गाड़ी गड्ढों वाली सड़क पर धक्के खा रही थी पर उसका दिमाग मुस्लिमों का आर्थिक बहिष्कार करने में लगा था

Written by Mithun Prajapati | Published on: March 12, 2020
वह बच्चा जिसकी मैं बात करने वाला हूँ वह तब तक नॉर्मल था जब तक कि उसके हाथ में मोबाइल न आ गया था। वह 17 की उम्र का था, उसे बच्चा नहीं कहा जा सकता। कह सकते हैं पर उसके सामने कहें तो शायद बुरा मान जाए। सोशल मीडिया के नफरती आर्टिकल, वीडियो, फोटोशॉप वाली तस्वीरों ने उसे नफरती और धर्म रक्षक बना दिया था। अब जो धर्म रक्षक हो बच्चा कहलाना कैसे पसन्द करता? 



वह बिस्तर पर लेटे लेटे मोबाइल का नेट ऑन करता है। उन मैसेजेज में एक मैसेज पर उसकी निगाह पड़ी जिसपर लिखा था- मुस्लिमों का आर्थिक बहिष्कार क्यों जरूरी है? 

आर्टिकल पूरा पढ़ने पर उसे बात समझ में आ गई और उसनें मुस्लिमों का हर तरह से बहिष्कार करने की कसम मखमली बिस्तर पर लेटे लेटे खा ली।

वह बिस्तर से उठा। ब्रश को दांतों पर घिसने के बाद चाय के लिए बहन को चिल्लाया जैसे कि आम भारतीय पुरुष चिल्लाते हैं। उसने यह आदत आपने फादर से सीखी थी जिसे वह प्यार से पापा कहता था। जिसे वह प्यार से पापा कहता था उनसे उसने और भी आदतें सीखी थी। जैसे कि माँ बहन की गलियां देना, नहाने के बाद चड्ढी घर की महिला सदस्य के धोने के लिए छोड़ देना, खाना देर से मिलने पर माँ या बहन पर चिल्लाना आदि। 

वह नहा धोकर कस्बे की तरह मोटरसाइकिल लेकर निकला जहां से उसे कुछ किताबें लेनी थी। मन में विचार बार बार हिलोरे मार रहे थे कि मुस्लिमों का आर्थिक बहिष्कार आज से ही करना है। सड़क जिसपर वह चल रहा था जिले को जोड़ने वाला मुख्य मार्ग था। चार साल पहले बनी इस सड़क पर चक्रवृद्धि ब्याज के दर की तरह गड्ढे बढ़ते और बड़े होते जा रहे थे। उसकी मोटरसाइकिल गड्ढे में घुसती और लहराते हुए बाहर आ जाती। वह संभलता और गिरने से बाल बाल बचता। उसके लिए यह चिंता का विषय था ही नहीं। दिमाग बस  मुस्लिमों के आर्थिक बहिष्कार की बात पर अटका था। 

गड्ढों को पार करता वह कस्बे तक पहुंच गया। सड़क के दोनों किनारे दुकानें थीं। एक दुकान उसके मित्र के फादर की भी थी जो किराने की थी। वह वहीं रुका। मित्र के फादर अंदर पूजा में व्यस्त थे जो घंटी की आवाज से आसानी से समझा जा सकता था। उसका मित्र लोगों को सौदा देने में लगा था। यह वही मित्र था जो अक्सर बहिष्कार वाले मैसेज फारवर्ड करता था। दोनों मित्र मिले तो बातें होती रहीं। तमाम दुनियादारी की बातें हुईं और यह भी चर्चा हुई मुस्लिमों का बहिष्कार जरूरी है। मित्र ग्राहक देखता रहा और बातें करता रहा। ग्राहक इम्पोर्टेन्ट है। 

एक चचा आये कुछ लेने। दुकानदार मित्र ने चचा से तहज़ीब से सलाम किया। जवाब भी मधुर आवाज में आया। चचा खूब सामान लेकर आगे बढ़े। 

चचा के जाने के बाद वह भड़का। कहने लगा- अबे तुम तो मुस्लिमों का आर्थिक बहिष्कार करने निकले थे। यह क्या! उस आदमी को तुम सलाम कर रहे और माल बेच रहे? 

मित्र बोला- अरे चचा बड़े ग्राहक हैं। अच्छे आदमी हैं। और बहिष्कार में मुस्लिमों से प्रोडक्ट खरीदने का बहिष्कार होता है बेचने का नहीं।  
वह बोला- लेकिन .... 

मित्र बीच में ही बात काटते हुए बोला- देख भाई, धंधे के साथ समझौता नहीं। बाकी सबकुछ चलेगा।

वह कुछ न बोल सका। उठा और मोटरसाइकिल आगे दौड़ा दी और वहां पहुंचा जहां से किताबें लेनी थी। मन में अब बहिष्कार की जगह निराशा थी और धोके जैसा फील हो रहा था। 

किताबें उसने डिग्गी में रखी। गाड़ी लेकर घर की तरफ मुड़ा ही था कि गाड़ी ने धोखा दे दिया। चलती गाड़ी बन्द पड़ गई। बहुत मसक्कत के बाद भी न स्टार्ट हुई। बाइक के अंदरूनी पार्ट का उसे ज्ञान भी न था। क्या क्या करे कुछ समझ न आ रहा था। अचानक उठकर उसने तेल की टंकी चेक की। तेल खत्म था। 

तीन किलोमीटर के रेंज में कहीं भी पेट्रोल पंप न था। एक जो थी वह कस्बे से बाहर और उसके घर से बिलकुल विपरीत दिशा में थी। वह मजबूर धक्के देते हुए गाड़ी को पेट्रोल पंप की तरफ ले जाने लगा। दोपहर हो चली थी। महीना मार्च का था पर धक्के देते देते वह पसीने से भीगता जा रहा था। एक किलोमीटर तक घसीटते घसीटते हालत पस्त हो गई। पर क्या करता? वह रुक जाता, उपाय सोचता पर अंत इससे होता कि ऑप्शन ही क्या है? वह गाड़ी फिर धकेलने लगता। मुस्लिमों के आर्थिक बहिष्कार की जगह अब पेट्रोल ने ले ली थी। वह पसीना पोंछता धक्के देता आगे बढ़ ही रहा था कि पीछे से आवाज आई- कितना धकेलोगे भाई? क्या हो गया?

वह मुड़ा। देखा तो दो लड़के पीछे बाइक बाइक पर थे। वह बोला- पेट्रोल खत्म हो गया है।

लड़कों में से एक ने कहा- पेट्रोल पंप बहुत दूर है। कबतक धक्का मारोगे इस धूप में ? 
वह बोला- क्या करें ? ऑप्शन क्या है ?

पीछे वाले लड़के ने कहा- तुम बैठो हम पैर से पुश करते हुए ले चलते हैं। 

वह खुश हुआ और हाँ में सिर हिला दिया। गाड़ी हैंडल सम्भाले वह बैठा रहा। पीछे से बाइक सवार लड़का बेहतरी से बैलेंस बनाकर धक्के देता रहा। कुछ ही देर में हवा से उसका पसीना सूख गया और सुखद अनुभूति होने लगी। इधर उधर की बातें होती रहीं और कुछ मिनटों में ही पेट्रोल पंप आ गया। दोनों लड़कों में से पीछे वाले ने पूछा- अगर पैसे न हों तो हम कुछ दे दें भाई?
वह बोला- हो जाएंगे। 

दोनों लड़के जाने को हुए। इसने शुक्रिया अदा किया और नाम पूछने लगा। पीछे बैठे लड़के ने कहा- मैं इमरान हूँ और ये मेरा भाई सुधीर है। वैसे दोस्त है पर मैं भाई मानता हूं। तुम्हारा नाम क्या है?

वह अपना नाम सोचता ही रहा। उसके दिमाग में यही लाइन गूंज रही थी- वैसे तो मेरा दोस्त है पर मैं भाई मानता हूं। 

लड़के आगे निकल गए। वह भी पेट्रोल भरवाकर घर की तरह बढ़ा। दिमाग उसी लाइन पर अटका था-वैसे तो मेरा दोस्त है पर भाई मानता हूं। आगे पेड़ के नीचे छांव में उसने गाड़ी खड़ी की। बगल के खेत में खड़ी सरसों को छूकर आती हुई हवाओं के बीच वह अगले क्षण नफरती मैसेजेज को डिलीट कर रहा था....

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