नॉर्थईस्ट डायरीः असम की चार महिलाओं के निर्वासन पर रोक, अरुणाचल में धर्मांतरण कानून पर विवाद

Written by sabrang india | Published on: June 8, 2026
बीते सप्ताह की नॉर्थ ईस्ट डायरी में असम, अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम, मणिपुर, मेघालय, त्रिपुरा और नगालैंड की जरूरी खबर।


साभार : गूगल 

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार, 5 जून को असम की चार महिलाओं के निर्वासन पर रोक लगा दी। इससे पहले राज्य के एक विशेष फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल ने उन्हें बांग्लादेश से आई अवैध प्रवासी घोषित करते हुए देश से बाहर भेजने का आदेश दिया था।

जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने अधिकारियों को 16 जुलाई को निर्धारित अगली सुनवाई तक यथास्थिति बनाए रखने का निर्देश दिया। साथ ही, अदालत ने प्रतिवादियों को चार सप्ताह के भीतर अपना जवाब दाखिल करने का आदेश भी दिया।

द वायर के अनुसार, पीठ ने सरभानु बेगम, सलेहा खातून, बसिराम नेसा और मुस्त नुरेज़ा बेगम द्वारा दायर अलग-अलग याचिकाओं पर केंद्र, असम सरकार और चुनाव आयोग को नोटिस जारी किए।

इन महिलाओं ने असम के स्पेशल फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल और गौहाटी हाईकोर्ट के उन फैसलों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी, जिनमें उन्हें अवैध प्रवासी मानते हुए देश से बाहर भेजने के ट्रिब्यूनल के आदेश को बरकरार रखा गया था।

चारों मामलों की संयुक्त सुनवाई करते हुए जस्टिस विक्रम नाथ ने कहा, “प्रतिवादियों को नोटिस जारी किया जाए और उनका जवाब 16 जुलाई 2026 तक दाखिल किया जाए। तब तक वर्तमान स्थिति बरकरार रहेगी। यदि याचिकाकर्ता हिरासत में हैं, तो उन्हें अगली सुनवाई की तारीख 16 जुलाई 2026 तक देश से बाहर नहीं भेजा जाएगा।”

याचिकाकर्ताओं ने दलील दी कि जन्म से भारतीय नागरिक होने के बावजूद उन्हें कई सालों से डिटेंशन सेंटर में रखा गया है।

याचिकाकर्ताओं के अनुसार, उनका जन्म भारतीय माता-पिता के घर हुआ था और वे जन्म से ही भारत में रह रही हैं। महिलाओं ने कहा कि उनके नाम वोटर लिस्ट और अन्य सरकारी रिकॉर्ड में शामिल हैं।

महिलाओं का दावा है कि इसके बावजूद उन्हें विदेशी घोषित कर दिया गया और देश से बाहर भेजने का आदेश दिया गया, क्योंकि उनकी भारतीय नागरिकता साबित करने के लिए पेश किए गए दस्तावेजों में कथित तौर पर कुछ कमियां और विसंगतियां थीं।

अरुणाचल: कथित 15 अवैध मस्जिदें सील की गईं

अरुणाचल प्रदेश सरकार ने ईटानगर राजधानी क्षेत्र में स्थित 15 मस्जिद स्थलों को सील कर दिया है। स्थानीय मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, प्रशासनिक जांच में पाया गया कि ये स्थल आवश्यक अनुमति के बिना संचालित किए जा रहे थे।

यह कार्रवाई ‘अरुणाचल प्रदेश इंडिजिनस यूथ ऑर्गनाइज़ेशन’ (एपीआईवाईओ) द्वारा लगातार किए जा रहे विरोध-प्रदर्शनों और अभियान के बाद की गई है। संगठन लंबे समय से राज्य के कुछ क्षेत्रों में कथित रूप से अनधिकृत निर्माण और बसावट के मामलों को लेकर चिंता व्यक्त करता रहा है।

संगठन ने इससे पहले आंदोलन की रूपरेखा की घोषणा की थी, जिसमें राजधानी क्षेत्र में बंद का आह्वान भी शामिल था। साथ ही, उन्होंने आदिवासी हितों के लिए बढ़ती चुनौती बताते हुए सरकार से दखल देने की मांग की थी।

राज्य सरकार के प्रवक्ता एवं शिक्षा मंत्री पीडी सोना ने बताया कि यह मुद्दा इस वर्ष की शुरुआत में औपचारिक रूप से सरकार के समक्ष उठाया गया था। उन्होंने कहा कि उस समय एपीआईवाईओ के प्रतिनिधियों और मुख्यमंत्री पेमा खांडू के बीच इस विषय पर चर्चा भी हुई थी।

इसके बाद जिला प्रशासन को निर्देश दिया गया कि वे उन धार्मिक ढांचों की स्थिति की जांच करें जो कथित रूप से जरूरी सरकारी अनुमति के बिना संचालित हो रहे हैं।

उन्होंने बताया कि अधिकारियों द्वारा चलाए गए सत्यापन अभियान के दौरान कैपिटल कॉम्प्लेक्स क्षेत्र में 15 मस्जिद स्थलों की पहचान की गई, जो आवश्यक अनुमतियों के बिना संचालित पाए गए।

सरकार के अनुसार, सीलिंग और अन्य प्रवर्तन संबंधी कार्रवाई करने से पहले सभी मामलों में निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन किया गया।

अधिकारियों ने अधिकांश मामलों में कानूनी जांच और प्रशासनिक प्रक्रिया पूरी होने के बाद सीलिंग तथा बेदखली की कार्रवाई की। शेष मामलों की अलग से समीक्षा की गई, जिसके बाद उन पर भी इसी प्रकार की कार्रवाई शुरू की गई।

पीडी सोना ने कहा कि प्रशासन ने स्वदेशी संगठनों द्वारा उठाई गई चिंताओं का समाधान कानूनी और प्रशासनिक प्रक्रियाओं के तहत करने का प्रयास किया है। उन्होंने उम्मीद जताई कि इस कार्रवाई के बाद आगे किसी आंदोलन की आवश्यकता नहीं पड़ेगी।

अरुणाचल: क्रिश्चियन फोरम का सरकार को धर्मांतरण विरोधी कानून के नियम बनाने का काम रोकने का आग्रह

राज्य का सबसे बड़ा ईसाई संगठन अरुणाचल क्रिश्चियन फोरम (एसीएफ) ने राज्य की भाजपा-नीत सरकार को 15 दिन का अल्टीमेटम दिया है।

फोरम ने मांग की है कि ‘अरुणाचल प्रदेश धर्म की स्वतंत्रता अधिनियम’ (एपीएफआरए) के तहत नियमों के मसौदे और उनकी अधिसूचना की जारी प्रक्रिया को तत्काल प्रभाव से रोक दिया जाए।

‘अरुणाचल प्रदेश धर्म की स्वतंत्रता अधिनियम’ (एपीएफआरए) वर्ष 1978 में पारित किया गया था, लेकिन इसे कभी प्रभावी रूप से लागू नहीं किया गया। सितंबर 2024 में गौहाटी हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया था कि वह इस अधिनियम के तहत आवश्यक नियम तैयार करे और उन्हें अधिसूचित करे।

मुख्यमंत्री पेमा खांडू को सौंपे गए एक ज्ञापन में फोरम ने कहा कि राज्य का ईसाई समुदाय एपीएफआरए के तहत नियम बनाए जाने और अधिनियम को लागू करने की प्रक्रिया को लेकर गहरी चिंता व्यक्त कर रहा है। फोरम का कहना है कि इस कदम के दूरगामी प्रभाव पड़ सकते हैं, जिनसे संवैधानिक अधिकारों, धार्मिक स्वतंत्रता, सामाजिक सद्भाव और विभिन्न समुदायों के शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व पर प्रतिकूल असर पड़ने की आशंका है।

एसीएफ ने अपने बयान में कहा, “एपीएफआरए, 1978 के संबंध में गठित उच्च-स्तरीय समिति द्वारा उठाया गया वर्तमान कदम, जिसे पर्याप्त जन-परामर्श के बिना आगे बढ़ाया जा रहा है, राज्य की बड़ी आबादी के बीच व्यापक चिंता और असंतोष का कारण बना है।”

फोरम ने खेद जताते हुए कहा कि विभिन्न संगठनों, धार्मिक संस्थाओं और नागरिकों द्वारा की गई अपीलों के बावजूद राज्य सरकार इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के अपने निर्णय पर अडिग दिखाई दे रही है।

एसीएफ ने चेतावनी देते हुए कहा कि व्यापक सहमति और सभी संबंधित पक्षों के साथ सार्थक संवाद के बिना उठाया गया कोई भी कदम राज्य में अनावश्यक तनाव और अस्थिरता पैदा कर सकता है। फोरम ने मांग की कि इस पूरी प्रक्रिया को तत्काल प्रभाव से रोक दिया जाए।

ज्ञापन में कहा गया है, ‘सरकार को इस प्रक्रिया को रोकने के अपने फैसले की सार्वजनिक घोषणा करनी चाहिए और एपीएफआरए को रद्द करने के विषय पर सभी प्रभावित पक्षों के साथ व्यापक परामर्श शुरू करना चाहिए।’

इस अधिनियम को स्वदेशी समुदायों की पारंपरिक धार्मिक प्रथाओं को बाहरी प्रभावों या दबाव से बचाने के उद्देश्य से पेश किया गया था। इससे पहले राज्य सरकार ने कहा था कि एपीएफआरए को अदालत के निर्देश का सम्मान करते हुए लागू किया जाएगा; इस संबंध में मुख्यमंत्री खांडू ने स्पष्ट किया था कि नियमों का मसौदा किसी भी धर्म के खिलाफ नहीं है।

मिजोरम: कांग्रेस की चेतावनी- दिहाड़ी मजदूरों की बढ़ती संख्या राज्य के सामाजिक ताने-बाने के लिए खतरा

मिजोरम की विपक्षी कांग्रेस पार्टी ने शुक्रवार (5 जून) को राज्य में दिहाड़ी मजदूरों की बढ़ती संख्या पर गंभीर चिंता व्यक्त की। पार्टी ने चेतावनी दी कि यदि इस प्रवृत्ति पर समय रहते रोक नहीं लगाई गई, तो इससे सामाजिक असमानता और विभाजन की खाई और गहरी हो सकती है।

कांग्रेस भवन में आयोजित एक राजनीतिक सत्र को संबोधित करते हुए मिजोरम प्रदेश कांग्रेस कमेटी के महासचिव लालबियाकज़ामा ने कहा कि दिहाड़ी मजदूरों के बीच बढ़ती भूमिहीनता एक गंभीर मुद्दा है, जिस पर तत्काल ध्यान देने और दीर्घकालिक नीतिगत समाधान विकसित करने की आवश्यकता है।

उन्होंने कहा, ‘मिजोरम में अब बड़ी संख्या में ऐसे दिहाड़ी मजदूर हैं जिनके पास अपनी जमीन नहीं है। लंबे समय में यह हमारे समाज में गंभीर भेदभाव और सामाजिक असमानता को जन्म देगा। हमें अभी से इसके समाधान के बारे में सोचना शुरू करना होगा।’

लालबियाकज़ामा ने जनता, खासकर युवाओं को उन राजनीतिक वादों से गुमराह न होने की चेतावनी दी, जो वास्तविक नहीं हैं।

मुख्यमंत्री लालडुहोमा और सत्तारूढ़ ज़ोरम पीपल्स मूवमेंट (जेडपीएम) के अन्य नेताओं के दावों की आलोचना करते हुए कांग्रेस नेता ने कहा कि सरकार द्वारा किए गए कई विकास संबंधी वादे अव्यावहारिक थे। उन्होंने आरोप लगाया कि तीन वर्षों के भीतर राज्य को आत्मनिर्भर बनाने और डार्ज़ो नदी से 2,400 मेगावाट बिजली उत्पादन जैसे दावे मतदाताओं को प्रभावित करने और गुमराह करने के उद्देश्य से किए गए थे।

उन्होंने कहा, ‘अगर कोई हमसे ऐसे वादे करता है, तो इसे युवाओं का अपमान समझना चाहिए। मिजोरम के युवाओं, अब जागने का समय आ गया है।’

भाजपा पर कटाक्ष करते हुए कांग्रेस नेता ने लोगों को पार्टी के जाल में फंसने के खिलाफ भी आगाह किया। उन्होंने दावा किया कि भाजपा का एजेंडा भूमि के लिए खतरा है और यह मिजोरम की संस्कृति और धार्मिक पहचान पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है।

लालबियाकजामा ने यह भी आरोप लगाया कि भाजपा शासन के दौरान भारत के आर्थिक और प्रशासनिक संकेतकों में गिरावट आई है। उनके अनुसार भारतीय मुद्रा का मूल्य लगातार घटा है और वह आर्थिक रूप से कमजोर पड़ोसी देशों की मुद्राओं के स्तर तक पहुंच गया है।

कांग्रेस नेता ने आरोप लगाया कि वर्तमान केंद्र सरकार के कार्यकाल के दौरान कम-से-कम छह बार परीक्षा-पत्र लीक होने की घटनाएं सामने आई हैं, लेकिन इनमें से किसी भी मामले में किसी मंत्री या अधिकारी ने जिम्मेदारी स्वीकार नहीं की है।

उन्होंने बार-बार सामने आए प्रश्नपत्र लीक के मामलों का हवाला देते हुए सरकार के मंत्रियों और अधिकारियों की जवाबदेही पर सवाल उठाए तथा इन घटनाओं के लिए जिम्मेदारी तय किए जाने की आवश्यकता पर जोर दिया।
लालबियाकज़ामा ने कहा कि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस राष्ट्रीय स्तर पर धीरे-धीरे अपनी राजनीतिक स्थिति मजबूत कर रही है।

उन्होंने यह भी दावा किया कि कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी), छात्र संगठनों और नागरिक समूहों द्वारा चलाए जा रहे विरोध-प्रदर्शनों का भाजपा पर उल्लेखनीय प्रभाव पड़ रहा है और इससे सत्तारूढ़ दल पर दबाव बढ़ा है।

मणिपुर: 13 मई की हत्याओं को लेकर गतिरोध जारी, यूएनसी ने बंधकों को रिहा करने की योजना रद्द की

मणिपुर में बंधक संकट को लेकर गतिरोध जारी है। यूनाइटेड नगा काउंसिल (यूएनसी) ने 14 कुकी बंधकों को रिहा करने की अपनी प्रस्तावित योजना फिलहाल वापस ले ली है। संगठन ने मांग की है कि कथित तौर पर कुकी समूहों के कब्जे में रखे गए छह नगा नागरिकों को पहले रिहा किया जाए।

इकोनॉमिक टाइम्स की एक रिपोर्ट के अनुसार, यूएनसी ने एक बयान जारी कर कहा कि 14 कुकी बंधकों की रिहाई की प्रस्तावित योजना को फिलहाल रद्द कर दिया गया है। संगठन ने इसके पीछे नगा समुदाय के भीतर व्याप्त मौजूदा जनभावनाओं को प्रमुख कारण बताया।

कुकी और नगा दोनों समुदायों द्वारा राष्ट्रीय राजमार्ग-37 पर आर्थिक नाकेबंदी किए जाने के कारण बाजार और स्कूल बंद रहे हैं।

कांगपोकपी जिले में थाडौ समुदाय के तीन चर्च नेताओं की गोली मारकर हत्या किए जाने के बाद 13 मई को कम-से-कम 14 कुकी और छह नगा नागरिकों को बंधक बना लिया गया था।

13 मई का यह हमला तब हुआ, जब थाडौ बैपटिस्ट एसोसिएशन ऑफ इंडिया और यूनाइटेड बैपटिस्ट काउंसिल के नेता, चूड़ाचांदपुर में आयोजित एक बैपटिस्ट सम्मेलन से कांगपोकपी जिले लौट रहे थे। पीड़ितों के अनुसार, सुबह लगभग 10 बजे कोटलेन और कोटज़िम गांवों के बीच अज्ञात बंदूकधारियों ने उनके दो वाहनों पर गोलियां चला दीं।

कई नगा संगठनों के एक मंच- जॉइंट ट्राइब्स काउंसिल ने अपहृत नगा लोगों की रिहाई सुनिश्चित करने में मणिपुर सरकार की कथित विफलता की कड़ी आलोचना की है।
डेक्कन हेराल्ड की रिपोर्ट के अनुसार, इसने यह भी मांग की है कि 14 कुकी लोगों को, जिन्हें 13 मई को नगा संगठनों द्वारा इसी तरह बंधक बनाया गया था, तब तक हिरासत में रखा जाए, जब तक कि छह नगा लोगों को रिहा नहीं कर दिया जाता।

इससे पहले मेघालय के मुख्यमंत्री कोनराड संगमा और नगालैंड के मुख्यमंत्री नेफ्यू रियो ने नगा और कुकी समुदायों के नेताओं से सभी बंधकों को तत्काल रिहा करने की अपील की थी।

मेघालय और असम विवादित लापांगाप में खेती फिर से शुरू करने पर सहमत

विवादित लापांगाप क्षेत्र में खेती-बाड़ी को लेकर कई सप्ताह से जारी अनिश्चितता के बीच मेघालय और असम मंगलवार (2 जून) को एक अंतरिम समझौते पर पहुंचे। इस समझौते के तहत दोनों राज्यों के किसानों को सीमा विवाद के स्थायी समाधान तक अपनी पारंपरिक कृषि गतिविधियां जारी रखने की अनुमति दी जाएगी।

शिलांग टाइम्स के अनुसार, यह फैसला दोनों राज्यों के मंत्रियों, बड़े अधिकारियों, पुलिस अधिकारियों और समुदाय के नेताओं की एक संयुक्त बैठक में लिया गया। यह बैठक मेघालय के मुख्यमंत्री कोनराड के. संगमा और उनके असम के समकक्ष हिमंता बिस्वा शर्मा के बीच हाल ही में हुई बातचीत के बाद हुई।

इस अंतरिम व्यवस्था के तहत पनार समुदाय के किसानों को पहाड़ी के निचले क्षेत्रों में धान की खेती जारी रखने की अनुमति होगी। वहीं, कार्बी आंगलोंग के तापत गांव के निवासी विवादित क्षेत्र के ऊंचे हिस्सों में केला, अनानास और अदरक जैसी फसलों की खेती पहले की तरह करते रहेंगे।

अधिकारियों ने बताया कि इस समझौते का मकसद मौजूदा स्थिति को बनाए रखना और यह पक्का करना है कि खेती-बाड़ी में कोई रुकावट न आए।

दोनों राज्य सरकारें इस बात पर सहमत हुई हैं कि भूमि के स्वामित्व और सीमा के अंतिम निर्धारण से जुड़े मुद्दों की जांच उस राज्य-स्तरीय तंत्र द्वारा की जाएगी, जिसे इस विवाद के समाधान की जिम्मेदारी सौंपी गई है। तब तक सभी संबंधित पक्षों से शांति बनाए रखने और ऐसे किसी भी कदम से परहेज करने का आग्रह किया गया है, जिससे स्थिति और अधिक तनावपूर्ण हो सकती है।

यह ताजा सफलता पिछले महीने स्थानीय अधिकारियों द्वारा गांव के प्रतिनिधियों के बीच आम सहमति बनाने की एक नाकाम कोशिश के बाद मिली है। 18 मई को पश्चिम जयंतिया हिल्स प्रशासन द्वारा बुलाई गई एक बैठक बिना किसी समझौते के खत्म हो गई थी, क्योंकि दोनों पक्ष इलाके में बागवानी गतिविधियों के मुद्दे पर एकमत नहीं थे।

बीते 18 मई को लापांगाप क्षेत्र में पत्थरबाज़ी और दोनों पक्षों के लोगों के बीच हल्की झड़प के बाद तनाव बढ़ गया था। उसके बाद मेघालय सरकार ने इलाके में सुरक्षा बलों को तैनात किया था।
त्रिपुरा: चिट फंड घोटाला मामले में तीन अधिकारियों को सजा सुनाई गई

पश्चिम त्रिपुरा स्थित एक विशेष सीबीआई अदालत ने चिट फंड घोटाले के एक मामले में प्रगति शील इन्फ्रा प्रोजेक्ट्स एंड सर्विसेज लिमिटेड के अध्यक्ष-सह-प्रबंध निदेशक (सीएमडी) और कंपनी के दो अन्य अधिकारियों को छह वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई है। केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) के अनुसार, यह मामला निवेशकों से जुटाई गई लगभग 5 से 6 करोड़ रुपये की धनराशि के कथित गबन से जुड़ा है।

अदालत ने दोषी ठहराए गए तीनों अधिकारियों पर 3-3 लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया। वहीं कंपनी को भी अलग से दोषी ठहराते हुए उस पर 7 लाख रुपये का जुर्माना लगाया गया।

विशेष सीबीआई अदालत ने कंपनी के सीएमडी अरिंदम दास, निदेशक परितोष दास और प्रशासनिक निदेशक दीपशिखा चक्रवर्ती को निवेशकों से एकत्रित जमा राशि के गबन का दोषी ठहराते हुए छह वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई।

पश्चिम त्रिपुरा जिले के विशेष सीबीआई न्यायाधीश ने इस मामले में प्रगति शील इन्फ्रा प्रोजेक्ट्स एंड सर्विसेज लिमिटेड को भी दोषी करार दिया और कंपनी पर अलग से जुर्माना लगाया।
यह मामला कैलाशहर पुलिस थाना के केस संख्या 90/2012 से संबंधित  है, जिसे 30 अप्रैल 2012 को दर्ज किया गया था। बाद में त्रिपुरा सरकार तथा भारत सरकार के कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (डीओपीटी) द्वारा जारी अधिसूचनाओं के आधार पर केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) ने 8 अक्टूबर 2013 को इस मामले को अपने स्तर पर पुनः दर्ज कर जांच शुरू की।

सीबीआई ने मामले की आगे की जांच अपने हाथ में लेते हुए उन आरोपों की जांच की, जिनके अनुसार आरोपियों ने शिकायतकर्ता सहित कई निवेशकों से धन जमा कराया, लेकिन परिपक्वता अवधि पूरी होने के बाद भी उनकी राशि वापस नहीं की। जांच एजेंसी के मुताबिक, आरोपियों ने आम जनता से जुटाए गए लगभग 5 से 6 करोड़ रुपये का कथित रूप से गबन किया।

जांच पूरी होने के बाद सीबीआई ने 28 मई 2018 को अरिंदम दास, परितोष दास, दीपशिखा चक्रवर्ती दास तथा प्रगति शील इन्फ्रा प्रोजेक्ट्स एंड सर्विसेज लिमिटेड के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल किया।

विशेष न्यायाधीश ने आदेश दिया कि दोषियों से वसूल की गई जुर्माने की राशि सक्षम अधिकारियों को भेजी जाए, ताकि उसे पीड़ित जमाकर्ताओं के बीच अनुपातिक रूप से वितरित किया जा सके।

अदालत ने निर्देश दिया कि यह राशि जिलाधिकारी एवं जिला कलेक्टर, उनाकोटी जिला (कैलाशहर) के माध्यम से संबंधित अधिकारियों को उपलब्ध कराई जाए, ताकि स्थानीय प्रशासन की आवश्यकताओं और निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार इसका वितरण किया जा सके।

अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि कानून के प्रावधानों के तहत, जहां तक संभव हो, आरोपियों की कुर्क की गई संपत्तियों से ठगी गई राशि की वसूली की जाए। वसूल की गई रकम को उन पहचाने गए जमाकर्ताओं और निवेशकों के बीच उनकी जमा राशि के अनुपात में वितरित किया जाए, जिन्हें अब तक अपना धन वापस नहीं मिल सका है।

नगालैंड: तंबाकू और निकोटीन वाले उत्पादों पर सरकार ने प्रतिबंध लगाया

नगालैंड के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग ने राज्य में तंबाकू और निकोटीन युक्त खाद्य उत्पादों की बिक्री तथा वितरण पर प्रतिबंध लगा दिया है। इस प्रतिबंध के दायरे में गुटखा, पान मसाला और अन्य ऐसे खाद्य उत्पाद शामिल हैं जिनमें तंबाकू या निकोटीन का उपयोग किया जाता है।

विभाग ने गुरुवार को ‘खाद्य सुरक्षा और मानक (कुछ उत्पादों की बिक्री पर रोक और प्रतिबंध) नियम, 2011’ (समय-समय पर संशोधित) के नियम 2.3.4 के तहत एक अधिसूचना जारी किया।

इस प्रावधान के अनुसार, ‘खाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम, 2006’ की धारा 3(1)(j) में दी गई परिभाषा के तहत किसी भी खाद्य उत्पाद या खाद्य पदार्थ में तंबाकू अथवा निकोटीन का उपयोग करना प्रतिबंधित है।

अधिसूचना में स्पष्ट किया गया है कि ‘सामग्री’ (इंग्रीडिएंट) से आशय किसी भी ऐसे पदार्थ से है, जिसमें फूड एडिटिव भी शामिल हैं, जिसका उपयोग किसी खाद्य पदार्थ के निर्माण या तैयारी में किया जाता है और जो अंतिम उत्पाद में, चाहे परिवर्तित रूप में ही क्यों न हो, मौजूद रहता है। यह परिभाषा ‘खाद्य सुरक्षा एवं मानक अधिनियम, 2006’ की धारा 3(1)(y) तथा संबंधित नियमों में निर्धारित की गई है।

विभाग ने सुप्रीम कोर्ट के 23.09.2016 के उस आदेश का हवाला दिया जो ‘ट्रांसफर केस सिविल नंबर 1/2010 (सेंट्रल अरेकानट मार्केटिंग कॉर्पोरेशन और अन्य)’ के मामले में दिया गया था।

आदेश में कहा गया है कि गुटखा पर लगे प्रतिबंध को दरकिनार करने के लिए कुछ निर्माता बिना तंबाकू वाले पान मसाले और सुगंधित चबाने वाले तंबाकू को अलग-अलग पाउच में बाजार में उतार रहे हैं। इन उत्पादों को अक्सर एक साथ पैक करके या एक ही विक्रेता द्वारा एक ही स्थान पर बेचा जाता है, जिससे उपभोक्ता उन्हें खरीदकर आपस में मिलाएं और गुटखे के विकल्प के रूप में इस्तेमाल कर सकें।

अधिसूचना में कहा गया है कि इस कदम का उद्देश्य सार्वजनिक स्वास्थ्य की रक्षा करना और तंबाकू तथा निकोटीन युक्त उत्पादों के सेवन पर प्रभावी नियंत्रण सुनिश्चित करना है।

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