देशभर में ऐप आधारित डिलीवरी और राइड-हेलिंग कर्मचारियों ने 25 और 31 दिसंबर को अपनी आईडी बंद कर विरोध दर्ज कराया था। इसी बीच, ब्लिंकिट की मूल कंपनी इटर्नल के सीईओ दीपिंदर गोयल ने सोशल मीडिया पर इस हड़ताल को ‘बेअसर’ करार दिया है। ऐप कर्मचारी एकता यूनियन ने गोयल के बयान को असंवेदनशील बताते हुए गिग श्रमिकों के शोषण का आरोप लगाया है।

देशभर में ऐप आधारित डिलीवरी और राइड-हेलिंग कंपनियों से जुड़े कर्मचारियों ने 25 और 31 दिसंबर 2025 को अपनी आईडी बंद कर कामकाज ठप कर दिया और कंपनियों की नीतियों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया। ऐप कर्मचारी एकता यूनियन (ऐक्टू) के अनुसार, इस आंदोलन में लाखों गिग कर्मचारियों ने भाग लिया।
यूनियन के अनुसार, स्विगी, जोमैटो, ब्लिंकिट, ज़ेप्टो, पोर्टर, ओला और उबर जैसी कंपनियों से जुड़े कर्मचारी पिछले कई वर्षों से विभिन्न शहरों में भुगतान, काम के घंटे, बीमा और सुरक्षा जैसे मुद्दों को लेकर लगातार विरोध करते आ रहे हैं।
द वायर की रिपोर्ट के अनुसार, ब्लिंकिट की मूल कंपनी इटर्नल के सीईओ दीपेंदर गोयल के हालिया बयान को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया है। ऐक्टू का आरोप है कि कर्मचारियों की शिकायतों पर सुधारात्मक कदम उठाने के बजाय गोयल ने गिग कर्मचारियों के शोषण से ही इनकार कर दिया। गोयल ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा, "ज़ोमैटो और ब्लिंकिट ने कल रिकॉर्ड गति से डिलीवरी की – पिछले कुछ दिनों में जिन हड़तालों की अपील की बातें हम सबने सुनी थीं, उनका कोई असर नहीं पड़ा. …अगर कोई व्यवस्था मूल रूप से अनुचित होती, तो वह लगातार इतने लोगों को आकर्षित नहीं कर पाती और न ही उन्हें अपने साथ बनाए रख पाती. कृपया स्वार्थी हितों द्वारा फैलाए जा रहे नैरेटिव्स में बह न जाएं।"
यूनियन ने गोयल के बयान को ‘अपमानजनक और असंवेदनशील’ करार दिया है।
यूनियन के मुताबिक, गिग कर्मचारियों को रोजाना औसतन 12 से 14 घंटे काम करने के बावजूद न्यूनतम जीवनयापन योग्य वेतन नहीं मिल पा रहा है। सड़क दुर्घटनाओं की स्थिति में मुआवजे की कोई स्पष्ट व्यवस्था नहीं है और कई मामलों में बीमा दावे भी खारिज कर दिए जाते हैं। ऐक्टू का आरोप है कि पिछले दो वर्षों में ब्लिंकिट और स्विगी इंस्टामार्ट जैसी कंपनियों ने डिलीवरी कर्मियों पर काम का दबाव और शोषण और बढ़ा दिया है।
भुगतान प्रणाली को लेकर भी गंभीर सवाल उठाए गए हैं। यूनियन का आरोप है कि कंपनियां पीक ऑवर्स के दौरान अधिक रेट दिखाकर कर्मचारियों को आकर्षित करती हैं, जिससे बड़ी संख्या में कर्मी लॉग इन कर लेते हैं और अंततः प्रति कर्मचारी कुल भुगतान घट जाता है। इसके अलावा, भर्ती पर किसी तरह की सीमा न होने और एल्गोरिदम आधारित निर्णयों के ज़रिए ‘अनुचित श्रम व्यवहार’ अपनाने के आरोप भी लगाए गए हैं।
ऐक्टू का यह भी दावा है कि दिल्ली में पिछले दो वर्षों के दौरान कई मौकों पर डार्क स्टोर्स में शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे कर्मचारियों के साथ कंपनी प्रशासन या बाउंसरों द्वारा दुर्व्यवहार और धमकी देने की घटनाएं सामने आई हैं।
केंद्र सरकार की भूमिका पर सवाल उठाते हुए यूनियन ने कहा है कि ऐप आधारित कंपनियां कर्मचारियों को ‘पार्टनर’ बताकर श्रम कानूनों की जिम्मेदारियों से बच रही हैं। यूनियन के अनुसार, हाल में लागू किए गए चार नए लेबर कोड में गिग कर्मचारियों के लिए ठोस सामाजिक सुरक्षा या कंपनियों की स्पष्ट जवाबदेही तय करने का कोई प्रभावी प्रावधान नहीं किया गया है।
ऐप कर्मचारी एकता यूनियन ने मांग की है कि सभी ऐप आधारित कर्मचारियों को श्रम कानूनों के अंतर्गत लाया जाए, उनके लिए न्यूनतम वेतन की गारंटी दी जाए और सामाजिक सुरक्षा के स्पष्ट व प्रभावी प्रावधान सुनिश्चित किए जाएं।
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यूनियन के अनुसार, स्विगी, जोमैटो, ब्लिंकिट, ज़ेप्टो, पोर्टर, ओला और उबर जैसी कंपनियों से जुड़े कर्मचारी पिछले कई वर्षों से विभिन्न शहरों में भुगतान, काम के घंटे, बीमा और सुरक्षा जैसे मुद्दों को लेकर लगातार विरोध करते आ रहे हैं।
द वायर की रिपोर्ट के अनुसार, ब्लिंकिट की मूल कंपनी इटर्नल के सीईओ दीपेंदर गोयल के हालिया बयान को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया है। ऐक्टू का आरोप है कि कर्मचारियों की शिकायतों पर सुधारात्मक कदम उठाने के बजाय गोयल ने गिग कर्मचारियों के शोषण से ही इनकार कर दिया। गोयल ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा, "ज़ोमैटो और ब्लिंकिट ने कल रिकॉर्ड गति से डिलीवरी की – पिछले कुछ दिनों में जिन हड़तालों की अपील की बातें हम सबने सुनी थीं, उनका कोई असर नहीं पड़ा. …अगर कोई व्यवस्था मूल रूप से अनुचित होती, तो वह लगातार इतने लोगों को आकर्षित नहीं कर पाती और न ही उन्हें अपने साथ बनाए रख पाती. कृपया स्वार्थी हितों द्वारा फैलाए जा रहे नैरेटिव्स में बह न जाएं।"
यूनियन ने गोयल के बयान को ‘अपमानजनक और असंवेदनशील’ करार दिया है।
यूनियन के मुताबिक, गिग कर्मचारियों को रोजाना औसतन 12 से 14 घंटे काम करने के बावजूद न्यूनतम जीवनयापन योग्य वेतन नहीं मिल पा रहा है। सड़क दुर्घटनाओं की स्थिति में मुआवजे की कोई स्पष्ट व्यवस्था नहीं है और कई मामलों में बीमा दावे भी खारिज कर दिए जाते हैं। ऐक्टू का आरोप है कि पिछले दो वर्षों में ब्लिंकिट और स्विगी इंस्टामार्ट जैसी कंपनियों ने डिलीवरी कर्मियों पर काम का दबाव और शोषण और बढ़ा दिया है।
भुगतान प्रणाली को लेकर भी गंभीर सवाल उठाए गए हैं। यूनियन का आरोप है कि कंपनियां पीक ऑवर्स के दौरान अधिक रेट दिखाकर कर्मचारियों को आकर्षित करती हैं, जिससे बड़ी संख्या में कर्मी लॉग इन कर लेते हैं और अंततः प्रति कर्मचारी कुल भुगतान घट जाता है। इसके अलावा, भर्ती पर किसी तरह की सीमा न होने और एल्गोरिदम आधारित निर्णयों के ज़रिए ‘अनुचित श्रम व्यवहार’ अपनाने के आरोप भी लगाए गए हैं।
ऐक्टू का यह भी दावा है कि दिल्ली में पिछले दो वर्षों के दौरान कई मौकों पर डार्क स्टोर्स में शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे कर्मचारियों के साथ कंपनी प्रशासन या बाउंसरों द्वारा दुर्व्यवहार और धमकी देने की घटनाएं सामने आई हैं।
केंद्र सरकार की भूमिका पर सवाल उठाते हुए यूनियन ने कहा है कि ऐप आधारित कंपनियां कर्मचारियों को ‘पार्टनर’ बताकर श्रम कानूनों की जिम्मेदारियों से बच रही हैं। यूनियन के अनुसार, हाल में लागू किए गए चार नए लेबर कोड में गिग कर्मचारियों के लिए ठोस सामाजिक सुरक्षा या कंपनियों की स्पष्ट जवाबदेही तय करने का कोई प्रभावी प्रावधान नहीं किया गया है।
ऐप कर्मचारी एकता यूनियन ने मांग की है कि सभी ऐप आधारित कर्मचारियों को श्रम कानूनों के अंतर्गत लाया जाए, उनके लिए न्यूनतम वेतन की गारंटी दी जाए और सामाजिक सुरक्षा के स्पष्ट व प्रभावी प्रावधान सुनिश्चित किए जाएं।
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