उत्तर प्रदेश के मिर्ज़ापुर में प्रस्तावित 1600 मेगावाट के कोयला-आधारित ताप विद्युत संयंत्र को लेकर स्थानीय स्तर पर विवाद उभर आया है। कुछ ग्रामीणों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने परियोजना से जुड़े पर्यावरणीय और वन स्वीकृतियों पर सवाल उठाए हैं, जबकि समर्थकों का कहना है कि इससे क्षेत्र में विकास और रोजगार को बढ़ावा मिलेगा। मामला न्यायालय में विचाराधीन है और इसी बीच निर्माण गतिविधियों को लेकर विभिन्न पक्षों की ओर से अलग-अलग दावे किए जा रहे हैं। यह रिपोर्ट इन्हीं मुद्दों और स्थानीय चिंताओं की पड़ताल करती है।

उत्तर प्रदेश के मिर्ज़ापुर में अडानी समूह की कथित 1600 मेगावाट कोयला-आधारित थर्मल पावर परियोजना को लेकर विरोध तेज़ है। स्थानीय ग्रामीणों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं का आरोप है कि परियोजना में पर्यावरणीय नियमों की अनदेखी की जा रही है। आरोप यह भी है कि वन्यजीव अभयारण्य और घने जंगलों के निकट कथित रूप से निर्माण कार्य जारी है। 25 जनवरी 2026 को समूह प्रमुख गौतम अडानी के दौरे के बाद, स्थानीय लोगों के अनुसार, निर्माण गतिविधियों में और तेजी आई है। ग्रामीणों का दावा है कि परियोजना को अमलीजामा पहनाने में सरकार का पूरा समर्थन है।
मामला सुप्रीम कोर्ट से लेकर हाईकोर्ट एवं स्थानीय न्यायालय में चल रहा है। बावजूद इसके इतर जन आवाज़ को दबाने की पुरजोर कोशिशों के बीच अडानी के थर्मल पॉवर प्लांट को परवान चढ़ाने के लिए शासन सत्ता से लेकर स्थानीय जनप्रतिनिधियों की कथित मौन स्वीकृति भी स्थानीय ग्रामीणों किसानों को खल रही है, जिन्हें वन संपदा के नष्ट होने से लेकर जंगल पहाड़, भालू के होने वाले प्रवास की भी चिंता सताए हुए हैं। ऐसे में उजड़ते जंगल, हरे-भरे पेड़ों की दी जा रही कुर्बानी, और भविष्य में इस कोयला आधारित बिजली पावर प्लांट से पड़ने वाले पर्यावरणीय नुकसान से आशंकित ग्रामीणों का बस एक ही सवाल होता है कि, "क्या सरकार हमें उजाड़ कर अडानी को आबाद करना चाहती है?"
फिलहाल इस सवाल का जबाब कोई देने वाला नहीं है, स्थानीय जनप्रतिनिधियों से लगाय शासन-सत्ता की नुमाइंदगी करने वाले लोगों ने मानों जुबां पर ताला जड़ रखा है। अडानी के थर्मल पॉवर प्लांट को लेकर रोजगार के लंबे दावे हैं तो बिजली दर कम होने के सुहाने सपने भी, लेकिन कोई यह नहीं बताने को तैयार है कि विकास के नाम जिस विध्वंस की ओर ले जाया जाएगा उसे रोकने का क्या उपाय होगा?
उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर में अडानी कंपनी के 1600 मेगावाट के कोयला आधारित थर्मल पॉवर प्लांट निर्माण को ऊंचे प्रभाव और शासन सत्ता का संरक्षण होने के नाते कंपनी पर पूरी तरह से कथित मनमानी, पर्यावरणीय नियमों की अनदेखी सहित कई आरोप लगाते हुए आए लोग शुरू से ही कंपनी और इससे जुड़े हुए लोगों को जन आवाम की अनदेखी का भी आरोप लगाते आए हैं। ऐसे में पिछले महीने वन विभाग मड़िहान रेंजर द्वारा जंगल के रास्ते से पावर प्लांट प्रोजेक्ट की तरफ जा रहे वाहनों और मजदूरों के समूह को रोक दिए जाने का दिखावा दिखाने के बाद अब बेधड़क होकर प्रोजेक्ट को गति मिलने से जंगल के रास्ते में हाइवे जैसा मार्ग तैयार किया जा रहा है।

विंध्य पारिस्थितिकी और प्राकृतिक इतिहास फाउंडेशन से जुड़े हुए कार्यकर्ता का कहना है कि, "पिछले दो वर्षों में मिर्ज़ापुर वन प्रभाग ने अडानी पावर के 1600 मेगावाट के कोयला आधारित ताप विद्युत संयंत्र के निर्माण को रोकने के बजाए कथित तौर पर लुकाछिपी का खेल खेलने का कार्य किया है।
कार्यकर्ताओं का कहना है कि पहुंच मार्ग के लिए वन विभाग की मंज़ूरी नहीं मिलने के बाद भी आखिरकार कैसे कंपनी का काम जंगल में होता आया है?"
फाउंडेशन से जुड़े हुए कार्यकर्ता ने बीते महीनों की कुछ तस्वीरें ज़ारी करते हुए 'सबरंग' को बताया है कि तस्वीरें पिछले महीने की हैं जो जंगलों को हुए नुकसान को दर्शाती हैं।

कार्रवाई के नाम पर दिखाया
बता दें कि लगभग दो वर्षों तक, यही विभाग (वन विभाग) आंखें मूंदे पड़ा रहा है, जबकि अडानी की कंपनी मिर्जापुर थर्मल पॉवर प्लांट ने कथित अवैध रूप से वन भूमि पर अतिक्रमण किया, 10 फुट ऊंची कंक्रीट की दीवार (कथित तौर पर लगभग 18 किमी लंबी) का निर्माण किया, जिससे वन क्षेत्र खंडित हो गया, तथा बार-बार शिकायतों और एनजीटी के समक्ष लंबित अवमानना मामले, जिस पर अब सर्वोच्च न्यायालय में सुनवाई हो रही है, के बावजूद बड़े पैमाने पर निर्माण गतिविधियां शुरू कर दीं गई।
विंध्य पारिस्थितिकी और प्राकृतिक इतिहास फाउंडेशन से जुड़े देवादित्यों सिन्हा बताते हैं कि, "यह वहीं जगह है जहां पूर्व में वेलस्पन पावर एनर्जी की 1320 मेगावाट की एक परियोजना को 2016 में एनजीटी ने वनों से जुड़ी गतिविधियों को छिपाने और 'दूषित' ईआईए प्रक्रिया के कारण रद्द कर दिया था, जो एक ऐतिहासिक मामला था। कंपनी की समीक्षा खारिज कर दी गई थी, और बाद में सुप्रीम कोर्ट में उसकी अपील वापस ले ली गई थी। फिर भी, अडानी पावर की नई 1600 मेगावाट की परियोजना को कानून, पारिस्थितिकी और पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के अपने स्थल निर्धारण दिशा-निर्देशों को ताक पर रखकर यहां धकेला जा रहा है जिसे 2019 में वन विभाग द्वारा 'स्लॉथ बियर कंजर्वेशन रिजर्व' के रूप में प्रस्तावित किया गया था, जो कैमरा-ट्रैप साक्ष्य पर आधारित था, जिसमें मैं (देवादित्यो) भी शामिल था।
वह बताते हैं, यह स्थल "कंज़र्वेशन रिज़र्व" घोषित किया था। भारत सरकार के एक प्रमुख संस्थान, भारतीय वन्यजीव संस्थान द्वारा किए गए एक अध्ययन में भी प्रस्तावित परियोजना स्थल के अंदर स्लॉथ बियर सहित कई संरक्षित प्रजातियां पाई गई थीं। इन दोनों रिपोर्टों को ईआईए में दबा दिया गया, ताकि स्थल को वन्यजीव विहीन दिखाया जा सके। शायद यही वजह है कि इतनी ऊंची और लंबी कंक्रीट की दीवार की आवश्यकता थी।" दिलचस्प बात यह है कि ईआईए ने सीमा दीवार के बाहर अनुसूची-I की 22 प्रजातियों की सूचना दी थी।

वन भूमि को झुठलाने तक का उपक्रम
मिर्ज़ापुर के पिछले डीएफओ ने 30 मई 2025 को एक कथित अवैध एनओसी भी जारी की थी, जिसमें झूठा दावा किया गया था कि "इसमें कोई वन भूमि शामिल नहीं है।" उस एक लाइन की मदद से कंपनी को पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय से पर्यावरण मंजूरी मिल गई, जबकि मामला अदालत में विचाराधीन था. रेलवे लाइन, ट्रांसमिशन लाइन और सड़क विस्तार के लिए वन विभाग की भागीदारी को छुपाने वाले एक अधूरे वन मंजूरी आवेदन को भी पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय से 'सैद्धांतिक' मंजूरी मिल गई। इस मामले को सुलझाने के लिए उचित कानूनी उपाय किए गए हैं और उल्लंघन का मामला अभी भी सर्वोच्च न्यायालय में लंबित है। बावजूद इसके कंपनी की हड़बड़ाहट लोगों के समझ से परे है।
वहीं दूसरी ओर इस प्लांट से प्रभावित होने वाले तथा शुरू से ही विरोध जताते हुए आएं ग्रामीण कहते हैं कि, "आज तक, कंपनी द्वारा कुछ अधिकारियों के साथ मिलकर उन्हें काफी नुकसान पहुंचाया गया है, जिन्होंने अपने वैधानिक कर्तव्य का पालन नहीं करने का निर्णय लिया, जिससे जंगल क्षतिग्रस्त हो गए, वन्यजीव विस्थापित हो गए तथा कानून का भी खूब मजाक उड़ाया गया।"
देवादित्यो सिंन्हा कहते हैं, "फिर भी, आशा नहीं मरनी चाहिए, ऐसी लड़ाइयां सच्चाई, साहस, विनम्रता और दृढ़ता के साथ लड़ी जानी चाहिए। यह गांधी का देश है जिन्होंने हमें याद दिलाया था, "जब अवसर पूरा सच बोलने और उसके अनुसार काम करने की मांग करता है, तो मौन कायरता बन जाती है।"

गौरतलब हो कि मिर्जापुर जिले के मड़िहान वन क्षेत्र के ददरी खुर्द में अडानी कंपनी के निर्माणाधीन मिर्जापुर थर्मल पॉवर प्लांट पर जाने के लिए कुनबियामार जंगल के समीप से बने रास्ते को मड़िहान वन रेंज के वन क्षेत्राधिकारी देवेंद्र सिंह नेगी, वन दारोगा राजेंद्र प्रसाद, वन रक्षक संजय ने बीते वर्ष, 03 नवंबर 2025 यह कहते हुए रोक दिया था कि कंपनी को जंगल से जाने का एनओसी नहीं मिला। इससे निर्माणाधीन पावर प्लांट में खलबली मच गई थी और प्लांट में जा रहे श्रमिकों को वापस लौटना पड़ गया था।
मिर्जापुर के मड़िहान वन क्षेत्र के ददरी खुर्द गांव में अडानी कंपनी के पावर प्लांट का निर्माण चल रहा है। जहां जाने के लिए मुख्य सड़क से दो किलोमीटर दूर तक वन विभाग की भूमि है। इसी वन भूमि में बनाए गए रास्ते से श्रमिक, कर्मचारी व इंजीनियर सहित बड़े छोटे वाहनों का आवागमन हो रहा है।
इससे पहले प्लांट पर लगने की लिए बड़ी मशीनें सहित अन्य उपकरण आएं थें जिन्हें वन क्षेत्राधिकारी ने अंदर जाने से रोक दिया था। इसके चलते इन्हें बाहर ही डंप किया गया। जिन्हें मिर्जापुर-सोनभद्र मुख्य मार्ग पर लबे रोड देखा जा सकता है।
वन क्षेत्राधिकारी मड़िहान देवेंद्र सिंह नेगी ने तब कहा था कि "कुनबियामार मार्ग से अडानी कंपनी के पावर प्लांट तक जाने के लिए अभी तक वन विभाग से कोई एनओसी प्रदान नहीं गई है, बावजूद इसके पावर प्लांट के लोग बिना रोक-टोक के जंगल के रास्ते आ-जा रहे हैं। उन्होंने बताया है कि वहां पर हरे पेड़ों को भी काटा जा रहा है, इसीलिए इनके आवागमन पर रोक लगाई गई है। उन्होंने बताया कि पावर प्लांट के लोग बाउंड्री के अंदर हरे-भरे पेड़ों को काटकर जंगल को क्षति पहुंचा रहे हैं। इससे वन्य जीवों पर भी खतरा मंडराने लगा है। दूसरी ओर जब इस संबंध में कंपनी के प्रोजेक्ट मैनेजर दिनेश कुमार से कंपनी की ओर से उनका पक्ष जानने के लिए ज़रिए उनके मोबाइल फोन पर संपर्क किया गया, लेकिन उनका फोन रिसीव नहीं हो सका।

पहले से ही उठते रहे हैं वन स्वीकृति पर सवाल
उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जनपद में अडानी कंपनी के प्रस्तावित थर्मल पावर प्रोजेक्ट को लेकर बड़ा विवाद पहले से ही खड़ा होता आया है, जब कंपनी पर 11 अप्रैल 2025 को गुपचुप तरीके से कथित जनसुनवाई का आरोप लगाया गया था। प्रभावित किसानों ग्रामीणों ने सवाल उठाया था कि बिना उन्हें अवगत कराएं गुपचुप तरीके से वह भी भाड़े की बाहरी लोगों की भीड़ बुलाकर जनसुनवाई कर ली गई थी जिसको लेकर विरोध के स्वर तेज़ हो गये थे। प्रभावित किसानों, ग्रामीणों ने सवाल दागा था कि "आखिरकार ऐसी कौन सी हड़बड़ी रही कि जन सुनवाई में न तो उन लोगों को बुलाया गया जो उस गांव क्षेत्र और आस-पास के थें जहां कंपनी को स्थापित किया जाना है, दूसरे जिन लोगों को बुलाया गया था वह बाहरी रहें यहां तक कि जिस विधानसभा क्षेत्र और तहसील क्षेत्र में यह एरिया आता है उनकी मौजूदगी की जगह दूसरे जनप्रतिनिधियों का होना पूरी तरह तरह से सुनियोजित का हिस्सा प्रतीत होता है।
किसान रामाज्ञा सिंह बताते हैं कि "कंपनी (Adani) ने 16 अक्टूबर 2025 से परियोजना स्थल पर कार्य शुरू कर दिया है, जबकि अब तक परियोजना को Stage-II (Final) Forest Clearance प्राप्त नहीं हुई है और न ही किसी सक्षम प्राधिकारी या न्यायालय से वैध आदेश जारी हुआ है। इस परियोजना को 23 सितंबर 2025 को पर्यावरण स्वीकृति (Environmental Clearance – EC) दी गई थी, जिसमें स्पष्ट लिखा है कि यह अनुमति “subject to forest clearance” एवं “subject to order of Hon’ble Supreme Court” है। इसके बावजूद कार्य प्रारंभ किए जाने को लेकर प्रशासनिक एवं पर्यावरणीय नियमों की अनदेखी के आरोप लग रहे हैं।

आरटीआई से उठे सवाल
इस पूरे मामले में जिलाधिकारी मिर्जापुर को संबोधित एक सूचना का अधिकार (RTI) आवेदन दाखिल किया गया है, जिसमें पूछा गया कि, किसके आदेश या अनुमति से कार्य शुरू हुआ? जब कोई वैध आदेश नहीं है, तो कार्य रोका क्यों नहीं गया? क्या यह कार्य किसी दबाव या प्रभाव में प्रारंभ किया गया? क्या परियोजना को Stage-II वन स्वीकृति मिली है? यदि नहीं, तो कार्य क्यों शुरू किया गया?
आवेदन में सभी संबंधित आदेशों, पत्राचार और अनुमति पत्रों की प्रतियां मांगी गई हैं। आवेदक ने यह भी कहा है कि पर्यावरण स्वीकृति (EC) में रेलवे लाइन का कोई उल्लेख नहीं है, जबकि यह परियोजना रेल संपर्क के बिना संभव नहीं। प्रस्तावित रेल मार्ग वन क्षेत्र से होकर गुजरता है, जिससे पर्यावरण पर गंभीर असर पड़ सकता है। ऐसे में परियोजना को टुकड़ों में मंजूरी देना नियमों का उल्लंघन माना जा रहा है।
स्थानीय जलस्रोत पर खतरा
परियोजना स्थल के पास स्थित ऊपरी खजुरी जलस्रोत से ग्रामीणों और काशी हिन्दू विश्वविद्यालय बीएचयू के राजीव गांधी दक्षिणी परिसर (BHU South Campus) को पानी मिलता है। विशेषज्ञों का कहना है कि थर्मल पावर प्रोजेक्ट शुरू होने से इस जलस्रोत का प्रदूषण बढ़ेगा और स्थानीय मछलियों की प्रजाति नष्ट होने का खतरा है। इससे ग्रामीणों की सिंचाई और जीविकोपार्जन पर भी असर पड़ेगा।
DFO की भूमिका संदिग्ध
वहीं सूत्रों की मानें तो संबंधित वन अधिकारी (Dfo mirzapur) पर अडानी कंपनी को स्वीकृति दिलाने में सहयोग करने के भी आरोप हैं। बताया जा रहा है कि स्वीकृति प्रक्रिया के बाद एक अधिकारी का पदोन्नति होना पूरे मामले को और संदेहास्पद बनाता है। इस संबंध में कुछ स्थानीय संगठनों ने जांच और कार्रवाई की मांग की है कि,
"परियोजना की पर्यावरणीय स्वीकृति की पुनः समीक्षा कराई जाए, रेल कॉरिडोर और जलस्रोतों पर प्रभाव का स्वतंत्र अध्ययन कराया जाए तथा जब तक समीक्षा पूरी न हो, परियोजना के सभी कार्य रोके जाएं। स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि यह मामला न केवल पर्यावरणीय संतुलन से जुड़ा हुआ है बल्कि हरे-भरे पेड़ों, वन्य प्राणियों के संरक्षण और सम्पूर्ण मानव जीवन से लेकर निकट भविष्य में उत्पन्न होने वाले संकटों से जुड़ा हुआ है।

मिर्ज़ापुर में अडानी कंपनी के थर्मल पावर प्लांट को लेकर लोगों की प्रतिक्रिया:----
एडवोकेट आयुष सिंह कहते हैं, "मिर्ज़ापुर का जंगल बर्बाद हो गया आम लोगों को रास्ता चाहिए होता है तो कभी नहीं मिलता, लेकिन अदानी वालों ने पूरे जंगल के बीचों बीच सड़क बना डाली है कोई बोलने वाला नहीं है। मनमानी है हजारों एकड़ में लगे हुए पेड़-पौधे सब ख़त्म कर दिए गए। पर्यावरण को ताक पर रख करके अदानी का यह प्रोजेक्ट मंजूर किया गया है।"
विकास सिंह इससे होने वाले पर्यावरणीय प्रभावों की चर्चा करते हुए कहते हैं, "थर्मल पावर प्लांट के आस-पास रहने वाले लोगों पर हवा, पानी और मिट्टी प्रदूषण का बुरा असर पड़ता है। प्लांट से निकलने वाला धुआं PM2.5/PM10, SO2,NOx और फ्लाई ऐश सांस की बीमारियां,अस्थमा,खांसी, आंखों में जलन और एलर्जी बढ़ाते हैं। लंबे समय में हृदय व फेफड़ों की समस्या हो सकती है। फ्लाई ऐश घरों व खेतों पर जमकर फसल की गुणवत्ता और उत्पादन घटाती है। प्लांट का दूषित/गर्म पानी पीने योग्य पानी को खराब कर सकता है। जिससे पेट व त्वचा रोग होते हैं। शोर व ट्रैफिक से तनाव और नींद की समस्या भी बढ़ती है।"
वहीं सूरज बहादुर सिंह बोलते हैं, "विकास की आड़ में किसानों, हरे भरे पेड़ों जंगलों, वन्य प्राणियों का दमन? मिर्ज़ापुर की धरती पर एक तरफ़ थर्मल पावर प्लांट के निर्माण के निर्माण का काम शुरू किया गया है तो वहीं दूसरी ओर उन किसानों का दर्द है जिनकी जमीनें और आजीविका दांव पर लगी है।
वह कहते हैं 25 जनवरी को गौतम अडानी के मिर्ज़ापुर थर्मल पावर प्लांट के निरीक्षण, दौरे के दौरान किसानों को अपनी बात रखने या उनसे मिलने तक की अनुमति नहीं दी गई, वह सवाल करते हैं कि क्या लोकतंत्र में अपनी ही जमीन के लिए सवाल पूछना गुनाह है? आरोप लगाया कि किसानों पर फर्जी केस दर्ज कर उन्हें डराया धमकाया जा रहा है ताकि वे अपनी जमीन छोड़ने पर मजबूर हो सकें।
बोलते हैं विकास के नाम पर किसानों की सहमति के बिना बलपूर्वक जमीन लेना उनके संवैधानिक अधिकारों का उलंघन है। क्योंकि
"जमीन सिर्फ मिट्टी नहीं, किसानों का सम्मान और उसकी आने वाली पीढ़ियों का भविष्य होती हैं, जब तक संवाद की जगह दमन होगा, तब तक न्याय की उम्मीद अधूरी है।"

जल संकट को लेकर जताई गई आशंका
अदानी समूह द्वारा अपर खजूरी से अदानी के थर्मल पावर प्लांट के लिए पानी ले जाने के प्रस्ताव का भी ग्रामीणों ने विरोध शुरू कर दिया है। जय जवान जय किसान जागरण मंच के अध्यक्ष शारदा प्रसाद मिश्रा लाला एवं पूर्व उपाध्यक्ष जिला कांग्रेस कमेटी ने आने वाले दिनों में उत्पन्न होने वाले जल संकट पर अपना विरोध दर्ज कराया है।
बताते चलें कि, अडानी ग्रुप की सहायक कंपनी मिर्ज़ापुर थर्मल एनर्जी (यूपी) प्राइवेट लिमिटेड, मिर्ज़ापुर के ग्राम ददरी खुर्द, मड़िहान वन रेंज में 2×800 मेगावाट कोयला आधारित अल्ट्रासुपर क्रिटिकल थर्मल पावर प्लांट (टीपीपी) विद्युत उत्पादन के लिए प्रस्तावित है, 1600 मेगावाट क्षमता के प्रस्तावित विद्युत प्लांट के लिए तकरीबन 365.19 हेक्टेयर भूमि की आवश्यकता है।जिसमें से 364.57 हेक्टेयर गैर वन भूमि है और 0.62 हेक्टेयर संयंत्र सीमा के अंदर वन भूमि है। निर्माण के बाद जब यह पावर प्लांट शुरू होगा तब यहां बिजली बनाने के लिए संयंत्र को 36 एमसीएम मिलियन क्यूबिक मीटर (Million Cubic Meters) पानी यानि कि 360 करोड़ लीटर पानी की आवश्यकता होगी। जिसकी आपूर्ति गंगा नदी से की जाएगी। यहं से पानी निकाल कर अपर खजुरी जलाशय में ले जाया जाएगा। इसके बाद अपर खजुरी जलाशय से पानी निकाल कर ददरी स्थित पावर प्लांट पर ले जाकर विद्युत उत्पादन के उपयोग में लिया जाएगा, ऐसे में निकट भविष्य में उत्पन्न होने वाले भारी जल संकट को लेकर भी लोगों का आशंकित होना लाजिमी है।
ग्रामीणों से घबराया रहा अडानी का कुनबा
मिर्जापुर में 25 जनवरी 2026 को गौतम अदानी के मड़िहान में साइट विज़िट के दौरान
ददरी खुर्द व आसपास के ग्रामीणों ने जोरदार विरोध दर्ज कराया। ग्रामीणों ने कहा, 'यह विरोध पर्यावरण, जंगल, जमीन और भविष्य की पीढ़ियों की रक्षा के लिए किया गया।
ग्रामीणों ने साफ कहा
“हम विकास के विरोधी नहीं, विनाश के विरोधी हैं।”
ग्रामीण अडानी से मिलकर शांतपूर्ण ढ़ंग से अपनी समस्या को रखना चाहते थे लेकिन भारी पुलिस फोर्स के बल पर किसानों ग्रामीणों को गौतम अडानी के पास फटकने तक नहीं दिया गया और ना ही अडानी ने किसानों से मिलकर उनकी समस्या को सुनकर उसे सुलझाना मुनासिब समझा। इस बात को लेकर किसानों में तीखी प्रतिक्रिया रही। मौके पर ग्रामीणों के समर्थन में उतरे भारतीय किसान यूनियन (लोकशक्ति) के कार्यकर्ता ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि "उनकी मांगों पर विचार नहीं हुआ तो वह जिला मुख्यालय से होते हुए ज़रुरत पड़ने पर राजधानी लखनऊ कूंच कर पूरे प्रदेश भर से किसान यूनियन के लोगों का जुटान करने से भी पीछे नहीं हटेंगे।"
किसान नेताओं ने गंभीर आरोप लगाते हुए सबरंग को बताया कि, "कुंनबिया मार्ग, जो एक वन मार्ग (Forest Route) है, उस पर अवैध तरीके से कब्ज़ा कर परियोजना का रास्ता बनाया जा रहा है। इसके बावजूद प्रशासन द्वारा कोई ठोस हस्तक्षेप नहीं किया जा रहा। उल्टा, ऐसा प्रतीत हो रहा है कि प्रशासनिक तंत्र अदानी प्रोजेक्ट को सहयोग दे रहा है।"

ग्रामीणों का कहना है कि, "वन विभाग (DFO) सहित ज़िम्मेदार अधिकारी मूकदर्शक बने हुए हैं, जंगल, पर्यावरण और कानून को ताक पर रखकर काम आगे बढ़ाया जा रहा है।"
दूसरी ओर मिर्जापुर बचाओ संघर्ष समिति ने स्पष्ट किया है कि, जब तक यह पर्यावरण-विरोधी पावर प्लांट रद्द नहीं होता, तब तक आंदोलन शांतिपूर्ण लेकिन लगातार जारी रहेगा।
ग्रामीणों ने यह भी कहा कि 11 अप्रैल 2025 को आयोजित जनसुनवाई पक्षपातपूर्ण रही, प्रभावित लोगों की आपत्तियों को ठीक से दर्ज नहीं किया गया और इसके बावजूद परियोजना को पर्यावरणीय अनुशंसा (EC) दे दी गई, जबकि मामला उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय में लंबित है।
प्रभावित लोगों ने मांग की है कि, "ग्राम सभा की वास्तविक सहमति, पर्यावरण व स्वास्थ्य पर स्वतंत्र जांच, और सभी गतिविधियों पर तत्काल रोक लगाई जाए। समिति ने चेतावनी दी कि मांगें नहीं मानी गईं तो आंदोलन को और व्यापक किया जाएगा।
(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं। उनसे mzp.newssdgiri@gmail.com के माध्यम से संपर्क किया जा सकता है।)

उत्तर प्रदेश के मिर्ज़ापुर में अडानी समूह की कथित 1600 मेगावाट कोयला-आधारित थर्मल पावर परियोजना को लेकर विरोध तेज़ है। स्थानीय ग्रामीणों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं का आरोप है कि परियोजना में पर्यावरणीय नियमों की अनदेखी की जा रही है। आरोप यह भी है कि वन्यजीव अभयारण्य और घने जंगलों के निकट कथित रूप से निर्माण कार्य जारी है। 25 जनवरी 2026 को समूह प्रमुख गौतम अडानी के दौरे के बाद, स्थानीय लोगों के अनुसार, निर्माण गतिविधियों में और तेजी आई है। ग्रामीणों का दावा है कि परियोजना को अमलीजामा पहनाने में सरकार का पूरा समर्थन है।
मामला सुप्रीम कोर्ट से लेकर हाईकोर्ट एवं स्थानीय न्यायालय में चल रहा है। बावजूद इसके इतर जन आवाज़ को दबाने की पुरजोर कोशिशों के बीच अडानी के थर्मल पॉवर प्लांट को परवान चढ़ाने के लिए शासन सत्ता से लेकर स्थानीय जनप्रतिनिधियों की कथित मौन स्वीकृति भी स्थानीय ग्रामीणों किसानों को खल रही है, जिन्हें वन संपदा के नष्ट होने से लेकर जंगल पहाड़, भालू के होने वाले प्रवास की भी चिंता सताए हुए हैं। ऐसे में उजड़ते जंगल, हरे-भरे पेड़ों की दी जा रही कुर्बानी, और भविष्य में इस कोयला आधारित बिजली पावर प्लांट से पड़ने वाले पर्यावरणीय नुकसान से आशंकित ग्रामीणों का बस एक ही सवाल होता है कि, "क्या सरकार हमें उजाड़ कर अडानी को आबाद करना चाहती है?"
फिलहाल इस सवाल का जबाब कोई देने वाला नहीं है, स्थानीय जनप्रतिनिधियों से लगाय शासन-सत्ता की नुमाइंदगी करने वाले लोगों ने मानों जुबां पर ताला जड़ रखा है। अडानी के थर्मल पॉवर प्लांट को लेकर रोजगार के लंबे दावे हैं तो बिजली दर कम होने के सुहाने सपने भी, लेकिन कोई यह नहीं बताने को तैयार है कि विकास के नाम जिस विध्वंस की ओर ले जाया जाएगा उसे रोकने का क्या उपाय होगा?
उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर में अडानी कंपनी के 1600 मेगावाट के कोयला आधारित थर्मल पॉवर प्लांट निर्माण को ऊंचे प्रभाव और शासन सत्ता का संरक्षण होने के नाते कंपनी पर पूरी तरह से कथित मनमानी, पर्यावरणीय नियमों की अनदेखी सहित कई आरोप लगाते हुए आए लोग शुरू से ही कंपनी और इससे जुड़े हुए लोगों को जन आवाम की अनदेखी का भी आरोप लगाते आए हैं। ऐसे में पिछले महीने वन विभाग मड़िहान रेंजर द्वारा जंगल के रास्ते से पावर प्लांट प्रोजेक्ट की तरफ जा रहे वाहनों और मजदूरों के समूह को रोक दिए जाने का दिखावा दिखाने के बाद अब बेधड़क होकर प्रोजेक्ट को गति मिलने से जंगल के रास्ते में हाइवे जैसा मार्ग तैयार किया जा रहा है।

विंध्य पारिस्थितिकी और प्राकृतिक इतिहास फाउंडेशन से जुड़े हुए कार्यकर्ता का कहना है कि, "पिछले दो वर्षों में मिर्ज़ापुर वन प्रभाग ने अडानी पावर के 1600 मेगावाट के कोयला आधारित ताप विद्युत संयंत्र के निर्माण को रोकने के बजाए कथित तौर पर लुकाछिपी का खेल खेलने का कार्य किया है।
कार्यकर्ताओं का कहना है कि पहुंच मार्ग के लिए वन विभाग की मंज़ूरी नहीं मिलने के बाद भी आखिरकार कैसे कंपनी का काम जंगल में होता आया है?"
फाउंडेशन से जुड़े हुए कार्यकर्ता ने बीते महीनों की कुछ तस्वीरें ज़ारी करते हुए 'सबरंग' को बताया है कि तस्वीरें पिछले महीने की हैं जो जंगलों को हुए नुकसान को दर्शाती हैं।

कार्रवाई के नाम पर दिखाया
बता दें कि लगभग दो वर्षों तक, यही विभाग (वन विभाग) आंखें मूंदे पड़ा रहा है, जबकि अडानी की कंपनी मिर्जापुर थर्मल पॉवर प्लांट ने कथित अवैध रूप से वन भूमि पर अतिक्रमण किया, 10 फुट ऊंची कंक्रीट की दीवार (कथित तौर पर लगभग 18 किमी लंबी) का निर्माण किया, जिससे वन क्षेत्र खंडित हो गया, तथा बार-बार शिकायतों और एनजीटी के समक्ष लंबित अवमानना मामले, जिस पर अब सर्वोच्च न्यायालय में सुनवाई हो रही है, के बावजूद बड़े पैमाने पर निर्माण गतिविधियां शुरू कर दीं गई।
विंध्य पारिस्थितिकी और प्राकृतिक इतिहास फाउंडेशन से जुड़े देवादित्यों सिन्हा बताते हैं कि, "यह वहीं जगह है जहां पूर्व में वेलस्पन पावर एनर्जी की 1320 मेगावाट की एक परियोजना को 2016 में एनजीटी ने वनों से जुड़ी गतिविधियों को छिपाने और 'दूषित' ईआईए प्रक्रिया के कारण रद्द कर दिया था, जो एक ऐतिहासिक मामला था। कंपनी की समीक्षा खारिज कर दी गई थी, और बाद में सुप्रीम कोर्ट में उसकी अपील वापस ले ली गई थी। फिर भी, अडानी पावर की नई 1600 मेगावाट की परियोजना को कानून, पारिस्थितिकी और पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के अपने स्थल निर्धारण दिशा-निर्देशों को ताक पर रखकर यहां धकेला जा रहा है जिसे 2019 में वन विभाग द्वारा 'स्लॉथ बियर कंजर्वेशन रिजर्व' के रूप में प्रस्तावित किया गया था, जो कैमरा-ट्रैप साक्ष्य पर आधारित था, जिसमें मैं (देवादित्यो) भी शामिल था।
वह बताते हैं, यह स्थल "कंज़र्वेशन रिज़र्व" घोषित किया था। भारत सरकार के एक प्रमुख संस्थान, भारतीय वन्यजीव संस्थान द्वारा किए गए एक अध्ययन में भी प्रस्तावित परियोजना स्थल के अंदर स्लॉथ बियर सहित कई संरक्षित प्रजातियां पाई गई थीं। इन दोनों रिपोर्टों को ईआईए में दबा दिया गया, ताकि स्थल को वन्यजीव विहीन दिखाया जा सके। शायद यही वजह है कि इतनी ऊंची और लंबी कंक्रीट की दीवार की आवश्यकता थी।" दिलचस्प बात यह है कि ईआईए ने सीमा दीवार के बाहर अनुसूची-I की 22 प्रजातियों की सूचना दी थी।

वन भूमि को झुठलाने तक का उपक्रम
मिर्ज़ापुर के पिछले डीएफओ ने 30 मई 2025 को एक कथित अवैध एनओसी भी जारी की थी, जिसमें झूठा दावा किया गया था कि "इसमें कोई वन भूमि शामिल नहीं है।" उस एक लाइन की मदद से कंपनी को पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय से पर्यावरण मंजूरी मिल गई, जबकि मामला अदालत में विचाराधीन था. रेलवे लाइन, ट्रांसमिशन लाइन और सड़क विस्तार के लिए वन विभाग की भागीदारी को छुपाने वाले एक अधूरे वन मंजूरी आवेदन को भी पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय से 'सैद्धांतिक' मंजूरी मिल गई। इस मामले को सुलझाने के लिए उचित कानूनी उपाय किए गए हैं और उल्लंघन का मामला अभी भी सर्वोच्च न्यायालय में लंबित है। बावजूद इसके कंपनी की हड़बड़ाहट लोगों के समझ से परे है।
वहीं दूसरी ओर इस प्लांट से प्रभावित होने वाले तथा शुरू से ही विरोध जताते हुए आएं ग्रामीण कहते हैं कि, "आज तक, कंपनी द्वारा कुछ अधिकारियों के साथ मिलकर उन्हें काफी नुकसान पहुंचाया गया है, जिन्होंने अपने वैधानिक कर्तव्य का पालन नहीं करने का निर्णय लिया, जिससे जंगल क्षतिग्रस्त हो गए, वन्यजीव विस्थापित हो गए तथा कानून का भी खूब मजाक उड़ाया गया।"
देवादित्यो सिंन्हा कहते हैं, "फिर भी, आशा नहीं मरनी चाहिए, ऐसी लड़ाइयां सच्चाई, साहस, विनम्रता और दृढ़ता के साथ लड़ी जानी चाहिए। यह गांधी का देश है जिन्होंने हमें याद दिलाया था, "जब अवसर पूरा सच बोलने और उसके अनुसार काम करने की मांग करता है, तो मौन कायरता बन जाती है।"

गौरतलब हो कि मिर्जापुर जिले के मड़िहान वन क्षेत्र के ददरी खुर्द में अडानी कंपनी के निर्माणाधीन मिर्जापुर थर्मल पॉवर प्लांट पर जाने के लिए कुनबियामार जंगल के समीप से बने रास्ते को मड़िहान वन रेंज के वन क्षेत्राधिकारी देवेंद्र सिंह नेगी, वन दारोगा राजेंद्र प्रसाद, वन रक्षक संजय ने बीते वर्ष, 03 नवंबर 2025 यह कहते हुए रोक दिया था कि कंपनी को जंगल से जाने का एनओसी नहीं मिला। इससे निर्माणाधीन पावर प्लांट में खलबली मच गई थी और प्लांट में जा रहे श्रमिकों को वापस लौटना पड़ गया था।
मिर्जापुर के मड़िहान वन क्षेत्र के ददरी खुर्द गांव में अडानी कंपनी के पावर प्लांट का निर्माण चल रहा है। जहां जाने के लिए मुख्य सड़क से दो किलोमीटर दूर तक वन विभाग की भूमि है। इसी वन भूमि में बनाए गए रास्ते से श्रमिक, कर्मचारी व इंजीनियर सहित बड़े छोटे वाहनों का आवागमन हो रहा है।
इससे पहले प्लांट पर लगने की लिए बड़ी मशीनें सहित अन्य उपकरण आएं थें जिन्हें वन क्षेत्राधिकारी ने अंदर जाने से रोक दिया था। इसके चलते इन्हें बाहर ही डंप किया गया। जिन्हें मिर्जापुर-सोनभद्र मुख्य मार्ग पर लबे रोड देखा जा सकता है।
वन क्षेत्राधिकारी मड़िहान देवेंद्र सिंह नेगी ने तब कहा था कि "कुनबियामार मार्ग से अडानी कंपनी के पावर प्लांट तक जाने के लिए अभी तक वन विभाग से कोई एनओसी प्रदान नहीं गई है, बावजूद इसके पावर प्लांट के लोग बिना रोक-टोक के जंगल के रास्ते आ-जा रहे हैं। उन्होंने बताया है कि वहां पर हरे पेड़ों को भी काटा जा रहा है, इसीलिए इनके आवागमन पर रोक लगाई गई है। उन्होंने बताया कि पावर प्लांट के लोग बाउंड्री के अंदर हरे-भरे पेड़ों को काटकर जंगल को क्षति पहुंचा रहे हैं। इससे वन्य जीवों पर भी खतरा मंडराने लगा है। दूसरी ओर जब इस संबंध में कंपनी के प्रोजेक्ट मैनेजर दिनेश कुमार से कंपनी की ओर से उनका पक्ष जानने के लिए ज़रिए उनके मोबाइल फोन पर संपर्क किया गया, लेकिन उनका फोन रिसीव नहीं हो सका।

पहले से ही उठते रहे हैं वन स्वीकृति पर सवाल
उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जनपद में अडानी कंपनी के प्रस्तावित थर्मल पावर प्रोजेक्ट को लेकर बड़ा विवाद पहले से ही खड़ा होता आया है, जब कंपनी पर 11 अप्रैल 2025 को गुपचुप तरीके से कथित जनसुनवाई का आरोप लगाया गया था। प्रभावित किसानों ग्रामीणों ने सवाल उठाया था कि बिना उन्हें अवगत कराएं गुपचुप तरीके से वह भी भाड़े की बाहरी लोगों की भीड़ बुलाकर जनसुनवाई कर ली गई थी जिसको लेकर विरोध के स्वर तेज़ हो गये थे। प्रभावित किसानों, ग्रामीणों ने सवाल दागा था कि "आखिरकार ऐसी कौन सी हड़बड़ी रही कि जन सुनवाई में न तो उन लोगों को बुलाया गया जो उस गांव क्षेत्र और आस-पास के थें जहां कंपनी को स्थापित किया जाना है, दूसरे जिन लोगों को बुलाया गया था वह बाहरी रहें यहां तक कि जिस विधानसभा क्षेत्र और तहसील क्षेत्र में यह एरिया आता है उनकी मौजूदगी की जगह दूसरे जनप्रतिनिधियों का होना पूरी तरह तरह से सुनियोजित का हिस्सा प्रतीत होता है।
किसान रामाज्ञा सिंह बताते हैं कि "कंपनी (Adani) ने 16 अक्टूबर 2025 से परियोजना स्थल पर कार्य शुरू कर दिया है, जबकि अब तक परियोजना को Stage-II (Final) Forest Clearance प्राप्त नहीं हुई है और न ही किसी सक्षम प्राधिकारी या न्यायालय से वैध आदेश जारी हुआ है। इस परियोजना को 23 सितंबर 2025 को पर्यावरण स्वीकृति (Environmental Clearance – EC) दी गई थी, जिसमें स्पष्ट लिखा है कि यह अनुमति “subject to forest clearance” एवं “subject to order of Hon’ble Supreme Court” है। इसके बावजूद कार्य प्रारंभ किए जाने को लेकर प्रशासनिक एवं पर्यावरणीय नियमों की अनदेखी के आरोप लग रहे हैं।

आरटीआई से उठे सवाल
इस पूरे मामले में जिलाधिकारी मिर्जापुर को संबोधित एक सूचना का अधिकार (RTI) आवेदन दाखिल किया गया है, जिसमें पूछा गया कि, किसके आदेश या अनुमति से कार्य शुरू हुआ? जब कोई वैध आदेश नहीं है, तो कार्य रोका क्यों नहीं गया? क्या यह कार्य किसी दबाव या प्रभाव में प्रारंभ किया गया? क्या परियोजना को Stage-II वन स्वीकृति मिली है? यदि नहीं, तो कार्य क्यों शुरू किया गया?
आवेदन में सभी संबंधित आदेशों, पत्राचार और अनुमति पत्रों की प्रतियां मांगी गई हैं। आवेदक ने यह भी कहा है कि पर्यावरण स्वीकृति (EC) में रेलवे लाइन का कोई उल्लेख नहीं है, जबकि यह परियोजना रेल संपर्क के बिना संभव नहीं। प्रस्तावित रेल मार्ग वन क्षेत्र से होकर गुजरता है, जिससे पर्यावरण पर गंभीर असर पड़ सकता है। ऐसे में परियोजना को टुकड़ों में मंजूरी देना नियमों का उल्लंघन माना जा रहा है।
स्थानीय जलस्रोत पर खतरा
परियोजना स्थल के पास स्थित ऊपरी खजुरी जलस्रोत से ग्रामीणों और काशी हिन्दू विश्वविद्यालय बीएचयू के राजीव गांधी दक्षिणी परिसर (BHU South Campus) को पानी मिलता है। विशेषज्ञों का कहना है कि थर्मल पावर प्रोजेक्ट शुरू होने से इस जलस्रोत का प्रदूषण बढ़ेगा और स्थानीय मछलियों की प्रजाति नष्ट होने का खतरा है। इससे ग्रामीणों की सिंचाई और जीविकोपार्जन पर भी असर पड़ेगा।
DFO की भूमिका संदिग्ध
वहीं सूत्रों की मानें तो संबंधित वन अधिकारी (Dfo mirzapur) पर अडानी कंपनी को स्वीकृति दिलाने में सहयोग करने के भी आरोप हैं। बताया जा रहा है कि स्वीकृति प्रक्रिया के बाद एक अधिकारी का पदोन्नति होना पूरे मामले को और संदेहास्पद बनाता है। इस संबंध में कुछ स्थानीय संगठनों ने जांच और कार्रवाई की मांग की है कि,
"परियोजना की पर्यावरणीय स्वीकृति की पुनः समीक्षा कराई जाए, रेल कॉरिडोर और जलस्रोतों पर प्रभाव का स्वतंत्र अध्ययन कराया जाए तथा जब तक समीक्षा पूरी न हो, परियोजना के सभी कार्य रोके जाएं। स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि यह मामला न केवल पर्यावरणीय संतुलन से जुड़ा हुआ है बल्कि हरे-भरे पेड़ों, वन्य प्राणियों के संरक्षण और सम्पूर्ण मानव जीवन से लेकर निकट भविष्य में उत्पन्न होने वाले संकटों से जुड़ा हुआ है।

मिर्ज़ापुर में अडानी कंपनी के थर्मल पावर प्लांट को लेकर लोगों की प्रतिक्रिया:----
एडवोकेट आयुष सिंह कहते हैं, "मिर्ज़ापुर का जंगल बर्बाद हो गया आम लोगों को रास्ता चाहिए होता है तो कभी नहीं मिलता, लेकिन अदानी वालों ने पूरे जंगल के बीचों बीच सड़क बना डाली है कोई बोलने वाला नहीं है। मनमानी है हजारों एकड़ में लगे हुए पेड़-पौधे सब ख़त्म कर दिए गए। पर्यावरण को ताक पर रख करके अदानी का यह प्रोजेक्ट मंजूर किया गया है।"
विकास सिंह इससे होने वाले पर्यावरणीय प्रभावों की चर्चा करते हुए कहते हैं, "थर्मल पावर प्लांट के आस-पास रहने वाले लोगों पर हवा, पानी और मिट्टी प्रदूषण का बुरा असर पड़ता है। प्लांट से निकलने वाला धुआं PM2.5/PM10, SO2,NOx और फ्लाई ऐश सांस की बीमारियां,अस्थमा,खांसी, आंखों में जलन और एलर्जी बढ़ाते हैं। लंबे समय में हृदय व फेफड़ों की समस्या हो सकती है। फ्लाई ऐश घरों व खेतों पर जमकर फसल की गुणवत्ता और उत्पादन घटाती है। प्लांट का दूषित/गर्म पानी पीने योग्य पानी को खराब कर सकता है। जिससे पेट व त्वचा रोग होते हैं। शोर व ट्रैफिक से तनाव और नींद की समस्या भी बढ़ती है।"
वहीं सूरज बहादुर सिंह बोलते हैं, "विकास की आड़ में किसानों, हरे भरे पेड़ों जंगलों, वन्य प्राणियों का दमन? मिर्ज़ापुर की धरती पर एक तरफ़ थर्मल पावर प्लांट के निर्माण के निर्माण का काम शुरू किया गया है तो वहीं दूसरी ओर उन किसानों का दर्द है जिनकी जमीनें और आजीविका दांव पर लगी है।
वह कहते हैं 25 जनवरी को गौतम अडानी के मिर्ज़ापुर थर्मल पावर प्लांट के निरीक्षण, दौरे के दौरान किसानों को अपनी बात रखने या उनसे मिलने तक की अनुमति नहीं दी गई, वह सवाल करते हैं कि क्या लोकतंत्र में अपनी ही जमीन के लिए सवाल पूछना गुनाह है? आरोप लगाया कि किसानों पर फर्जी केस दर्ज कर उन्हें डराया धमकाया जा रहा है ताकि वे अपनी जमीन छोड़ने पर मजबूर हो सकें।
बोलते हैं विकास के नाम पर किसानों की सहमति के बिना बलपूर्वक जमीन लेना उनके संवैधानिक अधिकारों का उलंघन है। क्योंकि
"जमीन सिर्फ मिट्टी नहीं, किसानों का सम्मान और उसकी आने वाली पीढ़ियों का भविष्य होती हैं, जब तक संवाद की जगह दमन होगा, तब तक न्याय की उम्मीद अधूरी है।"

जल संकट को लेकर जताई गई आशंका
अदानी समूह द्वारा अपर खजूरी से अदानी के थर्मल पावर प्लांट के लिए पानी ले जाने के प्रस्ताव का भी ग्रामीणों ने विरोध शुरू कर दिया है। जय जवान जय किसान जागरण मंच के अध्यक्ष शारदा प्रसाद मिश्रा लाला एवं पूर्व उपाध्यक्ष जिला कांग्रेस कमेटी ने आने वाले दिनों में उत्पन्न होने वाले जल संकट पर अपना विरोध दर्ज कराया है।
बताते चलें कि, अडानी ग्रुप की सहायक कंपनी मिर्ज़ापुर थर्मल एनर्जी (यूपी) प्राइवेट लिमिटेड, मिर्ज़ापुर के ग्राम ददरी खुर्द, मड़िहान वन रेंज में 2×800 मेगावाट कोयला आधारित अल्ट्रासुपर क्रिटिकल थर्मल पावर प्लांट (टीपीपी) विद्युत उत्पादन के लिए प्रस्तावित है, 1600 मेगावाट क्षमता के प्रस्तावित विद्युत प्लांट के लिए तकरीबन 365.19 हेक्टेयर भूमि की आवश्यकता है।जिसमें से 364.57 हेक्टेयर गैर वन भूमि है और 0.62 हेक्टेयर संयंत्र सीमा के अंदर वन भूमि है। निर्माण के बाद जब यह पावर प्लांट शुरू होगा तब यहां बिजली बनाने के लिए संयंत्र को 36 एमसीएम मिलियन क्यूबिक मीटर (Million Cubic Meters) पानी यानि कि 360 करोड़ लीटर पानी की आवश्यकता होगी। जिसकी आपूर्ति गंगा नदी से की जाएगी। यहं से पानी निकाल कर अपर खजुरी जलाशय में ले जाया जाएगा। इसके बाद अपर खजुरी जलाशय से पानी निकाल कर ददरी स्थित पावर प्लांट पर ले जाकर विद्युत उत्पादन के उपयोग में लिया जाएगा, ऐसे में निकट भविष्य में उत्पन्न होने वाले भारी जल संकट को लेकर भी लोगों का आशंकित होना लाजिमी है।
ग्रामीणों से घबराया रहा अडानी का कुनबा
मिर्जापुर में 25 जनवरी 2026 को गौतम अदानी के मड़िहान में साइट विज़िट के दौरान
ददरी खुर्द व आसपास के ग्रामीणों ने जोरदार विरोध दर्ज कराया। ग्रामीणों ने कहा, 'यह विरोध पर्यावरण, जंगल, जमीन और भविष्य की पीढ़ियों की रक्षा के लिए किया गया।
ग्रामीणों ने साफ कहा
“हम विकास के विरोधी नहीं, विनाश के विरोधी हैं।”
ग्रामीण अडानी से मिलकर शांतपूर्ण ढ़ंग से अपनी समस्या को रखना चाहते थे लेकिन भारी पुलिस फोर्स के बल पर किसानों ग्रामीणों को गौतम अडानी के पास फटकने तक नहीं दिया गया और ना ही अडानी ने किसानों से मिलकर उनकी समस्या को सुनकर उसे सुलझाना मुनासिब समझा। इस बात को लेकर किसानों में तीखी प्रतिक्रिया रही। मौके पर ग्रामीणों के समर्थन में उतरे भारतीय किसान यूनियन (लोकशक्ति) के कार्यकर्ता ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि "उनकी मांगों पर विचार नहीं हुआ तो वह जिला मुख्यालय से होते हुए ज़रुरत पड़ने पर राजधानी लखनऊ कूंच कर पूरे प्रदेश भर से किसान यूनियन के लोगों का जुटान करने से भी पीछे नहीं हटेंगे।"
किसान नेताओं ने गंभीर आरोप लगाते हुए सबरंग को बताया कि, "कुंनबिया मार्ग, जो एक वन मार्ग (Forest Route) है, उस पर अवैध तरीके से कब्ज़ा कर परियोजना का रास्ता बनाया जा रहा है। इसके बावजूद प्रशासन द्वारा कोई ठोस हस्तक्षेप नहीं किया जा रहा। उल्टा, ऐसा प्रतीत हो रहा है कि प्रशासनिक तंत्र अदानी प्रोजेक्ट को सहयोग दे रहा है।"

ग्रामीणों का कहना है कि, "वन विभाग (DFO) सहित ज़िम्मेदार अधिकारी मूकदर्शक बने हुए हैं, जंगल, पर्यावरण और कानून को ताक पर रखकर काम आगे बढ़ाया जा रहा है।"
दूसरी ओर मिर्जापुर बचाओ संघर्ष समिति ने स्पष्ट किया है कि, जब तक यह पर्यावरण-विरोधी पावर प्लांट रद्द नहीं होता, तब तक आंदोलन शांतिपूर्ण लेकिन लगातार जारी रहेगा।
ग्रामीणों ने यह भी कहा कि 11 अप्रैल 2025 को आयोजित जनसुनवाई पक्षपातपूर्ण रही, प्रभावित लोगों की आपत्तियों को ठीक से दर्ज नहीं किया गया और इसके बावजूद परियोजना को पर्यावरणीय अनुशंसा (EC) दे दी गई, जबकि मामला उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय में लंबित है।
प्रभावित लोगों ने मांग की है कि, "ग्राम सभा की वास्तविक सहमति, पर्यावरण व स्वास्थ्य पर स्वतंत्र जांच, और सभी गतिविधियों पर तत्काल रोक लगाई जाए। समिति ने चेतावनी दी कि मांगें नहीं मानी गईं तो आंदोलन को और व्यापक किया जाएगा।
(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं। उनसे mzp.newssdgiri@gmail.com के माध्यम से संपर्क किया जा सकता है।)