सीपीआई(एम), एनी राजा, पूर्व सिविल सेवकों और धार्मिक गुरुओं ने मुख्यमंत्री के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने, स्वतंत्र एसआईटी से जांच कराने और संवैधानिक पदाधिकारियों के सार्वजनिक बयानों पर बाध्यकारी दिशा-निर्देश तय करने की मांग की है। उनका आरोप है कि लंबे समय से एक खास समुदाय को निशाना बनाया जा रहा है, जिससे कार्यपालिका की शक्ति का दुरुपयोग हुआ है।

Image: Bar and Bench
सुप्रीम कोर्ट इन दिनों एक ऐसे मामले की सुनवाई की तैयारी में है, जिसे हाल के वर्षों के सबसे अहम संवैधानिक सवालों में से एक माना जा रहा है। सवाल सीधा है—क्या सत्ता में बैठे लोगों के सार्वजनिक बयानों पर संविधान कोई सीमा तय करता है? अगर हां, तो वह सीमा क्या है?
इस पूरे विवाद के केंद्र में असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा हैं। पिछले पांच वर्षों में दिए गए उनके कई सार्वजनिक बयान अब सुप्रीम कोर्ट के सामने रखे गए हैं। याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि ये बयान सिर्फ राजनीतिक भाषण नहीं थे, बल्कि एक खास समुदाय—मुसलमानों, खासकर असम के बंगाली मूल के मुसलमानों—के खिलाफ लगातार की गई आपत्तिजनक और बहिष्कारी टिप्पणियों की एक श्रृंखला थे। उनका कहना है कि इन बयानों से सामाजिक और आर्थिक भेदभाव को बढ़ावा मिला।
यह मामला कई याचिकाओं के जरिए सुप्रीम कोर्ट पहुंचा है। इनमें भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी), सीपीआई नेता एनी राजा, पूर्व आईएएस और आईएफएस अधिकारियों, राजनयिकों, शिक्षाविदों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का एक समूह, साथ ही जमीयत उलेमा-ए-हिंद शामिल हैं। इन सभी की मांग है कि मुख्यमंत्री के बयानों की स्वतंत्र जांच हो, आपराधिक कार्रवाई पर विचार किया जाए और संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों के बयानों को लेकर स्पष्ट और लागू करने योग्य मानक तय किए जाएं।
“पॉइंट ब्लैंक शॉट” और “नो मर्सी”: विवादित वीडियो
इस विवाद को तूल देने वाला ताजा कारण 7 फरवरी 2026 को सामने आया एक वीडियो है, जिसे भाजपा असम के आधिकारिक एक्स (पूर्व ट्विटर) अकाउंट से पोस्ट किया गया था।
वीडियो में मुख्यमंत्री को एक बंदूक से दो एनिमेटेड तस्वीरों पर गोली चलाते हुए दिखाया गया। ये तस्वीरें निशाने के दायरे में थीं और उन्हें मुसलमानों के रूप में दर्शाया गया था। जैसे ही गोली चलती है, स्क्रीन पर “Point blank shot” और “No mercy” जैसे शब्द उभरते हैं। वीडियो में कुछ नारे भी दिखाई देते हैं—
● “विदेशी-मुक्त असम”
● “कम्युनिटी, जमीन, जड़ें सबसे पहले”
● “तुम पाकिस्तान क्यों नहीं गए?”
● “बांग्लादेशियों के लिए कोई माफी नहीं”
आखिर में मुख्यमंत्री की एक स्टाइलिश, लगभग फिल्मी अंदाज वाली तस्वीर दिखाई जाती है।
वीडियो पोस्ट होने के बाद काफी विवाद हुआ और बाद में इसे हटा लिया गया। लेकिन याचिकाकर्ताओं का कहना है कि यह वीडियो अब भी अलग-अलग प्लेटफॉर्म पर मौजूद है और राजनीतिक नेटवर्क के जरिए फैलाया जा रहा है। उनका आरोप है कि यह वीडियो किसी एक बयान से आगे बढ़कर एक पूरे राजनीतिक नैरेटिव को दर्शाता है, जिसमें एक समुदाय को शक और विरोध के दायरे में रखा जाता है।
सुप्रीम कोर्ट में त्वरित सुनवाई की मांग
लाइव लॉ के अनुसार, वरिष्ठ वकील निजाम पाशा ने इन याचिकाओं का उल्लेख भारत के मुख्य न्यायाधीश के समक्ष करते हुए तत्काल सुनवाई की मांग की। उन्होंने दलील दी कि मुख्यमंत्री के कथित भड़काऊ बयानों के खिलाफ शिकायतें दी गईं, लेकिन अब तक कोई एफआईआर दर्ज नहीं हुई है। उन्होंने खास तौर पर 7 फरवरी के वीडियो और पहले के भाषणों का जिक्र किया।
मुख्य न्यायाधीश ने टिप्पणी की कि चुनावी समय में राजनीतिक विवाद अक्सर अदालतों तक पहुंच जाते हैं, और अब तो “चुनाव का एक हिस्सा सुप्रीम कोर्ट के भीतर भी लड़ा जाता है।” हालांकि अदालत ने संकेत दिया कि वह मामले पर विचार करेगी और सुनवाई की तारीख तय की जाएगी।
CPIM की फाइल की गई पिटीशन की डिटेल्स
1. कोई अकेला वीडियो नहीं: पांच साल से अलग-थलग भाषण का पैटर्न
खास बात यह है कि पिटीशन में इस बात पर जोर दिया गया है कि 7 फरवरी के वीडियो को अकेले नहीं देखा जा सकता।
CPIM की पिटीशन में कोर्ट के सामने 2021 से फरवरी 2026 तक की पूरी क्रोनोलॉजी रखी गई है, जिसमें मुख्यमंत्री के सार्वजनिक बयानों में लगातार बढ़ोतरी को दस्तावेजीकृत किया गया है। इनमें ऐसे बयान शामिल हैं जिनमें कथित तौर पर—
● अवैध प्रवास को मुस्लिम पहचान से जोड़कर पेश करना
● बंगाली भाषी मुसलमानों के लिए बार-बार “मियां” जैसे अपमानजनक शब्द का इस्तेमाल करना
● जमीन, नौकरी, परिवहन और रोजगार से वंचित करने की बात कहना
● “सविनय अवज्ञा” के नाम पर सामाजिक और आर्थिक बहिष्कार की वकालत करना
● मतदाता सूची में आपत्तियों के जरिए परेशान करने के लिए उकसाना
● किसी धार्मिक समुदाय के लोगों से मतदान का अधिकार छीनने का संकेत देना
याचिका में जिन बयानों का हवाला दिया गया है, उनमें कथित तौर पर कहा गया कि ऐसे हालात बनाए जाएं कि मुसलमान “असम में रह ही न सकें”—उन्हें रिक्शा, दुकान, गाड़ी और जमीन तक न मिले। एक अन्य बयान में समर्थकों से कथित तौर पर कहा गया कि लक्षित समुदाय के रिक्शा चालकों को पूरा किराया न दें, ताकि वे मजबूर होकर राज्य छोड़ दें।
याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि जब इस तरह के बयान किसी आम नेता की नहीं, बल्कि चुनी हुई सरकार के मुखिया की ओर से आते हैं, तो वे सिर्फ राजनीतिक भाषण भर नहीं रह जाते। उनका असर जमीनी स्तर पर दिखने लगता है और वे व्यवहार को प्रभावित करने वाली ताकत हासिल कर लेते हैं।
2. भाषण से समाज को नुकसान: “CM के निर्देशों पर काम करना”
इन पिटीशनों को पहले की हेट स्पीच चुनौतियों से अलग करने वाली बात यह है कि इनमें दस्तावेजीकृत सामाजिक परिणामों पर जोर दिया गया है।
CPIM की पिटीशन में दिहाड़ी मजदूरों को परेशान करने, रिक्शा चालकों को जानबूझकर कम पैसे देने और “बांग्लादेशी मुसलमान” कहकर लोगों को मोहल्ले खाली करने के लिए कहने की रिपोर्टों का उल्लेख किया गया है। कई मामलों में ऑनलाइन प्रसारित वीडियो में कथित तौर पर लोग साफ कहते दिखते हैं कि वे मुख्यमंत्री के निर्देशों के अनुसार काम कर रहे हैं।
पिटीशन में चेतावनी दी गई है कि यह एक खतरनाक संवैधानिक स्थिति है—जहां सरकार की बातों को नागरिक अनौपचारिक और विकेंद्रीकृत तरीके से लागू करने लगते हैं, जिससे राज्य की औपचारिक शक्ति और भीड़ के व्यवहार के बीच की रेखा धुंधली हो जाती है।
3. इमिग्रेशन, NRC और जानबूझकर मुद्दों को मिलाने का आरोप
एक अहम कानूनी तर्क यह है कि मुख्यमंत्री के बयानों से जानबूझकर गैर-कानूनी इमिग्रेशन और मुस्लिम पहचान के बीच का फर्क खत्म कर दिया जाता है।
CPIM की याचिका में कहा गया है कि भारतीय कानून के तहत इमिग्रेशन धर्मनिरपेक्ष विषय है, और NRC डेटा से पता चलता है कि बाहर किए गए कई लोग गैर-मुस्लिम थे। इसलिए मुसलमानों पर केंद्रित बयानबाजी सांप्रदायिक मंशा को दर्शाती है।
याचिका में कहा गया है कि जिसे सार्वजनिक रूप से जनसंख्या नियंत्रण या सीमा सुरक्षा के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, वह असल में धार्मिक प्रोफाइलिंग और सामूहिक दंड के रूप में कार्य करता है, जो अनुच्छेद 14, 15 और 21 के खिलाफ है।
4. संवैधानिक शपथ और सरकारी पद का दुरुपयोग
CPIM की याचिका में मंत्रियों द्वारा ली जाने वाली संवैधानिक शपथ का हवाला दिया गया है।
मनोज नरूला बनाम यूनियन ऑफ इंडिया, स्टेट ऑफ महाराष्ट्र बनाम एस.एस. चव्हाण और दौलतमल जैन जैसे फैसलों का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि किसी समुदाय को बदनाम करने और बाहर करने के लिए राज्य शक्ति का बार-बार उपयोग सरकारी पद का दुरुपयोग और संवैधानिक विश्वास का उल्लंघन है।
याचिका में हेट स्पीच मामले (कुर्बान अली, शाहीन अब्दुल्ला) में सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का हवाला देते हुए कहा गया है कि आईपीसी की धाराएं 153A, 153B, 295A और 505 (अब बीएनएस में समाहित) के तहत स्वतः एफआईआर दर्ज होनी चाहिए। शिकायतों के बावजूद एफआईआर दर्ज न होना कार्यपालिका की निष्क्रियता को दर्शाता है।
5. मांगी गई राहत: FIR, SIT, जांच का ट्रांसफर
याचिका में निम्न मांगें की गई हैं—
● बीएनएस के तहत अनिवार्य एफआईआर दर्ज की जाए
● एक स्वतंत्र विशेष जांच दल (SIT) गठित किया जाए
● जांच को स्वतंत्र प्राधिकरण को हस्तांतरित किया जाए
याचिका का तर्क है कि जब जांच का विषय स्वयं मुख्यमंत्री हों, तो राज्य एजेंसियों से पूर्ण निष्पक्षता की अपेक्षा कठिन है।
दायर की गई अन्य याचिकाएं
1. एक समानांतर संवैधानिक सवाल: ताकतवर लोगों की स्पीच को कौन नियंत्रित करेगा?
पूर्व सिविल सेवकों, राजनयिकों, शिक्षाविदों और सार्वजनिक बुद्धिजीवियों द्वारा दायर याचिका में कहा गया है कि संवैधानिक पदाधिकारियों की सार्वजनिक भाषा को नियंत्रित करने वाले स्पष्ट मानक नहीं हैं।
याचिका में कहा गया है कि सार्वजनिक पद पर बैठे लोग सामान्य वक्ता नहीं होते। उनके शब्द प्रशासनिक व्यवहार को प्रभावित करते हैं और कमजोर समुदायों में भय उत्पन्न कर सकते हैं।
नवतेज सिंह जोहर, जोसेफ शाइन और दिल्ली एनसीटी सरकार के फैसलों का हवाला देते हुए कहा गया है कि संवैधानिक नैतिकता सार्वजनिक शक्ति के प्रयोग पर नियंत्रण का कार्य करती है।
2. जमीयत उलेमा-ए-हिंद: छिपी हुई और सामान्यीकृत हेट स्पीच
जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने 27 जनवरी के उस कथित बयान का उल्लेख किया, जिसमें “मिया वोटरों” को मतदाता सूची से हटाने की बात कही गई थी।
संगठन ने इंडिया हेट लैब के आंकड़ों का हवाला देते हुए 2024 में हेट स्पीच घटनाओं में 74% वृद्धि का दावा किया है।
एक आम शिकायत: चुनिंदा कार्रवाई
सभी याचिकाओं में एक समान आरोप है कि कानून का प्रयोग चुनिंदा ढंग से किया जा रहा है। जहां अल्पसंख्यकों के खिलाफ तेजी से एफआईआर दर्ज होती हैं, वहीं शक्तिशाली पदाधिकारियों के खिलाफ शिकायतों पर कार्रवाई नहीं होती।
ललिता कुमारी, तहसीन पूनावाला, प्रवासी भलाई संगठन और कौशल किशोर मामलों का हवाला देते हुए सुप्रीम कोर्ट से अनुच्छेद 142 के तहत हस्तक्षेप की मांग की गई है।
संवैधानिक व्यवस्था के सामने अहम क्षण
ये याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट के सामने महत्वपूर्ण प्रश्न रखती हैं—
● क्या संवैधानिक पदाधिकारी बिना परिणाम के भड़काऊ भाषा का प्रयोग कर सकते हैं?
● क्या लगातार अलगाववादी बयान देना असंवैधानिक शासन का संकेत है?
● क्या संवैधानिक नैतिकता को कानूनी रूप से लागू किया जा सकता है?
● संस्थाओं की चुप्पी कब मिलीभगत बन जाती है?
‘हेट स्पीच’ मामले में फैसला सुरक्षित रखे जाने के बीच, असम के मुख्यमंत्री से जुड़ी ये याचिकाएं आने वाले समय में नफरत फैलाने वाले बयानों, कार्यपालिका की जवाबदेही और राजनीतिक सत्ता की संवैधानिक सीमाओं पर कानून की दिशा तय कर सकती हैं।
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Image: Bar and Bench
सुप्रीम कोर्ट इन दिनों एक ऐसे मामले की सुनवाई की तैयारी में है, जिसे हाल के वर्षों के सबसे अहम संवैधानिक सवालों में से एक माना जा रहा है। सवाल सीधा है—क्या सत्ता में बैठे लोगों के सार्वजनिक बयानों पर संविधान कोई सीमा तय करता है? अगर हां, तो वह सीमा क्या है?
इस पूरे विवाद के केंद्र में असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा हैं। पिछले पांच वर्षों में दिए गए उनके कई सार्वजनिक बयान अब सुप्रीम कोर्ट के सामने रखे गए हैं। याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि ये बयान सिर्फ राजनीतिक भाषण नहीं थे, बल्कि एक खास समुदाय—मुसलमानों, खासकर असम के बंगाली मूल के मुसलमानों—के खिलाफ लगातार की गई आपत्तिजनक और बहिष्कारी टिप्पणियों की एक श्रृंखला थे। उनका कहना है कि इन बयानों से सामाजिक और आर्थिक भेदभाव को बढ़ावा मिला।
यह मामला कई याचिकाओं के जरिए सुप्रीम कोर्ट पहुंचा है। इनमें भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी), सीपीआई नेता एनी राजा, पूर्व आईएएस और आईएफएस अधिकारियों, राजनयिकों, शिक्षाविदों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का एक समूह, साथ ही जमीयत उलेमा-ए-हिंद शामिल हैं। इन सभी की मांग है कि मुख्यमंत्री के बयानों की स्वतंत्र जांच हो, आपराधिक कार्रवाई पर विचार किया जाए और संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों के बयानों को लेकर स्पष्ट और लागू करने योग्य मानक तय किए जाएं।
“पॉइंट ब्लैंक शॉट” और “नो मर्सी”: विवादित वीडियो
इस विवाद को तूल देने वाला ताजा कारण 7 फरवरी 2026 को सामने आया एक वीडियो है, जिसे भाजपा असम के आधिकारिक एक्स (पूर्व ट्विटर) अकाउंट से पोस्ट किया गया था।
वीडियो में मुख्यमंत्री को एक बंदूक से दो एनिमेटेड तस्वीरों पर गोली चलाते हुए दिखाया गया। ये तस्वीरें निशाने के दायरे में थीं और उन्हें मुसलमानों के रूप में दर्शाया गया था। जैसे ही गोली चलती है, स्क्रीन पर “Point blank shot” और “No mercy” जैसे शब्द उभरते हैं। वीडियो में कुछ नारे भी दिखाई देते हैं—
● “विदेशी-मुक्त असम”
● “कम्युनिटी, जमीन, जड़ें सबसे पहले”
● “तुम पाकिस्तान क्यों नहीं गए?”
● “बांग्लादेशियों के लिए कोई माफी नहीं”
आखिर में मुख्यमंत्री की एक स्टाइलिश, लगभग फिल्मी अंदाज वाली तस्वीर दिखाई जाती है।
वीडियो पोस्ट होने के बाद काफी विवाद हुआ और बाद में इसे हटा लिया गया। लेकिन याचिकाकर्ताओं का कहना है कि यह वीडियो अब भी अलग-अलग प्लेटफॉर्म पर मौजूद है और राजनीतिक नेटवर्क के जरिए फैलाया जा रहा है। उनका आरोप है कि यह वीडियो किसी एक बयान से आगे बढ़कर एक पूरे राजनीतिक नैरेटिव को दर्शाता है, जिसमें एक समुदाय को शक और विरोध के दायरे में रखा जाता है।
सुप्रीम कोर्ट में त्वरित सुनवाई की मांग
लाइव लॉ के अनुसार, वरिष्ठ वकील निजाम पाशा ने इन याचिकाओं का उल्लेख भारत के मुख्य न्यायाधीश के समक्ष करते हुए तत्काल सुनवाई की मांग की। उन्होंने दलील दी कि मुख्यमंत्री के कथित भड़काऊ बयानों के खिलाफ शिकायतें दी गईं, लेकिन अब तक कोई एफआईआर दर्ज नहीं हुई है। उन्होंने खास तौर पर 7 फरवरी के वीडियो और पहले के भाषणों का जिक्र किया।
मुख्य न्यायाधीश ने टिप्पणी की कि चुनावी समय में राजनीतिक विवाद अक्सर अदालतों तक पहुंच जाते हैं, और अब तो “चुनाव का एक हिस्सा सुप्रीम कोर्ट के भीतर भी लड़ा जाता है।” हालांकि अदालत ने संकेत दिया कि वह मामले पर विचार करेगी और सुनवाई की तारीख तय की जाएगी।
CPIM की फाइल की गई पिटीशन की डिटेल्स
1. कोई अकेला वीडियो नहीं: पांच साल से अलग-थलग भाषण का पैटर्न
खास बात यह है कि पिटीशन में इस बात पर जोर दिया गया है कि 7 फरवरी के वीडियो को अकेले नहीं देखा जा सकता।
CPIM की पिटीशन में कोर्ट के सामने 2021 से फरवरी 2026 तक की पूरी क्रोनोलॉजी रखी गई है, जिसमें मुख्यमंत्री के सार्वजनिक बयानों में लगातार बढ़ोतरी को दस्तावेजीकृत किया गया है। इनमें ऐसे बयान शामिल हैं जिनमें कथित तौर पर—
● अवैध प्रवास को मुस्लिम पहचान से जोड़कर पेश करना
● बंगाली भाषी मुसलमानों के लिए बार-बार “मियां” जैसे अपमानजनक शब्द का इस्तेमाल करना
● जमीन, नौकरी, परिवहन और रोजगार से वंचित करने की बात कहना
● “सविनय अवज्ञा” के नाम पर सामाजिक और आर्थिक बहिष्कार की वकालत करना
● मतदाता सूची में आपत्तियों के जरिए परेशान करने के लिए उकसाना
● किसी धार्मिक समुदाय के लोगों से मतदान का अधिकार छीनने का संकेत देना
याचिका में जिन बयानों का हवाला दिया गया है, उनमें कथित तौर पर कहा गया कि ऐसे हालात बनाए जाएं कि मुसलमान “असम में रह ही न सकें”—उन्हें रिक्शा, दुकान, गाड़ी और जमीन तक न मिले। एक अन्य बयान में समर्थकों से कथित तौर पर कहा गया कि लक्षित समुदाय के रिक्शा चालकों को पूरा किराया न दें, ताकि वे मजबूर होकर राज्य छोड़ दें।
याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि जब इस तरह के बयान किसी आम नेता की नहीं, बल्कि चुनी हुई सरकार के मुखिया की ओर से आते हैं, तो वे सिर्फ राजनीतिक भाषण भर नहीं रह जाते। उनका असर जमीनी स्तर पर दिखने लगता है और वे व्यवहार को प्रभावित करने वाली ताकत हासिल कर लेते हैं।
2. भाषण से समाज को नुकसान: “CM के निर्देशों पर काम करना”
इन पिटीशनों को पहले की हेट स्पीच चुनौतियों से अलग करने वाली बात यह है कि इनमें दस्तावेजीकृत सामाजिक परिणामों पर जोर दिया गया है।
CPIM की पिटीशन में दिहाड़ी मजदूरों को परेशान करने, रिक्शा चालकों को जानबूझकर कम पैसे देने और “बांग्लादेशी मुसलमान” कहकर लोगों को मोहल्ले खाली करने के लिए कहने की रिपोर्टों का उल्लेख किया गया है। कई मामलों में ऑनलाइन प्रसारित वीडियो में कथित तौर पर लोग साफ कहते दिखते हैं कि वे मुख्यमंत्री के निर्देशों के अनुसार काम कर रहे हैं।
पिटीशन में चेतावनी दी गई है कि यह एक खतरनाक संवैधानिक स्थिति है—जहां सरकार की बातों को नागरिक अनौपचारिक और विकेंद्रीकृत तरीके से लागू करने लगते हैं, जिससे राज्य की औपचारिक शक्ति और भीड़ के व्यवहार के बीच की रेखा धुंधली हो जाती है।
3. इमिग्रेशन, NRC और जानबूझकर मुद्दों को मिलाने का आरोप
एक अहम कानूनी तर्क यह है कि मुख्यमंत्री के बयानों से जानबूझकर गैर-कानूनी इमिग्रेशन और मुस्लिम पहचान के बीच का फर्क खत्म कर दिया जाता है।
CPIM की याचिका में कहा गया है कि भारतीय कानून के तहत इमिग्रेशन धर्मनिरपेक्ष विषय है, और NRC डेटा से पता चलता है कि बाहर किए गए कई लोग गैर-मुस्लिम थे। इसलिए मुसलमानों पर केंद्रित बयानबाजी सांप्रदायिक मंशा को दर्शाती है।
याचिका में कहा गया है कि जिसे सार्वजनिक रूप से जनसंख्या नियंत्रण या सीमा सुरक्षा के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, वह असल में धार्मिक प्रोफाइलिंग और सामूहिक दंड के रूप में कार्य करता है, जो अनुच्छेद 14, 15 और 21 के खिलाफ है।
4. संवैधानिक शपथ और सरकारी पद का दुरुपयोग
CPIM की याचिका में मंत्रियों द्वारा ली जाने वाली संवैधानिक शपथ का हवाला दिया गया है।
मनोज नरूला बनाम यूनियन ऑफ इंडिया, स्टेट ऑफ महाराष्ट्र बनाम एस.एस. चव्हाण और दौलतमल जैन जैसे फैसलों का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि किसी समुदाय को बदनाम करने और बाहर करने के लिए राज्य शक्ति का बार-बार उपयोग सरकारी पद का दुरुपयोग और संवैधानिक विश्वास का उल्लंघन है।
याचिका में हेट स्पीच मामले (कुर्बान अली, शाहीन अब्दुल्ला) में सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का हवाला देते हुए कहा गया है कि आईपीसी की धाराएं 153A, 153B, 295A और 505 (अब बीएनएस में समाहित) के तहत स्वतः एफआईआर दर्ज होनी चाहिए। शिकायतों के बावजूद एफआईआर दर्ज न होना कार्यपालिका की निष्क्रियता को दर्शाता है।
5. मांगी गई राहत: FIR, SIT, जांच का ट्रांसफर
याचिका में निम्न मांगें की गई हैं—
● बीएनएस के तहत अनिवार्य एफआईआर दर्ज की जाए
● एक स्वतंत्र विशेष जांच दल (SIT) गठित किया जाए
● जांच को स्वतंत्र प्राधिकरण को हस्तांतरित किया जाए
याचिका का तर्क है कि जब जांच का विषय स्वयं मुख्यमंत्री हों, तो राज्य एजेंसियों से पूर्ण निष्पक्षता की अपेक्षा कठिन है।
दायर की गई अन्य याचिकाएं
1. एक समानांतर संवैधानिक सवाल: ताकतवर लोगों की स्पीच को कौन नियंत्रित करेगा?
पूर्व सिविल सेवकों, राजनयिकों, शिक्षाविदों और सार्वजनिक बुद्धिजीवियों द्वारा दायर याचिका में कहा गया है कि संवैधानिक पदाधिकारियों की सार्वजनिक भाषा को नियंत्रित करने वाले स्पष्ट मानक नहीं हैं।
याचिका में कहा गया है कि सार्वजनिक पद पर बैठे लोग सामान्य वक्ता नहीं होते। उनके शब्द प्रशासनिक व्यवहार को प्रभावित करते हैं और कमजोर समुदायों में भय उत्पन्न कर सकते हैं।
नवतेज सिंह जोहर, जोसेफ शाइन और दिल्ली एनसीटी सरकार के फैसलों का हवाला देते हुए कहा गया है कि संवैधानिक नैतिकता सार्वजनिक शक्ति के प्रयोग पर नियंत्रण का कार्य करती है।
2. जमीयत उलेमा-ए-हिंद: छिपी हुई और सामान्यीकृत हेट स्पीच
जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने 27 जनवरी के उस कथित बयान का उल्लेख किया, जिसमें “मिया वोटरों” को मतदाता सूची से हटाने की बात कही गई थी।
संगठन ने इंडिया हेट लैब के आंकड़ों का हवाला देते हुए 2024 में हेट स्पीच घटनाओं में 74% वृद्धि का दावा किया है।
एक आम शिकायत: चुनिंदा कार्रवाई
सभी याचिकाओं में एक समान आरोप है कि कानून का प्रयोग चुनिंदा ढंग से किया जा रहा है। जहां अल्पसंख्यकों के खिलाफ तेजी से एफआईआर दर्ज होती हैं, वहीं शक्तिशाली पदाधिकारियों के खिलाफ शिकायतों पर कार्रवाई नहीं होती।
ललिता कुमारी, तहसीन पूनावाला, प्रवासी भलाई संगठन और कौशल किशोर मामलों का हवाला देते हुए सुप्रीम कोर्ट से अनुच्छेद 142 के तहत हस्तक्षेप की मांग की गई है।
संवैधानिक व्यवस्था के सामने अहम क्षण
ये याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट के सामने महत्वपूर्ण प्रश्न रखती हैं—
● क्या संवैधानिक पदाधिकारी बिना परिणाम के भड़काऊ भाषा का प्रयोग कर सकते हैं?
● क्या लगातार अलगाववादी बयान देना असंवैधानिक शासन का संकेत है?
● क्या संवैधानिक नैतिकता को कानूनी रूप से लागू किया जा सकता है?
● संस्थाओं की चुप्पी कब मिलीभगत बन जाती है?
‘हेट स्पीच’ मामले में फैसला सुरक्षित रखे जाने के बीच, असम के मुख्यमंत्री से जुड़ी ये याचिकाएं आने वाले समय में नफरत फैलाने वाले बयानों, कार्यपालिका की जवाबदेही और राजनीतिक सत्ता की संवैधानिक सीमाओं पर कानून की दिशा तय कर सकती हैं।
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