एमपी में जेंडर बजट पर उठे सवाल! महिला सशक्तीकरण के लिए निर्धारित धनराशि का इस्तेमाल ‘सामान्य कार्यों’ में, ऑडिट रिपोर्ट में हुआ खुलासा

Written by sabrang india | Published on: April 8, 2026
2007-08 में महिलाओं के सशक्तीकरण के उद्देश्य से शुरू किया गया जेंडर बजट अब सड़कों, भवनों और जल योजनाओं जैसे सामान्य कार्यों पर खर्च होता नजर आ रहा है। वित्तीय ऑडिट में इस पर गंभीर सवाल उठाए गए हैं, जिस पर सरकार ने अपनी सफाई भी पेश की है।


साभार : दि संडे गार्डियन

मध्यप्रदेश में महिलाओं के कल्याण व सशक्तीकरण के लिए वर्ष 2007-08 में शुरू किया गया जेंडर बजट अब अपने मूल उद्देश्य से भटकता दिखाई दे रहा है। वित्त विभाग के हालिया ऑडिट में सामने आया है कि इस बजट के तहत दी गई बड़ी राशि ऐसे कार्यों पर खर्च हो रही है, जिनका महिलाओं के सशक्तीकरण से सीधा संबंध नहीं है। सड़कों का निर्माण, स्कूल भवनों का विकास और जल जीवन मिशन जैसी सामान्य आधारभूत परियोजनाओं में इस धन का उपयोग किया जा रहा है, जबकि जेंडर बजट का मुख्य उद्देश्य महिलाओं को आर्थिक, सामाजिक और स्वास्थ्य के स्तर पर सशक्त बनाना था।

द मूकनायक की रिपोर्ट के अनुसार, सरकार की ओर से इस पर यह तर्क दिया जा रहा है कि इन योजनाओं का लाभ महिलाओं को भी मिलता है, इसलिए इन्हें जेंडर बजट में शामिल करना उचित है। हालांकि, विशेषज्ञों और सामाजिक संगठनों का मानना है कि यह तर्क जेंडर बजट की मूल भावना के विपरीत है, क्योंकि यह बजट महिलाओं के लिए विशेष रूप से लक्षित योजनाओं के लिए बनाया गया था, न कि सामान्य विकास कार्यों के लिए। प्रदेश के वित्त मंत्री जगदीश देवड़ा ने कहा है कि बजट का उपयोग निर्धारित प्रावधानों के अनुसार ही किया जा रहा है, लेकिन ऑडिट रिपोर्ट इस दावे पर सवाल खड़े करती है।

जेंडर बजट के मूल उद्देश्यों पर नजर डालें तो इसमें महिला स्व-सहायता समूहों को केवल छोटे ऋण तक सीमित रखने के बजाय उन्हें बाजार से जोड़ने, उनकी ब्रांडिंग करने और वित्तीय सहयोग प्रदान करने पर जोर दिया गया था। इसके साथ ही महिलाओं को पारंपरिक कार्यों से आगे बढ़ाकर आईटी, लॉजिस्टिक्स और अन्य तकनीकी क्षेत्रों में प्रशिक्षित करने, कामकाजी महिलाओं के लिए सुरक्षित आवास की व्यवस्था करने तथा स्वास्थ्य और पोषण पर विशेष ध्यान देने जैसे लक्ष्य निर्धारित किए गए थे। ग्रामीण क्षेत्रों में मातृ स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार और महिलाओं को डिजिटल माध्यमों के जरिए सरकारी योजनाओं से जोड़ना भी इस बजट के प्रमुख उद्देश्यों में शामिल था।

लेकिन वर्ष 2025-26 के व्यय आंकड़े इन लक्ष्यों से अलग तस्वीर प्रस्तुत करते हैं। करीब 4500 करोड़ रुपये जल जीवन मिशन पर खर्च किए गए, जिसे यह तर्क देकर उचित ठहराया गया कि इससे ग्रामीण महिलाओं का प्रतिदिन 2-3 घंटे का समय बचता है। इसी प्रकार, 125 करोड़ रुपये भोपाल, इंदौर और ग्वालियर में सड़कों पर स्मार्ट लाइटिंग और सीसीटीवी लगाने पर खर्च किए गए। स्कूल भवन निर्माण पर 1017 करोड़ रुपये खर्च किए गए, जिसमें छात्राओं के लिए हाइजीन कॉर्नर बनाने का कारण बताया गया। इसके अलावा, 215 करोड़ रुपये छात्राओं को साइकिल उपलब्ध कराने और 85 करोड़ रुपये सरकारी आवास निर्माण पर खर्च किए गए, जिन्हें महिला हित से जोड़कर प्रस्तुत किया गया।

वहीं दूसरी ओर, महिलाओं के लिए विशेष रूप से बनाई गई योजनाएं—जैसे वन स्टॉप सेंटर, महिला हेल्पलाइन और ‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’—अपेक्षित व्यय से वंचित रह गईं। ऑडिट रिपोर्ट के अनुसार, इन योजनाओं के लिए आवंटित धनराशि का पूर्ण उपयोग नहीं हो सका। यहां तक कि वन स्टॉप सेंटर के सुदृढ़ीकरण के लिए जारी फंड भी मुख्यतः वेतन और किराए के भुगतान तक ही सीमित रहा, जिससे इन केंद्रों की प्रभावशीलता पर प्रश्नचिह्न खड़े हो गए हैं।

ऑडिट में एक और गंभीर अनियमितता सामने आई है कि करीब 5000 करोड़ रुपये महिला कल्याण के नाम पर खर्च तो किए गए, लेकिन उनके उपयोगिता प्रमाण पत्र (यूसी) प्रस्तुत नहीं किए गए। इससे यह स्पष्ट नहीं हो पा रहा है कि यह राशि वास्तव में किन कार्यों में और किस हद तक प्रभावी ढंग से उपयोग हुई। इसके अतिरिक्त, राज्य के कुल राजस्व का लगभग 45 प्रतिशत हिस्सा वेतन और पेंशन पर खर्च हो रहा है, और जेंडर बजट की राशि को महिला कर्मचारियों के वेतन में शामिल कर दिखाया गया है, जो पारदर्शिता पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है।

वर्ष 2026-27 के लिए राज्य सरकार ने 1.27 लाख करोड़ रुपये का जेंडर बजट निर्धारित किया है, जिसमें से 23,382 करोड़ रुपये ‘लाड़ली बहना’ योजना पर खर्च किए जाने का प्रावधान है। हालांकि, गृह, ऊर्जा और परिवहन जैसे विभागों में जेंडर बजट का आवंटन बहुत कम है, और वहां भी इसका उपयोग मुख्यतः विभागीय खर्चों तक सीमित है। कुल मिलाकर, जेंडर बजट का लगभग 68 प्रतिशत हिस्सा महिला एवं बाल विकास तथा स्कूल शिक्षा विभाग पर ही केंद्रित है, जो अन्य महत्वपूर्ण क्षेत्रों की अनदेखी की ओर संकेत करता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि जेंडर बजट को इसी प्रकार सामान्य विकास कार्यों में समाहित किया जाता रहा, तो इसका मूल उद्देश्य कमजोर पड़ सकता है। ऐसे में यह बजट केवल आंकड़ों तक सीमित होकर रह जाएगा और महिलाओं के वास्तविक सशक्तीकरण की दिशा में अपेक्षित प्रगति नहीं हो पाएगी। इसलिए आवश्यक है कि सरकार जेंडर बजट के उपयोग में पारदर्शिता सुनिश्चित करे, लक्षित योजनाओं पर अधिक ध्यान दे और यह सुनिश्चित करे कि प्रत्येक व्यय वास्तव में महिलाओं के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाने में सहायक हो।

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