नई दिल्ली। ऑक्सीजन को लेकर मची लूटमार की स्थिति के बाद कोरोना वैक्सीन को लेकर भी यही स्थिति बनती दिख रही है। कोरोना वैक्सीन के अलग अलग रेट को लेकर कांग्रेस ने मोदी सरकार पर हमला बोला है। कांग्रेस नेताओं ने कहा कि पूरे देश में वैक्सीन की एक समान कीमत होनी चाहिए। साथ ही टीकाकरण कार्यक्रम को निजी हाथों में और बाजार के भरोसे नहीं छोड़ना चाहिए। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने कहा कि मोदी सरकार की वैक्सीन नीति, लोगों को नोटबंदी की तरह लाइन में खड़े करने वाली है।

खास है कि सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया ने बुधवार को कहा कि कोविड-19 वैक्सीन की कीमत राज्य सरकारों के लिए 400 रुपये प्रति खुराक तथा निजी अस्पतालों के लिए 600 रुपये प्रति खुराक होगी। इसी को लेकर कांग्रेस ने सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (एसआईआई) की ओर से राज्यों एवं निजी अस्पतालों के लिए कोरोना रोधी टीके का मूल्य निर्धारित किए जाने के बाद केंद्र सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि यह एक ‘घटिया’ कदम है तथा पूरे देश में टीके की एक कीमत तय होनी चाहिए।
कांग्रेस नेता पी चिदंबरम ने सवाल भी उठाया कि टीके के लिए 400 रुपये का भुगतान राज्य सरकारें करेंगी या फिर लाभार्थी करेंगे? चिदंबरम ने ट्वीट किया, ‘जैसा कि अंदेशा था, कोविशील्ड टीके की कीमत सरकारी अस्पतालों के लिए 400 रुपये और निजी अस्पतालों के लिए 600 रुपये तय कर दी गई है। सरकारी अस्पतालों में 400 रुपये कौन अदा करेगा? राज्य सरकार या फिर लाभार्थी?। कांग्रेस नेता ने कहा कि सरकार अब अपनी जिम्मेदारी से भाग रही है। राज्यों पर अतिरिक्त बोझ डाल रही है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने वैक्सीन नीति पर सवाल उठाते हुए कहा कि टीकाकरण कार्यक्रम को निजी हाथों में और बाजार के भरोसे नहीं छोड़ना चाहिए।
उन्होंने कहा कि, 18 से 44 साल आयु वर्ग के कितने लोग प्रति खुराक 400 रुपये दे सकेंगे? क्या लाभार्थी पर कीमत का बोझ डाला जाएगा? कितने राज्य टीके की कीमत का भुगतान करेंगे और क्या लोगों को सब्सिडी दी जाएगी?’
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश ने भी ट्वीट कर कहा, ‘केंद्र सरकार को कोविशील्ड की खुराक 150 रुपये की मिलती रहेगी। अब राज्यों से इसके लिए 400 रुपये लिया जाएगा। यह सहकारी संघवाद नहीं है। यह पहले से ही संकट का सामना कर रहे राज्य सरकारों के खजाने पर और बोझ डालेगा। कहा यह घटिया कदम है। उन्होंने केंद्र सरकार से आग्रह करते हुए, ‘एक राष्ट्र, एक कीमत’ की मांग की है।
उधर, कांग्रेस के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष व सांसद राहुल गांधी ने मोदी सरकार की नई टीकाकरण नीति पर हमला बोला है। उन्होंने कहा कि केंद्र की नई टीकाकरण नीति भी नोटबंदी की ही तरह लाइन लगाने वाली साबित होगी। राहुल ने टीका नीति की तुलना नोटबंदी से करते हुए, आरोप लगाया कि केंद्र सरकार की टीका संबंधी रणनीति नोटबंदी से कम नहीं है क्योंकि इसमें भी लोग कतारों में लगेंगे और धन, स्वास्थ्य एवं जान का नुकसान सहेंगे और अंत में सिर्फ़ कुछ उद्योगपतियों का फ़ायदा होगा।
खास है कि एक मई से 18 साल से अधिक उम्र के सभी लोग कोविड-19 की रोकथाम के लिए टीका लगवा सकेंगे। केंद्र सरकार ने टीकाकरण अभियान में ढील देते हुए राज्यों, निजी अस्पतालों और औद्योगिक प्रतिष्ठानों को सीधे टीका, निर्माताओं से खरीदने की अनुमति भी दे दी है।
बहरहाल कुछ भी है, जो संशय हैं उन्हें सरकार को दूर करना चाहिए। मसलन जैसे भारत सरकार ने केंद्रीय बजट में वैक्सीन के लिए 35 हजार करोड़ रुपए का प्रावधान किया है। अगर राज्य सरकारें वैक्सीन अपने पैसे से खरीदेंगी और आम लोग भी अपने पैसे से वैक्सीन खरीदेंगे को केंद्रीय बजट का पैसा क्या होगा? अभी जिस दर पर सरकार को वैक्सीन मिल रही है इस हिसाब से सरकार 35 हजार करोड़ रुपए में पूरी आबादी को एक डोज लगाने लायक वैक्सीन खरीद सकती है। लेकिन अब भी बड़ी संख्या में लोग निजी अस्पतालों में ढाई सौ रुपए देकर वैक्सीन लगवा रहे हैं। इसमें डेढ़ सौ रुपए वैक्सीन की डोज के हैं, जाहिर है कि सरकार एक डोज में 60-70 रुपए सब्सिडी दे रही है। जब लोग वैक्सीन की खरीद खोल दी जाएगी तो लोग यह सब्सिडी भी खत्म हो जाएगी। क्या कायदे से सरकार को केंद्रीय बजट में प्रस्तावित रकम से वैक्सीन खरीद कर राज्यों को नहीं देनी चाहिए? क्या आम लोगों को मुफ्त में वैक्सीन नहीं लगनी चाहिए?
इसी तरह से वैक्सीन की कीमत का मामला है। जो लोग सरकारी अस्पतालों में जाकर वैक्सीन लगवाएंगे उन्हें तो मुफ्त में वैक्सीन लग जाएगी लेकिन निजी अस्पतालों में वैक्सीन के लिए क्या कीमत ली जाएगी? कहा जा रहा है कि निजी अस्पतालों में वैक्सीन की कीमत सात सौ से एक हजार रुपए प्रति डोज हो सकती है। कितने लोग इस कीमत पर वैक्सीन अफोर्ड कर सकेंगे? विदेशी वैक्सीन की कीमत इससे भी ज्यादा हो सकती है। राज्यों को किस कीमत पर वैक्सीन मिलेगी यह भी सरकार को तय करना चाहिए।
दूसरी ओर खास यह भी है कि देश पहले ही सरकारों की लापरवाही के चलते बेड व दवाई से लेकर ऑक्सीजन की इमरजेंसी तक से जूझ रहा है। वर्तमान में तो हालात लूटमार के बन आए हैं। आलम यह है कि हरियाणा सरकार ने दिल्ली सरकार पर ऑक्सीजन टैंकर लूट लेने के आरोप लगाए हैं। जबकि ऑक्सीजन किल्लत के पीछे सरकारों का लापरवाह रवैया और अदूरदर्शिता ही उजागर हुई है।
मसलन कोरोना की दूसरी लहर की संभावना साफ होने के बावजूद केंद्र सरकार ने इस साल, पिछले साल की तुलना में दोगुनी मात्रा में ऑक्सीजन बाहर दूसरे देशों को एक्सपोर्ट कर दी है। सवाल है कि सब कुछ (दूसरी लहर) जानते बूझते भी केंद्र की ऐसी क्या मजबूरी रही होगी कि देश से इतनी बड़ी (दोगुनी) मात्रा में ऑक्सीजन का निर्यात किया गया। सच्चाई ये है कि साल के शुरू होने के साथ ही भारत कोरोना महामारी से सबसे ज्यादा 3 प्रभावित देशों में शामिल हो गया था। बिजनेस टुडे के अनुसार, अप्रैल 2020 से जनवरी 2021 के दौऱान भारत ने 9301 मीट्रिक टन ऑक्सीजन का निर्यात किया। जबकि इसकी तुलना में पिछले साल 2019-20 में कुल 4514 मीट्रिक टन ऑक्सीजन का ही निर्यात किया था। यानि कि इस साल दोगुनी ऑक्सीजन निर्यात हुई है।

खास है कि सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया ने बुधवार को कहा कि कोविड-19 वैक्सीन की कीमत राज्य सरकारों के लिए 400 रुपये प्रति खुराक तथा निजी अस्पतालों के लिए 600 रुपये प्रति खुराक होगी। इसी को लेकर कांग्रेस ने सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (एसआईआई) की ओर से राज्यों एवं निजी अस्पतालों के लिए कोरोना रोधी टीके का मूल्य निर्धारित किए जाने के बाद केंद्र सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि यह एक ‘घटिया’ कदम है तथा पूरे देश में टीके की एक कीमत तय होनी चाहिए।
कांग्रेस नेता पी चिदंबरम ने सवाल भी उठाया कि टीके के लिए 400 रुपये का भुगतान राज्य सरकारें करेंगी या फिर लाभार्थी करेंगे? चिदंबरम ने ट्वीट किया, ‘जैसा कि अंदेशा था, कोविशील्ड टीके की कीमत सरकारी अस्पतालों के लिए 400 रुपये और निजी अस्पतालों के लिए 600 रुपये तय कर दी गई है। सरकारी अस्पतालों में 400 रुपये कौन अदा करेगा? राज्य सरकार या फिर लाभार्थी?। कांग्रेस नेता ने कहा कि सरकार अब अपनी जिम्मेदारी से भाग रही है। राज्यों पर अतिरिक्त बोझ डाल रही है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने वैक्सीन नीति पर सवाल उठाते हुए कहा कि टीकाकरण कार्यक्रम को निजी हाथों में और बाजार के भरोसे नहीं छोड़ना चाहिए।
उन्होंने कहा कि, 18 से 44 साल आयु वर्ग के कितने लोग प्रति खुराक 400 रुपये दे सकेंगे? क्या लाभार्थी पर कीमत का बोझ डाला जाएगा? कितने राज्य टीके की कीमत का भुगतान करेंगे और क्या लोगों को सब्सिडी दी जाएगी?’
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश ने भी ट्वीट कर कहा, ‘केंद्र सरकार को कोविशील्ड की खुराक 150 रुपये की मिलती रहेगी। अब राज्यों से इसके लिए 400 रुपये लिया जाएगा। यह सहकारी संघवाद नहीं है। यह पहले से ही संकट का सामना कर रहे राज्य सरकारों के खजाने पर और बोझ डालेगा। कहा यह घटिया कदम है। उन्होंने केंद्र सरकार से आग्रह करते हुए, ‘एक राष्ट्र, एक कीमत’ की मांग की है।
उधर, कांग्रेस के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष व सांसद राहुल गांधी ने मोदी सरकार की नई टीकाकरण नीति पर हमला बोला है। उन्होंने कहा कि केंद्र की नई टीकाकरण नीति भी नोटबंदी की ही तरह लाइन लगाने वाली साबित होगी। राहुल ने टीका नीति की तुलना नोटबंदी से करते हुए, आरोप लगाया कि केंद्र सरकार की टीका संबंधी रणनीति नोटबंदी से कम नहीं है क्योंकि इसमें भी लोग कतारों में लगेंगे और धन, स्वास्थ्य एवं जान का नुकसान सहेंगे और अंत में सिर्फ़ कुछ उद्योगपतियों का फ़ायदा होगा।
खास है कि एक मई से 18 साल से अधिक उम्र के सभी लोग कोविड-19 की रोकथाम के लिए टीका लगवा सकेंगे। केंद्र सरकार ने टीकाकरण अभियान में ढील देते हुए राज्यों, निजी अस्पतालों और औद्योगिक प्रतिष्ठानों को सीधे टीका, निर्माताओं से खरीदने की अनुमति भी दे दी है।
बहरहाल कुछ भी है, जो संशय हैं उन्हें सरकार को दूर करना चाहिए। मसलन जैसे भारत सरकार ने केंद्रीय बजट में वैक्सीन के लिए 35 हजार करोड़ रुपए का प्रावधान किया है। अगर राज्य सरकारें वैक्सीन अपने पैसे से खरीदेंगी और आम लोग भी अपने पैसे से वैक्सीन खरीदेंगे को केंद्रीय बजट का पैसा क्या होगा? अभी जिस दर पर सरकार को वैक्सीन मिल रही है इस हिसाब से सरकार 35 हजार करोड़ रुपए में पूरी आबादी को एक डोज लगाने लायक वैक्सीन खरीद सकती है। लेकिन अब भी बड़ी संख्या में लोग निजी अस्पतालों में ढाई सौ रुपए देकर वैक्सीन लगवा रहे हैं। इसमें डेढ़ सौ रुपए वैक्सीन की डोज के हैं, जाहिर है कि सरकार एक डोज में 60-70 रुपए सब्सिडी दे रही है। जब लोग वैक्सीन की खरीद खोल दी जाएगी तो लोग यह सब्सिडी भी खत्म हो जाएगी। क्या कायदे से सरकार को केंद्रीय बजट में प्रस्तावित रकम से वैक्सीन खरीद कर राज्यों को नहीं देनी चाहिए? क्या आम लोगों को मुफ्त में वैक्सीन नहीं लगनी चाहिए?
इसी तरह से वैक्सीन की कीमत का मामला है। जो लोग सरकारी अस्पतालों में जाकर वैक्सीन लगवाएंगे उन्हें तो मुफ्त में वैक्सीन लग जाएगी लेकिन निजी अस्पतालों में वैक्सीन के लिए क्या कीमत ली जाएगी? कहा जा रहा है कि निजी अस्पतालों में वैक्सीन की कीमत सात सौ से एक हजार रुपए प्रति डोज हो सकती है। कितने लोग इस कीमत पर वैक्सीन अफोर्ड कर सकेंगे? विदेशी वैक्सीन की कीमत इससे भी ज्यादा हो सकती है। राज्यों को किस कीमत पर वैक्सीन मिलेगी यह भी सरकार को तय करना चाहिए।
दूसरी ओर खास यह भी है कि देश पहले ही सरकारों की लापरवाही के चलते बेड व दवाई से लेकर ऑक्सीजन की इमरजेंसी तक से जूझ रहा है। वर्तमान में तो हालात लूटमार के बन आए हैं। आलम यह है कि हरियाणा सरकार ने दिल्ली सरकार पर ऑक्सीजन टैंकर लूट लेने के आरोप लगाए हैं। जबकि ऑक्सीजन किल्लत के पीछे सरकारों का लापरवाह रवैया और अदूरदर्शिता ही उजागर हुई है।
मसलन कोरोना की दूसरी लहर की संभावना साफ होने के बावजूद केंद्र सरकार ने इस साल, पिछले साल की तुलना में दोगुनी मात्रा में ऑक्सीजन बाहर दूसरे देशों को एक्सपोर्ट कर दी है। सवाल है कि सब कुछ (दूसरी लहर) जानते बूझते भी केंद्र की ऐसी क्या मजबूरी रही होगी कि देश से इतनी बड़ी (दोगुनी) मात्रा में ऑक्सीजन का निर्यात किया गया। सच्चाई ये है कि साल के शुरू होने के साथ ही भारत कोरोना महामारी से सबसे ज्यादा 3 प्रभावित देशों में शामिल हो गया था। बिजनेस टुडे के अनुसार, अप्रैल 2020 से जनवरी 2021 के दौऱान भारत ने 9301 मीट्रिक टन ऑक्सीजन का निर्यात किया। जबकि इसकी तुलना में पिछले साल 2019-20 में कुल 4514 मीट्रिक टन ऑक्सीजन का ही निर्यात किया था। यानि कि इस साल दोगुनी ऑक्सीजन निर्यात हुई है।