भारत के लोकपाल ने प्रति कार 70 लाख रुपये कीमत वाली सात बीएमडब्ल्यू कारों की खरीद के लिए जारी किया गया टेंडर रद्द कर दिया है। टेंडर से जुड़ी खबर सामने आने के बाद लोकपाल की कड़ी आलोचना हुई थी, और माना जा रहा है कि इसी विरोध के चलते यह फैसला लिया गया है।

भारत के लोकपाल ने प्रति कार लगभग 70 लाख रुपये कीमत वाली सात बीएमडब्ल्यू कारों की खरीद के लिए जारी किया गया टेंडर रद्द कर दिया है।
इस टेंडर से जुड़ी खबर सामने आने के बाद विपक्षी दलों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने महंगी गाड़ियों की खरीद को लेकर लोकपाल की कड़ी आलोचना की थी। माना जा रहा है कि इसी विवाद और विरोध के चलते यह फैसला लिया गया है।
न्यूज एजेंसी पीटीआई ने गुरुवार 1 जनवरी को अधिकारियों के हवाले से बताया कि भ्रष्टाचार विरोधी लोकपाल ने उस टेंडर को रद्द कर दिया है, जिसके तहत सात लग्जरी कारों की खरीद पर लगभग 5 करोड़ रुपये खर्च किए जाने थे।
अधिकारियों के मुताबिक, लोकपाल की पूर्ण पीठ द्वारा पारित एक प्रस्ताव के बाद कारों की खरीद रद्द करने का फैसला लिया गया। इसके बाद इस निर्णय से संबंधित एक औपचारिक संशोधन 16 दिसंबर को जारी किया गया।
द वायर ने लिखा, इससे पहले 16 अक्टूबर को जारी निविदा दस्तावेज़ में बताया गया था कि भारत के लोकपाल ने सात बीएमडब्ल्यू 3 सीरीज़ 330 ली कारों की आपूर्ति के लिए प्रतिष्ठित एजेंसियों से खुली निविदाएं आमंत्रित की थीं।
उल्लेखनीय है कि बीएमडब्ल्यू 3 सीरीज़ लॉन्ग व्हीलबेस को भारत में वर्ष 2025 में लॉन्च किया गया था और यह अपने सेगमेंट की सबसे लंबी कार मानी जाती है। बीएमडब्ल्यू की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार, यह मॉडल अपने वर्ग में सबसे लंबे व्हीलबेस के साथ बेहतरीन और आरामदायक रियर सीट अनुभव प्रदान करने के लिए डिजाइन किया गया है।
न्यूज़18 की रिपोर्ट के अनुसार, टेंडर में यह भी उल्लेख किया गया था कि जिस विक्रेता या फर्म को निविदा दी जाएगी, उसे ड्राइवरों और भारत के लोकपाल के अन्य नामित कर्मचारियों के लिए एक विस्तृत व्यावहारिक और सैद्धांतिक प्रशिक्षण कार्यक्रम भी आयोजित करना होगा।
विपक्ष की आलोचना
गौरतलब है कि टेंडर जारी होने के बाद विपक्षी दलों ने इस पूरे घटनाक्रम को लेकर लोकपाल की आलोचना की थी।
उस दौरान कांग्रेस के राज्यसभा सांसद अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा था कि भ्रष्टाचार विरोधी संस्था द्वारा अपने सदस्यों के लिए बीएमडब्ल्यू जैसी महंगी कारें खरीदने की योजना बेहद दुखद है। उनके मुताबिक, यह संस्था ईमानदारी की निगरानी करने वाली कम और विलासिता की ओर झुकी हुई अधिक प्रतीत होती है।
सिंघवी ने सोशल मीडिया एक्स पर यह जानकारी दी थी कि उनके पिता डॉ. एल.एम. सिंघवी ने 1960 के दशक में लोकपाल की अवधारणा रखी थी। उन्होंने यह भी बताया कि वह स्वयं लोकपाल से संबंधित संसदीय समिति के अध्यक्ष रह चुके हैं।
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इस टेंडर से जुड़ी खबर सामने आने के बाद विपक्षी दलों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने महंगी गाड़ियों की खरीद को लेकर लोकपाल की कड़ी आलोचना की थी। माना जा रहा है कि इसी विवाद और विरोध के चलते यह फैसला लिया गया है।
न्यूज एजेंसी पीटीआई ने गुरुवार 1 जनवरी को अधिकारियों के हवाले से बताया कि भ्रष्टाचार विरोधी लोकपाल ने उस टेंडर को रद्द कर दिया है, जिसके तहत सात लग्जरी कारों की खरीद पर लगभग 5 करोड़ रुपये खर्च किए जाने थे।
अधिकारियों के मुताबिक, लोकपाल की पूर्ण पीठ द्वारा पारित एक प्रस्ताव के बाद कारों की खरीद रद्द करने का फैसला लिया गया। इसके बाद इस निर्णय से संबंधित एक औपचारिक संशोधन 16 दिसंबर को जारी किया गया।
द वायर ने लिखा, इससे पहले 16 अक्टूबर को जारी निविदा दस्तावेज़ में बताया गया था कि भारत के लोकपाल ने सात बीएमडब्ल्यू 3 सीरीज़ 330 ली कारों की आपूर्ति के लिए प्रतिष्ठित एजेंसियों से खुली निविदाएं आमंत्रित की थीं।
उल्लेखनीय है कि बीएमडब्ल्यू 3 सीरीज़ लॉन्ग व्हीलबेस को भारत में वर्ष 2025 में लॉन्च किया गया था और यह अपने सेगमेंट की सबसे लंबी कार मानी जाती है। बीएमडब्ल्यू की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार, यह मॉडल अपने वर्ग में सबसे लंबे व्हीलबेस के साथ बेहतरीन और आरामदायक रियर सीट अनुभव प्रदान करने के लिए डिजाइन किया गया है।
न्यूज़18 की रिपोर्ट के अनुसार, टेंडर में यह भी उल्लेख किया गया था कि जिस विक्रेता या फर्म को निविदा दी जाएगी, उसे ड्राइवरों और भारत के लोकपाल के अन्य नामित कर्मचारियों के लिए एक विस्तृत व्यावहारिक और सैद्धांतिक प्रशिक्षण कार्यक्रम भी आयोजित करना होगा।
विपक्ष की आलोचना
गौरतलब है कि टेंडर जारी होने के बाद विपक्षी दलों ने इस पूरे घटनाक्रम को लेकर लोकपाल की आलोचना की थी।
उस दौरान कांग्रेस के राज्यसभा सांसद अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा था कि भ्रष्टाचार विरोधी संस्था द्वारा अपने सदस्यों के लिए बीएमडब्ल्यू जैसी महंगी कारें खरीदने की योजना बेहद दुखद है। उनके मुताबिक, यह संस्था ईमानदारी की निगरानी करने वाली कम और विलासिता की ओर झुकी हुई अधिक प्रतीत होती है।
सिंघवी ने सोशल मीडिया एक्स पर यह जानकारी दी थी कि उनके पिता डॉ. एल.एम. सिंघवी ने 1960 के दशक में लोकपाल की अवधारणा रखी थी। उन्होंने यह भी बताया कि वह स्वयं लोकपाल से संबंधित संसदीय समिति के अध्यक्ष रह चुके हैं।
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