गुजरात में गहराया श्रम संकट: पश्चिम एशिया संघर्ष के चलते गैस कटौती से उद्योग प्रभावित

Written by sabrang india | Published on: April 1, 2026
पश्चिम एशिया में जारी युद्ध के चलते गैस आपूर्ति में कटौती और महंगे एलपीजी के कारण गुजरात के कई औद्योगिक क्षेत्रों में एक बार फिर श्रम संकट गहराने लगा है। यहां के प्रमुख केंद्रों से प्रवासी मजदूरों का पलायन जारी है। वहीं, औद्योगिक गैस की भारी कमी के चलते विनिर्माण केंद्रों में उत्पादन पर गंभीर असर पड़ा है।


प्रतिकात्मक तस्वीर, साभार : मिंट

पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के चलते गुजरात के कई औद्योगिक क्षेत्रों में श्रम संकट एक बार फिर गहराता दिख रहा है, जिससे कोविड-19 महामारी के दौरान हुए बड़े पैमाने पर पलायन की चिंताजनक यादें ताजा हो गई हैं। औद्योगिक गैस की आपूर्ति में भारी कटौती के कारण मोरबी, सूरत और अहमदाबाद जैसे प्रमुख विनिर्माण केंद्रों में उत्पादन गंभीर रूप से प्रभावित हो रहा है।

वाइब्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, सिरेमिक, रसायन, कपड़ा और प्लास्टिक जैसे उद्योगों पर निर्भर कारखाने या तो उत्पादन घटा रहे हैं या अस्थायी रूप से बंद होने की स्थिति में हैं। काम के घंटों में कमी और रसोई गैस (एलपीजी) की बढ़ती कीमतों के चलते प्रवासी मजदूर अपने-अपने गृह राज्यों की ओर लौटने लगे हैं। मुख्य रूप से ओडिशा, बिहार, राजस्थान और उत्तर प्रदेश के श्रमिकों का पलायन शुरू हो चुका है।

गुजरात चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (जीसीसीआई) के पूर्व सचिव सचिन पटेल ने कहा कि करीब छह साल बाद फिर से वैसी ही स्थिति बनती नजर आ रही है। उनका कहना है कि एक बार श्रमिक अपने गृह राज्यों को लौट जाते हैं, तो उन्हें दोबारा वापस लाना बेहद कठिन हो जाता है।

कपड़ा उद्योग में महंगी रसोई गैस की मार

देश के सबसे बड़े मानव निर्मित कपड़ा केंद्र सूरत में पिछले कुछ हफ्तों से श्रमिकों की भारी कमी देखी जा रही है। फेडरेशन ऑफ गुजरात वीवर्स वेलफेयर एसोसिएशन (एफओजीडब्ल्यूए) के अध्यक्ष अशोक जीरावाला ने बताया कि रोजाना 500 से 600 रुपये कमाने वाले श्रमिकों को रसोई गैस सिलेंडर पर बड़ी राशि खर्च करनी पड़ रही है।

स्थानीय स्तर पर गैस की कीमतें 200 रुपये प्रति किलोग्राम तक पहुंच गई हैं। इससे परेशान होकर मजदूर बिहार, उत्तर प्रदेश और ओडिशा जैसे राज्यों की ओर लौटने लगे हैं।

एसजीसीसीआई के अध्यक्ष निखिल मद्रासी ने चेतावनी दी है कि यदि इस समस्या का समय रहते समाधान नहीं किया गया, तो सूरत के कपड़ा और हीरा उद्योगों के सामने गंभीर चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं। वहीं, जीसीसीआई की कपड़ा समिति के अध्यक्ष मिराज शाह के अनुसार, वर्तमान में करीब 30% मजदूर अनुपस्थित हैं, जिसका सीधा असर परिधान इकाइयों के उत्पादन पर पड़ रहा है।

रसायन क्षेत्र से मजदूरों का पलायन

अहमदाबाद के वटवा और नरोदा जैसे रसायन केंद्रों में भी हालात बेहद चिंताजनक बने हुए हैं। कारखानों को उनकी कुल आवश्यकता का केवल लगभग 40% गैस ही मिल पा रही है, जिसके कारण उनकी उत्पादन क्षमता में भारी गिरावट आई है।

एलपीजी की कमी और कालाबाजारी ने स्थिति को और गंभीर बना दिया है। वटवा इंडस्ट्रीज एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष भूपेंद्र पटेल के अनुसार, अहमदाबाद में करीब 700 रासायनिक कारखाने हैं, जिनमें लगभग 50,000 श्रमिक कार्यरत हैं। गैस की कमी के चलते ये इकाइयां इस समय केवल 40% क्षमता पर ही संचालित हो रही हैं।

जीसीसीआई के पूर्व अध्यक्ष नटू पटेल ने भी चिंता व्यक्त की है कि कई श्रमिक होली की छुट्टियों के बाद काम पर वापस नहीं लौटे हैं। उनका कहना है कि यदि स्थिति में जल्द सुधार नहीं हुआ, तो और अधिक मजदूर अपने गृह राज्यों की ओर लौट सकते हैं।

निर्माण क्षेत्र में होली के बाद सन्नाटा

निर्माण क्षेत्र में श्रमिकों की कमी सीधे तौर पर युद्ध का परिणाम नहीं, बल्कि होली के त्योहार और मौजूदा अनिश्चितताओं का संयुक्त प्रभाव है। क्रेडाई गुजरात के अध्यक्ष तेजस जोशी के अनुसार, निर्माण क्षेत्र में करीब 80% श्रमिक प्रवासी हैं, जिनमें से लगभग 50% होली के बाद काम पर वापस नहीं लौटे हैं। इसके अलावा, कच्चे माल की कमी भी उद्योग के लिए एक बड़ी चुनौती बनी हुई है।

एक रियल एस्टेट कंपनी के प्रबंध निदेशक तरल शाह ने बताया कि सिरेमिक और एल्यूमीनियम पाइप जैसे कच्चे माल की आपूर्ति बाधित होने के कारण फिनिशिंग चरण में पहुंच चुकी परियोजनाओं में देरी हो रही है। वहीं, अहमदाबाद में क्रेडाई के सचिव अंकुर देसाई के अनुसार, डेवलपर्स श्रमिकों को बेहतर आवास और सुविधाएं उपलब्ध कराकर उन्हें रोकने की हर संभव कोशिश कर रहे हैं।

सिरेमिक उद्योग सतर्क, लेकिन आशान्वित

गुजरात के सबसे अधिक श्रम-प्रधान क्षेत्रों में शामिल मोरबी का सिरेमिक उद्योग भी मौजूदा हालात से जूझ रहा है। इस उद्योग में करीब चार लाख कर्मचारी कार्यरत हैं, जिनमें से अधिकांश उत्तर प्रदेश, बिहार, ओडिशा और झारखंड से आते हैं।

मोरबी सिरेमिक मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष नरेंद्र संघत ने बताया कि प्रोपेन गैस पर निर्भर लगभग 50% इकाइयों ने उत्पादन बंद कर दिया है। वहीं, गुजरात गैस पर चलने वाली करीब 45% इकाइयां अभी काम कर रही हैं, लेकिन उन्हें अपनी औसत खपत का केवल 80% ही गैस मिल पा रही है।

कठिन परिस्थितियों के बावजूद उद्योग अपने कार्यबल को बनाए रखने के लिए लगातार वेतन का भुगतान कर रहे हैं। एक सिरेमिक फर्म के प्रमोटर हरेश बोपालिया ने उम्मीद जताई कि कोविड के विपरीत इस बार हालात जल्द ही स्थिर हो जाएंगे और उद्योग अपने श्रमिकों को बनाए रखने में सफल रहेंगे।

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