विभाजनकारी नीतियां बनीं भारतीय राजनीति का काला सच

Written by Dr. Amrita Pathak | Published on: May 30, 2022
भाजपा सरकार के सत्ता में आए 8 साल हो चुके हैं. इन वर्षों के दौरान भारतीय संविधान के मूल्यों को तार-तार करना और संवैधानिक संस्थाओं को ख़त्म करना इनकी महान उपलब्धि रही है. जनता के ज्ञान को ज्ञानवापी मस्जिद में शिवलिंग मिलने, ताजमहल को तेजोमहालय बनाने व क़ुतुबमीनार, जामा मस्जिद को खुदवाने तक सीमित कर दिया गया है. भारतीय संविधान में निहित बहुलतावाद व् विविधता के मूल्यों की रक्षा के लिए बनी भारतीय सरकार आज विभाजनकारी नीतियों को क्रूरता के साथ लागू करने पर आमदा है. 



समय समय पर मंदिर-मस्जिद के मुद्दे को उठाना या यूँ कहें कि चुनावी एजेंडे की तरह इस मुद्दे को उपयोग करना भाजपा की पुरानी आदत में शुमार है. धार्मिक राष्ट्रवाद पर शोध के लिए प्रसिद्द शम्सुल इस्लाम कहते हैं कि “आज लोग 5000 साल पुरानी भारतीय संभ्यता के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं.” इन दिनों देश गंभीर सामाजिक, आर्थिक, वैश्विक, सामरिक चुनौतियों का सामना कर रहा है. ऐसे हालात में जब कोरोना महामारी से 60 लाख से अधिक लोगों की मौत हो चुकी हो, भारत में केवल वायु प्रदुषण से लाखों लोगों की जान जा रही हो. चक्रवात व् जलवायु परिवर्तन विकराल रूप धारण कर देश और दुनिया में कोहराम मचाने के लिए तैयार हो, तब सत्ता पक्ष द्वारा भारत को हिन्दू- मुसलमान, मंदिर मस्जिद की बहस में लाकर खड़ा कर देना गैर जिम्मेदाराना व्यवहार है. 

अंग्रेजी अखबार टाइम्स ऑफ इण्डिया अपने सम्पादकीय में लिखता है कि, “भारतीय इतिहास खुबसूरत नहीं है लेकिन एक आधुनिक देश, खासकर एक विविधतापूर्ण लोकतंत्र को जो एक बड़ी वैश्विक आर्थिक ताकत बनना चाहता है उसे अपनी उर्जा इतिहास पर दुबारा मुकदमेंबाज़ी में खर्च नहीं करना चाहिए. देश पहले से ही कई साम्प्रदायिक मसलों का सामना कर रहा है तब एक और ‘मस्जिद-पहले-मंदिर-था’ आयाम जोडनें के खतरनाक नतीजे हो सकते हैं”.

मोदी सरकार के दिल्ली में सत्ता संभालने के बाद लोगों को यह उम्मीद थी कि अच्छे दिन आएंगे, विदेशों में जमा काला धन वापिस आएगा और रोज़गार के अवसर बढ़ेंगे. इनमें से कुछ भी नहीं हुआ. आवश्यक वस्तुओं के दाम आसमान छू रहे हैं और गरीबों के भोजन ‘रोटी-दाल’ में से दाल इतनी मंहगी हो गई कि मध्यम वर्ग के परिवारों के लिए भी उसे खरीदना मुश्किल हो गया है. बेरोज़गारी भयावह स्तर को पार कर चुकी है. रही बात बहुप्रचारित विदेश नीति की तो किसी को यह समझ में नहीं आ रहा है कि भारत सरकार की विदेश नीति आखिर है क्या? हां, प्रधानमंत्री नियमित रूप से विदेश जाते रहते हैं और दूसरे देशों के नेताओं के साथ उनकी तस्वीरें अखबारों की शोभा जरुर बढ़ाती रहती हैं.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ‘‘अधिकतम शासन-न्यूनतम सरकार’’ (मैक्सिमम गर्वनेंस-मिनिमल गर्वमेंट) के नारे से होते हुए दुसरे कार्यकाल में सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास नारे तक पंहुची जो वर्तमान में खोखला साबित हुआ है. सारी शक्तियां एक व्यक्ति के हाथों में केंद्रित हो गई हैं और उस व्यक्ति में तानाशाह बनने के चिन्ह स्पष्ट नज़र आ रहे हैं. देश में सांप्रदायिक द्वेष लगातार बढ़ रहा है, सौहार्द कम हुआ है और शैक्षणिक संस्थाओं की स्वायत्तता को लगभग समाप्तप्राय कर दिया गया है. मोदी सरकार के सत्ता संभालते ही संघ परिवार के विभिन्न अनुषांगिक संगठन अतिसक्रिय हो गए परिणामतः हिंदुत्व को सामने कर भीड़ हत्या की प्रवृति में बढ़ोतरी दर्ज की गयी है.

देश के युवाओं में आज रोजगार की भूख नहीं पहचान का जूनून भर दिया गया है और आज यह पहचान अल्पसंख्यकों के साथ दुर्व्यवहार, भीड़ हिंसा, हत्या व् असहिष्णुता के पैमाने पर खड़ा है. भावनात्मक मुद्दों को भड़का कर और उसमें हिंसा का छौंक लगा कर, उसे छदम राष्ट्र वाद का चोला पहना कर युवाओं को असंवेदनशील बनाया जा रहा है. यह प्रवृति भारतीय राष्ट्रवाद को गहरी क्षति पहुंचा रही है. भारतीय राष्ट्रवाद उदार है, उसमें अलग-अलग धर्मों जातियों, विचारधाराओं के लिए स्थान है. प्यार, सर्वधर्म समभाव, सोहाद्र, एकता, अखंडता भारत की पहचान है जिसे धूमिल किया जा रहा है. 

संघ की संकल्पना हिन्दू राष्ट्र बनाने की है जिसे भाजपा सरकार लागु करने के लिए प्रतिबद्ध और यह तब तक पूरा नहीं किया जा सकता जब तक देश के धर्मनिरपेक्ष छवि को धूमिल नहीं किया जाए. सत्ता में आने के साथ ही धार्मिक व् साम्प्रदायिक जंग शुरू करना इसी योजना का हिस्सा है. अल्पसंख्यकों के खिलाफ लगातार हो रहे अत्याचार और उन्हें भारत में बाहर से आए हुए दिखाना असल में अल्पसंख्यकों के खिलाफ बहुसंख्यकों के ताकत दिखाने की तैयारी है. अब तक के लिखे गए इतिहास पर सवाल खड़े करना और उसे अर्थहीन बताना पौराणिक सच्चाई से जनता को दूर रखने की कोशिश है ताकि सच और फैक्ट की जानकारी के साथ लोग सत्ता से सवाल भी न कर सके. 

वर्तमान ज्ञानवापी विवाद के सन्दर्भ में इतिहासकार हरबंस मुखिया कहते हैं कि काशी और मथुरा का मंदिर औरंगजेब के हुक्म से तोडा गया था. उसी औरंगजेब ने सैकड़ों मंदिरों व मठों को दान भी दिया. जहाँ एक तरफ मंदिरों को तोड़ा जा रहा था वहीँ दूसरी तरफ मंदिर और मठ के निर्माण के लिए जमीन व् पैसे भी दिए जा रहे थे. 

ऐसा नहीं है कि पूर्व के समय में भारत के हिन्दू मंदिरों में लूटपाट सिर्फ बाहर से आए गैर हिन्दू आक्रमणकारियों ने ही की है. सत्ता प्राप्ति के लिए व राजसी घरानों के आपसी क्लेश के कारण भी धार्मिक स्थलों को तोड़ने और अपमानित करने का इतिहास रहा है. 

इतिहासकार रिचर्ड ईटन के अनुसार, 11वीं सदी के शुरूआती सालों में चोल राजा राजेन्द्र प्रथम ने अपनी राजधानी को उन प्रतिमाओं से सजाया जिन्हें उन्होंने कई राजाओं से छीना था. इसमें चालुक्य से ली गयी दुर्गा बी व गणेश की मूर्ति, उड़ीसा के कलिंग से छीनी गयी भैरव, नंदी व काली की प्रतिमाएं शामिल हैं. वे लिखते हैं कि साल 1460 में ओडिशा के सूर्यवंशी गजपति राजवंश के संस्थापक कपिलेन्द्र ने युद्ध के दौरान शिव और विष्णु के मंदिरों को तोड़ने का आदेश दिया.

ईटन कहते हैं कि, ये पक्के तौर पर कभी भी पता नहीं चल पाएगा कि कितने हिन्दू मंदिरों का अपमान हिन्दू राजाओं द्वारा किया गया लेकिन 12वीं से 18वीं सदी के बीच 60 हिन्दू मंदिरों के अपमान के करीब-करीब पक्के सबूत मिले हैं. इस बात के भी प्रमाणित सबूत मिलते हैं कि हिन्दुओं ने बौद्ध स्तूपों और तीर्थ स्थलों की तबाही की. इतिहासकार डीएन झा लिखते हैं कि, एक तरफ जहाँ सम्राट अशोक भगवान बुद्ध को मानने वाले थे वहीं उनके बेटे और भगवान शिव के उपासक जलौक ने बौद्ध विहारों को बर्बाद किया. 

ऐसे कई उदाहरण इतिहासकारों द्वारा सबूत के साथ इतिहास के पन्नों में दर्ज किया गया है जिसे आज अर्थहीन बताने की पुरजोर कोशिश हो रही है ताकि किताबों और असलियत से परे मीडिया का इतिहास लोगों के दिमाग तक पहुँचाया जा सके और नफरत और हिंसा के बीज को तैयार किया जा सके. 

आज की तारीख में इतिहास की समझ को जटिल बना दिया गया है. इतिहास की जटिलता में अगर बहुत दूर तक नहीं भी जाया जाए तो भारतीय संविधान के अनुसार, उपासना स्थल (विशेष प्रावधान) कानून, 1991 कहता है कि 1947 में जो धार्मिक स्थल जिस स्थिति में था वो वैसा ही बना रहे” और संविधान का यह हिस्सा भारत में शांति और सद्भाव स्थापित करने के लिए प्रयाप्त है. आज देश में विभाजनकारी नीतियों की नहीं समतामूलक समाज निर्माण की जरुरत है जिसके लिए सामाजिक एकजुटता और सविधान पर भरोसा रखने की जरुरत है.

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