असम सरकार ने एनजीटी के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें वन कर्मियों को चुनावी ड्यूटी में तैनात करने पर रोक लगाई गई थी। सरकार का तर्क था कि असम फॉरेस्ट प्रोटेक्शन फोर्स (एएफपीएफ) के कर्मी ‘वन अधिकारी’ नहीं हैं।

फोटो साभार: पीटीआई
असम सरकार के इस दावे को खारिज करते हुए कि असम फॉरेस्ट प्रोटेक्शन फोर्स (एएफपीएफ) के कर्मी वन अधिकारी नहीं हैं, राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने बुधवार, 8 अप्रैल को अपने उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें कहा गया था कि असम चुनावों के दौरान वन कर्मियों को चुनाव ड्यूटी में नहीं लगाया जाना चाहिए।
याचिकाकर्ता और अधिवक्ता गौरव बंसल ने असम सरकार के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें वन कर्मियों को चुनाव ड्यूटी में तैनात करने का प्रावधान किया गया था। उनका तर्क था कि यह 2002 के जैव विविधता अधिनियम (बीडीए) और 2024 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए आदेश का उल्लंघन है।
द वायर की रिपोर्ट के अनुसार, 8 अप्रैल को असम सरकार ने दलील दी कि एएफपीएफ के कर्मियों को असम फॉरेस्ट प्रोटेक्शन फोर्स अधिनियम, 1986 के तहत वन अधिकारी नहीं माना जाता है, और एएफपीएफ बटालियन का सदस्य सशस्त्र कर्मियों जैसे कॉन्स्टेबल, लांस नायक, नायक, हवलदार, सब-इंस्पेक्टर और इंस्पेक्टर की श्रेणी में आता है, न कि ‘वन अधिकारी’ की।
राज्य सरकार ने यह भी कहा कि काजीरंगा नेशनल पार्क और टाइगर रिजर्व के लिए 90 कर्मियों वाली एक विशेष राइनो प्रोटेक्शन फोर्स गठित है। सरकार का दावा है, “यह टीम पूरी तरह से सशस्त्र है और काजीरंगा नेशनल पार्क की सुरक्षा के लिए समर्पित है। इसे वहीं तैनात रखा जाता है और एएफपीएफ की तरह अन्य कार्यों में नहीं लगाया जाता।”
सरकार ने यह भी कहा कि जैव विविधता केवल असम के जंगलों और संरक्षित क्षेत्रों तक सीमित नहीं है। हालांकि राज्य के कुल क्षेत्रफल का 27.24% हिस्सा अधिसूचित वन क्षेत्र है, लेकिन जैव विविधता राज्य के अन्य इलाकों में भी समान रूप से प्रचुर मात्रा में पाई जाती है।
राज्य सरकार ने यह भी तर्क दिया कि 2002 का जैव विविधता अधिनियम बलों की मानव संसाधन तैनाती पर कोई अधिकार क्षेत्र नहीं रखता और याचिकाकर्ता का दावा “पूरी तरह गलत और भ्रामक” है।
राज्य के अनुसार, याचिकाकर्ता ने “जैव विविधता अधिनियम, 2002 के प्रावधानों की आवश्यकता से अधिक व्यापक व्याख्या की है।”
असम सरकार ने यह भी कहा कि एएफपीएफ कर्मियों को पहले भी विभिन्न सरकारी कार्यों में लगाया जाता रहा है। राज्य का तर्क है, “कई मौकों पर एएफपीएफ कर्मियों की तैनाती असम पुलिस की सहायता के लिए की गई है, और इससे जैव विविधता संरक्षण पर कोई असर नहीं पड़ा। यह कहना पूरी तरह गलत है कि जैव विविधता की सुरक्षा केवल इन 1600 एएफपीएफ कर्मियों पर निर्भर है।”
हालांकि, एनजीटी ने इन दलीलों को स्वीकार नहीं किया। 8 अप्रैल के अपने आदेश में अधिकरण ने कहा, “अतीत में किसी अन्य उद्देश्य के लिए उनकी तैनाती के उदाहरण वर्तमान या भविष्य में ऐसी तैनाती को उचित नहीं ठहरा सकते।”
एनजीटी ने कहा कि भले ही एएफपीएफ के सदस्य 1986 के अधिनियम के तहत ‘वन अधिकारी’ की परिभाषा में न आते हों, लेकिन उनकी नियुक्ति मुख्य वन संरक्षक द्वारा की जाती है और यह अधिकार अधिनियम के तहत बनाए गए नियमों के अनुसार ही प्रयोग किया जाता है।
एनजीटी ने आगे कहा, “नियुक्ति की प्रक्रिया, अनुशासन बनाए रखने तथा वेतन और अन्य वित्तीय लाभ वन विभाग द्वारा दिए जाने को देखते हुए, असम फॉरेस्ट प्रोटेक्शन फोर्स के सदस्य वन विभाग के कर्मचारी माने जाएंगे। इस आधार पर वे ‘वन कर्मचारी’ की श्रेणी में आते हैं, और सुप्रीम कोर्ट द्वारा वन कर्मचारियों को चुनाव ड्यूटी में न लगाने संबंधी प्रतिबंध उन पर भी लागू होगा।”
अधिकरण ने यह भी कहा कि अधिनियम अन्य उद्देश्यों के लिए इन कर्मियों के उपयोग की अनुमति नहीं देता। एएफपीएफ कर्मियों को दूसरे कार्यों में लगाना “बल के गठन के मूल उद्देश्य को ही समाप्त कर देगा।”
इस प्रकार, एनजीटी ने राज्य सरकार की दलीलों को खारिज करते हुए अपने पूर्व आदेश को बरकरार रखा, जिसमें एएफपीएफ कर्मियों को चुनाव ड्यूटी में तैनात करने पर रोक लगाई गई थी। यह फैसला 2002 के जैव विविधता अधिनियम और 2024 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए निर्देशों के अनुरूप बताया गया। इस मामले की अगली सुनवाई 20 मई को निर्धारित है।
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असम सरकार के इस दावे को खारिज करते हुए कि असम फॉरेस्ट प्रोटेक्शन फोर्स (एएफपीएफ) के कर्मी वन अधिकारी नहीं हैं, राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने बुधवार, 8 अप्रैल को अपने उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें कहा गया था कि असम चुनावों के दौरान वन कर्मियों को चुनाव ड्यूटी में नहीं लगाया जाना चाहिए।
याचिकाकर्ता और अधिवक्ता गौरव बंसल ने असम सरकार के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें वन कर्मियों को चुनाव ड्यूटी में तैनात करने का प्रावधान किया गया था। उनका तर्क था कि यह 2002 के जैव विविधता अधिनियम (बीडीए) और 2024 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए आदेश का उल्लंघन है।
द वायर की रिपोर्ट के अनुसार, 8 अप्रैल को असम सरकार ने दलील दी कि एएफपीएफ के कर्मियों को असम फॉरेस्ट प्रोटेक्शन फोर्स अधिनियम, 1986 के तहत वन अधिकारी नहीं माना जाता है, और एएफपीएफ बटालियन का सदस्य सशस्त्र कर्मियों जैसे कॉन्स्टेबल, लांस नायक, नायक, हवलदार, सब-इंस्पेक्टर और इंस्पेक्टर की श्रेणी में आता है, न कि ‘वन अधिकारी’ की।
राज्य सरकार ने यह भी कहा कि काजीरंगा नेशनल पार्क और टाइगर रिजर्व के लिए 90 कर्मियों वाली एक विशेष राइनो प्रोटेक्शन फोर्स गठित है। सरकार का दावा है, “यह टीम पूरी तरह से सशस्त्र है और काजीरंगा नेशनल पार्क की सुरक्षा के लिए समर्पित है। इसे वहीं तैनात रखा जाता है और एएफपीएफ की तरह अन्य कार्यों में नहीं लगाया जाता।”
सरकार ने यह भी कहा कि जैव विविधता केवल असम के जंगलों और संरक्षित क्षेत्रों तक सीमित नहीं है। हालांकि राज्य के कुल क्षेत्रफल का 27.24% हिस्सा अधिसूचित वन क्षेत्र है, लेकिन जैव विविधता राज्य के अन्य इलाकों में भी समान रूप से प्रचुर मात्रा में पाई जाती है।
राज्य सरकार ने यह भी तर्क दिया कि 2002 का जैव विविधता अधिनियम बलों की मानव संसाधन तैनाती पर कोई अधिकार क्षेत्र नहीं रखता और याचिकाकर्ता का दावा “पूरी तरह गलत और भ्रामक” है।
राज्य के अनुसार, याचिकाकर्ता ने “जैव विविधता अधिनियम, 2002 के प्रावधानों की आवश्यकता से अधिक व्यापक व्याख्या की है।”
असम सरकार ने यह भी कहा कि एएफपीएफ कर्मियों को पहले भी विभिन्न सरकारी कार्यों में लगाया जाता रहा है। राज्य का तर्क है, “कई मौकों पर एएफपीएफ कर्मियों की तैनाती असम पुलिस की सहायता के लिए की गई है, और इससे जैव विविधता संरक्षण पर कोई असर नहीं पड़ा। यह कहना पूरी तरह गलत है कि जैव विविधता की सुरक्षा केवल इन 1600 एएफपीएफ कर्मियों पर निर्भर है।”
हालांकि, एनजीटी ने इन दलीलों को स्वीकार नहीं किया। 8 अप्रैल के अपने आदेश में अधिकरण ने कहा, “अतीत में किसी अन्य उद्देश्य के लिए उनकी तैनाती के उदाहरण वर्तमान या भविष्य में ऐसी तैनाती को उचित नहीं ठहरा सकते।”
एनजीटी ने कहा कि भले ही एएफपीएफ के सदस्य 1986 के अधिनियम के तहत ‘वन अधिकारी’ की परिभाषा में न आते हों, लेकिन उनकी नियुक्ति मुख्य वन संरक्षक द्वारा की जाती है और यह अधिकार अधिनियम के तहत बनाए गए नियमों के अनुसार ही प्रयोग किया जाता है।
एनजीटी ने आगे कहा, “नियुक्ति की प्रक्रिया, अनुशासन बनाए रखने तथा वेतन और अन्य वित्तीय लाभ वन विभाग द्वारा दिए जाने को देखते हुए, असम फॉरेस्ट प्रोटेक्शन फोर्स के सदस्य वन विभाग के कर्मचारी माने जाएंगे। इस आधार पर वे ‘वन कर्मचारी’ की श्रेणी में आते हैं, और सुप्रीम कोर्ट द्वारा वन कर्मचारियों को चुनाव ड्यूटी में न लगाने संबंधी प्रतिबंध उन पर भी लागू होगा।”
अधिकरण ने यह भी कहा कि अधिनियम अन्य उद्देश्यों के लिए इन कर्मियों के उपयोग की अनुमति नहीं देता। एएफपीएफ कर्मियों को दूसरे कार्यों में लगाना “बल के गठन के मूल उद्देश्य को ही समाप्त कर देगा।”
इस प्रकार, एनजीटी ने राज्य सरकार की दलीलों को खारिज करते हुए अपने पूर्व आदेश को बरकरार रखा, जिसमें एएफपीएफ कर्मियों को चुनाव ड्यूटी में तैनात करने पर रोक लगाई गई थी। यह फैसला 2002 के जैव विविधता अधिनियम और 2024 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए निर्देशों के अनुरूप बताया गया। इस मामले की अगली सुनवाई 20 मई को निर्धारित है।
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