ई20 पेट्रोल प्रचार: इन्फ्लुएंसर्स पर हुए खर्च की जानकारी सरकार ने नहीं दी

Written by sabrang india | Published on: January 5, 2026
ई20 पेट्रोल के प्रचार पर करदाताओं के पैसे खर्च किए गए या नहीं, इस बारे में आरटीआई के तहत जानकारी मांगी गई, लेकिन सरकार ने कोई स्पष्ट जवाब नहीं दिया। इसी सवाल पर सरकारी तेल कंपनियों के जवाब भी भिन्न रहे। भारत पेट्रोलियम और हिंदुस्तान पेट्रोलियम ने ‘व्यावसायिक गोपनीयता’ का हवाला दिया, जबकि इंडियन ऑयल ने इसे ‘काल्पनिक जानकारी’ करार दिया।


साभार : अमर उजाला

देशभर में ई20 यानी इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल को लेकर जारी बहस अब सिर्फ गाड़ियों के माइलेज या इंजन की हालत तक सीमित नहीं रह गई है। सोशल मीडिया पर वाहन मालिक अपनी समस्याएं साझा कर रहे हैं, जबकि कुछ महीने पहले कई इन्फ्लुएंसर्स ई20 के कथित फायदों का प्रचार कर चुके हैं।

उस समय आरोप लगाए गए थे कि सरकार ने करदाताओं के धन से इन्फ्लुएंसर्स को भुगतान कर ई20 का प्रचार करवाया। हालांकि, आरटीआई के जरिए जानकारी मांगे जाने पर सरकारी तेल कंपनियों और मंत्रालय की प्रतिक्रियाओं ने नए सवाल खड़े कर दिए।

आरटीआई में पूछा गया?

बिहार के आरटीआई एक्टिविस्ट कन्हैया कुमार ने 1 सितंबर 2025 को पेट्रोलियम मंत्रालय से कुछ सवाल पूछे:

– पिछले दो वर्षों में ई20 पेट्रोल के विज्ञापन/प्रचार पर सभी माध्यमों (इलेक्ट्रॉनिक, प्रिंट, डिजिटल, सोशल मीडिया आदि) के जरिए हुए कुल खर्च का विवरण

– प्रचार के लिए नियुक्त एजेंसियों और इन्फ्लुएंसर्स के नाम

– इस काम के लिए इन्फ्लुएंसर्स इत्यादि को किए गए भुगतान की जानकारी

क्या मिला जवाब

पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने जवाब देने के बजाय 8 सितंबर को आरटीआई आवेदन तीन सरकारी तेल कंपनियों (बीपीसीएल, एचपीसीएल, आईओसीएल) को भेज दिया। लेकिन तेल कंपनियों से मिले जवाबों की असंगति ने नए संदेह पैदा कर दिए।

कन्हैया कुमार ने आरटीआई के जवाब द वायर हिंदी को उपलब्ध कराए हैं।

इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन का जवाब

29 सितंबर को आईओसीएल ने सभी सवालों का एक ही जवाब दिया: ‘मांगी गई जानकारी काल्पनिक प्रकृति की है। इसलिए हम इसे उपलब्ध कराने में असमर्थ हैं।’

यह जवाब हैरान करने वाला है, क्योंकि ‘विज्ञापन खर्च, एजेंसियों के नाम और भुगतान के रिकॉर्ड’ जैसी तथ्यात्मक जानकारी मांगी गई थी।

भारत पेट्रोलियम का जवाब

बीपीसीएल ने 30 सितंबर 2025 को आरटीआई अधिनियम, 2005 की धारा 8(1)(d) का हवाला देते हुए कहा: ‘मांगा गया डेटा व्यावसायिक गोपनीयता के दायरे में आता है… इसलिए हम इस सूचना को उपलब्ध कराने से छूट चाहते हैं।’

बीपीसीएल ने तर्क दिया कि यह जानकारी ‘तीसरे पक्ष की प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति को नुकसान’ पहुंचा सकती है। लेकिन जनहित से जुड़ी सरकारी नीति के प्रचार पर हुआ सार्वजनिक व्यय ‘व्यावसायिक गोपनीयता’ कैसे हो सकता है?

हिंदुस्तान पेट्रोलियम (एचपीसीएल) का जवाब

हिंदुस्तान पेट्रोलियम (एचपीसीएल) ने भी बीपीसीएल जैसा ही जवाब दिया और व्यावसायिक गोपनीयता का हवाला देकर जानकारी देने से इनकार कर दिया।

जवाब में अंतर

इस तरह एक ही सवालों के जवाब में सरकारी कंपनियों ने दो तरह के जवाब दिए: आईओसीएल ने कहा कि सवाल ‘काल्पनिक’ है, जबकि बीपीसीएल और एचपीसीएल ने कहा कि यह ‘व्यावसायिक गोपनीयता’ का मामला है।

जवाबों की यह असंगति इसलिए विवादास्पद हो जाती है क्योंकि इस पूरे प्रचार अभियान पर सरकार द्वारा प्रायोजित होने का आरोप लगा था।

अगर कोई प्रचार अभियान नहीं चलाया गया या इन्फ्लुएंसर्स को भुगतान नहीं किया गया, तो सीधा जवाब दिया जा सकता था कि – ‘ऐसा कोई खर्च नहीं किया गया।’

लेकिन कंपनियों ने अलग-अलग जवाब दिए।

द वायर हिंदी ने तीनों कंपनियों को ईमेल भी भेजा है। उनसे फिर जानना चाहा है कि क्या उन्होंने सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स से प्रचार करवाया है या नहीं? अगर करवाया गया है, तो कितना पैसा खर्च हुआ है? यह भी पूछा गया है कि सार्वजनिक धन से जनता में जागरूकता के लिए चलाए गए अभियान पर हुए खर्च को ‘व्यावसायिक रूप से गोपनीय जानकारी’ कैसे माना जा सकता है?

द वायर ने लिखा है कि खबर के प्रकाशन तक उनका जवाब नहीं आया है। जवाब मिलने पर रिपोर्ट को अपडेट कर दिया जाएगा।

गौरतलब है कि सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 का मूल उद्देश्य सरकारी कामकाज में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करना है। विशेष रूप से जब मामला करदाताओं के धन के उपयोग से जुड़ा हो, तो नागरिकों को यह जानने का पूरा अधिकार है कि उनका पैसा कहां और किस तरह खर्च किया जा रहा है।

जब इन्फ्लुएंसर्स को मिला ‘पेड कोलैब’ ईमेल

इस अभियान से जुड़ी सच्चाई तब उजागर हुई, जब कुछ कंटेंट क्रिएटर्स ने बताया कि पीआर एजेंसियों ने उन्हें ई20 के प्रचार के बदले पैसे देने का प्रस्ताव रखा था, लेकिन उन्होंने उसे ठुकरा दिया।

अब तक ऐसा कोई प्रमाण सामने नहीं आया है जिससे यह साबित हो सके कि सरकार ने इन इन्फ्लुएंसर्स को सीधे पैसे दिए थे, हालांकि कुछ निजी एजेंसियों द्वारा प्रचार के लिए उनसे संपर्क किए जाने की बात सामने आई है।

बूम लाइव से बातचीत में द रेस मंकी के संपादक ईशान भारद्वाज ने बताया कि 14 अगस्त 2025 को ‘हेक्सटेक मीडिया’ नाम की पीआर एजेंसी ने उनसे संपर्क किया था। उन्होंने बताया कि 20 लाख रुपये की मांग के जवाब में एजेंसी ने 15 लाख रुपये का ऑफर दिया। भारद्वाज ने इसे “मार्केटिंग नहीं, बल्कि घोटाला” बताते हुए कहा कि करदाताओं के धन से भ्रामक सूचना फैलाई जा रही है।

‘मोटरसाइकिल ट्रेल्स’ नाम के एक अन्य इन्फ्लुएंसर को भी ऐसी ही पेशकश मिली थी, जिसे उन्होंने ठुकरा दिया।

कंटेंट क्रिएटर मुकेश मोहन के अनुसार, मई 2025 में ‘यूनोइया नेटवर्क्स’ नाम की पीआर एजेंसी ने उनसे ई20 पर स्पॉन्सर्ड रील बनाने के लिए 1.45 लाख रुपये की पेशकश की थी। मोहन ने इस कथित ऑफर का स्क्रीनशॉट सोशल मीडिया पर पोस्ट किया था।

इससे यह सवाल पैदा होता है कि क्या इन निजी एजेंसियों ने स्वतंत्र रूप से किसी सरकारी उत्पाद के प्रचार के लिए इन्फ्लुएंसर्स से संपर्क किया था। इस मामले पर प्रतिक्रिया के लिए हेक्सटेक मीडिया को ईमेल किया गया है, हालांकि अब तक कोई जवाब प्राप्त नहीं हुआ है।

आरोप-प्रत्यारोप के बीच गौण होता मुख्य सवाल

जब इन्फ्लुएंसर्स ई20 के लाभों का प्रचार कर रहे थे, तब सोशल मीडिया पर अनेक उपयोगकर्ता ई20 से होने वाली दिक्कतों को सामने लाते हुए केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी पर सवाल उठा रहे थे।

इस पर प्रतिक्रिया देते हुए गडकरी ने सोशल मीडिया पर चल रहे ‘ई20 विरोधी’ पोस्ट्स को ‘पेड कैंपेन’ और ‘राजनीतिक प्रेरणा से संचालित’ बताया। उनका कहना था कि यह अभियान उन्हें लक्ष्य बनाकर चलाया गया है और ‘पेट्रोल लॉबी बहुत अमीर और प्रभावशाली है।’

परिवहन मंत्री के आरोपों पर प्रतिक्रिया देते हुए कंटेंट क्रिएटर मुकेश मोहन ने अपने एक वीडियो में कहा, “नहीं मंत्री जी, आलोचक पैसे नहीं ले रहे थे। पैसे तो इसके लिए (पेड कैंपेन) दिए जा रहे थे।”

ई20 नीति के फायदे और नुकसान पर बहस अलग विषय है, लेकिन इसके प्रचार पर हुए खर्च की जानकारी देने से इनकार किया जाना चिंता पैदा करता है। एक ओर मंत्री आलोचना को ‘पेड’ बता रहे हैं, वहीं दूसरी ओर पीआर एजेंसियों के ऑफर और इन्फ्लुएंसर्स द्वारा सरकारी अकाउंट्स के साथ ‘कोलैब’ में डाले गए वीडियो भी सामने हैं।

जब सोशल मीडिया पर छाया ई20 का प्रचार अभियान

जुलाई–अगस्त 2025 में ई20 लक्ष्य को पांच साल पहले हासिल करने के सरकारी ऐलान के बाद सोशल मीडिया पर एक साथ कई प्रमुख इन्फ्लुएंसर्स ई20 की तारीफ करते नजर आए।

इस दौरान 30 से अधिक इन्फ्लुएंसर्स ने लगभग एक ही समय पर, एक जैसे हैशटैग और समान थीम वाले वीडियो साझा किए।

इन वीडियो में ई20 के पक्ष में यह बताया गया कि इससे पर्यावरण को फायदा होगा, किसानों की आमदनी बढ़ेगी और गाड़ियों पर इसका कोई नकारात्मक असर नहीं पड़ेगा।

दिलचस्प यह है कि इन पोस्ट्स में इंस्टाग्राम के ‘कोलैब’ फीचर के माध्यम से पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी, पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय और बीपीसीएल, एचपीसीएल, आईओसीएल जैसी सरकारी तेल कंपनियों के आधिकारिक अकाउंट्स को सीधे शामिल किया गया था।

कोलैब फीचर के लिए संबंधित यूजर की मंजूरी अनिवार्य होती है, जिससे यह साफ हो जाता है कि सरकार को इस अभियान की पूरी जानकारी थी।

ऑल्ट न्यूज ने रिपोर्ट किया कि इस अभियान में बनाए गए वीडियो लाखों नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों तक पहुंचे।

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