संगठन की मजबूती व चुनावी मुद्दों की जागरुकता के लिए AIUFWP का जनजागरूकता कार्यक्रम

Written by sabrang india | Published on: April 6, 2019
अखिल भारतीय वन-जन श्रमजीवी यूनियन ने संगठन की मजबूती एवं चुनाव में अपने स्थानीय मुद्दों को मजबूत करने के लिए टीमों का गठन किया है। ये टीमें (पलिया, दुधवा, बहराइच, मानिकपुर, चंदौली, सोनभद्र, अधौरा और रोहतास इलाके का दौरा करेंगी। सुप्रीम कोर्ट द्वारा वनाधिकार कानून खत्म करने के चलते लाखों वनाश्रितों पर अपनी जमीन से बेदखली का खतरा मंडरा रहा है। अखिल भारतीय वन-जन श्रमजीवी यूनियन की टीमें 12 अप्रैल से 15 मई तक विभिन्न स्थानों का दौरा कर वहां की जनता को असली मुद्दों के प्रति जागरुक करेंगी। 

अखिल भारतीय वन-जन श्रमजीवी यूनियन ने प्रेस विज्ञप्ति जारी कर कहा है.....
2014 से मोदी सरकार केन्द्र की सत्ता में आई है। तब से पूरे देश में अल्पसंख्यकों, मुस्लिमों, दलितों, आदिवासियों और महिलाओं पर हमले बेतहाशा बढ़े हैं। देश में गौरक्षा के नाम पर भड़की हिंसा और सुनियोजित हत्याएं उत्तर प्रदेश में दलितों, आदिवासियों पर अत्याचार, देश में दलितों पर भाजपा-आर.एस.एस. समर्थित संगठनों के लोगों द्वारा किये गये अत्याचार से इस देश के सांप्रदायिक ताने-बाने को कमजोर करने का काम किया है। गुजरात के ऊना में जिस तरह से चार दलित साथियों को सरे आम पुलिस थाने के पास मारा गया और पूरे घटना का विडियो सोशल मीडिया पर खुले आम शेयर किया गया अभी तक उन अपराधियों को गुजरात की भाजपा सरकार उनको सजा तक नहीं दिला पाई है। वो सभी हत्यारे और अपराधी खुलेआम घूम रहे है। ये सब सत्ता की शह के बिना नहीं हो सकता यहीं नहीं इसके बाद लगातार महसाना पाटन और अहमदाबाद में दलितों पर हमले और भी बढे है जिस तरह से देश के संविधान के मूल चरित्र के साथ छेड-छाड का प्रयास किया जा रहा है। उससे पूरे देश की मिली-जूली संस्कृति खतरे में आ गयी है।

पिछले पांच वर्षों में जिस तरह से देश की संवैधानिक संस्थाओं पर हमले बढ़े हैं उससे प्रजातांत्रिक व्यवस्था तहस-नहस हो गयी है। देश पूरी तरह से गंभीर आर्थिक संकट से जूझ रहा है। नोटबन्दी और जी.एस.टी. ने गरीबों और मध्यम वर्गीय व्यापारियों की कमर तोड़ दी है। बेरोजगारी 45 साल की तुलना में सबसे ज्यादा है, दूसरी तरफ पूरे देश में फैले साम्प्रदायिकता से भय का माहौल है।

आम नागरिकों पर सरकार की दमनकारी नीतियों के कारण अत्याचार में बढ़ावा हुआ है। मानवाधिकार व सामाजिक कार्यकर्ताओं पर आये दिन फर्जी मुकदमा करके जेल में डाल दिया जा रहा है। देश के प्राकृतिक संसाधनों को कम्पनियों के हाथों सौंप कर इस पर निर्भर आदिवासियों और वनाधारित समुदायों को उनके पांरपरिक जमीनों से बेदखल किया जा रहा है। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट के उस असंवैधानिक फैसले से लगभग 19 लाख मूल निवासियों पर जबरन विस्थापन का खतरा मंडरा रहा है। और मौजूदा सरकार उस मामले में बिलकुल गम्भीर नहीं है। संसद द्वारा पारित वनाधिकार कानून 2006 का क्रियान्वयन रोका जा रहा है। व्यक्तिगत व सामुदायिक दावों का निस्तारण नहीं किया जा रहा है उन्हे अपने मूलभूत सांवैधानिक अधिकारों से वंचित किया जा रहा है। जिसके कारण देश के करोड़ों वनाश्रित समुदाय के साथ एतिहासिक अन्याय जारी है। वनाश्रित समुदाय के ऊपर लाखों फर्जी मुकदमें वन विभाग द्वारा लगाये जा रहे है। जरूरत है शोषित जनता को संगठित होकर अपनी मांग और दावे को व्यापक जनता के सामने पेश किया जाए।

देश के एक जागरूक नागरिक होने के नाते हमारा कत्र्तव्य है कि संविधान की रक्षा नागरिकों के हक, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, सम्मान से जीने का हक, मिली-जुली संस्कृति को आगे बढ़ाने और न्यायपूर्ण समाज की स्थापना के लिये गंभीरता से विचार करें व इन विघटनकारी, सामंतवादी, सांप्रदायिक शक्तियां, फासीवादी सरकार को देश की सत्ता से बेदखल करने के लिये और जनपक्षीय उम्मीदवारों को सफल बनाने के लिए अपने मताधिकार का पुरजोर इस्तेमाल करें।

अखिल भारतीय वन-जन श्रमजीवी यूनियन की मांगें..

1. वनाधिकार कानून 2006 का प्रभावी क्रियान्वयन किया जाए।

2. लंबित सामुदायिक और व्यक्तिगत दावों का तत्काल प्रभाव से निस्तारण किया जाए।

3. रद्द किये गए सामुदायिक और व्यक्तिगत दावों की समीक्षा कर उन्हें फिर से नया आवेदन माना जाए।

4. उच्चतम न्यायालय के बेदखली के आदेश को सरकार द्वारा पुनर्विचार याचिका दायर कर याचिकाकर्ता बनकर उसे अतिशीघ्र निस्तारित कराया जाए।

 5. पेसो कानून का क्रियान्वयन और इसको कमज़ोर करने वाले आदेशों को निरस्त किया जाए।

6. लघु वनउपज के संकलन और उपयोग का अधिकार ग्रामसभा को दिया जाए।

7. अखिल भारतीय वन-जन श्रमजीवी यूनियन के कार्यकर्ताओं और अन्य मानवाधिकार व सामाजिक कार्यकर्ताओं पर लगे फर्जी मुकदमें वापस लिये जाएं।

8. मनरेगा और सार्वजनिक वितरण प्रणाली जैसी सामाजिक कल्याण योजनाओं को मजबूत और सुगम बनाया जाए। 9. सार्वजनिक वितरण प्रणाली में आधार कार्ड के अनिवार्यकरण पर रोक लगाई जाए।

 

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