ओडिशा में बंगाली बोलने वाले एक बुज़ुर्ग मुस्लिम व्यक्ति पर कथित रूप से भीड़ ने हमला किया। आरोप है कि उसे जबरन उठक-बैठक करने पर मजबूर किया गया और “गो माता की जय” के नारे लगवाए गए। इस घटना से जुड़ा एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है।

प्रतीकात्मक तस्वीर ; साभार : डेक्कन क्रोनिकल
देश में नफ़रत की घटनाएँ लगातार बढ़ती दिखाई दे रही हैं। जहाँ उत्तराखंड में मुसलमानों के खिलाफ माहौल बेहद तनावपूर्ण बताया जा रहा है, वहीं ओडिशा में भी हालात चिंताजनक बताए जा रहे हैं। आरोप है कि कुछ हिंदू संगठनों से जुड़े लोग मुस्लिम समुदाय के लोगों को निशाना बना रहे हैं और उनसे जबरन “जय श्री राम” तथा “भारत माता की जय” के नारे लगवाए जा रहे हैं।
हाल के दिनों में सोशल मीडिया पर कई वीडियो वायरल हुए हैं, जिनमें कथित तौर पर भीड़ एक मुस्लिम व्यक्ति को घेरकर उससे नारे लगवाती दिखाई देती है। इसी तरह एक अन्य वीडियो सामने आया है, जिसमें एक बुज़ुर्ग मुस्लिम व्यक्ति से जबरन नारे लगवाए जा रहे हैं और उसके साथ मारपीट की जा रही है।
जी सलाम की रिपोर्ट के अनुसार, बंगाली बोलने वाले इस बुज़ुर्ग मुस्लिम के साथ हुई घटना बेहद शर्मनाक और दिल दहला देने वाली बताई जा रही है। आरोप है कि कुछ कट्टरपंथी तत्वों ने उनसे उठक-बैठक करवाई, ज़ोर से “गो माता की जय” का नारा लगाने को कहा और उनके साथ मारपीट की। वीडियो में कथित तौर पर भीड़ के कुछ लोग ओडिया भाषा में “गो माता की जय” के नारे लगाते सुनाई देते हैं। इसके बाद बुज़ुर्ग व्यक्ति को भी वही नारे लगाने और उठक-बैठक करने के लिए मजबूर किया जाता है।
धर्म के आधार पर हिंसा
गौरतलब है कि हाल के समय में ओडिशा में धार्मिक तनाव और हिंसा की घटनाओं में वृद्धि की खबरें सामने आई हैं। सोशल मीडिया पर ऐसे वीडियो सामने आ रहे हैं, जिनमें बंगाली भाषा बोलने के आधार पर लोगों के साथ मारपीट किए जाने और उन्हें जबरन “बांग्लादेशी” कहे जाने के आरोप लगाए गए हैं। कई मामलों में यह भी कहा गया है कि कुछ लोग बंगाली भाषी व्यक्तियों को घुसपैठिया बताकर निशाना बना रहे हैं।
इसके अलावा, कुछ स्थानों पर गाय की तस्करी के शक में मुस्लिम युवकों पर हमले की घटनाएँ भी रिपोर्ट हुई हैं। कभी पहचान के नाम पर तो कभी धर्म के आधार पर लोगों को निशाना बनाए जाने की घटनाएँ समाज में भय और अविश्वास का माहौल पैदा कर रही हैं।
गौरतलब है कि उत्तराखंड के कोटद्वार में गणतंत्र दिवस के मौके पर एक स्थानीय जिम संचालक द्वारा किए गए हस्तक्षेप से शुरू हुई घटना भी कानून-व्यवस्था और नागरिक स्वतंत्रताओं से जुड़े एक जटिल विवाद में बदल गई थी। इस घटनाक्रम ने सांप्रदायिक धमकियों के प्रति राज्य की प्रतिक्रिया पर सवाल खड़े किए थे।
26 जनवरी 2026 को दीपक कुमार ने कथित तौर पर उस समय हस्तक्षेप किया था, जब बजरंग दल और विश्व हिंदू परिषद से जुड़े कुछ लोगों के समूह ने 70 वर्षीय मुस्लिम दुकानदार वकील अहमद को उनकी दशकों पुरानी दुकान के नाम में “बाबा” शब्द के इस्तेमाल को लेकर धमकाया था। कुछ ही दिनों में यह मामला बढ़ गया, कई एफआईआर दर्ज हुईं, राष्ट्रीय राजमार्ग जाम किया गया और न केवल कथित धमकाने वालों के खिलाफ, बल्कि बुज़ुर्ग दुकानदार के समर्थन में हस्तक्षेप करने वालों के खिलाफ भी मामले दर्ज किए गए।
राष्ट्रीय मीडिया में व्यापक रूप से रिपोर्ट की गई यह घटना इस बात की कसौटी बन गई है कि राज्य सांप्रदायिक तनाव के मामलों में कानून-व्यवस्था, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और संवैधानिक समानता के सिद्धांतों के बीच संतुलन कैसे बनाता है। जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ रही है, यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या धार्मिक धमकियों का विरोध करने वाले नागरिकों को संरक्षण मिलता है या उन्हें ही कानूनी कार्रवाई का सामना करना पड़ता है।
उधर मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, उत्तर प्रदेश के मेरठ की रहने वाली आकांक्षा एक मुस्लिम युवक, साहिल उर्फ़ शावेज़ राणा, से विवाह करना चाहती थीं। आकांक्षा एक बैंक में कार्यरत हैं और दोनों काफी समय से एक-दूसरे को जानते हैं। शादी की सभी तैयारियाँ पूरी कर ली गई थीं और निमंत्रण पत्र भी रिश्तेदारों में बाँटे जा चुके थे। हालांकि, इस रिश्ते को लेकर कुछ हिंदुत्ववादी संगठनों ने आपत्ति जताई और इसे ‘लव जिहाद’ से जोड़ते हुए विरोध शुरू कर दिया।
दोनों की सगाई 9 फरवरी को होनी थी, जबकि 13 फरवरी को विवाह तय था। लेकिन बढ़ते विरोध और दबाव के चलते अंततः यह शादी रद्द कर दी गई।
ज़ी न्यूज़ की रिपोर्ट के अनुसार, अखिल भारतीय हिंदू सुरक्षा संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष सचिन सिरोही ने कहा कि शादी के निमंत्रण पत्र में युवक का नाम साहिल लिखा गया है, जबकि वह खुद को शावेज़ राणा बताता है। उन्होंने आरोप लगाया कि नाम को लेकर भ्रम पैदा किया गया और युवती को गुमराह किया गया। संगठन का दावा है कि युवती को मानसिक रूप से प्रभावित कर इस रिश्ते के लिए मजबूर किया गया।
सचिन सिरोही का कहना है कि इस तरह के मामलों में कई बार महिलाएँ बाद में पछतावा करती हैं और यह मामला भी उसी तरह का प्रतीत होता है।
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प्रतीकात्मक तस्वीर ; साभार : डेक्कन क्रोनिकल
देश में नफ़रत की घटनाएँ लगातार बढ़ती दिखाई दे रही हैं। जहाँ उत्तराखंड में मुसलमानों के खिलाफ माहौल बेहद तनावपूर्ण बताया जा रहा है, वहीं ओडिशा में भी हालात चिंताजनक बताए जा रहे हैं। आरोप है कि कुछ हिंदू संगठनों से जुड़े लोग मुस्लिम समुदाय के लोगों को निशाना बना रहे हैं और उनसे जबरन “जय श्री राम” तथा “भारत माता की जय” के नारे लगवाए जा रहे हैं।
हाल के दिनों में सोशल मीडिया पर कई वीडियो वायरल हुए हैं, जिनमें कथित तौर पर भीड़ एक मुस्लिम व्यक्ति को घेरकर उससे नारे लगवाती दिखाई देती है। इसी तरह एक अन्य वीडियो सामने आया है, जिसमें एक बुज़ुर्ग मुस्लिम व्यक्ति से जबरन नारे लगवाए जा रहे हैं और उसके साथ मारपीट की जा रही है।
जी सलाम की रिपोर्ट के अनुसार, बंगाली बोलने वाले इस बुज़ुर्ग मुस्लिम के साथ हुई घटना बेहद शर्मनाक और दिल दहला देने वाली बताई जा रही है। आरोप है कि कुछ कट्टरपंथी तत्वों ने उनसे उठक-बैठक करवाई, ज़ोर से “गो माता की जय” का नारा लगाने को कहा और उनके साथ मारपीट की। वीडियो में कथित तौर पर भीड़ के कुछ लोग ओडिया भाषा में “गो माता की जय” के नारे लगाते सुनाई देते हैं। इसके बाद बुज़ुर्ग व्यक्ति को भी वही नारे लगाने और उठक-बैठक करने के लिए मजबूर किया जाता है।
धर्म के आधार पर हिंसा
गौरतलब है कि हाल के समय में ओडिशा में धार्मिक तनाव और हिंसा की घटनाओं में वृद्धि की खबरें सामने आई हैं। सोशल मीडिया पर ऐसे वीडियो सामने आ रहे हैं, जिनमें बंगाली भाषा बोलने के आधार पर लोगों के साथ मारपीट किए जाने और उन्हें जबरन “बांग्लादेशी” कहे जाने के आरोप लगाए गए हैं। कई मामलों में यह भी कहा गया है कि कुछ लोग बंगाली भाषी व्यक्तियों को घुसपैठिया बताकर निशाना बना रहे हैं।
इसके अलावा, कुछ स्थानों पर गाय की तस्करी के शक में मुस्लिम युवकों पर हमले की घटनाएँ भी रिपोर्ट हुई हैं। कभी पहचान के नाम पर तो कभी धर्म के आधार पर लोगों को निशाना बनाए जाने की घटनाएँ समाज में भय और अविश्वास का माहौल पैदा कर रही हैं।
गौरतलब है कि उत्तराखंड के कोटद्वार में गणतंत्र दिवस के मौके पर एक स्थानीय जिम संचालक द्वारा किए गए हस्तक्षेप से शुरू हुई घटना भी कानून-व्यवस्था और नागरिक स्वतंत्रताओं से जुड़े एक जटिल विवाद में बदल गई थी। इस घटनाक्रम ने सांप्रदायिक धमकियों के प्रति राज्य की प्रतिक्रिया पर सवाल खड़े किए थे।
26 जनवरी 2026 को दीपक कुमार ने कथित तौर पर उस समय हस्तक्षेप किया था, जब बजरंग दल और विश्व हिंदू परिषद से जुड़े कुछ लोगों के समूह ने 70 वर्षीय मुस्लिम दुकानदार वकील अहमद को उनकी दशकों पुरानी दुकान के नाम में “बाबा” शब्द के इस्तेमाल को लेकर धमकाया था। कुछ ही दिनों में यह मामला बढ़ गया, कई एफआईआर दर्ज हुईं, राष्ट्रीय राजमार्ग जाम किया गया और न केवल कथित धमकाने वालों के खिलाफ, बल्कि बुज़ुर्ग दुकानदार के समर्थन में हस्तक्षेप करने वालों के खिलाफ भी मामले दर्ज किए गए।
राष्ट्रीय मीडिया में व्यापक रूप से रिपोर्ट की गई यह घटना इस बात की कसौटी बन गई है कि राज्य सांप्रदायिक तनाव के मामलों में कानून-व्यवस्था, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और संवैधानिक समानता के सिद्धांतों के बीच संतुलन कैसे बनाता है। जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ रही है, यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या धार्मिक धमकियों का विरोध करने वाले नागरिकों को संरक्षण मिलता है या उन्हें ही कानूनी कार्रवाई का सामना करना पड़ता है।
उधर मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, उत्तर प्रदेश के मेरठ की रहने वाली आकांक्षा एक मुस्लिम युवक, साहिल उर्फ़ शावेज़ राणा, से विवाह करना चाहती थीं। आकांक्षा एक बैंक में कार्यरत हैं और दोनों काफी समय से एक-दूसरे को जानते हैं। शादी की सभी तैयारियाँ पूरी कर ली गई थीं और निमंत्रण पत्र भी रिश्तेदारों में बाँटे जा चुके थे। हालांकि, इस रिश्ते को लेकर कुछ हिंदुत्ववादी संगठनों ने आपत्ति जताई और इसे ‘लव जिहाद’ से जोड़ते हुए विरोध शुरू कर दिया।
दोनों की सगाई 9 फरवरी को होनी थी, जबकि 13 फरवरी को विवाह तय था। लेकिन बढ़ते विरोध और दबाव के चलते अंततः यह शादी रद्द कर दी गई।
ज़ी न्यूज़ की रिपोर्ट के अनुसार, अखिल भारतीय हिंदू सुरक्षा संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष सचिन सिरोही ने कहा कि शादी के निमंत्रण पत्र में युवक का नाम साहिल लिखा गया है, जबकि वह खुद को शावेज़ राणा बताता है। उन्होंने आरोप लगाया कि नाम को लेकर भ्रम पैदा किया गया और युवती को गुमराह किया गया। संगठन का दावा है कि युवती को मानसिक रूप से प्रभावित कर इस रिश्ते के लिए मजबूर किया गया।
सचिन सिरोही का कहना है कि इस तरह के मामलों में कई बार महिलाएँ बाद में पछतावा करती हैं और यह मामला भी उसी तरह का प्रतीत होता है।
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