सबरंग संवाद: लोग चुप हैं इसलिए लोकतंत्र सो रहा है - प्रोफेसर रूपरेखा वर्मा

Written by Sabrangindia Staff | Published on: October 5, 2022
सुप्रीम कोर्ट से बेल प्राप्त पत्रकार सिद्दीकी कप्पन को जब यूपी में ज़मानतदार की जरूरत थी, तब सिर्फ लखनऊ विश्वविद्यालय की पूर्व वाइस चांसलर प्रोफ रूपरेखा वर्मा उनकी जमानत के लिए खड़ी हुई। हालांकि वे कप्पन को पर्सनली नहीं जानती थीं लेकिन उन्हें इस बात की फिक्र थी कि किसी भी नागरिक का संवैधानिक हक नहीं मारा जाना चाहिए। उन्हें सामाजिक सौहार्द के लिए प्यार के संदेश वाले पर्चे बांटते भी लखनऊ की सड़कों पर देखा गया है। CAA/ NRC जन आंदोलन सहित महिला अधिकारों समेत विभिन्न दबे-कुचले वर्गों के लिए आगे आने वाली रूपरेखा वर्मा 40 वर्षों तक अध्यापन से जुड़ी रहीं। रूपरेखा वर्मा लखनऊ विश्वविद्यालय में दर्शन शास्‍त्र की प्रवक्ता और प्रोफेसर थीं । डिपार्टमेंट की हेड और विश्वविद्यालय की कुलपति भी रह चुकी हैं।  रूपरेखा वर्मा लेखिका भी हैं। उनके चार दर्जन से अधिक शोध पत्र भारत और विदेशों में विभिन्न पुस्तकों और पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। सबरंग इंडिया ने रूप रेखा वर्मा से सामाजिक तानेबाने, संवैधानिक मूल्य, सरकारों की भूमिका आदि मुद्दों पर एक्सक्लूसिव बातचीत की है। पढ़िए रूप रेखा वर्मा का साक्षात्कार....




 

सबरंग -  चाहे वो NRC/CAA के खिलाफ हो, या कौमी एकता के लिए हो, या सिद्दीक कप्पन के बेल की बात हो, आपको हमेशा एक निडर स्टैंड लेते हुए देखा गया है। हाल के कुछ सालों में, खासतौर पर यूपी में जिस तरह का राजनीतिक माहौल तैयार हुआ है उसमें उसमें आप खुद की और आपके जैसे लोगों की क्या भूमिका देखती हैं।

रूपरेखा वर्मा - देखिए, आज माहौल चाहे जैसा भी हो या न हो, हम आजादी के बाद से ही देखते आए थे कि बहुत सारी गलतियां सरकारों की तरफ से हुईं, जनता की तरफ से हुईं और बहुत सारी जहालतों में और ऐसी चीजों में जो आपसी मेलजोल को बाधित करती हैं, वो रही हैं लेकिन, इन परेशानियों को काटते, छांटते हम लोग आगे बढ़ते रहे हैं। तो जो लोकतंत्र अथवा जम्हूरियत जिसे हम कहते हैं उसमें सरकारों का तो जो रोल होता है, वो तो बहुत बड़ा होता ही है इनके पास सत्ता और साधन दोनों ही होते हैं ये लोग जितना तेजी से और असरदार तरीके से देश को आगे बढ़ाने में या पीछे खींचने में अहम रोल निभाते हैं। लेकिन अगर जनता की बात की जाए तो उसे चीजों को बेहतर करने के लिए जागरुक और चौकन्ना रहना चाहिए यही लोकतंत्र की जान है उसे सरकार को अपने कब्जे में रखना चाहिए, यह एक आदर्श बात हुई। लेकिन होता यह है कि जनता का बड़ा हिस्सा अपनी परेशानियों में लगा रहता है और वे इसे समझते भी नहीं हैं कि सरकार का काम कैसे होता है और उस पर कैसे नजर रखी जाए, तब चंद लोग ही आगे आते हैं। जो लोग ज्यादा पढ़ लिख गए हैं उनका कर्तव्य बनता है कि वे सरकार के कामकाज पर नजर रखें। अगर कुछ गलत होता नजर आता है तो उसके खिलाफ आवाज उठाएं और जनता को जागरुक करें, मैं इसी तरह से काम करती रही हूं। विपक्ष में चाहे जो भी दल हो उसको भी यही काम करना चाहिए। उन्हें जनता को बताना चाहिए कि सरकार क्या गलत कर रही है। लेकिन जब राजनीतिक पार्टियां यह करने में नाकाम रहती हैं तो हम जैसे लोगों को सामने आना पड़ता है।

सबरंग - लखनऊ जैसे शहर में सिविल सोसाइटी पर कैसा दबाव है? उनके काम पर इसका कैसा असर पड़ता है ?
रूपरेखा वर्मा - देखिए ये बहुत वाजिब सवाल है, सिविल सोसाइटी जिसमें एनजीओ भी शामिल हैं और वे लोग शामिल हैं जो राजनैतिक और सामाजिक कामों पर नजर रखते हैं और कुछ करने की ताकत रखते हैं तो इनमें से एक प्रतिशत तो वे हैं जिन्हें प्रोजेक्ट मिलना है और धन मिलना है ये इसे एक रोजगार के तौर पर लेते हैं। वे किसी लड़ाई में नहीं पड़ना चाहते हैं। लेकिन कुछ महत्वपूर्ण एनजीओ और इंडिविजुअल ऐसे भी रहे हैं जो जनसरोकार और समतावादी मूल्यों को प्राथमिकता देते हैं। एक प्रोजेक्ट के तौर पर काम खत्म कर लेना ही वे अपना कर्तव्य नहीं समझते। उनकी निगाह में देश का मतलब है जनता। लेकिन एक खास विचारधारा की सरकार में पिछले सात आठ सालों से यह हो रहा है कि सरकार के खिलाफ जिसने भी जुबान खोली है, गरीबों, वंचितों, दलितों, शोषितों, महिलाओं की आवाज उठाई है, उसे सताया जाता रहा है उनमें बहुत से लोग जेल में डाले गए हैं, मुकदमें लगाए गए हैं और कुछ के घर तोड़े गए हैं। इससे चारों तरफ डर का माहौल है। जनता की आवाज उठाने वाले कुछ लोग चुप हो गए हैं क्योंकि उनके भी परिवार हैं और वे कोई खतरा नहीं मोल लेना चाहते हैं। अगर जिन लोगों के परिवार नहीं भी हैं तो वे भी जेल नहीं जाना चाहते हैं, क्योंकि ऐसा नहीं है कि जेल में कोई ऐशोआराम की जिंदगी होगी। यह डर का माहौल बहुत खतरनाक है। लोग चुप हैं इसलिए लोकतंत्र सोया हुआ है। हममें से कई लोग आवाज उठाने के लिए सड़क पर निकलते भी हैं तो हमें घर में ही कैद कर लिया जाता है, कहीं रास्ते से उठाकर छोटी सी गाड़ी में सामान की तरह भरकर कहीं और छोड़ दिया जाता है। हमें डराया धमकाया भी जाता है। कुछ लोग तो हमारे बीच से भी कम हो गए हैं और कुछ जेल में पड़े हैं।

सबरंग -  और फिर भी लोग आवाज़ उठा रहे हैं
रूपरेखा वर्मा -  देखिए, ये इंसान की फितरत है, आप इतिहास उठाकर देखिए तो डिक्सनरी में डेमोक्रेसी नाम का शब्द ही नहीं था। सुकरात और ब्रूनो को सताया गया क्योंकि उन्होंने राजा को भगवान मानने से इंकार कर उनको सर्वशक्तिमान मानने से इंकार कर दिया था। गैलीलियो को भी सताया गया, इसी तरह हमारे हिंदुस्तान में भी बहुत सारे उदाहरण हैं। बौद्धों ने ब्राह्मणवाद की मुखालफत की तो उन्हें मार मारकर भगा दिया गया। राजा पुष्यमित्र ने बौद्धों को मरवाया और बौद्ध स्तूप तोड़ दिये। दुनियाभर में ऐसी बातें होती रही हैं लेकिन कुछ लोग ऐसे भी होते हैं कि वे सच्चाई को बोले बगैर नहीं रह सकते। ब्रूनो और सुकरात को पता था कि सत्ता की मुखालफत करना उनकी जान पर आफत के समान है लेकिन वे चुप नहीं रहे और बोले। कुछ लोगों को बोलने से आराम मिलता है तो कुछ लोग चुप रहते हैं। अगर भगत सिंह और हजरत मोहानी जैसे लोग हैं जिन्होंने अपनी जान की कुर्बानी दी, यह लिस्ट काफी लंबी है। वे अंग्रेजों के खिलाफ खड़े हुए और शहीद हुए लेकिन कुछ लोग अंग्रेजों का साथ देने वाले भी थे। वे बहुत कम लोग ही थे जिन्होंने लड़कर सामना किया। मैंने इन लोगों के उदाहरण इसलिए दिए हैं क्योंकि जो लोग सभी को डराना चाहते हैं लेकिन कुछ लोग डरने से इंकार कर देते हैं।

सबरंग -   उत्तर प्रदेश, लखनऊ, कहा जाए तो पूरे देशभर में मेलजोल की संस्कृति पर आक्रमण बढ़ा है। ...
रूपरेखा वर्मा -  गैर बीजेपी सरकार और बीजेपी सरकार, दोनों के ही कार्यकाल में सामाजिक ताना बाना तोड़ने वाले लोगों पर सख्ती से रोक नहीं लगाई गई। उनके इरादे हमें नहीं पता लेकिन सरकारों ने इनपर सख्ती नहीं की। हमारे जो वर्तमान मुख्यमंत्री हैं उनपर भड़काऊ भाषण और मुसलमानों के खिलाफ बोलने के बहुत सारे मुकदमें लगे थे लेकिन उन्होंने सरकार में आकर एक मुख्यमंत्री की हैसियत से अपने ही ऊपर से मुकदमे हटा दिए। ऐसे लोग सत्ता में हैं जो कि दो संप्रदायों के बीच में झगड़े कराना चाहते हैं। एक कहावत है कि ''जब सैंया भये कोतवाल तो डर काहे का'' यह सत्ताधारियों पर सटीक बैठती है। गैर भाजपाई सरकारों की विचारधारा में भले ही ऐसी बातें न रही हों लेकिन उन्होंने भी इन्हें रोकने में कोई सख्ती नहीं दिखाई। जो सामाजिक ताने बाने को तोड़ने वाली बातें थीं वे जनता के बीच पहुंचीं लेकिन जो भाईचारे की बात है वह नहीं पहुंच पाई। आजादी की लड़ाई भी भाईचारे से लड़ी गई थी उन मूल्यों की बातें लोगों तक पहुंची ही नहीं। ये बड़े खतरनाक लोग हैं लेकिन सत्ता में आने के बाद ये बेलगाम हो गए। यह सिर्फ सत्ता तक ही सीमित नहीं है बल्कि प्रचार की बदौलत लोगों को डराकर रखा गया।

सबरंग - आम लोगों में, उनकी रोज़मर्रा की ज़िन्दगी में इसका कितना असर दिखाई दे रहा है?
रूपरेखा वर्मा - देखिए, हिंदू मुसलमान के बीच में मेलजोल पूरी तरह मिटा नहीं है लेकिन कम जरूर हुआ है। यह आसानी से दिखता नहीं है लेकिन थोड़ा खरोंचने पर दिखता है। जैसे कि तमाम ऐसे लोग हैं जो हिंदू राष्ट्र के पक्ष में हैं और मानते हैं कि मुसलमानों ने बहुत गलत किया और फिर वो आज के मुसलमानों पर इसे ले आते हैं इसमें भी बड़ा घपला है। एंटी मुसलमान और एंटी क्रिश्चन व यहां तक एंटी वेस्टर्न डिस्कोर्स खड़ा किया गया और उसका एक कॉकटेल बनाया गया है जो लोगों को पिलाया जा रहा है। कुछ लोग तो अब खुलकर ऐसी बात को कहते हैं। मैं कई ट्रेवल एजेंसी और अन्य लोगों को जानती हूं जो खुलकर कहते हैं कि हम अपने यहां मुसलमानों को नहीं रखते। ऐसा 20-25 साल पहले नहीं था, अगर कोई ऐसी विचारधारा वाला होगा भी तो अपने अंदर इस बात को छिपाकर रखता था। यह बहुत बड़ा परिवर्तन है कि पहले जिस बात को आप शर्म से छिपा लेते थे लेकिन अब उसे फक्र से कह रहे हो। इसीलिए उनकी संख्या भी बढ़ी है। दूसरी तरह का जो फिरकापरस्त ग्रुप है वह ईद पर आपके घर कबाब भी खा लेगा, मुर्गा भी खा लेगा और सेंवई भी खा लेगा लेकिन बाद में कहेगा कि ये मुसलमान बड़े गलत होते हैं। वह यह भी बताएगा कि हमने लाल कपड़े में लपेटकर अपने घर में कुरान भी रखी है। ऐसे बहुत सारे लोग हैं जो अपने बचाव के लिए कुरान वाली बात को फक्र से बताएंगे लेकिन उनकी सारी बातें एंटी मुस्लिम होंगी। हिंदुओं में एक तीसरा ग्रुप है जिसका दिमाग बिल्कुल स्पष्ट है कि हिंदुस्तान सबका है। उनका मानना है कि हिंदुस्तान का मतलब ही सभी धर्मों का मेल है, इस पर सबका हक है और इसकी आजादी के लिए सभी धर्मों के लोगों ने अपना खून बहाया है, खुद को बर्बाद किया है और हिंदुस्तान तभी आगे बढ़ेगा जब सभी धर्म जाति के लोग हाथ में हाथ मिलाकर आगे बढ़ेंगे। अगर हम कहें कि सारे हिंदू ऐसे हो गये हैं या सारे हिंदू, हिंदू राष्ट्र मांगते हैं, ऐसा बिल्कुल भी नहीं है। सभी के साथ की बात करने वाला हिंदुओँ में जो वर्ग है वह पहले मेजॉरिटी में था लेकिन अब मेजॉरिटी में नहीं है। ये फर्क आया है। हालांकि, अभी यह भले ही मेजॉरिटी में न हो लेकिन फिर भी अच्छी संख्या है। ये सभी के हक की लड़ाई लड़ते हैं, चाहे इनमें तीस्ता सेतलवाड़ का नाम हो या अपूर्वानंद का। ये लोग सभी के हक की बात कर रहे हैं। हिंदुओं में आप तीन तरह के ग्रुप पाएंगे ये हैं- खुलकर मुस्लिम विरोधी, दबे स्वर वाले मुस्लिम विरोधी जिनके मन में मैल है और तीसरा मुस्लिमों को साथ लेकर चलने वाले।

सबरंग - इस माहौल का असर मुसलमानों पर कैसा रहा है?
रूपरेखा वर्मा - बहुत है। देखिए सच्चर कमेटी से पहले हमें कोई संख्या नहीं पता थी लेकिन यह पता था कि मुसलमानों में अशिक्षा और गरीबी बहुत थी। रिपोर्ट में आया कि दलितों में जिस तरह की मुफलिसी है, उससे ज्यादा मुसलमानों में है। जेंडर इक्वलिटी की बात करें तो मुझे मुसलमान और हिंदू दोनों ही घरों में सुनने को मिला कि देखिए, ये आ गईं घर तोड़ने वाली(औरतों के हक़ में बात करने के कारण)। मुसलमानों में मुफलिसी के साथ ही अशिक्षा के चलते वे बहुत डरे हुए हैं। जिंदा रहने के लिए बहुत सारे लोग कंप्रोमाइज करने को तैयार हैं। बहुत सारे मुसलमानों ने 10-20 साल किसी केस में जेल में बिताए हैं लेकिन इतने लंबे समय के बाद निर्दोष साबित हुए हैं। उनके पास ऐसी स्थिति पैदा हो गई कि या तो वे बेहतर काम की तरफ जाएं या पूरी तरह से सरेंडर कर दें। उनके खिलाफ ऐसे मिथ्या प्रचार चलाए गए कि उनमें डर का माहौल घर कर गया। हमें इस बात को संबोधित करना पड़ेगा। सरकार में इक्का दुक्का लोग जो सही आते हैं हमें उनसे उम्मीद करनी होगी। मेजॉरिटेरिन रूल को लेकर हमें सजग रहना होगा। किसी कम्युनिटी के आप सारे अधिकार रोक कर रखेंगे तो एक ऐसा खतरा पैदा हो जाएगा जिसकी रूल करने वालों को भी उम्मीद नहीं होगी।

सबरंग - जिस हिंदू राष्ट्र की बात की जा रही है, उसमें महिलाओं का स्थान क्या होगा?
रूपरेखा वर्मा -  देखिए देश के इतिहास में आज भी वो दस्तावेज मौजूद हैं, जिनमें कि हिंदू राष्ट्र का औरतों के प्रति जो विचार है वह मिल जाता है। जब नेहरू के समय में हिंदू कोड बिल आया तो श्यामा प्रसाद मुखर्जी की संस्था हिंदू महासभा और आरएसएस दोनों ने जमकर इसका विरोध किया। पार्लियामेंट में डिबेट हुईं और नेहरू पर सीधा आरोप लगाया कि विधवा विवाह को अनुमति देकर आप हिंदू संस्कृति को खराब कर रहे हैं। हिंदू कोड बिल सिविल कोड नहीं था और यह सिर्फ हिंदुओं के लिए ही था और इसमें एक सेक्शन महिलाओं के लिए भी था। आज जो सत्ताधारी हैं और हिंदू राष्ट्र के पक्षधर हैं, उन्होंने इसका जमकर विरोध किया। आप इसी से ही हिंदू राष्ट्र की परिकल्पना वालों की नजर में महिलाओं की स्थिति का अनुमान लगा सकते हैं। आजादी के बाद भी राजस्थान में सती होने की घटना सामने आई। रुपकंवर नाम की महिला ने पति की मृत्यु के बाद खुद को खत्म कर लिया। यह दिल दहला देने वाली घटना थी लेकिन एक वर्ग ने इसका खुलकर समर्थन किया। उस समय भाजपा या जनसंघ के नेताओं ने इसका समर्थन किया था और लोग सती का मंदिर बनाने की बात करने लगे। यह घटना संवैधानिक रूप से अपराध थी लेकिन एक वर्ग द्वारा इसका समर्थन किया जा रहा था, तब स्वामी अग्निवेश ने इसका विरोध किया था। अब अगर हाल के दौर की बात करें तो यति नरसिंहानंद जैसे लोग जो खुद को धर्मगुरू बताते हैं, हिंदू महिलाओं से 10-10 बच्चे पैदा करने की अपील कर रहे हैं ताकि वे मुसलमानों से निपट सकें। अब आप इन्हीं बातों से हिंदू राष्ट्र में महिलाओं की क्या स्थिति होगी सोच सकते हैं। इस विचार में महिलाओं को सिर्फ बच्चा पैदा करने की मशीन बनाकर फेंक देने पर ही जोर दिया गया है। हाल में ही भागवत जी (मोहन भागवत, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक) का बयान आया है कि अगर स्त्री ठीक से पति की सेवा न करे तो उसे छोड़ा जा सकता है। अब कानून को आप अपने पास रखे रहिए। क्योंकि आज जो सत्ता में हैं वे हिंदू राष्ट्र की बात कर रहे हैं और महिलाओं को छोड़े जाने की भी बात कर रहे हैं, वहीं आप मुसलमानों के मामले में तीन तलाक पर कायम हैं। इसमें सभी का नंबर आएगा चाहे वो हिंदू हो या मुसलमान अथवा बौद्ध या अन्य कोई भी।

सबरंग - अन्य राज्यों की तरह उत्तर प्रदेश में भी प्राइवेटाइजेशन की होड़ लगती हुई दिखाई दे रही है। दूसरी तरफ मुफ्त राशन वितरण जैसी वेलफेयर योजना भी चालू हैं। इसपर आपकी क्या राय है ?     
रूपरेखा वर्मा - देखिए, आज सार्वजनिक संपत्ति लगातार बेची जा रही है और कॉरपोरेटीकरण को बढ़ावा दिया जा रहा है। यह बहुत खतरनाक है। जो संपत्ति बेची जा रही है वह देश की जनता की है, टैक्सपेयर की वजह से बनी है। हम इसे सरकार को एक ट्रस्टी के तौर पर देते हैं। गांधी जी ने ट्रस्टी का जो कॉन्सेप्ट दिया था वह तो जमीन पर नहीं उतर पाया लेकिन लोकतंत्र में सार्वजनिक संपत्ति जनता की होती है, आपको यह जनता के हित में योजनाएं बनाने के लिये दिया जाता है। लेकिन आप कर ये रहे हैं कि सार्वजनिक संपत्ति को कॉरपोरेट के हित के लिए बेच रहे हैं, आप उस संपत्ति को भी बेच रहे हैं जो लाभ देने वाली है आपसे जनता के हित वाली एक योजना नहीं बन पाई। अब राशन वितरण की बात करें तो यह जनता के हित की स्कीम नहीं है बल्कि आगामी समय में नुकसान पहुंचाने वाली है। आप चावल तो दे रहे हैं लेकिन क्या आपने देखा कि लोगों के घर में इसे पकाने के लिए गैस, मसाले आदि सामग्री भी है? आपने अपनी बहुप्रचारित उज्जवला योजना के तहत गैस सिलेंडर तो दे दिया लेकिन दूसरी तरफ गैस के दाम इतने बढ़वा दिये कि यह मिडिल क्लास की पहुंच से भी बाहर हो गई। आपने सब्जी आदि के दाम इतने बढ़वा दिए कि लोगों के लिए मुश्किल खड़ी हो रही है। आप जनता से तो सभी चीजें महंगी करके मनमानी वसूली कर रहे हैं वहीं दूसरी तरफ कॉरपोरेट्स को बनी बनाई चीजें आधे दाम में दे रहे हैं। यह एक बड़ा खेल है। सरकार को सिर्फ कुर्सी से मतलब रह गया है इसीलिए संस्थानों को बेचा जा रहा है क्योंकि उन्हें धर्म की जहालत से भरा हुआ देश बनाना है जिसके लिए मीडिया मैनेजमेंट और प्रचार की जरूरत है जिसमें पूंजी की आवश्यकता है। अब पूंजीपतियों की मदद करके उनसे सत्ता में आऩे का रास्ता आसान कराया है इसीलिए प्राइवेटाइजेशन किया जा रहा है। अब डेमोक्रेसी और जनता के हित को भूल ही जाइये।

सबरंग -  लखनऊ जैसे शहर में सामाजिक सौहार्द का समृद्ध इतिहास रहा है।
रूपरेखा वर्मा - देखिए, भूत की बात पर न जाकर अभी की बात करें तो भी लखनऊ में साझी विरासत का रूप मिलता है। और सिर्फ लखनऊ ही नहीं, देश के अन्य हिस्सों जैसे हैदराबाद में  भी इस तरह का कल्चर है। पंजाब की बात करें तो वहां की भाषा में अभी भी आधे उर्दू के शब्द हैं। लखनऊ में मुसलमानों की शादी में अभी भी हिंदुओं के गानों का रिवाज है। यह विविधता किसी और देश में नहीं मिलेगी। लखनऊ पर लिखा भी बहुत गया है यहां अलीगंज में हनुमान का प्राचीन मंदिर है जिसे एक मुस्लिम महिला ने बनवाया था। यहां टिकैत राय मस्जिद बनवाते हैं और कई नवाबों ने मंदिरों के लिए जमीनें दीं और वहां इबादत के लिए जाते थे। मुसलमानों के घरों में बच्चा होने पर हिंदुओं द्वारा सोहर गाए जाते थे। नबी ने भेजे हैं कन्हैया लाल, खुदा भेज दिए रघुवीर ये सोहरों के शब्द हैं। राम जी और कृष्ण जी के लिए जो नज्में लिखी गई हैं उनका विस्तृत इतिहास है। हालांकि कुछ कन्फ्लिक्ट भी रहे हैं इससे इंकार नहीं किया जा सकता। लेकिन अब आपके ऊपर है कि आप इतिहास से कन्फ्लिक्ट की बातें निकालकर उन्हें फैलाते हैं या सामाजिक सौहार्द वाली। यह देश की जनता के ऊपर है कि वह इतिहास के किन पन्नों को खारिज करती है और किन पन्नों को बाहर लाती है।

सबरंग -  आने वाले समय का आंकलन? ऐसे नवयुवक जो आज की राजनीति में हक़ की बात करना चाहतें हैं, उनको आप क्या कहेंगी?
रूपरेखा वर्मा - देखिए, एक तो चारों तरफ बहुत घना अंधेरा दिखता है। विरोधी पार्टियों का बिखराव, उनका सही मुद्दों को सही तरीके से न लेना और सही तरीके से जमकर न लड़ना हमें बहुत निराश करता है। तो आशावान होने के लिए बहुत मुश्किलात हैं। लेकिन इंसानी इतिहास का जो अटल सत्य है वह यह है कि कोई भी निज़ाम हमेशा के लिए सत्तावान नहीं होता है। चीजें बदलेंगी और जरूर बदलेंगी। दूसरी बात ये है कि हम उस टेक्निकल दौर में हैं जहां कोई चीज कहीं घटित होती है तो वह साथ ही दर्ज भी हो जाती है। हमें ह्वेनसांग और कोलंबस की तरह जाकर रिपोर्ट लिखने की जरूरत नहीं है। जिस तरह से ये लोग धर्म के नाम पर, राम जी के नाम पर बवाल कर रहे हैं उसे लेकर इनके बारे में आने वाली नस्लें कितना गलत सोचेंगी, इनपर थू-थू करेंगी, उसका इन्हें अभी अंदाजा नहीं है क्योंकि अभी ये सत्ता के नशे में हैं। जिस धर्म को बहुत उदारवादी समझा गया, जिन रामजी को उदार व्यक्तित्व वाला माना जाता है उनपर धब्बा लगाने वालों की गिनती में हम नहीं आएंगे, सुधा भारद्वाज नहीं आएंगी और ना ही हजरत मोहानी का नाम लिया जाएगा। हिंदू धर्म और राम के नाम पर धब्बा लगाने वालों में आज के शासकों का नाम आएगा, ये वो समझ लें। अभी इन्हें लगता है कि इनकी जीत हो रही है लेकिन आगे आने वाले पन्नों में इनके मुंह पर कालिख पुत रही है। इस बात को देखते हुए आज का बहुत डरावना माहौल है, हमारे नौजवानों को अभिव्यक्ति के खतरों को उठाना पड़ेगा, उन्हें बोलना पड़ेगा, लड़ना पड़ेगा। सोशल मीडिया पर एक चीज वायरल है- मैं श्मशान गया तो मैंने उन लोगों की कब्रें भी देखीं जो डर से कभी बोले नहीं। इसका मतलब है कि भाई अमर तो होना नहीं है, जिंदा होने का सबूत देकर मरो, लड़कर मरो। मैं अपने बच्चों से भी कहना चाहुंगी कि मरना तो है ही, लड़कर मरो, अगर हमारे नौजवान आजादी की लड़ाई में खड़े नहीं होते तो हमें आजादी नहीं मिलती, आज हम आजादी की दूसरी लड़ रहे हैं, इसलिए उठो, बोलो और लड़ो, हम तुम्हारे पीछे चलने के लिए तैयार हैं जीत होगी। नवयुवकों और नवयुवतियों से हम इसलिए कह रहे हैं कि हम तो ठीक होते माहौल को ना देख पाएं लेकिन आपको जरूर देखने को मिलेगा। 

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