फील्ड इन्वेस्टिगेशन और गवाहियों के आधार पर यह रिपोर्ट चार वर्षों में पूरे राज्य में मुस्लिम परिवारों के खिलाफ हिंसा, धमकी और विस्थापन की घटनाओं का उल्लेख करती है।

एसोसिएशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ सिविल राइट्स (APCR) द्वारा जारी फैक्ट-फाइंडिंग रिपोर्ट में 2021 से 2025 के बीच उत्तराखंड के कई जिलों में मुस्लिम व्यक्तियों और परिवारों को प्रभावित करने वाली सांप्रदायिक हिंसा, धमकी, बेदखली और विस्थापन की घटनाओं की एक श्रृंखला का दस्तावेजीकरण किया गया है।
“बहिष्कृत, लक्षित और विस्थापित: उत्तराखंड में सांप्रदायिक नैरेटिव और हिंसा” शीर्षक वाली यह रिपोर्ट फील्ड इन्वेस्टिगेशन, पीड़ितों की गवाहियों, पुलिस रिकॉर्ड, अदालती दस्तावेजों, आधिकारिक नोटिस और मीडिया रिपोर्टों पर आधारित है। इसमें उत्तरकाशी, टिहरी, चमोली, नैनीताल, देहरादून, हरिद्वार और हल्द्वानी सहित कई जिलों की घटनाओं को दर्ज किया गया है और यह जांच की गई है कि किस तरह आपराधिक आरोप, प्रशासनिक कार्रवाई, धार्मिक लामबंदी और सरकारी नीतियां ज़मीनी स्तर पर सांप्रदायिक नैरेटिव के साथ जुड़ी रहीं।
APCR के अनुसार, यह रिपोर्ट बताती है कि ये घटनाएं समय के साथ कैसे सामने आईं, प्रभावित परिवारों द्वारा अनुभव की गई हिंसा और विस्थापन की प्रकृति क्या थी और प्रत्येक मामले में पुलिस तथा राज्य अधिकारियों की प्रतिक्रिया कैसी रही।
रिपोर्ट का विवरण: एक पैटर्न का उभरना
APCR के अनुसार, उत्तराखंड में सांप्रदायिक हिंसा को अलग-थलग घटनाओं की श्रृंखला के रूप में नहीं समझा जा सकता। अक्सर अफवाहों, आरोपों या हिंदुत्व समूहों द्वारा की गई राजनीतिक लामबंदी के बाद, 2021 से विभिन्न जिलों में मुसलमानों को लक्षित हिंसा, आर्थिक बहिष्कार, बेदखली, धमकी और धार्मिक स्थलों पर हमलों का सामना करना पड़ा है। ये घटनाएं उत्तरकाशी, टिहरी, चमोली, नैनीताल, देहरादून, हरिद्वार और आसपास के क्षेत्रों में हुईं, जिससे दुकानदार, प्रवासी मजदूर, धार्मिक संस्थान और लंबे समय से बसे परिवार प्रभावित हुए—जिनमें से कई दशकों से उत्तराखंड में रह रहे थे।
रिपोर्ट में कहा गया है कि कई प्रभावित मुस्लिम परिवार अपने पलायन को उत्तर प्रदेश के नजीबाबाद से जोड़ते हैं, जो 1970 और 1980 के दशक का है, जब उत्तराखंड 2000 में अलग राज्य नहीं बना था। इसके बावजूद, उन्हें बार-बार “बाहरी” कहा जाता है।
हरिद्वार धर्म संसद, 2021
APCR दिसंबर 2021 की हरिद्वार धर्म संसद को एक अहम मोड़ के रूप में चिन्हित करता है। इस तीन दिवसीय सम्मेलन में कई हिंदुत्ववादी धार्मिक नेताओं ने मुसलमानों के खिलाफ हिंसा, हिंदुत्व राष्ट्र की स्थापना और इस्लाम व ईसाई धर्म के दमन का आह्वान करते हुए भाषण दिए। रिपोर्ट में जिन वक्ताओं के नाम दर्ज हैं, उनमें यति नरसिंहानंद, प्रबोधानंद गिरि, यतींद्रानंद गिरि, साध्वी अन्नपूर्णा, स्वामी आनंद स्वरूप और कालीचरण महाराज शामिल हैं।
जन आक्रोश के बाद पुलिस में शिकायतें दर्ज की गईं, लेकिन रिपोर्ट के अनुसार इस आयोजन ने राज्य में खुले तौर पर हिंसक मुस्लिम-विरोधी बयानबाजी को सामान्य बनाने में भूमिका निभाई।
प्रशासनिक अभियान और सांप्रदायिक रंग देना
2023 में उत्तराखंड सरकार ने सरकारी जमीन पर “अवैध ढांचों” की पहचान और उन्हें हटाने के लिए राज्यव्यापी अभियान शुरू किया। दक्षिणपंथी समूहों ने इसे “लैंड जिहाद” और “मजार जिहाद” के खिलाफ कार्रवाई के रूप में प्रचारित किया। मई 2024 तक मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने दावा किया कि 5,000 एकड़ जमीन वापस ली गई है।
APCR रिकॉर्ड्स के अनुसार, मस्जिदों और मजारों को असमान रूप से निशाना बनाया गया, जबकि अन्य समुदायों के धार्मिक ढांचों पर इसी तरह की कार्रवाई नहीं की गई। रिपोर्ट में कहा गया है कि इस सोच ने तोड़फोड़ को सार्वजनिक रूप से वैध ठहराया और सांप्रदायिक तनाव को बढ़ाया।
पुरोला, 2023 — आरोप और उसके बाद
उत्तरकाशी जिले के पुरोला में उबैद खान और जितेंद्र सैनी पर एक नाबालिग हिंदू लड़की के अपहरण के आरोप ने अशांति फैला दी। बाद में अदालत में लड़की ने कहा कि उसका अपहरण नहीं किया गया था और पुलिस ने उससे जबरन बयान दिलवाया था। बरी होने के बावजूद, दक्षिणपंथी विरोध प्रदर्शन तेज हो गए।
मुस्लिम परिवारों को भागने या अपनी संपत्ति बेचने के लिए मजबूर किया गया। एक हिंदुत्ववादी महापंचायत आयोजित की गई, जिसके बाद उत्तराखंड हाई कोर्ट को हस्तक्षेप करना पड़ा और राज्य को कानून-व्यवस्था बनाए रखने के अपने दायित्व की याद दिलानी पड़ी। इसके बाद मुख्यमंत्री ने बैकग्राउंड वेरिफिकेशन उपायों की घोषणा की और कहा कि सत्यापन के बाद ही लोग उत्तराखंड में रह सकेंगे।
उत्तरकाशी, 2024 — मस्जिद को निशाना बनाना और भीड़ हिंसा
24 अक्टूबर 2024 को स्वामी दर्शन भारती के नेतृत्व में एक रैली ने उत्तरकाशी की मस्जिद को गिराने की मांग की। रैली हिंसक हो गई, जिसमें पांच पुलिसकर्मी और 30 से अधिक लोग घायल हुए तथा मुस्लिम दुकानों में तोड़फोड़ और लूटपाट हुई।
हाई कोर्ट को आश्वासन दिए जाने के बावजूद, 1 दिसंबर 2024 को एक हिंदुत्ववादी महापंचायत की अनुमति दी गई, जहां वक्ताओं—जिनमें बीजेपी विधायक टी. राजा भी शामिल थे—ने बुलडोजर से जुड़ी धमकियां दीं। APCR रिकॉर्ड्स के अनुसार, यह सीधे तौर पर हाई कोर्ट के निर्देशों की भावना का उल्लंघन था।
गवाहियों में दुकानदारों द्वारा 50,000 रुपये से 1 लाख रुपये तक के नुकसान, टूटे शटर, लूटे गए सामान और लगातार भय की स्थिति का उल्लेख किया गया है।
टिहरी क्षेत्र — श्रीनगर, चौरास, कीर्ति नगर
श्रीनगर में “लव जिहाद” के आरोपों के बाद मुसलमानों को कीर्ति नगर और चौरास से बाहर निकाले जाने की घटनाएं सामने आईं। कम से कम 15 दुकानदारों को बेदखल किया गया और उन्हें नजीबाबाद लौटने के लिए मजबूर किया गया।
APCR रिकॉर्ड्स में यह भी दर्ज है कि सांप्रदायिक नैरेटिव स्कूलों तक पहुंचे, जहां शिक्षकों द्वारा आधिकारिक कार्यक्रमों में “लव जिहाद” और “लैंड जिहाद” जैसे शब्दों का उल्लेख किया गया। मुस्लिम सरकारी कर्मचारियों ने बताया कि उन्हें “बाहरी” कहा गया और उन पर जमीन या नौकरियों पर कब्जा करने के आरोप लगाए गए। चौरास में, एक हिंदू महिला और एक मुस्लिम पुरुष के बीच संबंध के आरोपों के बाद, महिला के परिवार की ओर से कोई शिकायत न होने के बावजूद करीब पांच मुस्लिम दुकानदारों को पलायन करना पड़ा।
गौचर, चमोली — छोटे विवाद का बड़ा रूप
15 अक्टूबर 2024 को दो पुरुषों—एक हिंदू और एक मुस्लिम—के बीच हुआ पार्किंग विवाद सांप्रदायिक तनाव में बदल गया। दक्षिणपंथी समूहों के हस्तक्षेप के बाद करीब 10 मुस्लिम दुकानदारों को इलाके से हटना पड़ा।
जो परिवार 45 वर्षों से गौचर में रह रहे थे, वे रातों-रात पलायन कर गए। APCR ने अस्पतालों में भीड़ द्वारा डराने-धमकाने, दुकानों में तोड़फोड़ और पुलिस सुरक्षा में लोगों को बाहर निकालने की घटनाओं को भी दस्तावेज किया है।
नंदा घाट — जबरन रातों-रात विस्थापन
नंदा घाट में एक मुस्लिम नाई पर छेड़छाड़ के आरोप के बाद, 2–3 सितंबर 2024 को विरोध प्रदर्शन बड़े पैमाने पर हिंसा में बदल गए। दुकानों को लूटा गया, लगभग 4 लाख रुपये नकद चोरी हुए, वाहनों को नदी में फेंका गया और एक अस्थायी मस्जिद को ध्वस्त कर दिया गया।
पुलिस ने मुसलमानों को “अपनी सुरक्षा” के लिए इलाका छोड़ने की सलाह दी। 30–35 लोगों को पुलिस वाहनों में बाहर निकाला गया, जिससे पूरा समुदाय खाली हो गया। बाद में हाई कोर्ट के निर्देशों के बावजूद सुरक्षा आश्वासन मिलने पर भी अधिकांश परिवार वापस नहीं लौटे।
नैनीताल, 2024 — आपराधिक आरोप के बाद हिंसा
अप्रैल 2024 में POCSO और BNS प्रावधानों के तहत मोहम्मद उस्मान की गिरफ्तारी के बाद विरोध प्रदर्शन हिंसक हो गए। APCR दस्तावेजों में पत्थरबाजी, मुस्लिम दुकानों में तोड़फोड़, भोजनालयों पर हमले और पुलिस स्टेशन के पास स्थित नैनीताल जामा मस्जिद पर हमले का उल्लेख है।
बार-बार अनुरोधों के बावजूद घंटों तक अतिरिक्त पुलिस बल तैनात नहीं किया गया। कई सुनवाइयों के बाद भी मस्जिद को हुए नुकसान के लिए कोई FIR दर्ज नहीं की गई।
हल्द्वानी तक विस्तार
नैनीताल के बाद दक्षिणपंथी समूह हल्द्वानी पहुंचे और मुस्लिम दुकानदारों पर नाम बदलने या कारोबार बंद करने का दबाव डाला। लंबे समय से चल रही दुकानों ने अपनी धार्मिक पहचान सामने आने के बाद धमकियों की सूचना दी।
कानूनी बदलाव और संस्थागत निशाना
APCR दस्तावेजों में समान नागरिक संहिता (2024) और 2025 के संशोधनों, धर्मांतरण विरोधी कानूनों तथा अल्पसंख्यक शिक्षा व्यवस्था में किए गए बदलावों का उल्लेख है। रिपोर्ट के अनुसार, इन बदलावों से सजा बढ़ी, अवैध धर्मांतरण की परिभाषा विस्तृत हुई और मदरसों के नियमन की संरचना बदली, जिससे मुस्लिम समुदायों में स्वायत्तता के नुकसान की चिंता बढ़ी।
UMMEED पोर्टल और तोड़फोड़
रिपोर्ट में दर्ज है कि UMMEED पोर्टल के तहत डिजिटलीकरण अभियान में सभी वक्फ संपत्तियों को सीमित समय में पंजीकृत करना अनिवार्य किया गया। तकनीकी खामियों और दस्तावेजी आवश्यकताओं के कारण लगभग 75% वक्फ संपत्तियां अपंजीकृत रहीं और उन्हें स्वचालित रूप से “विवादित” घोषित कर दिया गया।
जून से नवंबर 2025 के बीच APCR ने 300 से अधिक मुस्लिम तीर्थस्थलों और दरगाहों को ध्वस्त किए जाने का रिकॉर्ड दर्ज किया, जिनमें देहरादून की हजरत कमाल शाह दरगाह जैसी पंजीकृत संपत्तियां भी शामिल थीं। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने कुछ मामलों में अवमानना नोटिस जारी किए।
रिपोर्ट के निष्कर्ष
APCR की फैक्ट-फाइंडिंग रिपोर्ट का निष्कर्ष है कि 2021 से 2025 के बीच उत्तराखंड में हुई घटनाओं को अलग-थलग नहीं देखा जा सकता। फील्ड इन्वेस्टिगेशन और सत्यापित रिकॉर्ड्स के आधार पर रिपोर्ट बताती है कि सांप्रदायिक लामबंदी, आरोपों या प्रशासनिक कार्रवाइयों के बाद मुस्लिम व्यक्तियों और परिवारों को बार-बार हिंसा, धमकियों, तोड़फोड़, आर्थिक बहिष्कार, बेदखली और विस्थापन का सामना करना पड़ा।
रिपोर्ट के अनुसार, कई मामलों में पुलिस सुरक्षा या तो देर से मिली या अपर्याप्त रही, मुस्लिम संपत्तियों और धार्मिक स्थलों पर हमलों से जुड़ी FIR लगातार दर्ज नहीं की गईं और प्रभावित परिवारों को “अपनी सुरक्षा” के नाम पर इलाका छोड़ने की सलाह दी गई। इनमें से कई परिवार दशकों से इन कस्बों में रह रहे थे और उन्हें बिना किसी औपचारिक पुनर्वास या वापसी के आश्वासन के अपने घर, दुकानें और आजीविका छोड़नी पड़ी।
APCR का कहना है कि तोड़फोड़ अभियान, सत्यापन अभ्यास और नियामक कार्रवाइयां अक्सर बढ़े हुए सांप्रदायिक तनाव के समय के साथ मेल खाती रहीं, जिससे अल्पसंख्यक समुदायों में असुरक्षा की भावना और गहरी हुई। समग्र रूप से, रिपोर्ट उत्तराखंड में मुसलमानों की सुरक्षा, गरिमा और बिना भय के रहने व काम करने की क्षमता पर पड़ रहे निरंतर प्रभाव को दर्ज करती है और इन निष्कर्षों को न्यायिक, संस्थागत और सार्वजनिक जांच के लिए रिकॉर्ड पर रखती है।
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“बहिष्कृत, लक्षित और विस्थापित: उत्तराखंड में सांप्रदायिक नैरेटिव और हिंसा” शीर्षक वाली यह रिपोर्ट फील्ड इन्वेस्टिगेशन, पीड़ितों की गवाहियों, पुलिस रिकॉर्ड, अदालती दस्तावेजों, आधिकारिक नोटिस और मीडिया रिपोर्टों पर आधारित है। इसमें उत्तरकाशी, टिहरी, चमोली, नैनीताल, देहरादून, हरिद्वार और हल्द्वानी सहित कई जिलों की घटनाओं को दर्ज किया गया है और यह जांच की गई है कि किस तरह आपराधिक आरोप, प्रशासनिक कार्रवाई, धार्मिक लामबंदी और सरकारी नीतियां ज़मीनी स्तर पर सांप्रदायिक नैरेटिव के साथ जुड़ी रहीं।
APCR के अनुसार, यह रिपोर्ट बताती है कि ये घटनाएं समय के साथ कैसे सामने आईं, प्रभावित परिवारों द्वारा अनुभव की गई हिंसा और विस्थापन की प्रकृति क्या थी और प्रत्येक मामले में पुलिस तथा राज्य अधिकारियों की प्रतिक्रिया कैसी रही।
रिपोर्ट का विवरण: एक पैटर्न का उभरना
APCR के अनुसार, उत्तराखंड में सांप्रदायिक हिंसा को अलग-थलग घटनाओं की श्रृंखला के रूप में नहीं समझा जा सकता। अक्सर अफवाहों, आरोपों या हिंदुत्व समूहों द्वारा की गई राजनीतिक लामबंदी के बाद, 2021 से विभिन्न जिलों में मुसलमानों को लक्षित हिंसा, आर्थिक बहिष्कार, बेदखली, धमकी और धार्मिक स्थलों पर हमलों का सामना करना पड़ा है। ये घटनाएं उत्तरकाशी, टिहरी, चमोली, नैनीताल, देहरादून, हरिद्वार और आसपास के क्षेत्रों में हुईं, जिससे दुकानदार, प्रवासी मजदूर, धार्मिक संस्थान और लंबे समय से बसे परिवार प्रभावित हुए—जिनमें से कई दशकों से उत्तराखंड में रह रहे थे।
रिपोर्ट में कहा गया है कि कई प्रभावित मुस्लिम परिवार अपने पलायन को उत्तर प्रदेश के नजीबाबाद से जोड़ते हैं, जो 1970 और 1980 के दशक का है, जब उत्तराखंड 2000 में अलग राज्य नहीं बना था। इसके बावजूद, उन्हें बार-बार “बाहरी” कहा जाता है।
हरिद्वार धर्म संसद, 2021
APCR दिसंबर 2021 की हरिद्वार धर्म संसद को एक अहम मोड़ के रूप में चिन्हित करता है। इस तीन दिवसीय सम्मेलन में कई हिंदुत्ववादी धार्मिक नेताओं ने मुसलमानों के खिलाफ हिंसा, हिंदुत्व राष्ट्र की स्थापना और इस्लाम व ईसाई धर्म के दमन का आह्वान करते हुए भाषण दिए। रिपोर्ट में जिन वक्ताओं के नाम दर्ज हैं, उनमें यति नरसिंहानंद, प्रबोधानंद गिरि, यतींद्रानंद गिरि, साध्वी अन्नपूर्णा, स्वामी आनंद स्वरूप और कालीचरण महाराज शामिल हैं।
जन आक्रोश के बाद पुलिस में शिकायतें दर्ज की गईं, लेकिन रिपोर्ट के अनुसार इस आयोजन ने राज्य में खुले तौर पर हिंसक मुस्लिम-विरोधी बयानबाजी को सामान्य बनाने में भूमिका निभाई।
प्रशासनिक अभियान और सांप्रदायिक रंग देना
2023 में उत्तराखंड सरकार ने सरकारी जमीन पर “अवैध ढांचों” की पहचान और उन्हें हटाने के लिए राज्यव्यापी अभियान शुरू किया। दक्षिणपंथी समूहों ने इसे “लैंड जिहाद” और “मजार जिहाद” के खिलाफ कार्रवाई के रूप में प्रचारित किया। मई 2024 तक मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने दावा किया कि 5,000 एकड़ जमीन वापस ली गई है।
APCR रिकॉर्ड्स के अनुसार, मस्जिदों और मजारों को असमान रूप से निशाना बनाया गया, जबकि अन्य समुदायों के धार्मिक ढांचों पर इसी तरह की कार्रवाई नहीं की गई। रिपोर्ट में कहा गया है कि इस सोच ने तोड़फोड़ को सार्वजनिक रूप से वैध ठहराया और सांप्रदायिक तनाव को बढ़ाया।
पुरोला, 2023 — आरोप और उसके बाद
उत्तरकाशी जिले के पुरोला में उबैद खान और जितेंद्र सैनी पर एक नाबालिग हिंदू लड़की के अपहरण के आरोप ने अशांति फैला दी। बाद में अदालत में लड़की ने कहा कि उसका अपहरण नहीं किया गया था और पुलिस ने उससे जबरन बयान दिलवाया था। बरी होने के बावजूद, दक्षिणपंथी विरोध प्रदर्शन तेज हो गए।
मुस्लिम परिवारों को भागने या अपनी संपत्ति बेचने के लिए मजबूर किया गया। एक हिंदुत्ववादी महापंचायत आयोजित की गई, जिसके बाद उत्तराखंड हाई कोर्ट को हस्तक्षेप करना पड़ा और राज्य को कानून-व्यवस्था बनाए रखने के अपने दायित्व की याद दिलानी पड़ी। इसके बाद मुख्यमंत्री ने बैकग्राउंड वेरिफिकेशन उपायों की घोषणा की और कहा कि सत्यापन के बाद ही लोग उत्तराखंड में रह सकेंगे।
उत्तरकाशी, 2024 — मस्जिद को निशाना बनाना और भीड़ हिंसा
24 अक्टूबर 2024 को स्वामी दर्शन भारती के नेतृत्व में एक रैली ने उत्तरकाशी की मस्जिद को गिराने की मांग की। रैली हिंसक हो गई, जिसमें पांच पुलिसकर्मी और 30 से अधिक लोग घायल हुए तथा मुस्लिम दुकानों में तोड़फोड़ और लूटपाट हुई।
हाई कोर्ट को आश्वासन दिए जाने के बावजूद, 1 दिसंबर 2024 को एक हिंदुत्ववादी महापंचायत की अनुमति दी गई, जहां वक्ताओं—जिनमें बीजेपी विधायक टी. राजा भी शामिल थे—ने बुलडोजर से जुड़ी धमकियां दीं। APCR रिकॉर्ड्स के अनुसार, यह सीधे तौर पर हाई कोर्ट के निर्देशों की भावना का उल्लंघन था।
गवाहियों में दुकानदारों द्वारा 50,000 रुपये से 1 लाख रुपये तक के नुकसान, टूटे शटर, लूटे गए सामान और लगातार भय की स्थिति का उल्लेख किया गया है।
टिहरी क्षेत्र — श्रीनगर, चौरास, कीर्ति नगर
श्रीनगर में “लव जिहाद” के आरोपों के बाद मुसलमानों को कीर्ति नगर और चौरास से बाहर निकाले जाने की घटनाएं सामने आईं। कम से कम 15 दुकानदारों को बेदखल किया गया और उन्हें नजीबाबाद लौटने के लिए मजबूर किया गया।
APCR रिकॉर्ड्स में यह भी दर्ज है कि सांप्रदायिक नैरेटिव स्कूलों तक पहुंचे, जहां शिक्षकों द्वारा आधिकारिक कार्यक्रमों में “लव जिहाद” और “लैंड जिहाद” जैसे शब्दों का उल्लेख किया गया। मुस्लिम सरकारी कर्मचारियों ने बताया कि उन्हें “बाहरी” कहा गया और उन पर जमीन या नौकरियों पर कब्जा करने के आरोप लगाए गए। चौरास में, एक हिंदू महिला और एक मुस्लिम पुरुष के बीच संबंध के आरोपों के बाद, महिला के परिवार की ओर से कोई शिकायत न होने के बावजूद करीब पांच मुस्लिम दुकानदारों को पलायन करना पड़ा।
गौचर, चमोली — छोटे विवाद का बड़ा रूप
15 अक्टूबर 2024 को दो पुरुषों—एक हिंदू और एक मुस्लिम—के बीच हुआ पार्किंग विवाद सांप्रदायिक तनाव में बदल गया। दक्षिणपंथी समूहों के हस्तक्षेप के बाद करीब 10 मुस्लिम दुकानदारों को इलाके से हटना पड़ा।
जो परिवार 45 वर्षों से गौचर में रह रहे थे, वे रातों-रात पलायन कर गए। APCR ने अस्पतालों में भीड़ द्वारा डराने-धमकाने, दुकानों में तोड़फोड़ और पुलिस सुरक्षा में लोगों को बाहर निकालने की घटनाओं को भी दस्तावेज किया है।
नंदा घाट — जबरन रातों-रात विस्थापन
नंदा घाट में एक मुस्लिम नाई पर छेड़छाड़ के आरोप के बाद, 2–3 सितंबर 2024 को विरोध प्रदर्शन बड़े पैमाने पर हिंसा में बदल गए। दुकानों को लूटा गया, लगभग 4 लाख रुपये नकद चोरी हुए, वाहनों को नदी में फेंका गया और एक अस्थायी मस्जिद को ध्वस्त कर दिया गया।
पुलिस ने मुसलमानों को “अपनी सुरक्षा” के लिए इलाका छोड़ने की सलाह दी। 30–35 लोगों को पुलिस वाहनों में बाहर निकाला गया, जिससे पूरा समुदाय खाली हो गया। बाद में हाई कोर्ट के निर्देशों के बावजूद सुरक्षा आश्वासन मिलने पर भी अधिकांश परिवार वापस नहीं लौटे।
नैनीताल, 2024 — आपराधिक आरोप के बाद हिंसा
अप्रैल 2024 में POCSO और BNS प्रावधानों के तहत मोहम्मद उस्मान की गिरफ्तारी के बाद विरोध प्रदर्शन हिंसक हो गए। APCR दस्तावेजों में पत्थरबाजी, मुस्लिम दुकानों में तोड़फोड़, भोजनालयों पर हमले और पुलिस स्टेशन के पास स्थित नैनीताल जामा मस्जिद पर हमले का उल्लेख है।
बार-बार अनुरोधों के बावजूद घंटों तक अतिरिक्त पुलिस बल तैनात नहीं किया गया। कई सुनवाइयों के बाद भी मस्जिद को हुए नुकसान के लिए कोई FIR दर्ज नहीं की गई।
हल्द्वानी तक विस्तार
नैनीताल के बाद दक्षिणपंथी समूह हल्द्वानी पहुंचे और मुस्लिम दुकानदारों पर नाम बदलने या कारोबार बंद करने का दबाव डाला। लंबे समय से चल रही दुकानों ने अपनी धार्मिक पहचान सामने आने के बाद धमकियों की सूचना दी।
कानूनी बदलाव और संस्थागत निशाना
APCR दस्तावेजों में समान नागरिक संहिता (2024) और 2025 के संशोधनों, धर्मांतरण विरोधी कानूनों तथा अल्पसंख्यक शिक्षा व्यवस्था में किए गए बदलावों का उल्लेख है। रिपोर्ट के अनुसार, इन बदलावों से सजा बढ़ी, अवैध धर्मांतरण की परिभाषा विस्तृत हुई और मदरसों के नियमन की संरचना बदली, जिससे मुस्लिम समुदायों में स्वायत्तता के नुकसान की चिंता बढ़ी।
UMMEED पोर्टल और तोड़फोड़
रिपोर्ट में दर्ज है कि UMMEED पोर्टल के तहत डिजिटलीकरण अभियान में सभी वक्फ संपत्तियों को सीमित समय में पंजीकृत करना अनिवार्य किया गया। तकनीकी खामियों और दस्तावेजी आवश्यकताओं के कारण लगभग 75% वक्फ संपत्तियां अपंजीकृत रहीं और उन्हें स्वचालित रूप से “विवादित” घोषित कर दिया गया।
जून से नवंबर 2025 के बीच APCR ने 300 से अधिक मुस्लिम तीर्थस्थलों और दरगाहों को ध्वस्त किए जाने का रिकॉर्ड दर्ज किया, जिनमें देहरादून की हजरत कमाल शाह दरगाह जैसी पंजीकृत संपत्तियां भी शामिल थीं। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने कुछ मामलों में अवमानना नोटिस जारी किए।
रिपोर्ट के निष्कर्ष
APCR की फैक्ट-फाइंडिंग रिपोर्ट का निष्कर्ष है कि 2021 से 2025 के बीच उत्तराखंड में हुई घटनाओं को अलग-थलग नहीं देखा जा सकता। फील्ड इन्वेस्टिगेशन और सत्यापित रिकॉर्ड्स के आधार पर रिपोर्ट बताती है कि सांप्रदायिक लामबंदी, आरोपों या प्रशासनिक कार्रवाइयों के बाद मुस्लिम व्यक्तियों और परिवारों को बार-बार हिंसा, धमकियों, तोड़फोड़, आर्थिक बहिष्कार, बेदखली और विस्थापन का सामना करना पड़ा।
रिपोर्ट के अनुसार, कई मामलों में पुलिस सुरक्षा या तो देर से मिली या अपर्याप्त रही, मुस्लिम संपत्तियों और धार्मिक स्थलों पर हमलों से जुड़ी FIR लगातार दर्ज नहीं की गईं और प्रभावित परिवारों को “अपनी सुरक्षा” के नाम पर इलाका छोड़ने की सलाह दी गई। इनमें से कई परिवार दशकों से इन कस्बों में रह रहे थे और उन्हें बिना किसी औपचारिक पुनर्वास या वापसी के आश्वासन के अपने घर, दुकानें और आजीविका छोड़नी पड़ी।
APCR का कहना है कि तोड़फोड़ अभियान, सत्यापन अभ्यास और नियामक कार्रवाइयां अक्सर बढ़े हुए सांप्रदायिक तनाव के समय के साथ मेल खाती रहीं, जिससे अल्पसंख्यक समुदायों में असुरक्षा की भावना और गहरी हुई। समग्र रूप से, रिपोर्ट उत्तराखंड में मुसलमानों की सुरक्षा, गरिमा और बिना भय के रहने व काम करने की क्षमता पर पड़ रहे निरंतर प्रभाव को दर्ज करती है और इन निष्कर्षों को न्यायिक, संस्थागत और सार्वजनिक जांच के लिए रिकॉर्ड पर रखती है।
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