मध्य प्रदेश के इंदौर में प्रस्तावित 100 बेड वाला सिविल अस्पताल पिछले छह वर्षों से सरकारी रिकॉर्ड में संचालित दर्शाया जा रहा है, जबकि जमीनी स्तर पर उसका निर्माण अब तक शुरू नहीं हो सका है। अस्पताल के लिए 87 पद स्वीकृत किए गए और उन पर नियुक्तियां व तबादले भी होते रहे। इस मामले को लेकर विपक्ष ने सरकार पर गंभीर प्रशासनिक लापरवाही का आरोप लगाया है।

फोटो साभार: फेसबुक/ जिला अस्पताल, इंदौर
मध्य प्रदेश के इंदौर के खजराना क्षेत्र में प्रस्तावित 100 बेड वाले सिविल अस्पताल को लेकर हैरान करने वाली प्रशासनिक स्थिति सामने आई है। सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार, यह अस्पताल पिछले छह वर्षों से पूरी तरह संचालित दिखाया जा रहा है, जबकि जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल अलग है। अब तक अस्पताल का निर्माण शुरू भी नहीं हो सका है और एक भी ईंट नहीं रखी गई है। इतना ही नहीं, अस्पताल के लिए भूमि का अंतिम चयन भी आज तक नहीं हो पाया है।
टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, छह साल पहले यानी वर्ष 2020 में मध्य प्रदेश सरकार ने खजराना में एक आधुनिक सिविल अस्पताल स्थापित करने की घोषणा की थी। लेकिन अस्पताल के लिए उपयुक्त जमीन की तलाश लंबी खिंचती चली गई। इसके बावजूद प्रशासनिक प्रक्रिया लगातार आगे बढ़ती रही। स्वास्थ्य विभाग ने इस अस्तित्वहीन अस्पताल के लिए डॉक्टरों, नर्सों और पैरामेडिकल कर्मचारियों सहित 87 पदों को मंजूरी दे दी।
अस्पताल को कागजों में संचालित दिखाए जाने के बाद वर्षों तक स्वीकृत पदों पर नियमित रूप से नियुक्तियां और तबादले होते रहे। हालांकि, अस्पताल का भवन अस्तित्व में नहीं होने के कारण इन कर्मचारियों की तैनाती शहर के विभिन्न सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों, जैसे हुकुमचंद अस्पताल, पीसी सेठी अस्पताल और अन्य सरकारी चिकित्सा संस्थानों में की जाती रही।
द वायर ने लिखा कि इस असामान्य स्थिति पर प्रतिक्रिया देते हुए मध्य प्रदेश के उपमुख्यमंत्री राजेंद्र शुक्ल ने परियोजना का इतिहास बताते हुए कहा, "शुरुआत में यहां एक शहरी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र संचालित होता था। बाद में इसे 50 बिस्तरों वाले सिविल अस्पताल में उन्नत किया गया और फिर इसे 100 बिस्तरों वाले अस्पताल के रूप में विकसित करने की योजना बनाई गई।"
अधिकारियों के अनुसार, उपयुक्त सरकारी भूमि उपलब्ध नहीं होने के कारण अस्पताल का निर्माण अब तक शुरू नहीं हो सका है। उनका कहना है कि जब तक अस्पताल की इमारत तैयार नहीं हो जाती, तब तक स्वीकृत पदों पर नियुक्त कर्मचारियों की सेवाएं शहर के विभिन्न सरकारी चिकित्सा संस्थानों में ली जा रही हैं। अधिकारियों ने यह भी स्पष्ट किया कि अस्पताल के लिए उपयुक्त जमीन की तलाश अभी भी जारी है।
उधर, विपक्ष ने इस पूरे मामले को सरकार की गंभीर प्रशासनिक लापरवाही करार देते हुए तीखा हमला बोला है। पूर्व मंत्री सज्जन सिंह वर्मा ने सवाल उठाया कि जब अस्पताल का भवन ही अस्तित्व में नहीं है, तो फिर उसके नाम पर वर्षों तक नियुक्तियां और तबादले किस आधार पर किए जाते रहे। उन्होंने इस पूरे मामले की जवाबदेही तय करने और इसकी निष्पक्ष जांच कराने की मांग भी की।
उन्होंने कहा, "हम आगामी विधानसभा सत्र में इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाएंगे और सरकार से जवाब मांगेंगे।" साथ ही, उन्होंने पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच की मांग भी की।
इस बीच, इंदौर के मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. माधव हसानी ने अस्पताल निर्माण में हुई देरी पर सफाई देते हुए कहा कि शहर की सीमा के भीतर इतनी बड़ी सरकारी जमीन उपलब्ध कराना आसान नहीं है। उनके अनुसार, उपयुक्त भूमि नहीं मिलने के कारण ही अब तक अस्पताल का निर्माण कार्य शुरू नहीं हो सका है।
उन्होंने बताया कि अस्पताल के लिए स्वीकृत नर्सिंग और पैरामेडिकल कर्मचारियों को फिलहाल संजीवनी क्लीनिकों और अन्य सरकारी अस्पतालों में तैनात किया गया है। उनका कहना है कि ऐसा इसलिए किया गया है, ताकि अस्पताल के निर्माण तक इन कर्मचारियों की सेवाओं और विशेषज्ञता का प्रभावी ढंग से उपयोग सुनिश्चित किया जा सके।
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फोटो साभार: फेसबुक/ जिला अस्पताल, इंदौर
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टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, छह साल पहले यानी वर्ष 2020 में मध्य प्रदेश सरकार ने खजराना में एक आधुनिक सिविल अस्पताल स्थापित करने की घोषणा की थी। लेकिन अस्पताल के लिए उपयुक्त जमीन की तलाश लंबी खिंचती चली गई। इसके बावजूद प्रशासनिक प्रक्रिया लगातार आगे बढ़ती रही। स्वास्थ्य विभाग ने इस अस्तित्वहीन अस्पताल के लिए डॉक्टरों, नर्सों और पैरामेडिकल कर्मचारियों सहित 87 पदों को मंजूरी दे दी।
अस्पताल को कागजों में संचालित दिखाए जाने के बाद वर्षों तक स्वीकृत पदों पर नियमित रूप से नियुक्तियां और तबादले होते रहे। हालांकि, अस्पताल का भवन अस्तित्व में नहीं होने के कारण इन कर्मचारियों की तैनाती शहर के विभिन्न सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों, जैसे हुकुमचंद अस्पताल, पीसी सेठी अस्पताल और अन्य सरकारी चिकित्सा संस्थानों में की जाती रही।
द वायर ने लिखा कि इस असामान्य स्थिति पर प्रतिक्रिया देते हुए मध्य प्रदेश के उपमुख्यमंत्री राजेंद्र शुक्ल ने परियोजना का इतिहास बताते हुए कहा, "शुरुआत में यहां एक शहरी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र संचालित होता था। बाद में इसे 50 बिस्तरों वाले सिविल अस्पताल में उन्नत किया गया और फिर इसे 100 बिस्तरों वाले अस्पताल के रूप में विकसित करने की योजना बनाई गई।"
अधिकारियों के अनुसार, उपयुक्त सरकारी भूमि उपलब्ध नहीं होने के कारण अस्पताल का निर्माण अब तक शुरू नहीं हो सका है। उनका कहना है कि जब तक अस्पताल की इमारत तैयार नहीं हो जाती, तब तक स्वीकृत पदों पर नियुक्त कर्मचारियों की सेवाएं शहर के विभिन्न सरकारी चिकित्सा संस्थानों में ली जा रही हैं। अधिकारियों ने यह भी स्पष्ट किया कि अस्पताल के लिए उपयुक्त जमीन की तलाश अभी भी जारी है।
उधर, विपक्ष ने इस पूरे मामले को सरकार की गंभीर प्रशासनिक लापरवाही करार देते हुए तीखा हमला बोला है। पूर्व मंत्री सज्जन सिंह वर्मा ने सवाल उठाया कि जब अस्पताल का भवन ही अस्तित्व में नहीं है, तो फिर उसके नाम पर वर्षों तक नियुक्तियां और तबादले किस आधार पर किए जाते रहे। उन्होंने इस पूरे मामले की जवाबदेही तय करने और इसकी निष्पक्ष जांच कराने की मांग भी की।
उन्होंने कहा, "हम आगामी विधानसभा सत्र में इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाएंगे और सरकार से जवाब मांगेंगे।" साथ ही, उन्होंने पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच की मांग भी की।
इस बीच, इंदौर के मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. माधव हसानी ने अस्पताल निर्माण में हुई देरी पर सफाई देते हुए कहा कि शहर की सीमा के भीतर इतनी बड़ी सरकारी जमीन उपलब्ध कराना आसान नहीं है। उनके अनुसार, उपयुक्त भूमि नहीं मिलने के कारण ही अब तक अस्पताल का निर्माण कार्य शुरू नहीं हो सका है।
उन्होंने बताया कि अस्पताल के लिए स्वीकृत नर्सिंग और पैरामेडिकल कर्मचारियों को फिलहाल संजीवनी क्लीनिकों और अन्य सरकारी अस्पतालों में तैनात किया गया है। उनका कहना है कि ऐसा इसलिए किया गया है, ताकि अस्पताल के निर्माण तक इन कर्मचारियों की सेवाओं और विशेषज्ञता का प्रभावी ढंग से उपयोग सुनिश्चित किया जा सके।
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