यह मार्च उस समय निकाला गया, जब मस्जिद की देखरेख करने वाले भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने 10 जून को जिला प्रशासन को पत्र लिखकर परिसर के आसपास किसी भी बड़ी भीड़ को अनुमति न देने का अनुरोध किया था।

Image Courtesy: Times of India
700 वर्ष पुरानी जामा मस्जिद पर अपना दावा जताते हुए, स्वयं को 12वीं सदी के संत चक्रधर स्वामी का अनुयायी बताने वाले कुछ लोगों ने 15 जून को भरूच में एक रैली निकाली। प्रदर्शनकारियों ने जिला कलेक्टर को ज्ञापन सौंपकर जामा मस्जिद की "मूल पहचान" बनाए रखने की मांग की। उनका दावा है कि यह स्थल मूल रूप से एक प्राचीन जैन मंदिर और संत चक्रधर स्वामी का जन्मस्थान था।
इंडियन एक्सप्रेस की 12 जून को प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने स्मारक की सुरक्षा को लेकर पहले ही जिला प्रशासन को लिखित निर्देश जारी किए थे।
यह मार्च ऐसे समय में आयोजित किया गया जब ASI ने 10 जून को जिला प्रशासन को पत्र लिखकर परिसर के आसपास किसी भी "बड़ी भीड़" को अनुमति न देने का अनुरोध किया था। इसके बावजूद, 'श्री चक्रधर स्वामी राष्ट्रीय विरासत संरक्षण समिति' और कई जैन संगठनों के बैनर तले हॉस्टल ग्राउंड से जिला कलेक्ट्रेट तक लगभग एक किलोमीटर लंबा मार्च निकाला गया।
गुजरात के अलावा महाराष्ट्र के अमरावती और अन्य जिलों से भी चक्रधर स्वामी के कई अनुयायी इसमें शामिल हुए। प्रदर्शनकारियों ने हाथों में बैनर और प्लेकार्ड लेकर रैली में भाग लिया।
प्रतिभागियों में भावेश पटेल भी शामिल थे, जिन्हें 2007 के अजमेर दरगाह विस्फोट मामले में दोषी ठहराया गया था और बाद में जमानत मिली थी। इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, पटेल अब "स्वामी मुक्तानंद" नाम से जाने जाते हैं और स्वयं को धर्मगुरु बताते हैं।
प्रदर्शनकारियों ने भरूच के कलेक्टर नवनाथ गवहाणे को ज्ञापन सौंपते हुए स्मारक को उसके "मूल स्वरूप" में बनाए रखने की मांग की। ज्ञापन में कहा गया है कि 18 से 23 मई के बीच चक्रधर स्वामी के अनुयायियों ने गुजरात और महाराष्ट्र में जन-जागरूकता अभियान चलाया था, जिसके दौरान 35,000 से अधिक लोगों के हस्ताक्षर और मोबाइल नंबर एकत्र किए गए।
मुक्तानंद स्वामी उर्फ भावेश पटेल ने कहा, "जामा मस्जिद मूल रूप से एक प्राचीन जैन मंदिर और संत चक्रधर स्वामी का जन्मस्थान है। बाद में इस्लामी शासकों ने इसे मस्जिद में परिवर्तित कर दिया। वर्तमान में यह स्मारक ASI के संरक्षण में है।"
उन्होंने आरोप लगाया, "हमें जानकारी मिली है कि ASI के नियमों और कानूनों का पालन नहीं किया जा रहा है तथा कुछ लोग मौजूदा ढांचे में बदलाव कर रहे हैं। संरक्षित स्मारक में किसी भी प्रकार का परिवर्तन करने वालों के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए।"
हालांकि, भरूच के जिला कलेक्टर डॉ. नवनाथ गवहाणे ने स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा, "कानून-व्यवस्था की कोई समस्या नहीं है। जिला पुलिस, जिला प्रशासन और ASI के अधिकारी स्थिति पर लगातार नजर रखे हुए हैं। हमने लोगों से अपील की है कि वे स्मारक को लेकर अफवाहों और भ्रामक सूचनाओं पर विश्वास न करें। स्मारक से संबंधित निर्णय लेने का अधिकार केवल ASI के पास है।"
गौरतलब है कि पिछले कुछ दशकों में कई दक्षिणपंथी समूह विभिन्न मस्जिदों और दरगाहों पर ऐतिहासिक या धार्मिक दावे पेश करते हुए अभियान चलाते रहे हैं। आलोचकों का कहना है कि ऐसे अभियान धार्मिक अल्पसंख्यकों के सांस्कृतिक और धार्मिक अधिकारों पर असर डाल सकते हैं।
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700 वर्ष पुरानी जामा मस्जिद पर अपना दावा जताते हुए, स्वयं को 12वीं सदी के संत चक्रधर स्वामी का अनुयायी बताने वाले कुछ लोगों ने 15 जून को भरूच में एक रैली निकाली। प्रदर्शनकारियों ने जिला कलेक्टर को ज्ञापन सौंपकर जामा मस्जिद की "मूल पहचान" बनाए रखने की मांग की। उनका दावा है कि यह स्थल मूल रूप से एक प्राचीन जैन मंदिर और संत चक्रधर स्वामी का जन्मस्थान था।
इंडियन एक्सप्रेस की 12 जून को प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने स्मारक की सुरक्षा को लेकर पहले ही जिला प्रशासन को लिखित निर्देश जारी किए थे।
यह मार्च ऐसे समय में आयोजित किया गया जब ASI ने 10 जून को जिला प्रशासन को पत्र लिखकर परिसर के आसपास किसी भी "बड़ी भीड़" को अनुमति न देने का अनुरोध किया था। इसके बावजूद, 'श्री चक्रधर स्वामी राष्ट्रीय विरासत संरक्षण समिति' और कई जैन संगठनों के बैनर तले हॉस्टल ग्राउंड से जिला कलेक्ट्रेट तक लगभग एक किलोमीटर लंबा मार्च निकाला गया।
गुजरात के अलावा महाराष्ट्र के अमरावती और अन्य जिलों से भी चक्रधर स्वामी के कई अनुयायी इसमें शामिल हुए। प्रदर्शनकारियों ने हाथों में बैनर और प्लेकार्ड लेकर रैली में भाग लिया।
प्रतिभागियों में भावेश पटेल भी शामिल थे, जिन्हें 2007 के अजमेर दरगाह विस्फोट मामले में दोषी ठहराया गया था और बाद में जमानत मिली थी। इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, पटेल अब "स्वामी मुक्तानंद" नाम से जाने जाते हैं और स्वयं को धर्मगुरु बताते हैं।
प्रदर्शनकारियों ने भरूच के कलेक्टर नवनाथ गवहाणे को ज्ञापन सौंपते हुए स्मारक को उसके "मूल स्वरूप" में बनाए रखने की मांग की। ज्ञापन में कहा गया है कि 18 से 23 मई के बीच चक्रधर स्वामी के अनुयायियों ने गुजरात और महाराष्ट्र में जन-जागरूकता अभियान चलाया था, जिसके दौरान 35,000 से अधिक लोगों के हस्ताक्षर और मोबाइल नंबर एकत्र किए गए।
मुक्तानंद स्वामी उर्फ भावेश पटेल ने कहा, "जामा मस्जिद मूल रूप से एक प्राचीन जैन मंदिर और संत चक्रधर स्वामी का जन्मस्थान है। बाद में इस्लामी शासकों ने इसे मस्जिद में परिवर्तित कर दिया। वर्तमान में यह स्मारक ASI के संरक्षण में है।"
उन्होंने आरोप लगाया, "हमें जानकारी मिली है कि ASI के नियमों और कानूनों का पालन नहीं किया जा रहा है तथा कुछ लोग मौजूदा ढांचे में बदलाव कर रहे हैं। संरक्षित स्मारक में किसी भी प्रकार का परिवर्तन करने वालों के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए।"
हालांकि, भरूच के जिला कलेक्टर डॉ. नवनाथ गवहाणे ने स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा, "कानून-व्यवस्था की कोई समस्या नहीं है। जिला पुलिस, जिला प्रशासन और ASI के अधिकारी स्थिति पर लगातार नजर रखे हुए हैं। हमने लोगों से अपील की है कि वे स्मारक को लेकर अफवाहों और भ्रामक सूचनाओं पर विश्वास न करें। स्मारक से संबंधित निर्णय लेने का अधिकार केवल ASI के पास है।"
गौरतलब है कि पिछले कुछ दशकों में कई दक्षिणपंथी समूह विभिन्न मस्जिदों और दरगाहों पर ऐतिहासिक या धार्मिक दावे पेश करते हुए अभियान चलाते रहे हैं। आलोचकों का कहना है कि ऐसे अभियान धार्मिक अल्पसंख्यकों के सांस्कृतिक और धार्मिक अधिकारों पर असर डाल सकते हैं।
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