संकल्प पत्र मराठी भाषा में तैयार किया गया है, जिसकी शुरुआत भारतीय संविधान तथा उसकी प्रस्तावना के उल्लेख से होती है। इसमें स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के मूल आदर्शों पर विशेष बल दिया गया है। संकल्प में स्पष्ट रूप से कहा गया है, “अब से सौंदळा गांव में कोई भी व्यक्ति जाति का पालन नहीं करेगा और न ही किसी प्रकार की जातिगत प्रथा में सहभागी बनेगा। इसके स्थान पर मानवता ही गांववासियों का एकमात्र धर्म होगी।”

फोटो साभार : द वायर
अहिल्यानगर (पूर्ववर्ती नाम अहमदनगर) जिले के नेवासा तालुका में स्थित सौंदळा गांव ने एक महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक निर्णय लेते हुए स्वयं को “जातिमुक्त गांव” घोषित किया है। यह कदम भारतीय समाज में व्याप्त जातीय भेदभाव और अस्पृश्यता जैसी सामाजिक बुराइयों के खिलाफ एक सशक्त और प्रेरणादायक संदेश देता है। खासकर ऐसे समय में, जब पूरे देश में जातिवाद को लेकर व्यापक चर्चा चल रही है और आए दिन जातिगत भेदभाव की घटनाएं सामने आ रही हैं, यह पहल बेहद सराहनीय है।
उधर, भोपाल में यूजीसी के समता नियमों को लागू करने की मांग को लेकर 12 फरवरी को दलित, आदिवासी तथा ओबीसी समुदाय के लोगों ने मुख्यमंत्री आवास का घेराव किया। ऐसे वातावरण में सौंदळा गांव के ग्रामीणों द्वारा सामाजिक समरसता, समानता और समावेशिता का उदाहरण प्रस्तुत करना न केवल प्रशंसनीय है, बल्कि पूरे देश के लिए अनुकरणीय भी है।
द वायर की रिपोर्ट के मुताबिक, 5 फरवरी को सौंदळा ग्रामसभा की एक विशेष बैठक शाम 4 बजे सरपंच शरद बाबुराव अर्गड़े की अध्यक्षता में आयोजित की गई। इस बैठक में सरपंच अर्गड़े ने सौंदळा गांव को “जातिमुक्त” घोषित करने का प्रस्ताव रखा।
उन्हें पता था कि एक वर्गीकृत समाज में जाति व्यवस्था को समाप्त करना मामूली कार्य नहीं है। उन्होंने द वायर से बातचीत में कहा, “सरपंच के रूप में अपने तीन कार्यकालों के दौरान मैंने गांववासियों के साथ लगातार और गंभीर संवाद बनाए रखा है। मुझे विश्वास था कि सकारात्मक परिवर्तन संभव है।”
उनकी अपेक्षा के अनुरूप यह विशेष प्रस्ताव सभा में पारित हो गया। इस बैठक में सवर्ण और बहुजन समुदायों के साथ कुछ मुस्लिम नागरिक भी उपस्थित थे, और सभी ने सर्वसम्मति से प्रस्ताव के पक्ष में मतदान किया।
बैठक के दौरान भारतीय संविधान में निहित मूल्यों—समता, बंधुता और सामाजिक न्याय—को आधार बनाते हुए गांव में व्याप्त जातीय भेदभाव, अस्पृश्यता और अन्याय को पूर्णतः समाप्त करने पर विस्तार से विचार-विमर्श किया गया।
ग्रामसभा ने सर्वसम्मति से एक संकल्प पारित किया, जिसमें स्पष्ट रूप से घोषणा की गई कि गांव में जाति, धर्म, पंथ या वंश के आधार पर किसी भी प्रकार का भेदभाव स्वीकार्य नहीं होगा। सभी नागरिकों को समान माना जाएगा और “माझी जात मानव” (मेरी जाति मानव है) की भावना को अपनाते हुए सामाजिक समरसता को बढ़ावा दिया जाएगा।
ग्रामसभा के निर्णय के अनुसार, सार्वजनिक स्थान—जैसे मंदिर, श्मशानभूमि, विद्यालय, जलस्रोत तथा सामाजिक कार्यक्रम—सभी नागरिकों के लिए समान रूप से खुले रहेंगे। किसी भी प्रकार की अस्पृश्यता, सामाजिक बहिष्कार या जातीय अन्याय को बिल्कुल सहन नहीं किया जाएगा।
इसके अलावा, सोशल मीडिया पर जातीय वैमनस्य या तनाव फैलाने वाली पोस्ट करने वालों के खिलाफ ग्राम पंचायत आवश्यक और उचित कार्रवाई करेगी। इन सभी प्रावधानों के साथ सौंदळा गांव को औपचारिक रूप से “जातिमुक्त गांव” घोषित किया गया।
संकल्प पत्र मराठी भाषा में तैयार किया गया है, जिसकी शुरुआत भारतीय संविधान और उसकी प्रस्तावना के उल्लेख से होती है। इसमें स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के मूल सिद्धांतों पर विशेष बल दिया गया है।
ठराव में स्पष्ट रूप से कहा गया है, “अब से सौंदळा गांव में कोई भी व्यक्ति जाति का पालन नहीं करेगा और न ही किसी प्रकार की जातिगत प्रथा में भाग लेगा। इसके स्थान पर मानवता ही गांववासियों का एकमात्र धर्म होगी।”
यह पहली बार नहीं है कि सौंदळा गांव ने सामाजिक चेतना से जुड़ा कोई महत्त्वपूर्ण संकल्प पारित किया हो। इससे पहले भी ग्रामसभा द्वारा लिंग संवेदनशीलता से संबंधित अनेक प्रगतिशील प्रस्ताव स्वीकृत किए जा चुके हैं।
इनमें बाल विवाह पर पूर्ण प्रतिबंध, विधवा महिलाओं के पुनर्विवाह की स्वीकृति, घरेलू हिंसा और दहेज प्रथा के खिलाफ सख्त कार्रवाई जैसे निर्णय शामिल हैं। साथ ही, लड़कियों की उच्च शिक्षा सुनिश्चित करने के लिए विशेष प्रावधान किए गए हैं तथा गांव में महिलाओं की राजनीतिक और सामाजिक गतिविधियों में सक्रिय भागीदारी बढ़ाने के उद्देश्य से भी प्रस्ताव पारित किए गए हैं।
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फोटो साभार : द वायर
अहिल्यानगर (पूर्ववर्ती नाम अहमदनगर) जिले के नेवासा तालुका में स्थित सौंदळा गांव ने एक महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक निर्णय लेते हुए स्वयं को “जातिमुक्त गांव” घोषित किया है। यह कदम भारतीय समाज में व्याप्त जातीय भेदभाव और अस्पृश्यता जैसी सामाजिक बुराइयों के खिलाफ एक सशक्त और प्रेरणादायक संदेश देता है। खासकर ऐसे समय में, जब पूरे देश में जातिवाद को लेकर व्यापक चर्चा चल रही है और आए दिन जातिगत भेदभाव की घटनाएं सामने आ रही हैं, यह पहल बेहद सराहनीय है।
उधर, भोपाल में यूजीसी के समता नियमों को लागू करने की मांग को लेकर 12 फरवरी को दलित, आदिवासी तथा ओबीसी समुदाय के लोगों ने मुख्यमंत्री आवास का घेराव किया। ऐसे वातावरण में सौंदळा गांव के ग्रामीणों द्वारा सामाजिक समरसता, समानता और समावेशिता का उदाहरण प्रस्तुत करना न केवल प्रशंसनीय है, बल्कि पूरे देश के लिए अनुकरणीय भी है।
द वायर की रिपोर्ट के मुताबिक, 5 फरवरी को सौंदळा ग्रामसभा की एक विशेष बैठक शाम 4 बजे सरपंच शरद बाबुराव अर्गड़े की अध्यक्षता में आयोजित की गई। इस बैठक में सरपंच अर्गड़े ने सौंदळा गांव को “जातिमुक्त” घोषित करने का प्रस्ताव रखा।
उन्हें पता था कि एक वर्गीकृत समाज में जाति व्यवस्था को समाप्त करना मामूली कार्य नहीं है। उन्होंने द वायर से बातचीत में कहा, “सरपंच के रूप में अपने तीन कार्यकालों के दौरान मैंने गांववासियों के साथ लगातार और गंभीर संवाद बनाए रखा है। मुझे विश्वास था कि सकारात्मक परिवर्तन संभव है।”
उनकी अपेक्षा के अनुरूप यह विशेष प्रस्ताव सभा में पारित हो गया। इस बैठक में सवर्ण और बहुजन समुदायों के साथ कुछ मुस्लिम नागरिक भी उपस्थित थे, और सभी ने सर्वसम्मति से प्रस्ताव के पक्ष में मतदान किया।
बैठक के दौरान भारतीय संविधान में निहित मूल्यों—समता, बंधुता और सामाजिक न्याय—को आधार बनाते हुए गांव में व्याप्त जातीय भेदभाव, अस्पृश्यता और अन्याय को पूर्णतः समाप्त करने पर विस्तार से विचार-विमर्श किया गया।
ग्रामसभा ने सर्वसम्मति से एक संकल्प पारित किया, जिसमें स्पष्ट रूप से घोषणा की गई कि गांव में जाति, धर्म, पंथ या वंश के आधार पर किसी भी प्रकार का भेदभाव स्वीकार्य नहीं होगा। सभी नागरिकों को समान माना जाएगा और “माझी जात मानव” (मेरी जाति मानव है) की भावना को अपनाते हुए सामाजिक समरसता को बढ़ावा दिया जाएगा।
ग्रामसभा के निर्णय के अनुसार, सार्वजनिक स्थान—जैसे मंदिर, श्मशानभूमि, विद्यालय, जलस्रोत तथा सामाजिक कार्यक्रम—सभी नागरिकों के लिए समान रूप से खुले रहेंगे। किसी भी प्रकार की अस्पृश्यता, सामाजिक बहिष्कार या जातीय अन्याय को बिल्कुल सहन नहीं किया जाएगा।
इसके अलावा, सोशल मीडिया पर जातीय वैमनस्य या तनाव फैलाने वाली पोस्ट करने वालों के खिलाफ ग्राम पंचायत आवश्यक और उचित कार्रवाई करेगी। इन सभी प्रावधानों के साथ सौंदळा गांव को औपचारिक रूप से “जातिमुक्त गांव” घोषित किया गया।
संकल्प पत्र मराठी भाषा में तैयार किया गया है, जिसकी शुरुआत भारतीय संविधान और उसकी प्रस्तावना के उल्लेख से होती है। इसमें स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के मूल सिद्धांतों पर विशेष बल दिया गया है।
ठराव में स्पष्ट रूप से कहा गया है, “अब से सौंदळा गांव में कोई भी व्यक्ति जाति का पालन नहीं करेगा और न ही किसी प्रकार की जातिगत प्रथा में भाग लेगा। इसके स्थान पर मानवता ही गांववासियों का एकमात्र धर्म होगी।”
यह पहली बार नहीं है कि सौंदळा गांव ने सामाजिक चेतना से जुड़ा कोई महत्त्वपूर्ण संकल्प पारित किया हो। इससे पहले भी ग्रामसभा द्वारा लिंग संवेदनशीलता से संबंधित अनेक प्रगतिशील प्रस्ताव स्वीकृत किए जा चुके हैं।
इनमें बाल विवाह पर पूर्ण प्रतिबंध, विधवा महिलाओं के पुनर्विवाह की स्वीकृति, घरेलू हिंसा और दहेज प्रथा के खिलाफ सख्त कार्रवाई जैसे निर्णय शामिल हैं। साथ ही, लड़कियों की उच्च शिक्षा सुनिश्चित करने के लिए विशेष प्रावधान किए गए हैं तथा गांव में महिलाओं की राजनीतिक और सामाजिक गतिविधियों में सक्रिय भागीदारी बढ़ाने के उद्देश्य से भी प्रस्ताव पारित किए गए हैं।
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