अंकिता भंडारी हत्याकांड: सीएम धामी के इस्तीफे और सीबीआई जांच में उन्हें शामिल किए जाने की मांग

Written by sabrang india | Published on: February 10, 2026
अंकिता न्याय यात्रा संयुक्त संघर्ष मंच द्वारा देहरादून में आयोजित एक महापंचायत में उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को पद से हटाने और पिछले महीने आदेशित सीबीआई जांच में उन्हें शामिल किए जाने की मांग करते हुए एक प्रस्ताव पारित किया गया। इस महापंचायत के माध्यम से राष्ट्रपति के नाम एक ज्ञापन भी भेजा गया।



देहरादून में रविवार, 8 फरवरी को आयोजित एक महापंचायत में अंकिता भंडारी हत्याकांड के कथित तौर पर गलत तरीके से निपटारे को लेकर उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को पद से हटाने की मांग करते हुए एक प्रस्ताव पारित किया गया।

गौरतलब है कि 19 वर्षीय अंकिता भंडारी पौड़ी गढ़वाल स्थित एक रिज़ॉर्ट में कार्यरत थीं। 18 सितंबर 2022 को कथित तौर पर इसलिए उनकी हत्या कर दी गई थी क्योंकि उन्होंने एक वीआईपी मेहमान को ‘विशेष सेवाएँ’ देने से इनकार कर दिया था—यह शब्द आमतौर पर सेक्स वर्क के संदर्भ में इस्तेमाल किया जाता है।

द वायर की रिपोर्ट के अनुसार, इस मामले में रिज़ॉर्ट के मालिक और भाजपा से निष्कासित नेता विनोद आर्य के बेटे पुलकित आर्य, तथा उसके स्टाफ सदस्य सौरभ भास्कर और अंकित गुप्ता को अंकिता की हत्या के आरोप में गिरफ्तार किया गया था।

जनवरी में मुख्यमंत्री धामी ने इस मामले में एक वीआईपी की कथित संलिप्तता के आरोपों के मद्देनज़र सीबीआई जांच के आदेश दिए थे। बताया जा रहा है कि यह वीआईपी भाजपा के राष्ट्रीय महामंत्री दुष्यंत कुमार गौतम हैं।

महापंचायत

अंकिता न्याय यात्रा संयुक्त संघर्ष मंच द्वारा बुलाई गई इस महापंचायत में 40 संगठनों से जुड़े 500 से अधिक लोगों ने हिस्सा लिया। इंडिया गठबंधन की विभिन्न राजनीतिक पार्टियों ने भी इस सभा को समर्थन दिया।

महापंचायत में पारित प्रस्तावों में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को पद से हटाने और पिछले महीने आदेशित सीबीआई जांच में उन्हें शामिल किए जाने की मांग प्रमुख रही।

महापंचायत के माध्यम से राष्ट्रपति के नाम एक ज्ञापन भी भेजा गया। इसके अलावा, पद्म भूषण से सम्मानित अनिल जोशी द्वारा दायर की गई उस अलग एफआईआर को रद्द करने की मांग भी की गई, जिसमें मामले में कथित रूप से शामिल वीआईपी के खिलाफ जांच की मांग की गई थी।

पर्यावरणविद् अनिल जोशी, जो ‘हिमालयन एनवायरनमेंटल स्टडीज़ एंड कंजरवेशन ऑर्गनाइजेशन’ का संचालन करते हैं, ने इस वर्ष 9 जनवरी को यह एफआईआर दर्ज कराई थी—उसी दिन जब सीबीआई जांच की सिफारिश की गई थी। इसे मामले में कथित रूप से शामिल वीआईपी को बचाने की कोशिश के रूप में देखा गया।

वरिष्ठ कांग्रेस नेता और उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने जोशी द्वारा दर्ज एफआईआर के पीछे के उद्देश्य पर सवाल उठाते हुए कहा कि सरकार-प्रायोजित किसी व्यक्ति के आधार पर कराई जाने वाली जांच निष्पक्ष नहीं हो सकती।

रविवार को पारित प्रस्तावों में यह मांग भी शामिल थी कि सीबीआई जांच जोशी की एफआईआर के आधार पर नहीं कराई जानी चाहिए।

अंकिता के पिता वीरेंद्र भंडारी ने कहा,
“मैंने मुख्यमंत्री को एक ज्ञापन सौंपकर सेवानिवृत्त सुप्रीम कोर्ट के एक न्यायाधीश की निगरानी में जांच कराने की मांग की थी, लेकिन डॉ. अनिल जोशी की शिकायत के आधार पर एफआईआर दर्ज कर ली गई, जिनसे मेरा कोई संबंध नहीं है।”

भंडारी ने मामले में कॉल रिकॉर्ड्स की भी जांच की मांग की। उन्होंने कहा, “अगर मेरी बेटी नहीं झुकी, तो मैं कैसे झुक सकता हूँ?”

कांग्रेस नेता सूर्यकांत धस्माना ने नई एफआईआर पर सवाल उठाते हुए कहा कि इसकी कोई आवश्यकता नहीं थी, क्योंकि अंकिता भंडारी का मामला उसी मूल एफआईआर के तहत चल रहा है, जो शुरुआत में लक्ष्मणझूला थाने में दर्ज की गई थी। उन्होंने कहा कि उसी एफआईआर के आधार पर जांच हुई, चार्जशीट दाखिल की गई और कोटद्वार की सेशंस कोर्ट में मुकदमा चला, जिसके बाद तीनों आरोपियों को दोषी ठहराया गया।

गौरतलब है कि मई 2025 में कोटद्वार की एक जिला अदालत ने रिज़ॉर्ट के मालिक पुलकित आर्य और उनके दो सहयोगियों—सौरभ भास्कर और अंकित गुप्ता—को दोषी करार दिया था।

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