SKM का अखिल भारतीय सम्मेलन: FCI मजबूत करने समेत कई मांगें दोहराई गई  

Written by sabrang india | Published on: July 29, 2026
"वर्ष 2019 में भारत के अरबपतियों की कुल संपत्ति लगभग 31 लाख करोड़ रुपये थी, जो 2025 तक बढ़कर 88 लाख करोड़ रुपये हो गई।"



नई दिल्ली में मंगलवार को आयोजित संयुक्त किसान मोर्चा (एसकेएम) के इस अखिल भारतीय सम्मेलन में देश के सभी राज्यों एवं केंद्रशासित प्रदेशों का प्रतिनिधित्व करने वाले किसान संगठनों के सबसे बड़े साझा मंच के प्रतिनिधि इकट्ठा हुए। इस सम्मेलन में देशभर के किसान, कृषि मजदूरों तथा मेहनतकश शामिल हुए।

इस दौरान कहा गया कि नवंबर 2020 में दिल्ली की सीमाओं पर हुए ऐतिहासिक किसान आंदोलन की पृष्ठभूमि में संयुक्त किसान मोर्चा का गठन हुआ। 385 दिनों तक दिन-रात चले इस शांतिपूर्ण महापड़ाव में 736 किसानों ने शहादत दी। तब से लेकर आज तक एसकेएम अपनी मूल मांगों-सभी फसलों के लिए खरीद की गारंटी के साथ सी2+50 प्रतिशत के आधार पर एमएसपी की कानूनी गारंटी, ग्रामीण ऋणमुक्ति और किसानों तथा दिहाड़ी मजदूरों की आत्महत्याओं को समाप्त करने के लिए व्यापक कर्ज माफी तथा बिजली के निजीकरण को रोकने- के लिए लगातार संघर्षरत है।

प्रारूप घोषणा पत्र जारी करते हुए किसान नेता ने कहा कि 2020-21 का बड़ा किसान आंदोलन, जो आजादी के बाद का सबसे बड़ा जनसंघर्ष था, 19 नवंबर 2021 को तीनों कृषि कानूनों की वापसी की ऐतिहासिक जीत हासिल करने में सफल रहा। 11 दिसंबर 2021 को 9 दिसंबर 2021 के केंद्र सरकार के लिखित आश्वासन के आधार पर आंदोलन स्थगित किया गया था। इस आश्वासन में सभी फसलों के लिए खरीद की गारंटी के साथ सी2+50 प्रतिशत एमएसपी पर समिति का गठन, व्यापक कर्ज माफी, सर्वसम्मति के बिना बिजली क्षेत्र में सुधार लागू न करने तथा किसानों पर दर्ज सभी मुकदमे वापस लेने का वादा किया गया था।

इस दौरान कहा कि पिछले पांच वर्षों में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार ने इनमें से किसी भी आश्वासन को लागू नहीं किया। किसान विरोधी नीतियों को बदलने, कृषि और देश को बचाने के लिए संयुक्त किसान मोर्चा लगातार संघर्ष के रास्ते पर डटा हुआ है।

मेहनतकश जनता पर बढ़ता कॉरपोरेट हमला

पत्र में कहा गया कि, पिछले 12 वर्षों से सत्ता में रहने के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पूरे किसान समाज के साथ लगातार विश्वासघात किया है। उन्होंने किसानों को सी2+50 प्रतिशत के आधार पर लाभकारी न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की कानूनी गारंटी देने के वादे से मुकरते हुए खेती की लगातार बढ़ती लागत को कम करने से इनकार किया है। गरीब और मध्यम किसानों, बटाईदार किसानों तथा कृषि मजदूरों के लिए व्यापक कृषि कर्ज माफी देने से भी सरकार ने इनकार किया है, जबकि दूसरी ओर लगभग 16 लाख करोड़ रुपये के कॉरपोरेट ऋण माफ कर दिए गए हैं।

इसमें आगे कहा गया कि, भारत में मुट्ठीभर अमीर तबके और विशाल मेहनतकश आबादी के बीच असमानता लगातार बढ़ रही है। ऑक्सफैम की रिपोर्ट के अनुसार, देश की सबसे अमीर 1 प्रतिशत आबादी के पास कुल संपत्ति का 40 प्रतिशत हिस्सा है, जबकि शीर्ष 10 प्रतिशत लोगों के पास राष्ट्रीय आय का 60 प्रतिशत हिस्सा है। इसके विपरीत, निचले 50 प्रतिशत लोगों को राष्ट्रीय आय का केवल 15 प्रतिशत हिस्सा ही मिलता है। वर्ष 2019 में भारत के अरबपतियों की कुल संपत्ति लगभग 31 लाख करोड़ रुपये थी, जो 2025 तक बढ़कर 88 लाख करोड़ रुपये हो गई।

"मोदी सरकार का कॉरपोरेटपरस्त हमला तेज”

किसान नेता ने कहा, मोदी सरकार बिजली संशोधन विधेयक और स्मार्ट मीटरों के माध्यम से बिजली क्षेत्र के निजीकरण को तेजी से आगे बढ़ा रही है तथा एक खतरनाक बीज विधेयक लागू करने की तैयारी कर रही है। इसने श्रमिकों को पूंजीपतियों के सामने लगभग बंधुआ बना देने वाले अत्यंत प्रतिगामी चार श्रम संहिताओं (लेबर कोड्स) को लागू किया है और 2005 के ऐतिहासिक मनरेगा अधिनियम को प्रभावहीन बना दिया है। इसके अलावा, अमेरिकी साम्राज्यवाद के दबाव के आगे झुकते हुए सरकार ने भारत-अमेरिका मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) तथा अन्य मुक्त व्यापार समझौतों को आगे बढ़ाया है। यह केवल करोड़ों किसानों और मजदूरों पर ही नहीं, बल्कि लाखों सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) पर भी गंभीर हमला है।

उन्होंने आगे कहा कि, इस हमले का नवीनतम रूप भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) के साइलो भंडारण में अडाणी और लीप इंडिया की दोध्रुवीय पकड़ है जिसके तहत देश के 77.5 प्रतिशत अनाज भंडारण पर इनका नियंत्रण स्थापित हो जाएगा। साथ ही, राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत प्रत्येक परिवार को मिलने वाले 35 किलोग्राम मुफ्त अनाज को घटाकर प्रति व्यक्ति 7 किलोग्राम करने का प्रयास किया जा रहा है, जबकि भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति को प्रतिमाह 14.5 किलोग्राम अनाज की आवश्यकता होती है।

घोषणा पत्र में कहा गया कि खेती की लागत में लगातार बढ़ोतरी और कृषि उपज के अलाभकारी दामों के कारण किसानों की ऋणग्रस्तता और आत्महत्याएं बढ़ रही हैं। अकेले महाराष्ट्र के विदर्भ और मराठवाड़ा क्षेत्र में औसतन प्रतिदिन सात किसान आत्महत्या कर रहे हैं। कृषि संकट ने ग्रामीण आबादी के बड़े हिस्से को शहरों की ओर पलायन करने के लिए मजबूर किया है और असंगठित क्षेत्र के श्रमिक-जो मुख्यतः भूमिहीन एवं गरीब किसान हैं- न्यूनतम मजदूरी के लिए संघर्ष करने को विवश हैं।

उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, वर्ष 2024 में भारत में प्रतिदिन औसतन 173.4 श्रमिकों (दिहाड़ी मजदूर, कृषि मजदूर और किसान सहित) ने आत्महत्या की, जबकि वर्ष 2014 में यह संख्या 77.2 प्रतिदिन थी।

एमएसपी और जनता की लूट

इस पत्र में यह कहा गया कि वर्ष 2006 में राष्ट्रीय किसान आयोग के अध्यक्ष डॉ. एम.एस. स्वामीनाथन द्वारा अनुशंसित सी2+50 प्रतिशत के बजाय, कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (सीएसीपी) और केंद्र सरकार ए2+एफएल+50 प्रतिशत के फार्मूले के आधार पर एमएसपी तय कर रहे हैं, जो लगभग 30 प्रतिशत कम है।

वर्ष 2016 से 2025 के बीच देश के किसानों को 20 प्रमुख फसलों में कुल मिलाकर लगभग ₹27 लाख करोड़ का नुकसान हुआ। देश की सबसे महत्वपूर्ण खरीफ फसल धान के लिए वर्ष 2026-27 का एमएसपी ₹2,441 प्रति क्विंटल घोषित किया गया है, जबकि सी2+50 प्रतिशत के आधार पर यह ₹3,243 प्रति क्विंटल होना चाहिए था। अर्थात किसानों को ₹802 प्रति क्विंटल का सीधा नुकसान हो रहा है।

वहीं प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि के तहत एक किसान परिवार को पूरे वर्ष में मात्र ₹6,000 मिलते हैं। लेकिन यदि सी2+50 प्रतिशत के आधार पर एमएसपी लागू कर दिया जाए, तो वर्ष 2026-27 की दरों के अनुसार किसान को प्रति एकड़ ₹18,464 का अतिरिक्त लाभ होगा। यानी किसान सम्मान निधि के पूरे ₹6,000 वापस कर देने के बाद भी किसान के पास प्रति एकड़ ₹18,464 की अतिरिक्त आय बचेगी। इससे स्पष्ट होता है कि किसानों को सम्मान निधि के नाम पर दी जाने वाली मामूली सहायता की तुलना में लाभकारी एमएसपी कहीं अधिक महत्वपूर्ण और लाभदायक है।

इसके अलावा, अन्य फसलों में होने वाले नुकसान का भी इसी प्रकार आकलन कर व्यापक प्रचार किया जाना चाहिए, ताकि जनता को यह समझाया जा सके कि कॉरपोरेट व्यापारियों, बड़े उद्योगपतियों और उनके बिचौलियों द्वारा किसानों की किस प्रकार संगठित लूट की जा रही है। इससे किसानों को अपने अधिकारों की रक्षा के लिए संघर्ष के रास्ते पर संगठित करने में मदद मिलेगी।

एफटीए : भारत के आर्थिक उपनिवेशीकरण की रूपरेखा

किसाने नेता ने मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) का जिक्र करते हुए कहा कि यग भारत के आर्थिक उपनिवेशीकरण का खाका हैं। कृषि क्षेत्र में ये समझौते सस्ते कृषि उत्पादों के आयात को बढ़ावा देंगे, खेती की आर्थिक व्यवहार्यता को और कमजोर करेंगे, खाद्य प्रसंस्करण उद्योग पर कॉरपोरेट कब्जा मजबूत करेंगे तथा फसल चक्र में ऐसे बदलाव लाएंगे, जो देश की खाद्य आत्मनिर्भरता को गंभीर नुकसान पहुंचाएंगे।

उन्होंने कहा, संयुक्त किसान मोर्चा कृषि और संपूर्ण अर्थव्यवस्था पर कॉरपोरेट कब्जे का डटकर विरोध करने के लिए प्रतिबद्ध है और यह सम्मेलन भारत की आत्मनिर्भरता तथा संप्रभुता की रक्षा का संकल्प दोहराता है।

किसान–मजदूर–छात्र एकता

12 फरवरी 2026 को केंद्रीय ट्रेड यूनियनों के संयुक्त मंच के आह्वान पर आयोजित ऐतिहासिक देशव्यापी आम हड़ताल, जिसे संयुक्त किसान मोर्चा तथा मेहनतकश जनता के अन्य संगठनों का समर्थन प्राप्त था, किसान–मजदूर एकजुट प्रतिरोध का महत्वपूर्ण उदाहरण थी।

उन्होंने कहा कि, हाल में विशेषकर उत्तर भारत के विभिन्न औद्योगिक क्षेत्रों में ठेका श्रमिकों और असंगठित क्षेत्र के मजदूरों के बड़े आंदोलन देखने को मिले। ये मजदूर मुख्यतः वही भूमिहीन और गरीब किसान हैं, जिन्हें कृषि संकट ने गांवों से विस्थापित कर दिया है। इन आंदोलनों ने पूरे देश के मजदूर वर्ग में नया उत्साह पैदा किया है।

इसी तरह, पेपर लीक और उच्चस्तरीय भ्रष्टाचार के खिलाफ छात्रों के ऐतिहासिक संघर्ष ने सरकार पर दबाव बनाया। यह संघर्ष लोकतांत्रिक अधिकारों की पुनर्स्थापना की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है।

16 जनवरी 2026 का संकल्प

16 जनवरी 2026 को संयुक्त किसान मोर्चा के आह्वान पर देशभर के किसानों ने यह संकल्प लिया कि 9 दिसंबर 2021 को केंद्र सरकार द्वारा लिखित रूप में दिए गए सभी आश्वासनों को लागू करवाने तक देशव्यापी, व्यापक और निरंतर संघर्ष चलाया जाएगा।

सात प्रमुख मांगें

1. भारत–अमेरिका मुक्त व्यापार समझौता (एफटीए) नहीं चलेगा। सभी मुक्त व्यापार समझौतों (एफटीए) को रद्द किया जाए।
2. सभी फसलों के लिए खरीद की गारंटी के साथ सी2+50 प्रतिशत एमएसपी को कानूनी अधिकार बनाया जाए।
3. ग्रामीण ऋणमुक्ति तथा किसानों एवं दिहाड़ी मजदूरों की आत्महत्या को समाप्त करने के लिए व्यापक कर्ज माफी लागू की जाए। किसान आत्महत्या करने वाले प्रत्येक परिवार को ₹25 लाख का मुआवजा दिया जाए।
4. चारों श्रम संहिताओं (लेबर कोड्स) को रद्द किया जाए तथा सभी श्रमिकों के लिए ₹31,000 प्रतिमाह न्यूनतम वेतन सुनिश्चित किया जाए।
5. मनरेगा को बहाल किया जाए, वर्ष में 200 दिन का रोजगार तथा ₹700 प्रतिदिन मजदूरी सुनिश्चित की जाए।
6. बिजली निजीकरण विधेयक 2025, बीज विधेयक 2025 तथा राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (एनएफएसए) संशोधन विधेयक को वापस लिया जाए।
7. जबरन भूमि अधिग्रहण और कॉरपोरेटपरस्त भूमि पूलिंग पर रोक लगाई जाए।

8. भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन में उचित प्रतिकर और पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम, 2013 (एलएआरआर) तथा वनाधिकार अधिनियम, 2006 (एफआरए) के आधार पर आदिवासियों एवं गैर-आदिवासी वनवासियों के भूमि अधिकारों की रक्षा की जाए।

स्थानीय प्रमुख मांगें

राज्य समन्वय समितियां सदस्य संगठनों के आपसी परामर्श से अपने-अपने राज्यों की प्रमुख स्थानीय मांगों को इस संघर्ष अभियान में शामिल करेंगी।

पूरक मांगें
1. भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) को मजबूत किया जाए तथा एफसीआई साइलो पर अडानी–लीप इंडिया की दोध्रुवीय (डुओपॉली) व्यवस्था समाप्त की जाए।
2. कृषि, खाद्य प्रसंस्करण एवं निर्यात तथा संबंधित एमएसएमई क्षेत्रों में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) की अनुमति न दी जाए।
3. उर्वरक, रसोई गैस, पेट्रोल एवं डीजल पर सब्सिडी बहाल की जाए तथा उनकी कृत्रिम कमी, कालाबाजारी और महंगाई पर रोक लगाई जाए।
4. फसल एवं पशुधन बीमा पूरी तरह सार्वजनिक क्षेत्र के माध्यम से लागू किया जाए।
5. जलागम (वाटरशेड) विकास के आधार पर हर खेत को सिंचाई उपलब्ध कराई जाए।
6. सभी पात्र नागरिकों को ₹10,000 प्रतिमाह सामाजिक सुरक्षा पेंशन दी जाए।
7. बाढ़ एवं सूखा जैसी प्राकृतिक आपदाओं के लिए पर्याप्त वित्तीय प्रावधानों के साथ पारदर्शी और प्रभावी राहत व्यवस्था सुनिश्चित की जाए।
8. अनुसंधान एवं विकास (आर एंड डी) पर केंद्र सरकार के बजट का 6 प्रतिशत तथा जीडीपी का 3 प्रतिशत, और शिक्षा पर जीडीपी का 6 प्रतिशत व्यय किया जाए।
9. सहकारी संस्थाओं को कॉरपोरेट कब्जे से बचाया जाए तथा उनका लोकतांत्रिककरण कर किसानों की भूमिका और भागीदारी बढ़ाई जाए।

"कृषि संकट समाप्त करो - कृषि बचाओ, भारत बचाओ”

किसान नेता ने कहा कि कृषि संकट का दुष्प्रभाव केवल खेती तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका असर उद्योगों और समूची अर्थव्यवस्था पर भी पड़ रहा है। औद्योगिक क्षेत्र में गिरावट और जनता की घटती क्रय-शक्ति का प्रमुख कारण किसानों और मजदूरों का लगातार शोषण है। उन्हें न तो उनकी उपज का लाभकारी मूल्य मिल रहा है और न ही सम्मानजनक न्यूनतम मजदूरी।

वर्ष 2021 से 2025 के बीच देश में 2.04 लाख से अधिक निजी कंपनियां बंद हो गईं। "मेक इन इंडिया" योजना भी विनिर्माण क्षेत्र की हिस्सेदारी बढ़ाने के अपने लक्ष्य को प्राप्त करने में असफल रही। इसके विपरीत, विनिर्माण क्षेत्र का जीडीपी में योगदान लगातार घटा है।

कॉरपोरेट केंद्रीकरण के संघीय संघीय अधिकारों की रक्षा

"एक राष्ट्र, एक बाज़ार" का नारा वास्तव में किसानों, मजदूरों, व्यापारियों, छोटे उद्यमियों और मेहनतकश समाज के हितों के बजाय बड़े कॉरपोरेट घरानों के हितों को बढ़ावा देता है।

भारत एक संघीय गणराज्य है। इसलिए राज्यों के संवैधानिक और वित्तीय अधिकारों की रक्षा तथा उन्हें सशक्त बनाना आवश्यक है। राज्यों को केंद्रीय करों में न्यायपूर्ण हिस्सा मिलना चाहिए, ताकि वे कृषि के आधुनिकीकरण, कृषि-आधारित उद्योगों, आधारभूत ढांचे और रोजगार सृजन को बढ़ावा दे सकें। इससे असमानता कम होगी, ग्रामीण ऋणग्रस्तता घटेगी, गांवों से शहरों की ओर पलायन रुकेगा और किसानों तथा खेत-मजदूरों की आत्महत्या जैसी गंभीर समस्याओं पर अंकुश लगाया जा सकेगा।

"बढ़ती असमानता समाप्त करो”

उन्होंने कहा कि अत्यधिक संपन्न वर्ग पर अधिक कर लगाकर संसाधनों का न्यायपूर्ण वितरण सुनिश्चित किया जाना चाहिए। प्रत्येक नागरिक को शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास, स्वच्छ पेयजल, सम्मानजनक रोजगार और सामाजिक सुरक्षा का अधिकार मिलना चाहिए।

लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा

जनता के सभी लोकतांत्रिक अधिकारों, विशेषकर शांतिपूर्ण विरोध और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा सुनिश्चित की जानी चाहिए।

संविधान और राष्ट्रीय एकता की रक्षा

भारतीय संविधान के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप, लोकतांत्रिक मूल्यों तथा देश की एकता, अखंडता और सामाजिक सद्भाव की हर परिस्थिति में रक्षा की जानी चाहिए।

सार्वजनिक परिवहन को मजबूत बनाया जाए 

सार्वजनिक परिवहन के निजीकरण और व्यावसायीकरण पर रोक लगाई जाए तथा इसे सभी नागरिकों के लिए सुलभ, किफायती और सार्वभौमिक बनाया जाए।

संयुक्त किसान मोर्चा को और मजबूत बनाने की दिशा

संयुक्त किसान मोर्चा की एकता, स्वतंत्र पहचान और जनसंघर्षों का विस्तार हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता है। सभी सदस्य संगठनों को साझा न्यूनतम कार्यक्रम के आधार पर एकजुट होकर आगे बढ़ना चाहिए।

●  अगले छह महीनों के भीतर सभी राज्य समन्वय समितियों को सक्रिय किया जाए, ताकि पूरे देश में व्यापक और प्रभावी जनआंदोलन संगठित किए जा सकें।

● जनसंपर्क, समन्वय और संवाद को मजबूत करने के लिए सोशल मीडिया नेटवर्क का विस्तार किया जाए, जिससे अधिक से अधिक लोगों को आंदोलन से जोड़ा जा सके।

● प्रभावी संवाद, समन्वय गतिविधियों के सुदृढ़ीकरण तथा व्यापक जनता तक पहुंच बनाने के लिए सोशल मीडिया नेटवर्क विकसित किया जाए, जिससे लोगों को संघर्ष के रास्ते पर संगठित किया जा सके।

भविष्य की 6 सूत्रीय कार्ययोजना

सभी राज्य समन्वय समितियां (एससीसी) वर्ष 2020-21 के पंजाब किसान आंदोलन के अनुभवों से सीख लेते हुए गांव-गांव में निरंतर अभियान चलाएं, ताकि किसानों की व्यापक भागीदारी और संसाधनों का प्रभावी जुटान सुनिश्चित किया जा सके। आगामी संघर्ष के लिए प्रत्येक गांव को आंदोलन का केंद्र बनाया जाए।

1. संयुक्त किसान मोर्चा तथा उसके सभी सदस्य संगठन आगामी दो महीनों के भीतर राज्य स्तरीय सम्मेलन आयोजित करें, ताकि स्वतंत्र एवं संयुक्त, दोनों प्रकार के दीर्घकालीन संघर्षों की तैयारी की जा सके।

2. 10 अगस्त 2026 को भारत छोड़ो आंदोलन की 84वीं वर्षगांठ के अवसर पर देशभर में 1,000 स्थानों पर जेल भरो, रेल रोको और सड़क रोको सहित विभिन्न प्रतिरोध कार्यक्रम आयोजित किए जाएं। संयुक्त किसान मोर्चा ने यह कार्रवाई भारत–अमेरिका मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) सहित अन्य प्रमुख मांगों के समर्थन में करने का आह्वान किया है। अनेक संगठन और जनमंच इस कार्यक्रम में एसकेएम के साथ मिलकर भाग लेने और समन्वय करने का निर्णय ले चुके हैं।

3. 17 अगस्त 2026 को संयुक्त किसान मोर्चा का प्रतिनिधिमंडल प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता, सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों, विधानसभा में विपक्ष के नेताओं, सांसदों तथा विधायकों को मांग-पत्र सौंपेगा और सात प्रमुख मांगों पर सकारात्मक कार्रवाई की मांग करेगा।

4. सभी सदस्य संगठन स्वतंत्र तथा संयुक्त रूप से जन पदयात्राएं, वाहन यात्राएं और ट्रैक्टर मार्च आयोजित करें, जिनका समापन जनसभाओं, महापंचायतों और राज्य स्तरीय रैलियों में किया जाए।

5. 3 अक्टूबर को लखीमपुर खीरी शहीद दिवस के अवसर पर पूरे देश के गांवों में संयुक्त किसान मोर्चा के बैनर तले ग्राम महापंचायतें आयोजित की जाएं। सदस्य संगठन 26 नवंबर 2026 से शुरू होने वाले दीर्घकालीन संघर्ष के लिए स्वयंसेवकों का पंजीकरण करें, जो प्रमुख मांगों की प्राप्ति तक आंदोलन जारी रखेंगे।

6. 26 नवंबर 2026 से राष्ट्रीय राजधानी सहित देशभर के 100 स्थानों पर किसान मार्च और कई दिनों तक चलने वाले व्यापक जनआंदोलन का प्रस्ताव रखा गया है। इन कार्यक्रमों का विस्तृत स्वरूप, स्थान और तिथियों की घोषणा उचित समय पर की जाएगी।

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