'कर्नाटक के इतिहास में गौरी एक अद्भुत महिला थीं'

Written by बी चंद्र गौडा | Published on: October 11, 2017
मेरा संपर्क गौरी के साथ पिछले 18 सालों से रही है और इसके आधार पर मैं ये कह सकता हूं कि गौरी कर्नाटक के इतिहास में एक अद्भुत महिला थीं। जब पी लंकेश जी का देहांत हो गया था तो सबके दिलों में एक प्रश्न था कि उनके लंकेश पत्रिके का भविष्य क्या होगा। लेकिन इस प्रश्न का जवाब गौरी दिल्ली से वापस लौटकर जवाब दिया। उन्होंने पत्रिका का संपादक होने का जिम्मेदारी उठाया। मैंने उनसे पहले बात करने में हिचकिचाया लेकिन लंकेश जी की एक बात मुझे याद आई उन्होंने कहा था कि बिना हिचकिचाए और बिना शर्मिंदगी के हर किसी को अपनी बात रखनी चाहिए।

Gauri Lankesh

मुझे ये पता नहीं है कि यदि गौरी जी ने मेरे लिखे कॉलम को पढ़ा था या नहीं। लेकिन उनको ये लगा कि मैं बहुत विशेष हूं। उन्होंने मेरे साथ अनौपचारिक तरीके से बात रखती थीं। लंकेश पत्रिके बहुत परेशानियां उठा रही थी। और गौरी ने पत्रिके को आगे बढ़ाने के लिए बहुत कष्ट उठाया। गौरी की निर्भिकता से बहुत सारे लोगों उनसे बात करने से डरते थें। लंकेश जी ने उनके पत्रिके का एक साहित्यिक और राजनीतिक ढ़ाचा तैयार किया था लेकिन गौरी ने इस ढ़ांचे के बाहर अपने खुद का ढ़ांचा तैयार किया। ठीक उसी वक्त मुझे एक बार फोन आया तो मैंने उठााया और पूछा कि आप कौन बोल रहे हैं। तो उन्होंने उधर से बोला कि मैं तेरी मां बोल रही हूं। जिस अधिकार से वो मुझसे पेश आईं थीं तो ये मुझपर बहुत प्रभाव डाल गई। मैंने उन्हें मेरे सारे संबंधियों से मुलाकात करवाया।

पहली बार मैंने गौरी को मेरी पत्नी की माइका लेकर गया था। और वो जगह बेल्लुरू क्रॉस के नजदीक छोलसंद्रा में थी। तो उस दिन उस गांव में एक उत्सव था। नियमों के अनुसार घरों में मांस नहीं बना सकते हैं। बैल्लुरू के सैय्यद गौसन्ना अपने घर में मांस बनवाया और लेकर आए। हमलोग एक गौशाला में बैठकर हमलोगों ने एक छोटी पार्टी मनाई। गौरी को सिगरेट जलाते हुए देख कर हमारे पड़ोसी चौंक गए। मेरी मौसी को गौरी बहुत पसंद आई थीं। उन्होंने ये भी कहा था कि अगर हमारे बेटियां गौरी जैसे हों तो बेटों की क्या जरूरत है। जब गौरी निकलने वाली थी तब गौरी ने मेरे मौसी जी को एक सॉल गिफ्ट में दिया था। मौसी इस शॉल को उनके आखिरी दिनों तक अपने पास रखा और सबसे कहती थीं कि 'गौरी जी ने मुझे ये शॉल गिफ्ट दिया था’।

मैं गौरी जी को अपने गांव भी ले गया। मेरे घर में शौचालय नहीं था। मैंने जल्दी से शौचालय बनवाया और उन्हें घर ले गया। पूर्व मंत्री एचटी कृष्णप्पा भी मेरे घर पहुंचे। उन्होंने उनको कर्नाटक का राजनीतिक इतिहास बताया। बात करते करते रात काफी देर हो गई। उन्होंने मुझसे कहा कि उनको गौरी के संबंध में बहुत से संदेह थे। लेकिन गौरी से बात करने के बाद उन्हें लगा कि गौरी अपने लंकेश से भी वैचारिक रूप से ज्यादा थीं। गौरी ने उन्हें अपनी कार से खुद ड्राइव करते हुए नागमंगला में उनको घर पहुंचाया।

थोड़ी देर से ही सही मैंने गौरी को समझा। वह निर्भीक थीं। वो किसी भगवान में विश्वास नहीं करती थी और न ही धर्म और जाति में उनकी खास दिलचस्पी थी। वो एक बच्चे की तरह मासूम थीं कि वो किसी से मिलने या किसी के घर जाने या किसी के साथ खाना खाने से नहीं हिचकिचाती थीं। जिन लोगों को उनके पिता जी से परेशानी थी उनके घर भी वो जाती थीं। उन्होंने तेजस्वी जी का भी इंटरव्यू किया। ऐसे बहुत से लोग जिन्होंने उनकी एक बात भी नहीं मानी। उनका भी वो ख्याल रखती थीं। गौरी ये कहती थीं कि जो हर एक जीव का भला चाहे वो एक सच्चा 'शरण' है।

मैं जब भी बैंगलुरू जाता था तो मुझे रहने के लिए जगह मिलने में दिक्कत होती थी। गौरी ने मुझसे बताया था कि अपने घर में एक खाली कमरा है और मैं वहां पर रह सकता हूं। जब भी मैं उनके घर पर रूकता था तो वह खुद से मेरे लिए बिस्तर लगाती थीं और जब मैं सोने को जाता था तब वो बाय बोलकर जाती थीं। लेकिन अब मैं उनकी सिर्फ इन्हीं यादों के साथ जी रहा हूं।

ये बोला जाता है कि जिसको मरने से डर नहीं है वो सबसे सुखी इंसान है। गौरी ठीक वैसी ही थीं। हम हमेशा एक दूसरे के साथ हंसते और हंसाते थें। मैं उनको चुटकुला सुनाता और हंसाया करता था। जब मैंने आखिरी बार उन्हें हंसाया था तब मैंने उनसे ये कहा था कि: उन्होंने कन्हैया और रोहित को अपने बेटा बोलकर एक लेख लिखा था तो मैंने उनके चेंबर में जाकर ये कहा कि 'आपको हममें से कोई नजर नहीं आया क्या? आपको अभी मेरे साथ एक फोटो खिंचाकर उसे पब्लिश करनी होगी और मुझे आपको ब्रदर-इन-लॉ घोषित करना होगा।’

कई बार मैंने उनको हंसाने के लिए ही चुटकुला ढ़ूंढ़ निकालता था। मैंने उनके पिता जी के लिए ऐसा ही करता था। अब दोनों सिर्फ याद बनकर रह गए हैं।

कुछ महिलाएं बैंगलुरू के नायनदल्ली में एक छोटा सा घर लेकर रह रहे हैं। उनमें कई महिलाएं विधवा हैं और कई महिलाओं को उनके पतियों ने छोड़ दिया है। मैंने गौरी को इस घर ले गया था तो इन सभी महिलाओं को खुशी से रहते हुए देख कर गौरी बहुत खुश हुईं। इसके बाद गौरी ने बहुत बार उस घर का दौरा किया। आखिरी बार जब गौरी वहां गईं थी तो उन्होंने उन महिलाओं से वादा किया था कि वो फिर आएंगी। उनको उन महिलाओं के एक सभा का अध्यक्ष 14 सितंबर 2017 को बनना था। लेकिन अब वो महिलाएं गौरी की याद में आंसू बहा रही है और मेरे लिए भी वही एक विकल्प है।


इंगलिश से किया गया अनुवाद