“जंगल आदिवासियों का है, पट्टे दो या आंदोलन देखो”: उदयपुर में वृंदा करात का सरकार पर हमला

Written by sabrang india | Published on: June 29, 2026
भाजपा सरकार पर आदिवासियों की अनदेखी का आरोप, 66 हजार वनाधिकार आवेदन निरस्त; अब ‘करो या मरो’ के संघर्ष का समय।



जंगलों की रक्षा के नाम पर सरकार की नजर उन आदिवासी समुदायों पर है, जो सदियों से जंगलों के साथ सहअस्तित्व में जीवन जीते आए हैं। सच तो यह है कि आदिवासियों के बिना जंगलों की कल्पना अधूरी है। ऐसे समय में आदिवासी समाज को अपने जीवन, सम्मान और सांस्कृतिक अस्तित्व की रक्षा के लिए "करो या मरो" के संकल्प के साथ एक सशक्त और संगठित आंदोलन खड़ा करना होगा।

ये विचार पूर्व सांसद एवं आदिवासी राष्ट्रीय अधिकार मंच की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष वृंदा करात ने उदयपुर और डूंगरपुर जिलों में वनाधिकार पट्टों की मांग को लेकर माछला मंगरा स्थित शिराली भवन में युवाओं द्वारा आयोजित प्रशिक्षण शिविर को संबोधित करते हुए व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि केंद्र में भाजपा सरकार के सत्ता में आने के बाद राजस्थान में किसी भी व्यक्ति को वनाधिकार का पट्टा नहीं मिला है, जो आदिवासियों के प्रति सरकार के दृष्टिकोण को स्पष्ट करता है।

द मूकनायक की रिपोर्ट के अनुसार, वृंदा करात ने आरोप लगाया कि भाजपा की नीतियां आदिवासी समुदाय के हितों के प्रतिकूल हैं और वे आदिवासियों के जीवन, आजीविका तथा अधिकारों को प्रभावित कर रही हैं।

उन्होंने कहा कि राज्य में वनाधिकार के पट्टे के लिए किए गए 1,18,675 आवेदनों में से केवल 51,775 आवेदन ही स्वीकृत किए गए, जबकि 66,213 आवेदन अस्वीकृत कर दिए गए। उन्होंने कहा कि उदयपुर जिले में 22,533 आवेदनों में से 12,758 आवेदन स्वीकृत किए गए, जबकि 9,775 आवेदन अस्वीकृत कर दिए गए।

वृंदा करात ने कहा कि वनाधिकार कानून के तहत आदिवासियों को अधिकतम 25 बीघा तक वन भूमि पर अधिकार-पट्टा दिए जाने का प्रावधान है, लेकिन अधिकांश मामलों में उन्हें केवल दो से चार बीघा भूमि के ही पट्टे प्रदान किए गए हैं। उन्होंने कहा कि कानून के अनुसार वनाधिकार पट्टों के संबंध में अंतिम निर्णय लेने का अधिकार जिला स्तरीय समिति को दिया गया है, किंतु सरकारों ने इस समिति को प्रभावहीन बना दिया है।

वृंदा करात ने कहा कि वन भूमि पर निवास करने वाले आदिवासी समुदाय आज भी सड़क, बिजली, पेयजल और विद्यालय जैसी बुनियादी सुविधाओं से वंचित हैं, जबकि कानून में इन सुविधाओं के विकास पर कोई प्रतिबंध नहीं है। उन्होंने सवाल उठाते हुए कहा, "यह कैसा देश बन रहा है?"

करात ने कहा, "आदिवासी जितनी जमीन पर हल जोतता है, वह उतनी जमीन का मालिक है। सरकार, पूंजीपति और प्रशासन उसके जज्बात से न खेलें।" उन्होंने बताया कि आने वाले वक्त में उदयपुर जिले में वनाधिकार के पट्टों को लेकर बड़ा आंदोलन किया जाएगा।

इस मौके पर आदिवासी जनाधिकार एका मंच के प्रदेश अध्यक्ष दुलीचंद मीणा ने कहा कि अधिकारियों ने आदिवासियों को वन भूमि के पट्टे नहीं देने के लिए अपने कार्यालय में बैठकर एक लाइन—"मौके पर उसका कब्जा नहीं पाया गया"—लिखकर आदिवासियों के जीवन को अंधेरे में धकेल दिया। उन्होंने कहा कि भाजपा और कांग्रेस पार्टी ने आदिवासियों के साथ हमेशा धोखा किया और जाति के नाम पर बना राजनीतिक दल भी आदिवासियों की भावनाओं के साथ खेल रहा है तथा आदिवासियों के जीवन से जुड़े मुद्दों पर कोई काम नहीं कर रहा है। उन्होंने कहा कि आदिवासी वनवासी नहीं, बल्कि जंगल का मूल निवासी है। उन्होंने कहा कि आदिवासी को किसी धर्म से जोड़ना भी उसके साथ अन्याय होगा। उन्होंने जनगणना में आदिवासियों के लिए अलग कॉलम होने की भी मांग की।

इस मौके पर माकपा जिला सचिव राजेश सिंघवी, आदिवासी जन अधिकार एका मंच के जिला अध्यक्ष हाकरचंद खराड़ी, जिला सचिव प्रेम पारगी, देवाराम, प्रभुलाल भगोरा, श्रवण, नौजवान सभा के रमेश, डूंगरपुर के बाबूलाल, फाल्गुन बरांडा आदि मौजूद थे।

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