं हैं

पुणे का आंदोलन तीन अलग-अलग विरोध प्रदर्शनों में बंट गया है, जो MPSC परीक्षा के पैटर्न और आयोग के कामकाज को लेकर उम्मीदवारों के बीच मतभेदों को दिखाता है। एसएम जोशी ब्रिज पर पवार के नेतृत्व में हो रहा विरोध प्रदर्शन मुख्य रूप से MPSC चेयरमैन विवेक भीमन्वार को हटाने की मांग पर केंद्रित है।

अहिल्या अभ्यासिका के पास लाल बहादुर शास्त्री रोड पर, नितिन अंधाले के नेतृत्व में एक और समूह ऑब्जेक्टिव परीक्षा पैटर्न को फिर से लागू करने की मांग कर रहा है।

अल्का चौक पर, छात्र डिस्क्रिप्टिव पैटर्न को जारी रखने की मांग कर रहे थे। उनका तर्क था कि उम्मीदवारों ने मौजूदा फॉर्मेट के हिसाब से तैयारी में कई साल बिताए हैं और अचानक हुए किसी और बदलाव से उन पर बुरा असर पड़ेगा। हाई कोर्ट की सुनवाई के बाद वह विरोध प्रदर्शन वापस ले लिया गया। 'फ्री प्रेस जर्नल' की रिपोर्ट के मुताबिक, समूह ने कोर्ट की अपील का सम्मान करने और अपनी तैयारी में वापस लौटने का फैसला किया।

इन मतभेदों के बावजूद, MPSC के भीतर जवाबदेही का सवाल सभी विरोध प्रदर्शनों में एक आम बात बनकर उभरा है। एसएम जोशी ब्रिज पर चल रहे आंदोलन में लगातार यह बात कही जा रही है कि कथित अनियमितताओं को सिर्फ़ प्रशासनिक विवाद नहीं माना जा सकता।

अब कोर्ट के सामने 'भरोसा बहाल करने' का मुद्दा है

हाई कोर्ट की टिप्पणियों ने राज्य सरकार को मुश्किल स्थिति में डाल दिया है। सरकार ने छात्रों से अपनी पढ़ाई में लौटने का आग्रह किया है, जबकि कोर्ट ने भी उनसे सार्वजनिक सड़कों पर न आने और किसी भी आगे के विरोध प्रदर्शन के लिए अनुमति लेने को कहा है। लेकिन साथ ही, बेंच ने साफ तौर पर माना है कि छात्रों के अविश्वास को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। “अब यह मामला कोर्ट के सामने है... हम छात्रों से क्लास में वापस जाने का अनुरोध करेंगे। हम इसे यूं ही नहीं छोड़ेंगे। भरोसा फिर से कायम होना चाहिए। परीक्षाएं निष्पक्ष तरीके से होनी चाहिए। जहां तक कमीशन की बात है, आप (राज्य) जानते हैं कि चेयरमैन को कैसे नियुक्त और हटाया जा सकता है। हम यह पक्का करेंगे कि राज्य की ओर से जवाब आए। हम चाहते हैं कि पहले बैकलॉग वाली खाली जगहें भरी जाएं... जो छात्र पढ़ाई में रुचि रखते हैं, उन्हें परीक्षा में शामिल होने का उचित मौका मिलना चाहिए... वे 70 हजार खाली जगहों के साथ आए हैं... उन माता-पिता की हालत देखिए जिन्होंने अपने बच्चों को पुणे भेजा है। ये बच्चे मासूम हैं। हम देखेंगे कि राज्य इस मामले से कैसे निपट रहा है। छात्रों से बस यही अनुरोध है कि वे फैकल्टी के साथ जुड़ें। वरना उनका करियर बदल जाएगा। पूरा ओरिएंटेशन बदल जाएगा। उन्हें ऐसी चीजों में शामिल नहीं होना चाहिए। एक अभिभावक के तौर पर हम यह पक्का करेंगे,” बेंच ने राज्य को नोटिस जारी करते हुए कहा। LiveLaw ने इसे प्रकाशित किया।

जजों ने राज्य से यह पक्का करने को भी कहा कि खाली जगहों के बड़े बैकलॉग को ठीक किया जाए, क्योंकि हजारों युवाओं का करियर एक काम करने वाली और भरोसेमंद भर्ती प्रक्रिया पर निर्भर करता है। इसलिए कोर्ट का दखल ट्रैफिक जाम की फौरी समस्या से कहीं आगे जाता है। इसने असल में MPSC भर्ती प्रक्रिया की विश्वसनीयता को ही जांच के दायरे में ला दिया है।

लोगों ने सड़क जाम को लेकर चिंता जताई

कोर्ट में यह याचिका लोगों की उन शिकायतों के बाद दायर की गई थी जिनमें विरोध प्रदर्शनों के कारण ट्रैफिक जाम और दिक्कतों का जिक्र था, खासकर पुणे के भीड़भाड़ वाले 'पेठ' इलाकों में, जहां कोचिंग क्लास, लाइब्रेरी और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वालों के लिए रहने की जगहें हैं। निवासियों ने मीडिया को बताया कि बार-बार सड़क जाम होने के कारण उन्हें दूसरे रास्तों से जाना पड़ा और शाम के समय ट्रैफिक की स्थिति बहुत मुश्किल हो गई।

वहां रहने वालीं उमा जोशी ने कहा कि गंजवे चौक इलाके से आना-जाना मुश्किल हो गया है क्योंकि वैकल्पिक रास्ते लेने पड़ रहे हैं और भीड़ भी बढ़ रही है।

एक और निवासी, सुशांत फड़के ने कहा कि बार-बार हो रहे विरोध-प्रदर्शनों ने इस भीड़-भाड़ वाले इलाके में पहले से मौजूद दिक्कतों को और बढ़ा दिया है।

इसके बाद कोर्ट ने साफ किया कि छात्रों की शिकायतें सार्वजनिक सड़कों पर अनिश्चितकालीन रुकावट को सही नहीं ठहरा सकतीं। कोर्ट ने उन प्रदर्शनकारियों से कहा जो अपना आंदोलन जारी रखना चाहते हैं कि वे जरूरी मंजूरी लें और कोई ऐसी वैकल्पिक जगह चुनें जहां लोगों की आवाजाही में कोई रुकावट न आए।

LiveLaw की रिपोर्ट के अनुसार, बेंच ने भरोसा दिलाया, "लोगों को परेशानी नहीं होनी चाहिए। जहां तक आपकी चिंता का सवाल है, हम यह सुनिश्चित करेंगे कि भर्ती प्रक्रिया का ध्यान रखा जाए। और गड़बड़ी के बारे में जानकारी मिल जाएगी कि क्या किया गया है। हम अगले दिन इन सब बातों की जांच करेंगे। तब तक, हम सभी प्रदर्शनकारी गुटों से अपील करते हैं कि वे अपना विरोध-प्रदर्शन वापस लें और फैकल्टी में शामिल हों। अब यह मामला कोर्ट के सामने है।" 

पूरा आदेश नीचे पढ़ा जा सकता है:



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