डीयू में प्रदर्शन पर सख्ती: 72 घंटे पहले अनुमति लेने का निर्देश, छात्र संगठनों ने ‘अलोकतांत्रिक आदेश’ बताया

Written by sabrang india | Published on: March 25, 2026
डीयू प्रशासन ने परिसर के भीतर होने वाले प्रदर्शनों को लेकर नियम कड़े करते हुए नए निर्देश जारी किए हैं। इसके तहत अब किसी भी विरोध प्रदर्शन से पहले 72 घंटे पूर्व लिखित अनुमति लेना अनिवार्य होगा। साथ ही, बाहरी व्यक्तियों के कैंपस में प्रवेश पर भी रोक लगा दी गई है।



दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू) ने सोमवार, 23 मार्च को जारी एक आधिकारिक सूचना में कहा कि परिसर में होने वाले किसी भी प्रस्तावित विरोध प्रदर्शन या सभा के लिए कम से कम 72 घंटे पहले विश्वविद्यालय प्रशासन और स्थानीय पुलिस को सूचना देना अनिवार्य होगा।

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, यह निर्देश 17 फरवरी को विश्वविद्यालय द्वारा विरोध प्रदर्शनों पर लगाए गए एक महीने के प्रतिबंध के कुछ ही दिनों बाद जारी किया गया। यह प्रतिबंध नॉर्थ कैंपस में छात्रों के हिंसक प्रदर्शन के बाद लगाया गया था, जिसमें कथित रूप से एक महिला पत्रकार पर हमला किया गया था।

प्रोक्टर कार्यालय की ओर से जारी यह नोटिस छात्रों, शिक्षकों, कर्मचारियों और अन्य संबंधित पक्षों पर लागू होगा। इसमें कहा गया है कि किसी भी कार्यक्रम के आयोजकों को अपने आवेदन की हस्ताक्षरित हार्ड कॉपी विश्वविद्यालय के प्रोक्टर कार्यालय के साथ-साथ संबंधित स्थानीय पुलिस अधिकारियों—जिनमें पुलिस उपायुक्त और क्षेत्र के संबंधित थाना प्रभारी शामिल हैं—को जमा करनी होगी।

दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोक्टर मनोज कुमार सिंह ने बताया कि आवेदन में आयोजक का नाम, उसके कॉलेज या विभाग का विवरण, संपर्क की जानकारी, कार्यक्रम की प्रकृति और अवधि, आवश्यक व्यवस्थाएं, वक्ताओं की सूची तथा प्रतिभागियों की अनुमानित संख्या जैसी जानकारियाँ शामिल करना अनिवार्य होगा।

नोटिस के अनुसार, परिसर में किसी भी सभा, जमावड़े, विरोध प्रदर्शन, धरने, मार्च, जुलूस या इसी तरह की गतिविधि से 72 घंटे पहले ये विवरण जमा करना अनिवार्य है।

नोटिस में यह भी कहा गया है कि इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से दी गई सूचना—जैसे पोस्टर, पर्चे, सोशल मीडिया पोस्ट या व्हाट्सऐप संदेश—को आधिकारिक सूचना या अनुमति के रूप में स्वीकार नहीं किया जाएगा।

नोटिस में आगे कहा गया है, ‘आयोजकों और प्रतिभागियों को परिसर के भीतर किसी भी प्रकार की गतिविधि में बाहरी व्यक्तियों (जो दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्र नहीं हैं) को बुलाने, लाने या अनुमति देने से सख्त मनाही है।’

इसमें आगे चेतावनी दी गई है कि किसी भी उल्लंघन पर आयोजकों, प्रतिभागियों और सहयोगियों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी, जिसमें निष्कासन, विश्वविद्यालय से नामांकन रद्द करना या पुलिस कार्रवाई शामिल हो सकती है।

छात्र संगठनों ने कहा, ‘हम परमिशन राज को खारिज करते हैं’

छात्र संगठन आइसा ने प्रशासन के इस निर्देश को खारिज करते हुए कहा कि यह अधिसूचना असहमति की आवाज़ को दबाने की प्रशासन की लगातार कोशिशों का ही विस्तार है। संगठन के अनुसार, यह कदम यूजीसी समानता विनियमों के खिलाफ चल रहे आंदोलन की रफ्तार को तोड़ने के उद्देश्य से, एक महीने तक लागू किए गए बीएनएसएस 163 के बाद उठाया गया है।

एक आधिकारिक बयान में संगठन ने कहा कि यह नया आदेश विरोध करने के अधिकार पर सीधा हमला है। उनका कहना है कि यह विश्वविद्यालय की उस मूल अवधारणा के लिए गंभीर खतरा है, जहां विचारों को स्वतंत्र और खुलकर व्यक्त किया जाना चाहिए।

इस संबंध में आइसा की राष्ट्रीय अध्यक्ष नेहा ने द वायर को बताया कि यह नया फरमान पूरी तरह तर्कहीन और अलोकतांत्रिक है। उनका कहना है कि किसी विरोध प्रदर्शन के लिए उसी प्रशासन या संस्थान से मंज़ूरी लेना, जिसके खिलाफ अधिकतर मामलों में विरोध किया जा रहा होता है, विरोध के अधिकार की मूल भावना के ही खिलाफ है।

नेहा कहती हैं कि अधिकांश मामलों में छात्रों की शिकायतें विश्वविद्यालय प्रशासन के खिलाफ ही होती हैं और अक्सर वही प्रशासन छात्रों या नागरिकों के रूप में उनके अधिकारों के हनन का कारण बनता है। ऐसे में उसी प्रशासन से अनुमति मांगना और उन्हें 72 घंटे का नोटिस देना गैरज़रूरी और छात्रों के विरोध के अधिकार के खिलाफ है।

वे आगे सवाल उठाती हैं कि यदि प्रशासन अपने बचाव में छात्रों के असंतोष को दबाने के लिए विरोध प्रदर्शन के नोटिस को अस्वीकार कर दे, तो क्या होगा? क्या यह विरोध को दबाने के लिए प्रशासनिक शक्ति का जानबूझकर दुरुपयोग नहीं होगा?

‘विश्वविद्यालय के मामलों में पुलिस की क्या भूमिका है?’

उन्होंने इस मामले में पुलिस को सूचित करने को भी गैरज़रूरी बताते हुए कहा कि विश्वविद्यालय के मामलों में पुलिस की क्या भूमिका है? उनका कहना है कि छात्रों से किसी कार्यक्रम से पहले विश्वविद्यालय प्रशासन और पुलिस दोनों को अपना विवरण देने के लिए कहना केवल डराने की रणनीति है। इसके ज़रिए राज्य के आदेशों का पालन सुनिश्चित करने की कोशिश की जा रही है, ताकि छात्र विश्वविद्यालय की कमियों के खिलाफ आवाज़ उठाने या राज्य की नीतियों पर सवाल करने से डरें।

वहीं, दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्रा अंजलि का कहना है, “देश का संविधान और यूजीसी दोनों ही हमें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण प्रदर्शन का अधिकार देते हैं। ऐसे में विश्वविद्यालय के प्रॉक्टर के पास यह अधिकार नहीं है कि वे अपनी ओर से इस तरह का कोई नोटिस जारी करें।”

वे आगे कहती हैं कि पिछले एक महीने से यूजीसी इक्विटी रेगुलेशन के मुद्दे पर छात्र लगातार संगठित हो रहे हैं। इस दौरान बड़े प्रदर्शन और मार्च आयोजित हुए, साथ ही ‘समता महाजुटान’ भी हुआ। इसी बीच प्रशासन ने विरोध प्रदर्शनों पर प्रतिबंध लगा दिया। अब जब उस प्रतिबंध की अवधि समाप्त होने वाली है, तो 72 घंटे पहले सूचना देने का यह नया आदेश जारी किया गया है, जिसे हम अस्वीकार करते हैं।

वह आगे कहती हैं कि विश्वविद्यालय प्रशासन पिछले कुछ वर्षों से परिसर में भगवा प्रचार को बढ़ावा दे रहा है। उनके अनुसार, मनोज तिवारी और सुधांशु त्रिवेदी जैसे लोगों को कार्यक्रमों में आमंत्रित किया जाता है और एबीवीपी-आरएसएस की शाखाएं भी लगती हैं, लेकिन उस समय विश्वविद्यालय की अनुमति की अनिवार्यता का सवाल नहीं उठता। उनका आरोप है कि यह कदम केवल प्रगतिशील आवाज़ों को दबाने के लिए उठाया गया है। यह विडंबना है कि छात्रों से उन्हीं लोगों से अनुमति लेने के लिए कहा जा रहा है, जिनके खिलाफ अक्सर आवाज़ उठाई जाती है। उनके मुताबिक, यह छात्रों के लोकतांत्रिक अधिकारों का सीधा उल्लंघन है।

‘लोकतांत्रिक अधिकारों पर हमला’

प्रशासन के इस कदम पर दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर और डेमोक्रेटिक टीचर्स फ्रंट (डीटीएफ) से जुड़े राजीव कुंवर ने कहा कि विश्वविद्यालय का यह आदेश छात्र-छात्राओं के लोकतांत्रिक अधिकारों पर सीधा हमला है।

वे कहते हैं, ‘विश्वविद्यालय नियंत्रण और दमन की जगह नहीं हो सकता। इस तरह के नियमों का उद्देश्य असहमति की आवाज़ को दबाना और छात्रों को संगठित होने से रोकना है।’

वे आगे कहते हैं, “आज जब शिक्षा क्षेत्र में फीस वृद्धि, निजीकरण और अन्य गंभीर मुद्दों को लेकर छात्र आवाज़ उठा रहे हैं, ऐसे समय में इस तरह का प्रतिबंध लगाना न केवल अलोकतांत्रिक है, बल्कि संविधान द्वारा प्रदत्त अभिव्यक्ति और संगठन की स्वतंत्रता के अधिकारों के भी खिलाफ है।”

प्रोफेसर राजीव कुंवर के अनुसार, विश्वविद्यालय प्रशासन को छात्रों के साथ संवाद करना चाहिए, न कि इस तरह के दमनकारी नियम थोपने चाहिए। इस निर्णय को वापस लिया जाना चाहिए और परिसर में लोकतांत्रिक माहौल सुनिश्चित किया जाना चाहिए।

‘तानाशाही आदेश’

क्रांतिकारी युवा संगठन (केवाईएस) ने इस आदेश की कड़ी आलोचना करते हुए इसे छात्रों के विरोध और असहमति के संवैधानिक अधिकारों पर हमला बताया है। संगठन का कहना है कि परिसर में किसी भी सभा या प्रदर्शन के लिए 72 घंटे पहले प्रशासन और पुलिस से अनुमति लेने की अनिवार्यता लोकतांत्रिक अधिकारों को सीमित करने का प्रयास है।

केवाईएस ने अपने बयान में कहा कि यह आदेश शहीद भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु के शहादत दिवस पर जारी किया गया है, जो औपनिवेशिक दौर की दमनकारी नीतियों की याद दिलाता है। संगठन के अनुसार, इस तरह की शर्तें छात्रों की पहलकदमियों और विरोध प्रदर्शनों को रोकने के उद्देश्य से लागू की गई हैं।

संगठन ने यह भी आरोप लगाया कि विश्वविद्यालय प्रशासन पहले भी अलग-अलग कारणों का हवाला देकर विरोध प्रदर्शनों पर रोक लगाता रहा है और अब प्रक्रियात्मक बाधाएं खड़ी कर असहमति की आवाज़ को नियंत्रित करने की कोशिश की जा रही है।

केवाईएस ने इस आदेश को तुरंत वापस लेने, संबंधित अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई करने और प्रशासन से सार्वजनिक माफी की मांग की है। साथ ही, संगठन ने छात्रों से अपील की है कि वे इस फैसले के खिलाफ आवाज़ उठाएं और अपने लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा के लिए एकजुट हों।

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