हिरासत में मौत मामला: मुआवजा न देने पर यूपी सरकार को हाईकोर्ट की फटकार

Written by sabrang india | Published on: July 29, 2026
प्रीमा देवी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य मामले में 20 फरवरी 2026 को पारित फैसले में डिवीजन बेंच ने निर्देश दिया था कि मृतक के कानूनी उत्तराधिकारियों को तीन सप्ताह के भीतर 10 लाख रुपये का मुआवजा दिया जाए।



इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने हिरासत में मौत से जुड़े एक मामले में दिए गए अपने फैसले का पालन न किए जाने पर कड़ा रुख अपनाया है। अवमानना याचिका की सुनवाई करते हुए अदालत ने उत्तर प्रदेश सरकार के गृह विभाग के प्रमुख सचिव संजय प्रसाद को 31 जुलाई को व्यक्तिगत रूप से कोर्ट में उपस्थित होने का निर्देश दिया है।

जस्टिस सौरभ लवानिया की एकल पीठ ने टिप्पणी की कि डिवीजन बेंच के आदेश का अब तक पालन नहीं किया गया है। अदालत ने यह भी कहा कि संबंधित अधिकारी अवमानना अधिनियम की धारा 12 के तहत दंडात्मक कार्रवाई के दायरे में आते हैं।

द मूकनायक की रिपोर्ट के अनुसार, यह अवमानना याचिका (सिविल) संख्या 2110/2026, प्रीमा देवी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य मामले में 20 फरवरी 2026 को डिवीजन बेंच द्वारा पारित फैसले के कथित उल्लंघन के खिलाफ दायर की गई है। उस फैसले में अदालत ने पाया था कि मृतक की मौत राज्य अधिकारियों की हिरासत और नियंत्रण में हुई थी तथा रिकॉर्ड पर उपलब्ध सामग्री से संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मौलिक अधिकारों के उल्लंघन की पुष्टि होती है।

सुनवाई के दौरान कोर्ट ने डिवीजन बेंच के फैसले के महत्वपूर्ण अंशों का भी उल्लेख किया। अदालत ने कहा था, "कस्टोडियल टॉर्चर मानवीय गरिमा का सबसे क्रूर उल्लंघन है। यह न केवल पीड़ित के आत्मसम्मान को ठेस पहुंचाता है, बल्कि उसके अस्तित्व की जड़ों तक को झकझोर देता है। कस्टोडियल टॉर्चर मानवीय गरिमा पर एक सुनियोजित हमला है और जब भी मानवीय गरिमा पर आघात होता है, सभ्यता एक कदम पीछे चली जाती है।"

अदालत ने अपने फैसले में आगे कहा था, "राज्य अपनी हिरासत में रहने वाले व्यक्तियों के जीवन और स्वतंत्रता का संरक्षक होने के नाते उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने का सख्त और अहस्तांतरणीय दायित्व वहन करता है। इस दायित्व का निर्वहन करने में विफलता सार्वजनिक कानून के तहत राज्य की जवाबदेही को आकर्षित करती है।"

डिवीजन बेंच ने यह भी स्पष्ट किया था कि राज्य द्वारा दी गई व्याख्याएं न तो ठोस थीं और न ही पर्याप्त, जिससे यह अनुमान खारिज किया जा सके कि याचिकाकर्ता के बेटे की मौत जेल में हुई थी। अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों का हवाला देते हुए कहा था कि आत्महत्या भी एक आंतरिक, जानबूझकर की गई चोट मानी जाएगी और यह अप्राकृतिक मृत्यु होगी, जिसकी जिम्मेदारी राज्य पर होगी।

मुआवजे के संबंध में डिवीजन बेंच ने निर्देश दिया था कि मृतक के कानूनी उत्तराधिकारियों को तीन सप्ताह के भीतर 10 लाख रुपये का मुआवजा दिया जाए। साथ ही, राज्य सरकार को निर्देश दिया गया था कि वह मोटर वाहन अधिनियम, 1988 के तहत उपलब्ध मल्टीप्लायर पद्धति की तर्ज पर उम्र, आय और आश्रितों जैसे प्रासंगिक मानकों को अपनाते हुए कस्टोडियल डेथ के मामलों में मुआवजा तय करने के लिए दिशानिर्देश तैयार करे।

न्यायमूर्ति सौरभ लवानिया ने कहा कि राज्य सरकार डिवीजन बेंच के फैसले का पूर्ण रूप से पालन करने में विफल रही है। अदालत ने कहा कि मृतक के कानूनी उत्तराधिकारियों को आदेशानुसार पूरे 10 लाख रुपये का मुआवजा अब तक नहीं दिया गया है। इसके अलावा, फैसले के पैरा 23 में दिए गए निर्देश के बावजूद कस्टोडियल डेथ के मामलों में मुआवजा तय करने संबंधी दिशानिर्देश भी राज्य सरकार ने अब तक तैयार नहीं किए हैं।

मामले की गंभीरता को देखते हुए अदालत ने कहा कि संबंधित अधिकारी अवमानना अधिनियम, 1971 की धारा 12 के तहत दंडात्मक कार्रवाई के पात्र हैं। कोर्ट ने निर्देश दिया कि उत्तर प्रदेश सरकार के गृह विभाग के प्रमुख सचिव संजय प्रसाद अगली सुनवाई पर व्यक्तिगत रूप से उपस्थित हों, जहां उनके खिलाफ आरोप तय करने की प्रक्रिया भी पूरी की जाएगी। अदालत ने स्पष्ट किया कि प्रमुख सचिव 31 जुलाई को न्यायालय के समक्ष अनिवार्य रूप से उपस्थित हों। मामले की अगली सुनवाई भी इसी दिन निर्धारित की गई है।

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