शैक्षणिक संस्थानों में विरोध प्रदर्शन पर केरल हाई कोर्ट की टिप्पणियां अस्वीकार्य और प्रतिबंधात्मक: NAJAR

Written by sabrang india | Published on: November 7, 2026
'नेशनल अलायंस फॉर जस्टिस, अकाउंटेबिलिटी एंड राइट्स' (NAJAR) ने केरल उच्च न्यायालय से आग्रह किया है कि वह छात्रों सहित सभी लोगों के शांतिपूर्ण विरोध करने के अधिकार पर अपने रुख पर पुनर्विचार करे।



पूरे भारत के वकीलों, कानून के छात्रों और कानूनी पेशेवरों का एक समूह 'नेशनल अलायंस फॉर जस्टिस, अकाउंटेबिलिटी एंड राइट्स' (NAJAR) ने एक बयान जारी कर केरल उच्च न्यायालय की उस हालिया टिप्पणी की आलोचना की है, जिसमें कहा गया था कि "संवैधानिक लोकतंत्र में, और विशेष रूप से शैक्षणिक संस्थानों में, धरने, भूख हड़ताल और सत्याग्रह के लिए कोई जगह नहीं है।" NAJAR ने इस बात पर जोर दिया है कि जब संस्थागत उपाय विफल हो जाते हैं, तो जवाबदेही तय करने के लिए अहिंसक धरने (sit-ins) एक लोकतांत्रिक और कानूनी तरीका हैं। वास्तव में, देश भर की अदालतों ने अपने कई फैसलों में इस संवैधानिक अधिकार को 'अनुच्छेद 19' का हिस्सा माना है। इस समूह ने उच्च न्यायालय से आग्रह किया है कि वह अपने रुख पर पुनर्विचार करे और सभी नागरिकों तथा छात्रों के शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन के संवैधानिक अधिकार को बनाए रखे।

तथ्यों और कानूनी कार्यवाही की संक्षिप्त पृष्ठभूमि:

दो दिन पहले, 3 नवंबर 2026 को, न्यायमूर्ति अनिल के. नरेंद्रन और न्यायमूर्ति मुरली कृष्ण एस. की एक खंडपीठ (Division Bench) ने 'श्री शंकराचार्य यूनिवर्सिटी ऑफ संस्कृत बनाम अर्चना पी.एस. व अन्य' (W.A. 2276/2026) मामले में, एक एकल न्यायाधीश (single judge) के अंतरिम आदेश को रद्द कर दिया। उस अंतरिम आदेश में विश्वविद्यालय को निर्देश दिया गया था कि वह 'श्री शंकराचार्य यूनिवर्सिटी ऑफ संस्कृत' (कलाडी, एर्नाकुलम, केरल) के 16 निलंबित छात्रों की फीस स्वीकार करे और उन्हें अपनी परीक्षाओं में बैठने की अनुमति दे। खंडपीठ के समक्ष यह अपील दलीलों और अंतरिम राहत के आधार पर तय की गई थी। ऐसा करते हुए, खंडपीठ ने 'डॉ. एंटनी थॉमस बनाम वी.एम. मुहम्मद रफीक' (2017) मामले की टिप्पणियों का हवाला दिया और उन्हें फिर से प्रासंगिक बना दिया। इसमें कहा गया था कि जो छात्र किसी शैक्षणिक संस्थान में इस तरह के विरोध प्रदर्शन में शामिल होते हैं, उन्हें निष्कासित (expelled) या रस्टिकेट (rusticated) किया जा सकता है।

विश्वविद्यालय का आरोप है कि 13 अगस्त 2026 को छात्रों द्वारा बाधा उत्पन्न की गई और मारपीट की गई। दूसरी ओर, छात्रों ने इन आरोपों को नकारा है और मामले की जांच चल रही है। NAJAR ने स्पष्ट किया है कि वह विवादित तथ्यों पर कोई पक्ष नहीं ले रहा है, और यदि कहीं हिंसा हुई है, तो वह उसका समर्थन नहीं करता है। लेकिन क्या हिंसा हुई थी और क्या कैंपस में शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन की कोई जगह है - ये दोनों बिल्कुल अलग-अलग सवाल हैं, और इन्हें आपस में नहीं मिलाया जाना चाहिए। NAJAR का मानना है कि कैंपस में होने वाले अहिंसक विरोध-प्रदर्शनों को 'लोकतंत्र-विरोधी' बताना, शांतिपूर्ण आंदोलन (बेहतर सुविधाओं के लिए) या छात्रों के अधिकारों को गैर-कानूनी व्यवधान के साथ जोड़ने जैसा है, जिसे स्वीकार नहीं किया जा सकता।

शैक्षणिक परिसरों में शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन एक संवैधानिक अधिकार है:

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19 (1) (a) और (b) अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण ढंग से बिना हथियारों के इकट्ठा होने के अधिकार की गारंटी देता है। संविधान में कहीं भी धरना या सत्याग्रह जैसे शांतिपूर्ण विरोध के तरीकों पर रोक नहीं लगाई गई है। साथ ही, कोई नागरिक छात्र हो, या जगह कोई यूनिवर्सिटी कैंपस या शैक्षणिक संस्थान हो, तो भी ये अधिकार खत्म नहीं हो जाते। सुप्रीम कोर्ट ने भी शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन को इन स्वतंत्रताओं का हिस्सा माना है। इसमें रामलीला मैदान घटना (2012), मजदूर किसान शक्ति संगठन बनाम भारत संघ (2018) और अमित साहनी बनाम पुलिस आयुक्त (2020) जैसे चर्चित मामले शामिल हैं।

शांतिपूर्ण विरोध को रोकने के लिए डॉ. अंबेडकर का हवाला देना अनुचित है:

3 नवंबर 2026 को, डिवीजन बेंच ने 'डॉ. एंटनी थॉमस बनाम वी.एम. मुहम्मद रफीक और अन्य' मामले में कोर्ट की निम्नलिखित टिप्पणियों को दोहराया:

“संवैधानिक लोकतंत्र में धरना, भूख हड़ताल और सत्याग्रह जैसी राजनीतिक गतिविधियों की कोई जगह नहीं है, और शैक्षणिक संस्थानों में तो बिल्कुल भी नहीं। यदि कोई व्यक्ति किसी शैक्षणिक संस्थान में ऐसी गतिविधियों में शामिल होता है, तो उसे संस्थान से निकाला (expelled) या निलंबित (rusticated) किया जा सकता है। शैक्षणिक संस्थान शिक्षा देने के लिए होते हैं, न कि राजनीति के लिए। राजनीतिक दल अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं के चलते किसी शैक्षणिक संस्थान को बंधक नहीं बना सकते, और न ही सभ्य छात्रों के शिक्षा पाने के अधिकार में बाधा डाल सकते हैं।”

ये टिप्पणियां संभवतः डॉ. बी.आर. अंबेडकर के 'अराजकता के व्याकरण' (Grammar of Anarchy) वाले विचार से प्रेरित हैं। इसमें उन्होंने जोर दिया था कि जहां संवैधानिक उपाय मौजूद हों, वहां असंवैधानिक तरीकों को अपनाने का कोई औचित्य नहीं है। हालांकि, NAJAR का कहना है कि डॉ. अंबेडकर के विचारों को इस तरह तोड़-मरोड़ कर पेश करना - खासकर छात्र राजनीति के संदर्भ में - संस्थागत दमन पर संवैधानिक होने का मुखौटा पहनाने की एक व्यर्थ कोशिश के सिवा कुछ नहीं है। यह पूरी सोच कई तरह से समस्याग्रस्त है।

पहली बात, ऊपर दिया गया उद्धरण एक शर्त पर आधारित है। इसमें कहा गया है कि जहां संवैधानिक तरीके उपलब्ध हों, वहां असंवैधानिक तरीकों का कोई औचित्य नहीं होता। मुख्य सवाल यह है कि क्या इन छात्रों के लिए वास्तव में संवैधानिक रास्ते खुले थे? अदालत ने इस पहलू की गहराई से जांच नहीं की है। जब विश्वविद्यालय प्रशासन मनमाने ढंग से काम करता है, तो परिसर के भीतर संवैधानिक रास्ते व्यावहारिक रूप से बंद हो जाते हैं। ऐसी स्थितियों में, शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन कानून का उल्लंघन नहीं है; बल्कि यह प्रशासन की जवाबदेही तय करने का एकमात्र बचा हुआ संवैधानिक विकल्प है।

दूसरी बात, डॉ. अंबेडकर का यह सुझाव कि केवल संवैधानिक उपायों का ही सहारा लिया जाना चाहिए, इसे संविधान को अपनाने से पहले और बाद में उनकी व्यक्तिगत और राजनीतिक विचारधारा में आए बदलाव के संदर्भ में देखा जाना चाहिए। स्वतंत्रता-पूर्व काल में, औपनिवेशिक उत्पीड़कों के खिलाफ लोगों को हिंसक और अहिंसक- दोनों तरह के विरोध प्रदर्शनों का सहारा लेना पड़ा था। लेकिन, यह आज की राजनीतिक वास्तविकता को नहीं बदलता, जहां कई बार सत्याग्रह और धरने जैसे कानूनी विरोध प्रदर्शनों की आवश्यकता पड़ती है। असल में, अक्सर संवैधानिक संस्थाएं ही नागरिकों को ऐसे तरीके अपनाने के लिए मजबूर कर देती हैं। 1927 में 'महाड सत्याग्रह' का नेतृत्व करने वाले बाबासाहेब का हवाला देकर सत्याग्रहों पर पूरी तरह से प्रतिबंध को सही ठहराना, तथ्यों को अपनी सुविधानुसार चुनने (selective) जैसा है। अहिंसक विरोध प्रदर्शन को अपराध मान लेना, उनके मूल इरादे और चेतावनी को गलत तरीके से पेश करने जैसा है।

आज भारत में सत्याग्रह और छात्र आंदोलनों की भूमिका:

भारत के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान 'सत्याग्रह' जन-प्रतिरोध के प्रमुख तरीकों में से एक था। इसे संवैधानिक लोकतंत्र के लिए 'बाहरी' या 'विदेशी' नहीं कहा जा सकता, क्योंकि गांधीजी द्वारा लोकप्रिय बनाया गया यही तरीका, खुद इस लोकतंत्र के निर्माण में सहायक रहा था। इसी तरह, स्वतंत्रता संग्राम से लेकर बाद में अधिकारों और संस्थागत सुधारों के लिए हुए आंदोलनों तक, छात्र आंदोलनों ने केरल और पूरे देश के विश्वविद्यालयों (कैंपस) को एक नई दिशा दी है। उस समय, छात्रों ने औपनिवेशिक संस्थानों का बहिष्कार किया और 'असहयोग आंदोलन' तथा 'भारत छोड़ो आंदोलन' में हिस्सा लिया। हाल के वर्षों में, छात्रों ने हॉस्टल में महिलाओं के लिए लागू भेदभावपूर्ण कर्फ्यू और परिसर में होने वाले जातिगत भेदभाव को चुनौती दी है। हाल ही में, पेपर लीक के आरोपों के बीच NTA द्वारा NEET-UG परीक्षा रद्द किए जाने के बाद, देशभर के छात्र शांतिपूर्ण तरीके से सड़कों पर उतर आए थे। इसके परिणामस्वरूप, तत्कालीन केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा देना पड़ा था। ये आंदोलन शिक्षा से ‘ध्यान भटकाने’ या उसमें ‘बाधा डालने’ वाले नहीं हैं। इनके जरिए छात्र और युवा शिक्षण संस्थानों से जवाब और जवाबदेही की मांग करते हैं। यह कहना कि शिक्षण संस्थान केवल शिक्षा देने के लिए हैं, न कि राजनीति के लिए- या तो राजनीतिक समझ की कमी को दर्शाता है, या फिर यह छात्रों को आलोचनात्मक सोच और लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति से दूर रखने की एक बेहद निंदनीय कोशिश है।

NAJAR शांतिपूर्ण तरीके से संगठित होने और विरोध करने के अधिकार का समर्थन करता है:

NAJAR का मानना है कि सभी परिसरों (कैंपस) और शिक्षण स्थलों पर छात्रों के पास अपनी शिकायतें रखने के लिए कानूनी रास्ते होने चाहिए। संस्थानों को इन जायज़ शिकायतों का जवाब देना चाहिए, न कि शिकायत करने वालों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई करनी चाहिए या उन्हें दबाना चाहिए। कैंपस को राजनीति से मुक्त करने का मतलब है छात्रों से अन्याय पर सवाल उठाने, और सामाजिक ढांचे को समझने व उसमें सुधार करने की क्षमता छीन लेना।

किसी खास राजनीतिक विचारधारा से जुड़े होने, माफ़ी मांगने से इनकार करने, या ऐसे मुद्दों पर बात करने- जिनकी सच्चाई अभी पूरी तरह सामने नहीं आई है- के आधार पर, छात्रों को अपनी जायज शिकायतें रखने से नहीं रोका जा सकता। छात्र संवैधानिक और लोकतांत्रिक तरीके से संस्थागत सुधारों की मांग कर रहे हैं, और उन्हें ऐसा करने से रोकना गलत है। शांतिपूर्ण विरोध करने से छात्र ‘कम सभ्य’ या ‘उपद्रवी’ नहीं हो जाते।

इसके विपरीत, शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार को सीमित करना, केरल जैसे राज्य में प्रगतिशील और लोकतांत्रिक नागरिक स्थानों को कमज़ोर करने की एक बेहद संदिग्ध कोशिश है। आज केरल जो कुछ भी है, वह छात्र और नागरिक आंदोलनों द्वारा किए गए लोकतांत्रिक प्रतिरोध, विरोध-प्रदर्शनों और संवैधानिक संघर्षों की ही देन है!

इसलिए, इस समूह ने श्री शंकराचार्य विश्वविद्यालय से अपील की है कि वह प्राकृतिक न्याय और उचित अनुपात (proportionality) के सिद्धांतों को ध्यान में रखते हुए, जल्द से जल्द और निष्पक्ष तरीके से जांच पूरी करे। NAJAR ने यह भी आग्रह किया है कि केरल उच्च न्यायालय को शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन करने वालों को दंडित करने के लिए, 2017 की अपनी ही टिप्पणियों का सहारा नहीं लेना चाहिए। कैंपस में असहमति को अपराध नहीं माना जाना चाहिए, और न ही इसे शिक्षा के लिए कोई खतरा समझना चाहिए।

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