पिछले एक दशक में विश्व स्वास्थ्य संगठन में दुनिया के सबसे बड़े दानदाता बने बिल गेट्स

Written by Girish Malviya | Published on: May 3, 2020
कुछ अरबपति स्वंय को एक आइलैंड खरीद कर देने से संतुष्ट हैं। बिल गेट्स ने अपने लिए जिनेवा में संयुक्त राष्ट्र की स्वास्थ्य एजेंसी खरीदी है। यहां WHO की ही बात हो रही है। यह एक मशहूर पत्रिका पॉलिटीको की कवर स्टोरी है 2017 में, जी हां 2017 में !



यहाँ हिन्दुस्तान में हम बिल गेट्स को माइक्रोसॉफ्ट के कारण ही जानते है लेकिन अपनी परोपकारी गतिविधियों के लिए वह पूरी दुनिया सालो से चर्चा का केंद्र बने हुए है। पिछले एक दशक में, दुनिया का सबसे अमीर आदमी विश्व स्वास्थ्य संगठन का दूसरा सबसे बड़ा दानदाता बन गया है।

WHO को मिलने वाले कुल फण्ड में बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन का हिस्सा 14% रहा है। वही अमेरिका 24% और GAVI यानी 'ग्लोबल अलायंस फॉर वैक्सीन एंड इम्यूनाइजेशन' वो भी एक बड़ा फंड WHO को देता आया है। इस GAVI में भी बिल गेट्स शामिल हैं। यानि संभवतः बिल गेट्स अकेले दुनिया के किसी देश से भी ज्यादा WHO को फंडिंग करते है! तो जो लोग उन्हें एक परोपकारी व्यक्ति समझ रहे है उन्हें एक जरा ठिठक कर वापस से सोचने की जरूरत है कि परोपकार में WHO को हथियाने की कोशिशें क्यो की जा रही है ?

कहते है कि एक दशक पहले, जब गेट्स ने मलेरिया उन्मूलन में पैसा फेंकना शुरू किया, तो WHO के कुछ बड़े अधिकारियों ने इसका विरोध किया डब्ल्यूएचओ के मलेरिया कार्यक्रम के प्रमुख ने इस पर भी चिंता जताई किउनकी फंडिंग अनुसंधान प्राथमिकताओं को विकृत कर रही है।

गेट्स फाउंडेशन ने सन 2000 के बाद से डब्ल्यूएचओ में 2.4 बिलियन डॉलर से भी अधिक पैसा डाला है क्योंकि विश्व के बड़े अर्थव्यवस्था की UN के इन बड़े संगठनों का बोझ उठाने में खुद को अक्षम पा रही थी 2008 के वैश्विक आर्थिक संकट के बाद यह प्रवृत्ति बढ़ती ही गया।

आज हालत यह है कि UN के सदस्य राष्ट्रों द्वारा भुगतान की गई राशि अब WHO के 4.5 बिलियन डॉलर के द्विवार्षिक बजट के एक चौथाई से भी कम है।

हमारी इंदौर की भाषा मे हम पूछते है 'इतना धन आ कहा से रिया है'? कहा से बरस रिया है?

पोलिटीको की यह स्टोरी बता रही है कि इस स्थिति से आज भी कुछ NGO और शिक्षाविद चिंतित हैं। वे अच्छी तरह से समझ रहे हैं कि गेट्स फाउंडेशन द्वारा दिया गया पैसा दरअसल एक बड़े कारोबार में निवेश के समान है यह कॉर्पोरेट हितों के लिए एक ट्रोजन हॉर्स के रूप में काम कर सकता है जो मानकों को स्थापित करने और स्वास्थ्य नीतियों को आकार देने में डब्ल्यूएचओ की भूमिका को कमजोर करता है।

आज कोरोना काल मे इस 'ट्रोजन हॉर्स' का भेद खुल गया है। इस monopolistic philanthropy’ के पीछे रची गयी साजिशें स्पष्ट रूप से खुल कर सामने आ गयी है पर।अफसोस ये है कि हम उसे आज भी नजरअंदाज कर रहे हैं।

कल तक अफ्रीका महाद्वीप में ये जो गेम खेल रहे थे वही आज पूरे संसार मे खेलने की तैयारी है।

कोरोना काल मे बिल गेट्स कहते है 'हर किसी को बाहर जाने में डर लग रहा है। इसलिए उस इलाज की जरूरत है जिससे लोग खुद को सुरक्षित महसूस करें, तभी वे घर के बाहर आजादी के साथ घूम पाएंगे। इसके लिए वैक्सीन एकमात्र उम्मीद है। जब तक वैक्सीन तैयार नहीं हो जाती है, दुनिया वैसी नहीं रह जाएगी जैसी कोरोना से पहले थी।

सीधा अर्थ है कि कोरोना की वैक्सीन तैयार होने के बाद हर शख्स को लगाई जाएगी।

वे कहते है कि 'जब वैक्सीन तैयार हो जाएगी सही यह होगा कि दुनिया की पूरी आबादी (लगभग 700 करोड़) को वैक्सीन लगे। साथ में उन्होंने यह भी कहा कि जब वैक्सी तैयार हो जाएगी तो इसे पाने की होड़ मच जाएगी, इसलिए बहुत बड़े पैमाने पर वैक्सीन तैयार करने की जरूरत होगी जिससे हालात बिगड़े नहीं।'

इसी हफ्ते दुनिया की जानीमानी पत्रिका द इकनॉमिस्ट में उनका एक लेख छपा है जिसके अंत मे वे लिखते है। 'इतिहास हमेशा एक तय ढर्रे पर नहीं चलता। लोग तय करते हैं कि कौन सी दिशा लेनी है और वे गलत मोड़ भी ले सकते हैं। 2021 के बाद के साल बहुत कुछ 1945 के बाद के सालों जैसे ही होंगे। लेकिन आज की सबसे ज्यादा समानता 10 नवंबर 1942 से हो सकती है। ब्रिटेन ने युद्ध में पहली जमीनी लड़ाई जीती थी और विंस्टन चर्चिल के एक भाषण में घोषणा की- ‘यह अंत नहीं है। यह अंत की शुरुआत भी नहीं है। लेकिन यह संभवत: शुरुआत का अंत है।

यकीन जानिए अभी तो बहुत कुछ सामने आने वाला है। इस बहुत बड़े खेल में कोरोना वैक्सीन भी 'संभवत: शुरुआत का अंत' ही है। बने रहिए।

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