जम्मू-कश्मीर: अभिव्यक्ति की आज़ादी और मीडिया को दबाने की कोशिश? पुलिस ने मीडिया और पत्रकारों को भेजा समन

Written by sabrang india | Published on: January 22, 2026
नेशनल पब्लिकेशन के चार पत्रकारों को दिए गए सख्त समन से गुस्सा भड़क गया है। यह दमनकारी कार्रवाई, जो साफ तौर पर डराने-धमकाने जैसी है, उन लोगों को निशाना बना रही है जिन्होंने जम्मू-कश्मीर प्रशासन और पुलिस द्वारा केंद्र शासित प्रदेश में मस्जिदों आदि से जुड़ी जानकारी इकट्ठा करने के विवादास्पद कदम पर रिपोर्टिंग की है।



जम्मू-कश्मीर में बड़े नेशनल पब्लिकेशन के लिए काम करने वाले करीब चार रिपोर्टर्स को पुलिस ने तलब किया है। स्क्रॉल ने यह रिपोर्ट प्रकाशित की है। द वायर ने भी इस विषय पर एक विस्तृत रिपोर्ट प्रकाशित की है, जिसे यहां पढ़ा जा सकता है। इस मामले से जुड़े एक व्यक्ति ने स्क्रॉल को बताया कि बुलाए गए चार पत्रकारों में द इंडियन एक्सप्रेस के सीनियर पत्रकार बशारत मसूद भी शामिल हैं।

मसूद ने हाल ही में कश्मीर में मस्जिदों और उनके प्रबंधन से जुड़ी जानकारी इकट्ठा करने के लिए पुलिस की एक विवादास्पद मुहिम पर रिपोर्टिंग की थी। उन्होंने बताया कि उनसे एक बॉन्ड पर हस्ताक्षर करने के लिए कहा गया, जिसमें लिखा था कि वे केंद्र शासित प्रदेश में शांति भंग करने वाला कोई काम नहीं करेंगे। गौर करने वाली बात यह है कि पुलिस की यह कार्रवाई किसी औपचारिक एफआईआर पर आधारित नहीं है, बल्कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 126 के तहत की जा रही है। उन्होंने मीडिया को यह जानकारी दी।

यह प्रावधान एक कार्यकारी मजिस्ट्रेट को उन लोगों से पहले से बॉन्ड लेने की अनुमति देता है जो “शांति भंग कर सकते हैं।” सरकारी अधिकारी व्यक्तियों के बारे में मिली सूचनाओं के आधार पर ही इस धारा का इस्तेमाल कर सकते हैं।

सीनियर पत्रकार निरुपमा सुब्रमण्यम ने सोमवार, 19 जनवरी को सोशल मीडिया पर इन घटनाओं को लेकर तीखी टिप्पणी की।

रिपोर्ट्स के अनुसार, इंडियन एक्सप्रेस के एक प्रवक्ता ने मीडिया को पुष्टि की कि मसूद को पुलिस स्टेशन बुलाया गया था। प्रवक्ता ने कहा,
“बशारत मसूद, असिस्टेंट एडिटर और 2006 से द इंडियन एक्सप्रेस के श्रीनगर ब्यूरो के सदस्य हैं। उन्हें चार दिनों तक श्रीनगर के साइबर पुलिस स्टेशन बुलाया गया और एक बॉन्ड पर हस्ताक्षर करने के लिए कहा गया, जिस पर उन्होंने हस्ताक्षर नहीं किए हैं। द इंडियन एक्सप्रेस अपने पत्रकारों के अधिकारों और गरिमा को बनाए रखने तथा उनकी रक्षा करने के लिए आवश्यक कदम उठाने के लिए प्रतिबद्ध है।”

स्क्रॉल ने श्रीनगर पुलिस के सीनियर सुपरिटेंडेंट से भी संपर्क किया और पत्रकारों को बुलाने तथा बॉन्ड पर हस्ताक्षर कराने के कारणों के बारे में पूछा। अधिकारी ने कॉल और संदेशों का कोई जवाब नहीं दिया। यदि वे प्रतिक्रिया देते हैं, तो इस स्टोरी को अपडेट किया जाएगा।

पुलिस का बुलावा

14 जनवरी की शाम मसूद को श्रीनगर में साइबर पुलिस से पहला फोन आया, जिसमें उन्हें अगली दोपहर पुलिस स्टेशन आने के लिए कहा गया, जैसा कि बाद की घटनाओं से अवगत एक व्यक्ति ने बताया। जब वे वहां पहुंचे, तो उन्हें लगभग तीन घंटे तक इंतजार कराया गया, जिसके बाद एक पुलिस अधिकारी ने उन्हें अगले दिन फिर आने को कहा। अधिकारी ने भरोसा दिलाया कि अगली बार उन्हें केवल आधे घंटे के लिए रुकना होगा। हालांकि, वरिष्ठ पत्रकार को शुक्रवार और शनिवार पूरा दिन एक सरकारी दफ्तर से दूसरे दफ्तर के चक्कर लगाने पड़े।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, मसूद को पहले पुलिस स्टेशन से डिप्टी कमिश्नर के दफ्तर भेजा गया, जहां उनसे धारा 126 के तहत एक बॉन्ड पर हस्ताक्षर करने के लिए कहा गया। बताया गया कि पुलिस अधिकारी अपनी मांग का कारण बताने को तैयार नहीं थे। जब मसूद ने हस्ताक्षर करने से इनकार किया, तो एक पुलिस अधिकारी ने उनसे कहा कि उन्हें फिर श्रीनगर सेंट्रल जेल भेज दिया जाएगा।

डिप्टी कमिश्नर के दफ्तर से पत्रकार को वापस पुलिस स्टेशन भेज दिया गया। वहां एक अधिकारी ने बताया कि उनसे बॉन्ड पर हस्ताक्षर इसलिए मांगे जा रहे हैं क्योंकि उन्होंने कश्मीर में मस्जिदों पर पुलिस कार्रवाई को लेकर राजनीतिक प्रतिक्रिया पर एक स्टोरी लिखी थी।

सोमवार दोपहर उन्हें फिर से बुलाया गया। यह चौथा दिन था जब उन्हें पुलिस स्टेशन आने के लिए मजबूर किया गया। हालांकि, इस बार पुलिस ने उन्हें ज्यादा देर तक नहीं रोका। तीन अन्य पत्रकारों को भी इसी तरह के समन मिले हैं। उनमें से एक श्रीनगर से बाहर था, जब उसे एक पुलिस अधिकारी का फोन आया और उसे आने के लिए कहा गया। अब तक अन्य किसी पत्रकार ने पुलिस स्टेशन में हाजिरी नहीं दी है।

‘प्रेस की आज़ादी पर गंभीर हमला’

जिन चार पत्रकारों को तलब किया गया था, उन्होंने जम्मू-कश्मीर पुलिस द्वारा मस्जिदों से जुड़ी जानकारी इकट्ठा करने की मुहिम पर राजनीतिक प्रतिक्रिया के बारे में रिपोर्टिंग की थी, जो पिछले एक हफ्ते से कश्मीर में विवाद का विषय बनी हुई है।

रिपोर्ट्स के अनुसार, पुलिस अधिकारी मुस्लिम-बहुल इलाकों में मस्जिदों को चार पन्नों के फॉर्म की प्रतियां बांट रहे हैं। इन फॉर्मों में पूजा स्थलों की देखरेख करने वालों के पारिवारिक पृष्ठभूमि और वित्तीय विवरण से जुड़ी विस्तृत जानकारी मांगी गई है।

इस कार्रवाई की कश्मीरी नेताओं और प्रमुख धार्मिक संगठनों ने भी आलोचना की है। उनका कहना है कि यह कदम मस्जिदों की कानूनी स्थिति की जांच से कहीं आगे बढ़कर है।

इंडियन एक्सप्रेस ने यह भी रिपोर्ट किया कि जम्मू-कश्मीर के पुलिस महानिदेशक नलिन प्रभात ने इस पर टिप्पणी करने से इनकार किया। नाम न बताने की शर्त पर एक अन्य अधिकारी ने अखबार को बताया कि पुलिस ने घाटी की सभी मस्जिदों को चार पन्नों का दस्तावेज बांटने और उनके बजट, फंडिंग के स्रोत तथा प्रबंधन समितियों के बारे में विस्तृत जानकारी मांगने वाली खबरों के बाद पत्रकारों को बुलाया था।

मसूद 2006 से द इंडियन एक्सप्रेस के श्रीनगर ब्यूरो के सदस्य हैं। अखबार के मुख्य संपादक राज कमल झा ने कहा, “पिछले दो दशकों में उनके काम खुद उनकी पत्रकारिता का प्रमाण हैं। उन्होंने पुलिस के दबाव में बॉन्ड पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं। इंडियन एक्सप्रेस अपने पत्रकारों के अधिकारों और गरिमा की रक्षा के लिए जो भी जरूरी होगा, वह करेगा।”

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