भारत में रोजगार संकट के विभिन्न पहलू

Written by बी. सिवरामन | Published on: September 17, 2022
CMIE के आंकड़ों के अनुसार, 2021-22 में भारत में श्रम बल की भागीदारी दर केवल 42.6% थी। 2022 में, यह अप्रैल 2022 तक 40% तक गिर गई। इसके अलावा, जून 2022 में श्रम बल की भागीदारी दर 38.8% तक गिर गई।


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संयुक्त राष्ट्र के अनुमान के मुताबिक अगले साल भारत जनसंख्या के मामले में चीन से आगे निकल जाएगा और दुनिया में सबसे ज्यादा आबादी वाला देश बन जाएगा। विश्व की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में भारतीय अर्थव्यवस्था सबसे तेजी से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था है। साथ ही प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में भारत में बेरोजगार लोगों की संख्या भी सबसे अधिक है।

केवल यही नहीं है कि भारत में रोजगार वृद्धि जनसंख्या वृद्धि के साथ तालमेल नहीं बिठा पा रही है, यह अर्थव्यवस्था में भी विकास दर से मेल नहीं खा रही है। यहां तक कि 1990 के दशक में भारतीय अर्थव्यवस्था की 8 से अधिक प्रतिशत की चरम वृद्धि वाली अवधि में, और नई सहस्राब्दी के पहले दशक में, विकास एक 'रोजगारविहीन विकास' साबित हुआ है।

यह सर्वविदित है कि महामारी ने लाखों भारतीयों को बेरोजगार कर दिया। महामारी से पहले के स्तर पर पहुंचने की बात तो दूर, विकास दर लगातार गिर रही है और अर्थव्यवस्था मंदी की ओर अग्रसर है। यह भारत में पहले से ही गंभीर बने रोज़गार संकट को बढ़ा रहा है।

भारत के दीर्घकालिक रोजगार संकट की जड़ पर्याप्त संख्या में रोजगार पैदा करने में भारतीय अर्थव्यवस्था की असमर्थता है, यहां तक कि विस्तारित होते कार्यबल के लिए रोज़गार पैदा करना तो दूर, बेरोजगारों के बैकलॉग को खत्म करने की स्थिति तक नहीं बनी। कार्यबल में नए जनसांख्यिकीय (demographic) वृद्धि से रोजगार सृजन लगातार पिछड़ रहा है। ‘बैलूनिंग’ बेरोज़गारी (ballooning unemployment) इसी संकट का परिणाम है।

भारत में नौकरियों का संकट कितना गंभीर है?

भारत में रोज़गार संकट कितना गंभीर है? इस पर एक समग्र विचार प्राप्त करने के लिए, आइए हम रोजगार और बेरोजगारी पर विभिन्न डेटा स्रोतों से डेटा का सारांश तैयार करें। डेटा स्रोतों और श्रेणियों की परिभाषा के बारे में पहले कुछ शब्द।

परिभाषाओं के अनुसार, श्रम शक्ति (labour force) कामकाजी उम्र की आबादी में उन लोगों की संख्या का प्रतिनिधित्व करती है जो वास्तव में काम कर रहे हैं और साथ ही जो काम करने के इच्छुक हैं लेकिन रोजगार नहीं पा रहे हैं। हालांकि, कार्यबल (workforce) एक ऐसी श्रेणी है जो केवल उन लोगों का प्रतिनिधित्व करती है जो वास्तव में काम कर रहे हैं। इस प्रकार, कार्यबल में उन लोगों की गिनती नहीं है जो काम करने के इच्छुक हैं लेकिन काम नहीं पा रहे हैं। यानि, बेरोजगार व्यक्तियों की कुल संख्या श्रम बल और कार्यबल के बीच का अंतर होता है।

भारत में रोजगार और बेरोजगारी के आंकड़ों के दो प्रमुख स्रोत हैं। एक राष्ट्रीय पतिदर्श सर्वेक्षण संगठन (NSSO) सर्वेक्षण है जो सरकार के राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) द्वारा किया जाता है। दूसरा एक निजी थिंक टैंक सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (CMIE) द्वारा हर महीने किए जाने वाले बड़े पतिदर्श सर्वेक्षण हैं। पहले, NSO पांच साल में एक बार रोजगार-बेरोजगारी सर्वेक्षण करता था जिसे एनएसएसओ राउंड कहा जाता था। लेकिन, अधिक बारंबारता वाले डेटा-अंतराल के लिए डेटा हासिल करने हेतु, अप्रैल 2017 से, NSO ने शहरी क्षेत्रों के लिए हर तिमाही (यानी, तीन महीने में एक बार) के लिए आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (PLFS), और संयुक्त रूप से शहरी और ग्रामीण क्षेत्र दोनों के लिए वार्षिक सर्वेक्षण करना शुरू कर दिया है, जो पूरे भारत के साथ-साथ अलग-अलग राज्यों को कवर करते हैं। अब तक चार वार्षिक सर्वेक्षण रिपोर्ट (जुलाई 2017 से जून 2018, जुलाई 2018 से जून 2019, जुलाई 2019 से जून 2020 और जुलाई 2020 से जून 2021) और 15 तिमाही सर्वेक्षण रिपोर्ट (अप्रैल-जून 2022 तिमाही रिपोर्ट 15 वीं तिमाही रिपोर्ट है ) को नई PLFS प्रणाली के तहत प्रकाशित किया गया है।

CMIE हर महीने बड़े पैमाने पर पतिदर्श सर्वेक्षण (sample survey) करता है और पूरे भारत के साथ-साथ अलग-अलग राज्यों के लिए, शहरी भारत के साथ-साथ ग्रामीण भारत के लिए अलग-अलग बेरोजगारी के लिए मासिक डेटा प्रस्तुत करता है। न केवल सामान्य रूप से अर्थशास्त्री बल्कि भारतीय रिजर्व बैंक और नीति आयोग जैसे सरकारी संस्थानों ने भी इन आंकड़ों को उद्धृत करना शुरू कर दिया है क्योंकि वे इन आंकड़ों को विश्वसनीय मानते हैं।

हालांकि, बेरोजगारी पर NSSO डेटा और CMIE डेटा के बीच कुछ अंतर है और CMIE बेरोजगारी डेटा अधिक उच्च है (on the higher side)।

CMIE मासिक बेरोजगारी डेटा के अनुसार, शहरी भारत में बेरोजगारी के लिए अगस्त 2022 में नवीनतम आंकड़े कुल श्रम शक्ति का 9.57% और ग्रामीण भारत के लिए 7.68% है।

दूसरी ओर, PLFS की 15 वीं तिमाही रिपोर्ट (अप्रैल-जून 2022) दर्शाती है कि अप्रैल-जून 2022 में बेरोजगारी घटकर 7.6% रह गई, जो अप्रैल-जून 2021 में 12.6% थी।

संकट के विभिन्न पहलू
श्रम शक्ति से बाहर है कामकाजी उम्र की अधिकांश आबादी

CMIE के आंकड़ों के अनुसार, 2021-22 में भारत में श्रम बल की भागीदारी दर केवल 42.6% थी। 2022 में, यह अप्रैल 2022 तक 40% तक गिर गई। इसके अलावा, जून 2022 में श्रम बल की भागीदारी दर 38.8% तक गिर गई। नतीजतन, बेरोजगारी के लिए समायोजन के बाद, केवल 35.8% कामकाजी उम्र की आबादी कार्यबल में थी। इसका मतलब है कि CMIE के आंकड़ों के अनुसार जून 2022 में भारत में कामकाजी उम्र की आबादी का एक तिहाई से थोड़ा ही अधिक हिस्सा काम कर रहा था।

महिलाओं की घटती श्रम शक्ति भागीदारी

CMIE के आंकड़ों से पता चलता है कि 2017 और 2022 के बीच, 2 करोड़ 10 लाख महिलाएं श्रम बल से "गायब" हो गईं। अब, योग्य कामकाजी उम्र की महिलाओं में से केवल 9% ही श्रम बल में शामिल होती हैं। श्रम बल में शामिल नहीं होने वालों में वे लोग थे जिन्होंने अपनी नौकरी खो दी, और साथ ही वे जो स्वेच्छा से श्रम बल से बाहर हो गए।

श्रम बल में शामिल इन 9% में से भी, जनवरी और अप्रैल 2021 के बीच, 18.4% महिलाएं जो काम करना चाहती थीं , उन्हें शहरी क्षेत्रों में काम नहीं मिल रहा था और इसलिए वे बेरोजगार रहीं। ग्रामीण महिलाओं के लिए बेरोजगारी दर 11.5% थी।

ऐसा नहीं है कि वे सभी जो श्रम शक्ति में नहीं हैं, शिक्षा ग्रहण कर रही हैं। 2019 में वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम में डी. त्रेहान द्वारा प्रस्तुत एक अध्ययन के अनुसार, अवसरों की कमी के कारण, भारत में 15-29 आयु वर्ग की 45% महिलाएं किसी भी शिक्षा, रोजगार या प्रशिक्षण में संलग्न नहीं हैं।

कोई आश्चर्य नहीं कि श्रम शक्ति में महिलाओं की इतनी कम भागीदारी के कारण भारत में समग्र श्रम शक्ति भागीदारी कम है।

युवा रोज़गार संकट

युवाओं में श्रम बल की भागीदारी दर अपने आप में बहुत कम है। CMIE के आंकड़ों के अनुसार, 2016-17 और 2021-22 के बीच सभी आयु समूहों के लिए औसत श्रम शक्ति भागीदारी का आंकड़ा 42.6% था, जबकि 15-24 आयु वर्ग के युवाओं के लिए यह 22.7% था। दूसरे शब्दों में, 5 में से केवल एक भारतीय युवा ने श्रम बल में प्रवेश किया। यह पूरी तरह बुरा न लगता अगर बाकी युवा अपनी शिक्षा पूरी कर रहे होते। लेकिन बात ऐसी नहीं थी।

बल्कि, बेरोजगारी की दर युवाओं के लिए 34% थी, जो सचमुच दिमाग चक्रा देती है। जबकि 2021-22 में सभी आयु समूहों के लिए यह केवल 7% थी। इससे पता चलता है कि भारत में युवा बेरोजगारी का संकट बहुत तीव्र है और यह कुछ निश्चित परिस्थितियों में बहुत विस्फोटक हो सकता है, जैसा कि अग्निपथ विरोध के दौरान देखने को मिला था।

कृषि में कार्यरत लोगों के हिस्से में गिरावट

यदि हम कृषि में कार्यरत लोगों को लें - जिनमें किसान, खेतिहर मजदूर और अन्य कृषि-आधारित ग्रामीण मजदूर शामिल हैं - देश के कुल कार्यबल में उनका हिस्सा 1993-94 में 61.9% से गिरकर 2018-19 में 41.4% हो गया (नीचे चित्र देखें)।

स्रोत: पहले 4 कॉलम NSSO अलग-अलग राउंड और आखिरी 3 कॉलम PLFS रिपोर्ट।

केवल 2019-20 और 2020-21 के महामारी के वर्षों में, जिसमें प्रवासियों का संकट सामने आया, देश के कुल कार्यबल में कृषि क्षेत्र की सापेक्ष हिस्सेदारी बढ़ी। ऐसा इसलिए था क्योंकि कृषि क्षेत्र ने लौटने वाले प्रवासियों को अवशोषित कर लिया था, और इस अर्थ में यह केवल संकटकालीन रोजगार (distress employment) था। न केवल कृषि के सापेक्ष हिस्से के संदर्भ में, निरपेक्ष रूप से भी किसानों की संख्या और यहां तक कि खेतिहर मजदूरों की संख्या में भी पिछले कुछ वर्षों में गिरावट आई है। 25 मार्च 2021 को ‘मिंट’ में प्रकाशित विद्या म हांबारे एट ऑल द्वारा किए गए एक अध्ययन से पता चला है कि केरल में 20 से 59 वर्ष के प्रमुख कामकाजी आयु वर्ग में, किसानों के रूप में या खेतिहर मजदूरों के रूप में कृषि में काम करना, 2004-05 में 20.3% से गिरकर 2018-19 में 8.5% हो गया था, जबकि मध्य प्रदेश में यह 2004-05 में 51.7% से घटकर 2018-19 में 35.3% हो गया, और यहां तक कि पंजाब और हरियाणा में भी कृषि में काम करने वाली आयु-आबादी का हिस्सा 2018-19 में 20% से कम रहा। कुल मिलाकर कृषि क्षेत्र बड़ी संख्या में रोजगार पैदा करने की स्थिति में नहीं है, खासकर गुणवत्तापूर्ण रोजगार। बल्कि युवा तो खेती से बाहर जा रहे हैं।

रोजगार के अवसर- आवश्यक बनाम रोजगार उत्पन्न

CMIE के आंकड़ों के अनुसार भारत में श्रम बल मार्च 2022 में 88 लाख बढ़कर अप्रैल 2022 में 43.72 करोड़ हो गया।

हालांकि, हम देखें कि भारत में औपचारिक नौकरियों का विस्तार बहुत पीछे रह गया है। सरकार नए ईपीएफओ (EPFO) सब्सक्रिप्शन की संख्या में वृद्धि के आधार पर औपचारिक नौकरियों के विस्तार के आंकड़े तक पहुंचती है। पर जरूरी नहीं कि वे नई नौकरियां हों क्योंकि औपचारिक क्षेत्र के उद्यमों में नियोक्ताओं द्वारा श्रमिकों को EPFO ग्राहकों के रूप में नामांकित किया जाता है। फिर भी, इसे औपचारिक क्षेत्र की नौकरियों के विस्तार के संकेतक के रूप में माना जा सकता है। 24 फरवरी 2022 के प्रेस सूचना ब्यूरो डेटा के अनुसार, EPFO सदस्यता में वृद्धि के संदर्भ में देखें तो औपचारिक क्षेत्र की नौकरियों का विस्तार 2018-19 में 61,12,223 नौकरियां, 2019-20 में 78,58,394 नौकरियां, 2020-21 में 77,08,375 नौकरियां रहीं। और, 2021-22 में 92,39,070 नौकरियां थीं। यहां ध्यान दें कि पूरे 2021-22 में 92 लाख नौकरियां पैदा हुईं, जबकि अकेले अप्रैल 2022 के महीने में, यानि एक माह में श्रम बल में 88 लाख का विस्तार हुआ था। यानि,औपचारिक क्षेत्र में रोजगार सृजन की तुलना में श्रम बल का विस्तार कहीं अधिक रहा है।

क्या अनौपचारिक क्षेत्र के रोजगार में विस्तार हर महीने हो रहे कार्यबल में शेष ताजा वृद्धि को पाट सकता है? क्या वह बेरोजगारों के बैकलॉग को खत्म कर सकता है ? PLFS 2017-18 के अनुसार, भारत ने हाल के वर्षों में अपने कार्यबल में सालाना 50 लाख से 1 करोड़ अनौपचारिक श्रमिकों को जोड़ा है। पर CMIE मासिक सर्वेक्षण के अनुसार, भारत ने अगस्त 2022 में केवल 21 लाख अनौपचारिक नौकरियों को जोड़ा है।

श्रम शक्ति में वृद्धि और सृजित नए रोजगार के समग्र रुझानों को ध्यान में रखते हुए अर्थशास्त्रियों ने निष्कर्ष निकाला है कि रोजगार में औसत वृद्धि श्रम बल में वृद्धि से पिछड़ रही है, जिसके कारण बेरोजगारी में लगातार वृद्धि हो रही है। यह भारत में रोज़गार संकट की जड़ है।

भारत में रोज़गार संकट के लिए कई कारक जिम्मेदार हैं। उनमें से प्रमुख हैं निजीकरण, पारंपरिक सफेदपोश रोजगार निर्माण में ठहराव, आईटी नौकरियां और ई-कॉमर्स नौकरियां स्थिर रह रही हैं, नई प्रौद्योगिकियों का विकास जैसे कृत्रिम बुद्धिमत्ता (artificial intelligence) आईटी क्षेत्र में बड़े पैमाने पर स्वचालन की ओर बढ़ने का संकेत दे रही है जिससे नौकरियां घट रही हैं; न केवल आईटी क्षेत्र में बल्कि विनिर्माण आदि में भी डिजिटलीकरण का प्रसार बढ़ रहा है।

भारत में रोज़गार संकट का एक और पहलू यह है कि रोज़गार का विस्तार मुख्य रूप से अनौपचारिक क्षेत्र में हो रहा है। कई औपचारिक क्षेत्र की नौकरियां भी अनौपचारिक बन रही हैं। जिन नौकरियों का विस्तार हो रहा है, वे मुख्य रूप से गिग वर्कर्स, स्कीम वर्कर्स और कॉन्ट्रैक्ट लेबर की हैं। उनमें से ज्यादातर अनिश्चित श्रमिक हैं। हम यह विवरण भविष्य के लेखों में शामिल करेंगे।

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