असम NRC: MHA ने इस आदेश से खोला अमित शाह की धमकी पूरा करने का रास्ता

Written by sabrang india | Published on: June 11, 2019
मोदी सरकार ने पहले कार्यकाल में असम एनआरसी के जरिए अल्पसंख्यकों को विदेशी घोषित करने का रास्ता खोल दिया था। 40 लाख से ज्यादा लोग एक ही झटके में घुसपैठिए घोषित कर दिए गए। बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने दावा किया था कि बीजेपी देशभर में एनआरसी लागू कर विदेशियों की पहचान करेगी। अब केंद्र सरकार ने राज्यों को विदेशी नागरिकों की पहचान करने के लिए बनाए जाने वाले विदेशी अधिकरण स्थापित करने का अधिकार दे दिया है। सूत्रों का दावा है कि इसे तुरंत लागू नहीं किया जा सकता लेकिन आरएसएस-बीजेपी का रोडमैप तैयार हो गया है। 

नागरिकता विधेयक पर बीजेपी के घोषणापत्र को साकार करने के लिए अमित शाह के अंडर आने वाले गृह मंत्रालय ने 30 मई, 2019 को एक विवादास्पद अधिसूचना जारी की है। एक नए संशोधित आदेश में NRC से बाहर आने वाले लोगों के लिए एक स्पष्ट रोडमैप तैयार कर दिया है। इसमें विदेशी ट्रिब्यूनलों (FTs) को भी अनिर्दिष्ट और अभूतपूर्व शक्तियां प्रदान की गई हैं। विदेशी ट्रिब्यूनल जो कि किसी व्यक्ति की नागरिकता की प्रामाणिकता के सवाल का आंकलन करता है, अब उसके पास ज्यादा शक्तियां हैं।

नया आदेश यहां पढ़ा जा सकता है

गृह मंत्रालय ने ये निर्देश विदेशी विषयक (अधिकरण) आदेश, 1964 में संशोधन करते हुए जारी किए हैं। जिसके तहत सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के जिला मजिस्ट्रेट को भारतीय सीमा में अवैध रूप से रह रहे विदेशी नागरिक पर निर्णय लेने के लिए अधिकरण स्थापित करने के अधिकार दिए हैं। इसे कोर्ट, भारतीय संविधान और नागरिकता अधिनियम के मूल सिद्धांतों के उल्लंघन करने की एक चाल के रूप में देखा जा रहा है। 

विदेशी अधिकरण अर्ध-न्यायिक निकाय होते हैं। ये नागरिकों की वैधता पर फैसला करते हैं। दूसरे राज्यों में विदेशी नागरिकों को पहले पुलिस गिरफ्तार करती है, जिसके बाद उन्हें पासपोर्ट एक्ट 1920 या विदेशी विषयक अधिनियम, 1946 के तहत स्थानिय कोर्ट में पेश किया जाता है। इसके तहत आरोपी व्यक्ति को दोषी साबित होने पर तीन महीने से आठ साल तक की जेल हो सकती है। सजा खत्म करने के बाद व्यक्ति को जब तक उसका देश स्वीकार नहीं करता डिटेंशन सेंटर में रखा जाता है।

31 जुलाई को एनआरसी की फाइनल सूची जारी की जाएगी, जिसके चलते गृह मंत्रालय ने असम में करीब 1,000 अधिकरण स्थापित करने की मंजूरी दी है। इनके पास किसी भी व्यक्ति को घुसपैठिया या नागरिक घोषित करने का अधिकार होगा।  

अपराध की नियमित अदालतों में जहां दोषी साबित होने तक किसी व्यक्ति निर्दोष माना जाता है और अभियोजन उसे साबित करने के लिए सबूत दिखाता है जबकि एफटी की सुनवाई में सबूत उपलब्ध कराने का बोझ उस व्यक्ति पर निहित है जिसकी नागरिकता पर सवाल खड़ा है। उस व्यक्ति को अपनी नागरिकता की प्रामाणिकता के लिए उपलब्ध कराए जा रहे दस्तावेजों की प्रामाणिकता को भी साबित करना होगा।

गृह मंत्रालय ने नए ऑर्डर में दो अतिरिक्त पैराग्राफ जोड़े हैं, जो कि एफटी को अनिश्चित शक्ति प्रदान करते हैं।

ऑर्डर में नए पैराग्राफ 3 ए का उप-खंड 17 देखना दिलचस्प है। इसमें लिखा है: "इस आदेश के प्रावधान के अधीन, ट्रिब्यूनल के पास समयबद्ध तरीके से मामलों के निपटान के लिए अपनी प्रक्रिया को विनियमित करने की शक्ति होगी।" जिन लोगों ने फाइनल ड्राफ्ट में नाम शामिल नहीं होने के खिलाफ अर्जी नहीं दी है उन मामलों में संशोधित अधिनियम जिला अधिकारी को फैसला करने का अधिकार देता है।

नए खंड में एफटी को मामलों के निपटान के लिए अपनी प्रक्रिया को विनियमित करने की शक्ति प्रदान की गई है। उन्हें असीमित या अनिर्दिष्ट शक्तियों के लिए एक कार्टे ब्लैंच (जैसा कि वे संचालित करना चाहते हैं) दिया गया है।

असम एनआरसी मसौदा 30 जुलाई, 2018 को प्रकाशित किया गया था, जिसमें 40.7 लाख लोगों को शामिल किए जाने पर भारी विवाद हुआ था। दावा और आपत्तियों के बाद 31 जुलाई को एनआरसी की फाइनल सूची जारी की जाएगी, जिससे पहले गृह मंत्रालय ने असम में करीब 1,000 अधिकरण स्थापित करने की मंजूरी दी है।

आगे नागरिकता पर जो बात कही गई है, वह आदेश में नए पैराग्राफ 1 बी और 3 बी को शामिल करने की है, जो केवल एफटी और विशिष्ट "नियम और शर्तों" के तहत विदेशी के रूप में पहचान के खिलाफ अपील को प्रतिबंधित करता है।

उदाहरण के लिए, NRC के मामले में, यदि कोई अपील की जाती है, तो नया आदेश जिला और उप-जिला रजिस्ट्रार या नागरिक रजिस्ट्रार को किसी भी व्यक्ति की नागरिकता की स्थिति के निर्धारण से संबंधित किसी भी जानकारी को प्रस्तुत करने की अनुमति देता है।

यदि कोई अपील नहीं की जाती है, तो संबंधित प्राधिकरण "अपनी राय के लिए ट्रिब्यूनल को संदर्भित कर सकता है"। भले ही, एफटी को अपने रिकॉर्ड जमा करने वाले मिसिंग व्यक्तियों के बारे में चार महीने के भीतर अपना फैसला देना है।

इसके अलावा, नया आदेश अधीकरण को अपील सुनने की शर्त पर असम या अन्य जगहों पर नागरिकता पर अंतिम निर्णय लेने वाली संस्था बनाता है। नए पैराग्राफ 3 ए के उप-खंड 10 में कहा गया है कि रिकॉर्ड बनाए जाने के बाद जिला मजिस्ट्रेट अपीलकर्ता को केवल नागरिकता के प्रश्न की सुनवाई के लिए नोटिस जारी कर सकते हैं, यदि यह "अपील में योग्य पाया जाता है"।

ट्रिब्यूनल के अर्ध-न्यायिक स्वरूप को देखते हुए और इसके कामकाज के बारे में कई चिंताओं को उठाया गया है, ट्रिब्यूनल के सदस्यों को "योग्यता" शब्द की व्याख्या करना भी अहम होगा जो कि लोगों के लिए खतरनाक हो सकता है।

नया आदेश उन लोगों को पहले से ज्यादा असुरक्षित बनाता है जो कानून के अधिकार क्षेत्र में "योग्यता" के बारे में अस्पष्टता पैदा करते हैं। यह पूर्वाग्रह या एक गलत निर्णय की संभावना को बढ़ाता है।

यदि इस आदेश को चेलैंज नहीं किया जाता है तो केंद्र 31 जुलाई तक असम सरकार को NRC में शामिल करने के कई दावों की जल्दबाजी को दूर करने के लिए 1,000 ट्रिब्यूनल स्थापित करने की अनुमति देने जा रहा है। केंद्र सरकार भी ई-फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल स्थापित करने के राज्य सरकार के प्रस्ताव को अपनी मंजूरी देने की प्रक्रिया में है।

उच्चतम न्यायालय की निगरानी वाली NRC कवायद, जिसका उद्देश्य बांग्लादेश की सीमाओं की राज्य में अवैध प्रवासियों की पहचान करना है, जो 1985 के असम समझौते के अनुसरण में किया गया और उस राज्य तक सीमित था। इस कदम के साथ, हालांकि, एक कार्यकारी आदेश के माध्यम से, नए शासन के तहत एमएचए ने फॉरेन ट्रिब्यूनल तंत्र को वैध बनाने के लिए सभी प्रक्रिया और कानून को विफल करने का प्रयास किया है। याद रखें कि एफटी केवल अर्ध-न्यायिक निकाय हैं जो अदालतों को प्रतिस्थापित नहीं कर सकते हैं।