एफआईआर में नाम हटाने, कार्रवाई में देरी और परिजनों से मारपीट पर कोर्ट ने सख्त नाराजगी जताई। कोर्ट ने छुट्टी के दिन सुनवाई कर पुलिस को फटकार लगाई।

मध्य प्रदेश के इंदौर के महू स्थित बडगोंदा थाना क्षेत्र में पुलिस की लापरवाही एक बार फिर उजागर हुई है। मामला अनुसूचित जाति की 17 वर्षीय नाबालिग किशोरी के अपहरण से जुड़ा है। 23 फरवरी को हुई इस घटना के बाद पीड़ित परिवार लगातार कार्रवाई की मांग करता रहा, लेकिन आरोप है कि पुलिस ने न सिर्फ एफआईआर दर्ज करने में देरी की, बल्कि मामला दर्ज करते समय नामजद आरोपियों के बजाय अज्ञात व्यक्तियों को आरोपी बना दिया। इस घटनाक्रम से आहत पीड़िता के मजदूर पिता को हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ा, जहां बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर सुनवाई करते हुए अदालत ने पुलिस के रवैये पर कड़ी नाराजगी जाहिर की।
द मूकनायक की रिपोर्ट के अनुसार, इस मामले की गंभीरता को देखते हुए हाई कोर्ट की डबल बेंच ने शनिवार को छुट्टी के दिन भी सुनवाई की। यह अपने आप में दर्शाता है कि अदालत ने इस प्रकरण को कितना संवेदनशील और तात्कालिक माना। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता शुभम मांडिल और गौरव गुप्ता ने पक्ष रखा, जबकि राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता राहुल सेठी उपस्थित हुए। अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा कि जब परिजन लगातार आरोपियों के नाम बता रहे थे, तब भी एफआईआर में उन्हें शामिल न करना गंभीर लापरवाही है।
कोर्ट ने पुलिस के रुख पर सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि एक नाबालिग के अपहरण जैसे गंभीर मामले में इस तरह की ढिलाई और उदासीनता पूरी तरह अस्वीकार्य है। अदालत ने यह भी गौर किया कि घटना के डेढ़ महीने बाद तक पुलिस न तो बालिका की तलाश के लिए ठोस प्रयास कर सकी और न ही परिजनों से पर्याप्त जानकारी एकत्र कर सकी। यह स्थिति कानून-व्यवस्था और पुलिस की जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े करती है। साथ ही, अदालत ने माना कि प्रथम दृष्टया मामला अत्यंत गंभीर है और इसमें तत्काल कार्रवाई आवश्यक है।
हाई कोर्ट ने सख्त निर्देश जारी करते हुए पुलिस को आदेश दिया कि वह नाबालिग बालिका, जो कथित रूप से पवन सिंह के कब्जे में बताई जा रही है, को हर हाल में 6 अप्रैल को अदालत के समक्ष पेश करे। इसके साथ ही अदालत ने मामले से जुड़े सभी आरोपियों को भी कोर्ट में उपस्थित करने का निर्देश दिया। इस आदेश के बाद पुलिस प्रशासन पर तत्काल कार्रवाई का दबाव बढ़ गया है।
पीड़िता के पिता का आरोप है कि उन्होंने शुरुआत से ही पवन सिंह का नाम पुलिस को बताया था, इसके बावजूद एफआईआर में उसका नाम शामिल नहीं किया गया। इस पर अदालत ने कड़ी आपत्ति जताते हुए कहा कि नामजद शिकायत के बावजूद आरोपियों को अज्ञात दर्शाना न्यायिक प्रक्रिया के साथ खिलवाड़ है। यह न केवल पीड़ित को न्याय से वंचित करता है, बल्कि आरोपियों को बचाने का प्रयास भी प्रतीत होता है।
मामले में एक और गंभीर पहलू सामने आया कि जब पीड़िता के परिजन थाने पहुंचे, तो उनके साथ अभद्र व्यवहार किया गया और पीड़िता के चाचा के साथ मारपीट तक की गई। इस घटना ने पुलिस की संवेदनहीनता को और उजागर कर दिया है। ऐसे व्यवहार ने न केवल परिवार को मानसिक रूप से आहत किया, बल्कि पुलिस पर उनका भरोसा भी कमजोर कर दिया।
हाई कोर्ट की सख्ती के बाद पुलिस का रवैया अचानक बदलता नजर आया। जहां पहले डेढ़ महीने तक कोई ठोस पहल नहीं की गई थी, वहीं कोर्ट के आदेश के तुरंत बाद बडगोंदा थाना पुलिस सक्रिय हो गई। पुलिस टीम पीड़िता के घर पहुंची और परिजनों से घटना की विस्तृत जानकारी जुटाने लगी। इससे स्पष्ट होता है कि न्यायिक हस्तक्षेप के बाद ही प्रशासनिक तंत्र में तेजी आई।
यह पूरा मामला पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है। एक ओर जहां पीड़ित परिवार लगातार न्याय की गुहार लगाता रहा, वहीं दूसरी ओर पुलिस की निष्क्रियता और कथित पक्षपातपूर्ण रवैया सामने आया। अब इस मामले में 6 अप्रैल को सुनवाई होनी है, जब पुलिस को नाबालिग बालिका और आरोपियों को अदालत के समक्ष पेश करना होगा।
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द मूकनायक की रिपोर्ट के अनुसार, इस मामले की गंभीरता को देखते हुए हाई कोर्ट की डबल बेंच ने शनिवार को छुट्टी के दिन भी सुनवाई की। यह अपने आप में दर्शाता है कि अदालत ने इस प्रकरण को कितना संवेदनशील और तात्कालिक माना। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता शुभम मांडिल और गौरव गुप्ता ने पक्ष रखा, जबकि राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता राहुल सेठी उपस्थित हुए। अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा कि जब परिजन लगातार आरोपियों के नाम बता रहे थे, तब भी एफआईआर में उन्हें शामिल न करना गंभीर लापरवाही है।
कोर्ट ने पुलिस के रुख पर सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि एक नाबालिग के अपहरण जैसे गंभीर मामले में इस तरह की ढिलाई और उदासीनता पूरी तरह अस्वीकार्य है। अदालत ने यह भी गौर किया कि घटना के डेढ़ महीने बाद तक पुलिस न तो बालिका की तलाश के लिए ठोस प्रयास कर सकी और न ही परिजनों से पर्याप्त जानकारी एकत्र कर सकी। यह स्थिति कानून-व्यवस्था और पुलिस की जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े करती है। साथ ही, अदालत ने माना कि प्रथम दृष्टया मामला अत्यंत गंभीर है और इसमें तत्काल कार्रवाई आवश्यक है।
हाई कोर्ट ने सख्त निर्देश जारी करते हुए पुलिस को आदेश दिया कि वह नाबालिग बालिका, जो कथित रूप से पवन सिंह के कब्जे में बताई जा रही है, को हर हाल में 6 अप्रैल को अदालत के समक्ष पेश करे। इसके साथ ही अदालत ने मामले से जुड़े सभी आरोपियों को भी कोर्ट में उपस्थित करने का निर्देश दिया। इस आदेश के बाद पुलिस प्रशासन पर तत्काल कार्रवाई का दबाव बढ़ गया है।
पीड़िता के पिता का आरोप है कि उन्होंने शुरुआत से ही पवन सिंह का नाम पुलिस को बताया था, इसके बावजूद एफआईआर में उसका नाम शामिल नहीं किया गया। इस पर अदालत ने कड़ी आपत्ति जताते हुए कहा कि नामजद शिकायत के बावजूद आरोपियों को अज्ञात दर्शाना न्यायिक प्रक्रिया के साथ खिलवाड़ है। यह न केवल पीड़ित को न्याय से वंचित करता है, बल्कि आरोपियों को बचाने का प्रयास भी प्रतीत होता है।
मामले में एक और गंभीर पहलू सामने आया कि जब पीड़िता के परिजन थाने पहुंचे, तो उनके साथ अभद्र व्यवहार किया गया और पीड़िता के चाचा के साथ मारपीट तक की गई। इस घटना ने पुलिस की संवेदनहीनता को और उजागर कर दिया है। ऐसे व्यवहार ने न केवल परिवार को मानसिक रूप से आहत किया, बल्कि पुलिस पर उनका भरोसा भी कमजोर कर दिया।
हाई कोर्ट की सख्ती के बाद पुलिस का रवैया अचानक बदलता नजर आया। जहां पहले डेढ़ महीने तक कोई ठोस पहल नहीं की गई थी, वहीं कोर्ट के आदेश के तुरंत बाद बडगोंदा थाना पुलिस सक्रिय हो गई। पुलिस टीम पीड़िता के घर पहुंची और परिजनों से घटना की विस्तृत जानकारी जुटाने लगी। इससे स्पष्ट होता है कि न्यायिक हस्तक्षेप के बाद ही प्रशासनिक तंत्र में तेजी आई।
यह पूरा मामला पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है। एक ओर जहां पीड़ित परिवार लगातार न्याय की गुहार लगाता रहा, वहीं दूसरी ओर पुलिस की निष्क्रियता और कथित पक्षपातपूर्ण रवैया सामने आया। अब इस मामले में 6 अप्रैल को सुनवाई होनी है, जब पुलिस को नाबालिग बालिका और आरोपियों को अदालत के समक्ष पेश करना होगा।
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