कोरोना में सबसे ज्यादा बेरोजगार हुए मुसलमान, SC-ST, महिलाओं पर खास असर: Oxfam India

Written by Navnish Kumar | Published on: September 16, 2022
भारत में महिलाएं पुरुषों से और मुसलमान गैर-मुस्लिमों से हजारों रुपये कम कमा रहे हैं और इसकी वजह उनकी पहचान है। भारत में महिलाएं इसलिए श्रम क्षेत्र का हिस्सा नहीं बन पा रही हैं क्योंकि एक तो उन्हें पैसा बहुत कम मिलता है और उन्हें लैंगिक भेदभाव भी झेलना पड़ता है। मानवाधिकार संगठन ऑक्सफैम ने अपनी ताजा रिपोर्ट में यह बात कही है। यही नहीं, ऑक्सफैम इंडिया की डिस्क्रिमिनेशन रिपोर्ट 2022 में बताया गया है कि सामान्य वर्ग की तुलना में देश के दलित और आदिवासी हर महीने 5 हजार रूपए कम कमा रहे हैं, वहीं गैर मुस्लिमों की तुलना में मुस्लिम हर माह 7 हजार रूपए कम कमा रहे हैं।


Image Courtsy: Oxfam India

भारत अपनी आजादी की 75वीं सालगिरह बना चुका है लेकिन भेदभाव से मुक्ति के लिए अब तक कोई रास्ता नहीं निकल पाया है। भारत में भेदभाव पर ऑक्सफैम इंडिया की रिपोर्ट जारी हुई है। ऑक्सफैम इंडिया की ताजा रिपोर्ट के अनुसार मुल्क में आज भी धर्म, जाति और लिंग की वजह से लोग सताए जा रही हैं। लोगों की कमाई तक धर्म, जाति और लिंग से तय की जा रही है। इंडिया डिस्क्रिमिनेशन रिपोर्ट 2022 ऑक्सफैम इंडिया की ताजा रिपोर्ट 'इंडिया डिस्क्रिमिनेशन रिपोर्ट 2022' में बताया गया है कि सामान्य वर्ग की तुलना में देश के दलित और आदिवासी हर महीने 5 हजार रूपए कम कमा रहे हैं। वहीं गैर मुस्लिमों की तुलना में मुस्लिम हर माह 7 हजार रूपए कम कमा रहे हैं। साथ ही महिलाएं पुरुषों की तुलना में 4 हजार रुपए कम कमा रही हैं।

16 साल के सरकारी आंकड़ों के विश्लेषण के बाद तैयार हुई रिपोर्ट

बता दें कि ऑक्सफैम इंडिया की इस रिपोर्ट को शोधकर्ताओं ने 16 साल के सरकारी आंकड़ों के विश्लेषण के बाद तैयार किया है। शोधकर्ताओं ने 2004 से 2020 के बीच अलग-अलग वर्ग की नौकरियों, उनका वेतन, स्वास्थ्य, कर्ज आदि का अध्ययन किया है। जिसके बाद यह इंडिया डिस्क्रिमिनेशन रिपोर्ट 2022 तैयार की गई है। 

ऑक्सफैम रिपोर्ट कहती है कि भारत अगर महिलाओं को श्रम क्षेत्र में शामिल करना चाहता है तो सरकार को बेहतर वेतन, प्रशिक्षण और नौकरियों में आरक्षण जैसी सुविधाएं उपलब्ध करानी होंगी। ‘इंडिया डिस्क्रिमिनेशन रिपोर्ट 2022' सुझाव देती है कि नियोक्ताओं को महिलाओं को काम पर रखने के लिए प्रोत्साहित किए जाने की जरूरत है। सरकार के आंकड़ों के मुताबिक 2021 में भारतीय श्रम शक्ति में महिलाओं की हिस्सेदारी सिर्फ 25% थी। दुनिया की उभरती अर्थव्यवस्थाओं ब्राजील, रूस, चीन और दक्षिण अफ्रीका में यह सबसे कम है। 2020-21 के सरकार के आंकड़ों के मुताबिक सिर्फ 25.1% महिलाएं श्रम शक्ति का हिस्सा हैं जब कि 2004-05 में 42.7% महिलाएं काम कर रही थीं। रिपोर्ट कहती है कि इन वर्षों में महिलाओं का काम छोड़ जाना चिंता का विषय है जबकि इस दौरान भारत में तेज आर्थिक वृद्धि हुई है। बीते दो साल में कोरोना वायरस महामारी ने भी महिलाओं को बड़े पैमाने पर श्रम बाजार से बाहर कर दिया है क्योंकि नौकरियां कम हो गईं और जिन लोगों की नौकरियां इस दौरान गईं, उनमें महिलाएं ज्यादा थीं।

रिपोर्ट के मुताबिक 98% गैरबराबरी की वजह लैंगिक भेदभाव होता है। बाकी दो प्रतिशत शिक्षा और अनुभव आदि के कारण हो सकता है। रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि समाज के अन्य तबकों को भी भेदभाव झेलना पड़ता है। पिछले महीने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी महिलाओं को काम करने के लिए बढ़ावा देने की जरूरत का जिक्र किया था। एक भाषण में उन्होंने राज्यों से आग्रह किया था कि काम के घंटों को लचीला रखा जाए ताकि महिलाओं को श्रम शक्ति का हिस्सा बनाया जा सके। उन्होंने कहा था कि अपनी नारी शक्ति का इस्तेमाल किया जाए तो "भारत अपने आर्थिक लक्ष्यों तक” जल्दी पहुंच सकता है।

ऑक्सफैम रिपोर्ट कहती है कि बड़ी संख्या में महिलाएं रोजगार इसलिए नहीं कर पाती हैं क्योंकि उनके ऊपर ‘पारिवारिक जिम्मेदारियां' होती हैं और उन्हें सामाजिक नियम-कायदों को मानना पड़ता है। भारत में महिलाओं और अल्पसंख्यकों के साथ भेदभाव को उजागर करती ऐसी रपटें पहले भी आती रही हैं। यह एक जाना-माना तथ्य है कि भारत में महिलाएं पुरुषों के मुकाबले कम काम करती हैं और अधिकतर महिलाओं को कार्यस्थल पर शोषण अथवा भेदभाव से गुजरना पड़ता है। इसके अलावा एक समस्या उनकी घरेलू और सामाजिक जिम्मेदारियां भी हैं जो उन्हें काम करने से हतोत्साहित करती हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, "पितृसत्ता के कारण ही पुरुषों के समान और यहां तक कि उनसे बेहतर क्षमता और कौशल के बावजूद महिलाएं श्रम बाजार से बाहर रहती हैं और समय के साथ इसमें कोई सुधार नहीं हुआ है।”

यही नहीं, रिपोर्ट कहती है, "महिलाओं के अलावा ऐतिहासिक रूप से दमित समुदाय जैसे दलित और आदिवासी और धार्मिक अल्पसंख्यक जैसे कि मुसलमान भी नौकरी खोजने, रोजी-रोटी कमाने और कृषि आदि क्षेत्र में कर्जा पाने के लिए भेदभाव का सामना करते हैं।” रिपोर्ट बताती है कि कोविड-19 महामारी के दौरान बेरोजगारी में सबसे ज्यादा वृद्धि (17 प्रतिशत) मुसलमानों के बीच हुई।

कोविड में सबसे ज्यादा बेरोजगार हुए मुसलमान 
कोविड 19 महामारी के दौरान सबसे ज्यादा बेरोजगार मुसलमान हुए हैं। कोविड-19 के पहले ही क्वार्टर में मुसलमानों के बीच बेरोजगारी में 17 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। साल 2019 से साल 2020 में 15 वर्ष और उससे अधिक आयु की शहरी मुस्लिम आबादी में से 15.6 प्रतिशत के पास नियमित वेतन भोगी नौकरियां थीं। ठीक इसी वक्त गैर मुसलमानों में 23.3 प्रतिशत लोग नियमित वेतन भोगी नौकरी कर रहे थे। शहरी मुसलमानों को 68 प्रतिशत मामलों में भेदभाव के कारण रोजगार कम मिला है। 

मुस्लिम और गैर मुस्लिम के बीच कमाई में 1.5 गुना का अंतर 
वहीं अगर कमाई की बात करें तो शहरी क्षेत्र में रेगुलर नौकरी करने वाले गैर मुस्लिम हर महीने 20,346 रुपए कमा रहे हैं। वही मुसलमान 13,600 रुपए ही कमा रहे हैं। इस तरह मुस्लिमों और गैर मुस्लिमों के बीच कमाई में 1.5 गुना का अंतर है। अपना रोजगार करने वाले यानी सेल्फ एंप्लॉयड मुस्लिम भी कमाई के मामले में गैर-मुस्लिम सेल्फ एंप्लॉयड से पिछड़े हुए हैं। जहां गैर-मुस्लिम महीने की औसतन 15,878 रुपये कमा रहे हैं। वही मुस्लिम 11,421 रुपए ही कमा पा रहे हैं। 

भेदभाव के कारण दलित-आदिवासी की कमाई हुई कम 
ऑक्सफैम इंडिया की इंडिया डिस्क्रिमिनेशन रिपोर्ट में आकस्मिक वेतन श्रमिकों को लेकर अलग से आंकड़ा दिया गया है। मोटे तौर पर दिहाड़ी मजदूरों को आकस्मिक वेतन श्रमिक कहा जाता है। रिपोर्ट में मौजूद आंकड़ों के अनुसार ऐसे दलित और आदिवासी जो दिहाड़ी मजदूरी करते हैं, उनकी आय गैर दलित और आदिवासी दिहाड़ी मजदूरों की आय से कम है। कमाई में अंतर के लिए 79 प्रतिशत भेदभाव जिम्मेदार है। यह पिछले साल की तुलना में 10 प्रतिशत ज्यादा है।

भेदभाव के कारण वेतन में 41% का अंतर 
बता दें कि घर के मुखिया के शिक्षा, उम्र और श्रमिक की शिक्षा जैसे कारक कमाई को प्रभावित करते हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि एससी और एसटी समुदायों के सदस्यों की शिक्षा का स्तर समान वर्ग के समान होने के बावजूद उनकी कमाई कम हो रही है। ज्यादातर मामलों में भेदभाव के कारण वेतन में 41 प्रतिशत का अंतर आ रहा है। 

SC-ST के नियमित कर्मचारियों के कमाई भी 33% की कमी 
ऑक्सफैम इंडिया की रिपोर्ट से पता चलता है कि शहर में काम करने वाले SC और ST समुदाय के नियमित कर्मचारी औसत 15,312 रुपये कमाते हैं। जबकि सामान्य वर्ग के कर्मचारी 20,346 रुपये कमाते हैं। इस तरह SC-ST समुदाय के नियमित कर्मचारी भी सामान्य वर्ग की तुलना में 33 फीसदी कम कमा रहे हैं। 

SC-ST वर्ग के किसानों को कम मिल रहा कृषि लोन 

एससी और एसटी समुदायों के सेल्फ इम्पलॉयड (खुद का काम करने वाले) सदस्य भी गैर-एसी/एसटी की तुलना में 2,000 रुपये कम कमाते हैं। इस अंतर के लिए 78% जिम्मेदार भेदभाव को माना गया है। एससी/एसटी वर्ग के किसानों को कृषि लोन भी सामान्य वर्ग की तुलना में कम मिल रहा है।

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