तिहाड़ जेल में बंद कश्मीरी नेता निर्दलीय लोकसभा चुनाव जीतकर चर्चा में क्यों हैं?

Written by Navnish Kumar | Published on: June 20, 2024


"कश्मीर की तीन लोकसभा सीटों में से एक में जेल में क़ैद निर्दलीय उम्मीदवार अब्दुल रशीद शेख़ ने जीत हासिल की है। आम तौर पर लोग उन्हें इंजीनियर रशीद के नाम से जानते हैं। उनकी जीत इसलिए और अहम हो जाती है क्योंकि उन्होंने जेल में रहते हुए जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री और नेशनल कॉन्फ़्रेंस नेता उमर अब्दुल्ला को दो लाख से भी ज़्यादा वोटों से शिकस्त दी है। रशीद की जीत को जम्मू-कश्मीर की अर्ध-स्वायत्त स्थिति को रद्द करने के खिलाफ लोकप्रिय जन भावना की स्पष्ट अभिव्यक्ति के रूप में भी देखा जा रहा है। यही कारण है कि कश्मीर ही नही, देश भर में सोशल मीडिया पर इंजीनियर रशीद की जीत की जबरदस्त चर्चाएं हो रही हैं।"

उनकी जीत पर एक स्थानीय समर्थक कहते हैं कि साल 2019 के बाद जो कुछ भी कश्मीर में हुआ, इंजीनियर रशीद की जीत उसी बात का जवाब है। उनका कहना था कि कश्मीर के युवाओं ने जिस तरह इंजीनियर रशीद का समर्थन किया है, वो इस बात को दर्शाता है कि नई पीढ़ी नए चेहरों को ढूंढ रही है और पारंपरिक राजनीति से तंग आ चुकी हैं। अखिल भारतीय वन जन श्रमजीवी यूनियन से जुड़े वनाधिकार कार्यकर्ता शकील बताते हैं कि रशीद 2014 से 2019 तक लगातार कश्मीर पर भारत और पाकिस्तान के बीच रायशुमारी की बात करते रहे थे। फिर, उन्हें पांच साल से ज्यादा से जेल में डाला हुआ है। सभी नेता छूट गए हैं। उनका प्रॉपर ट्रायल नहीं होना भी अन्नाय है। बाकी सभी नेता कश्मीर में ही बंद थे, इन्हें दिल्ली में क्यों रखा गया है। इससे भी लोगों में उनके प्रति सहानुभूति जगी है। खास है कि बारामुला सीट पर रशीद को चार लाख 72 हज़ार वोट मिले जबकि उमर अब्दुल्ला को दो लाख 68 हज़ार वोट मिले। तीसरे स्थान पर रहे जम्मू- कश्मीर पीपल्स कॉन्फ़्रेंस के सज्जाद लोन को एक लाख 73 हज़ार वोट मिले है।

इंजीनियर रशीद दिल्ली की जेल में बंद हैं। उन्हें 'आतंकवाद की फ़ंडिंग' के आरोप में यूएपीए के तहत 2019 में गिरफ़्तार किया गया था और इस समय वो दिल्ली के तिहाड़ जेल में बंद हैं। 2019 में केंद्र सरकार ने इस क़ानून में संशोधन कर सरकार को ये ताक़त दी कि किसी भी व्यक्ति पर अदालती कार्रवाई के बग़ैर उन्हें चरमपंथी या देश विरोधी घोषित कर सकती है। बीबीसी की एक रिपोर्ट के अनुसार, गिरफ्तारी के बाद इंजीनियर रशीद को समर्थन दे रही अवामी इत्तेहाद पार्टी ने उन पर लगे आरोपों को ख़ारिज किया है। पार्टी का कहना है कि रशीद पर लगे आरोप एक राजनीतिक साज़िश है। रशीद अवामी इत्तेहाद पार्टी के संस्थापकों में से एक हैं। 2019 में भी उन्होंने बारामुला से पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ा था और तीसरे नंबर पर रहे थे।

अब्दुल रशीद शेख़ का जन्म हंदवाड़ा क़स्बा के लाछ, मावर में हुआ था। श्रीनगर पॉलिटेक्निक से सिविल इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने वाले रशीद ने एक सरकारी विभाग में इंजीनियर के पद पर क़रीब 25 साल तक नौकरी की थी। 2003 के दौरान उन्होंने कश्मीर में उस समय के मशहूर उर्दू साप्ताहिक अख़बार 'चट्टान' में राजनीतिक मुद्दों पर लिखना शुरू किया। उनके लेखों से उन्हें काफ़ी शोहरत मिली। इसी दौरान उन्होंने कश्मीर में भारतीय सेना के कथित मानवाधिकार उल्लंघन के ख़िलाफ़ भी आवाज़ उठानी शुरू की। वो धरनों और प्रदर्शनों के ज़रिए अपनी बात रखते थे। जेल जाने से पहले इंजीनियर रशीद शांतिपूर्ण तरीक़े से कश्मीर समस्या को हल करने की वकालत करते रहे हैं। इंजीनियर रशीद जम्मू कश्मीर से संविधान के अनुच्छेद 370 को हटाने के सख़्त ख़िलाफ़ थे और इस मुद्दे को लेकर वो सड़कों पर भी उतरे थे। उन्होंने इसे लेकर कई धरने दिए हैं। अनुच्छेद 370 के निष्प्रभावी होने के बाद उनकी कैद और कश्मीरियों के अधिकारों की वकालत मतदाताओं को पसंद आई।

2000 के दशक की शुरु में, रशीद ने लंगेट में सुरक्षा बलों द्वारा नागरिकों के उत्पीड़न के खिलाफ अभियान का नेतृत्व किया था। 2002 में चौ अब्दुल गनी लोन की हत्या के बाद, वह सज्जाद के साथ थे। दोनों ने 2008 में चुनावी राजनीति में प्रवेश करने की योजना बनाई थी, लेकिन अमरनाथ भूमि विवाद आंदोलन के बाद सज्जाद पीछे हट गए। रशीद ने निर्दलीय के रूप में विधानसभा चुनाव लड़ा और जीता। बीबीसी के अनुसार, उन्होंने 2013 में उन्होंने अपनी पार्टी बनाई और उसका नाम रखा- अवामी इत्तेहाद पार्टी। 2014 के विधानसभा चुनाव में वो दोबारा विधायक बने। इस साल उन्होंने बारामुला से लोकसभा का चुनाव भी लड़ा था लेकिन वो हार गए। 2015 में, जब उन्होंने गोमांस खाने पर प्रतिबंध हटाने के लिए एक विधेयक पेश किया, तो विधानसभा में चर्चा के लिए नहीं लिया गया, उन्होंने श्रीनगर में एक गोमांस पार्टी की मेजबानी की, जिससे उनके और भाजपा विधायकों के बीच झड़प हो गई। इसके बाद एक घटना में 2015 में दिल्ली के प्रेस क्लब में कुछ लोगों ने उन पर काली स्याही फेंकी थी। रशीद ने 2019 में बारामूला लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा, लेकिन तीसरे स्थान पर रहे। महीनों बाद, अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी कर दिया गया और रशीद को गिरफ्तार कर लिया गया। उनकी जीत से उन्हें आगामी विधानसभा चुनावों में एक ताकत के रूप में स्थापित करने की संभावना है।  

तिहाड़ से चला चुनाव अभियान, बेटों ने किया प्रचार, नारा था “तिहाड़ का बदला” भीड़ का जवाब, “वोट से।” 

रशीद ने तिहाड़ जेल से ही अपना चुनावी अभियान चलाया। उनकी अनुपस्थिति में उनके बेटों अबरार और असरार ने उनके लिए प्रचार किया। दोनों भाई, जिनकी उम्र 20 साल के आसपास है, जोश से भरे नारे लगाते हुए भीड़ का नेतृत्व कर रहे थे। हर रैली की शुरुआत अबरार के नारे से होती थी, “तिहाड़ का बदला” जिस पर भीड़ जवाब देती थी, “वोट से।” अबरार नारे लगाते हुए आगे बढ़ते थे “जुल्म (अन्याय) का बदला” और “जेल का बदला” जिनमें से हर बार “वोट से” की जोरदार प्रतिक्रिया मिलती थी। दरअसल, अनुच्छेद 370 के निष्प्रभावी होने के बाद उनकी कैद और कश्मीरियों के अधिकारों की वकालत मतदाताओं को पसंद आई। सीलो में एक रैली में अबरार ने कहा, "मुझे पता है आप बहिष्कार करने वाले हो। लेकिन मुझसे वादा करो... इस बार, आप बाहर निकलेंगे और मतदान करेंगे।" नतीजा, बारामुला में 2019 में 35 प्रतिशत से ज्यादा 59 प्रतिशत रिकॉर्ड मतदान हुआ। रशीद जीते। अबरार ने कहा, "हमारे पास सीमित संसाधन थे और हमें हमेशा अपने पिता की कमी महसूस होती थी। लेकिन हमने जमीनी स्तर पर लोगों तक पहुंचने की कोशिश की, जिसके परिणाम सामने आए हैं।" 

उनकी सफलता जम्मू-कश्मीर में अन्य जीतों के विपरीत थी। जम्मू क्षेत्र में, भाजपा के जितेंद्र सिंह और जुगल किशोर शर्मा ने क्रमशः उधमपुर और जम्मू निर्वाचन क्षेत्रों में हैट्रिक बनाई, हालांकि 2019 की तुलना में कम अंतर से। श्रीनगर में, नेशनल कॉन्फ्रेंस के आगा सैयद रूहुल्लाह मेहदी ने पीडीपी के वहीद पारा को 1.80 लाख वोटों से हराया। अनंतनाग- राजौरी- पुंछ में, पीडीपी अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती को नेशनल कॉन्फ्रेंस के मियां अल्ताफ अहमद ने 2.81 लाख वोटों से हराया।

अब जनता को उनके जेल से बाहर आने का इंतजार 

इंजीनियर रशीद के भाई खुर्शीद कहते हैं कि "जिस देश का संविधान इतना आज़ाद है कि रशीद साहब को चुनाव लड़ने की इजाज़त दी, उसी देश के कुछ गिने-चुने व्यक्तियों ने उनके बुनियादी अधिकार उनसे छीन लिए हैं।" वो कहते हैं उन्हें उम्मीद थी कि जिस तरह से उन्होंने अपने इलाक़े में विकास का काम किया है और लोगों के अधिकार की बात करते आ रहे हैं, उसका फल उन्हें ज़रूर मिलेगा। वो कहते हैं, "अब उन्होंने चुनाव जीत लिया है और हमें उनके बाहर आने का इंतज़ार है। परिवार से ज़्यादा अब जनता को उनका इंतज़ार है, जिन्होंने उनको चुना है।"

खास यह भी कि इस बार घाटी में चुनावी मुद्दे क़रीब एक जैसे ही थे। घाटी की दोनों प्रमुख पार्टियों नेशनल कॉन्फ्रेंस और पीडीपी ने 370 के ख़त्म किए जाने को अपना सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा बनाया था। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 370 के तहत जम्मू-कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा हासिल था। केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने अगस्त 2019 में संविधान के इस अनुच्छेद को हटा दिया और जम्मू-कश्मीर से राज्य का दर्जा छीनते हुए उसे दो केंद्र शासित प्रदेशों में तब्दील कर दिया था। जम्मू-कश्मीर में इस लिहाज़ से भी ये चुनाव काफ़ी अहम था क्योंकि 370 के हटाने के बाद वहां यह पहली बार बड़ा चुनाव हो रहा था। खास इस मायने में भी है कि 370 हटाने के बाद पहली बार हुए चुनाव में भाजपा ने घाटी में अपने उम्मीदवार ही नहीं खड़े किए, एक तरह से यह अपनी ही नीतियों के खिलाफ सरेंडर करने जैसा था। दरअसल सरकार लगातार दावा कर रही है कि 370 हटाने के बाद कश्मीर विकास की राह पर आगे बढ़ रहा है। जम्मू कश्मीर के उप-राज्यपाल मनोज सिन्हा भी बार -बार 'नए कश्मीर' की बात कर रहे हैं।

सीपीएम नेता पूर्व विधायक मोहम्मद यूसुफ़ तारिगामी ने चुनावी नतीजे आने के बाद बीबीसी से बातचीत में कहा, "कश्मीर की जनता के लिए ये एक बड़ी ख़बर है कि जो विश्वास ख़त्म हो गया था, वो फिर से वापस लौट रहा है। जम्मू-कश्मीर के लोग जिस मायूसी के दलदल में फंस गए थे, उस मायूसी से निकलने का आज उन्हें रास्ता नज़र आ रहा है।" "जो संविधान का भविष्य है, वो अब सुरक्षित रहेगा। संसद में विपक्ष की अब एक मज़बूत आवाज़ उभरेगी और मनमानी का दौर अब ख़त्म होगा। इसी मनमानी के कारण जम्मू-कश्मीर में एक लंबे समय से विधानसभा के चुनाव भी नहीं हो सके।"

“यथास्थिति के खिलाफ प्रतिरोध का प्रतीक” रशीद 

रशीद की जीत को जम्मू-कश्मीर की अर्ध-स्वायत्त स्थिति को रद्द करने के खिलाफ लोकप्रिय जन भावना की स्पष्ट अभिव्यक्ति के रूप में देखा जा रहा है। ​​इंजीनियर रशीद, जिन्होंने जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला को हराया है, कश्मीर के एकमात्र राजनीतिक नेता हैं जो जम्मू-कश्मीर की अर्ध-स्वायत्त स्थिति के निरस्त होने के बाद पांच साल से अधिक समय तक जेल में बंद हैं। कश्मीर स्थित एक स्थानीय दैनिक, कश्मीर ऑब्जर्वर के हाल के संपादकीय में , राशिद को “यथास्थिति के खिलाफ प्रतिरोध का प्रतीक” बताया गया। श्रीनगर के वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक टिप्पणीकार मोहम्मद सईद मलिक के अनुसार, उनकी जीत जम्मू-कश्मीर की अर्ध-स्वायत्त स्थिति को खत्म करने के खिलाफ़ लोगों की लोकप्रिय भावना की स्पष्ट अभिव्यक्ति है। मलिक ने फ्रंटलाइन से कहा, "सज्जाद लोन के विपरीत, उमर अब्दुल्ला और इंजीनियर रशीद दोनों ही अनुच्छेद 370 और 35 (ए) को खत्म करने के विरोधी थे। संक्षेप में कहें तो रशीद को सहानुभूति वोट इसलिए मिला क्योंकि 5 अगस्त, 2019 को कश्मीर के साथ एकतरफा तरीके से जो किया गया, उस पर अपनी वैचारिक स्थिति के लिए वह जेल में हैं।" कहा जाता है कि रशीद एक सड़क-लड़ाकू हैं और घाटी के लोगों ने अब तक उन्हें सबसे अलग तरह का विधायक देखा है। वह कश्मीर में मानवाधिकारों के उल्लंघन के खिलाफ विरोध प्रदर्शनों में सबसे आगे रहे हैं और कई मौकों पर सुरक्षा बलों द्वारा उनकी पिटाई की गई है और उन्हें हिरासत में लिया गया है।

कुपवाड़ा निवासी परवेज़ मजीद, जो श्रीनगर के अमर सिंह कॉलेज में पत्रकारिता पढ़ाते हैं, वे उन कारणों को गिनाते हैं, जिनकी वजह से इस तेजतर्रार नेता के लिए लोगों में भारी सहानुभूति की लहर पैदा हुई। मजीद ने फ्रंटलाइन से कहा, "एक आम आदमी के रूप में देखा जाए तो वह एक सादगीपूर्ण जीवन जीने वाले व्यक्ति हैं और उनकी छवि साफ-सुथरी है। उन्होंने हमेशा अपने विधानसभा क्षेत्र से बाहर भी जनहित के मुद्दों के लिए लड़ाई लड़ी है। विधायक के तौर पर उन्हें कभी भी सरकारी सुरक्षा और वाहन जैसी आधिकारिक सुविधाएं नहीं मिलीं।" इंजीनियर रशीद को इस साल जनवरी से अपने परिवार से फोन पर बात करने की अनुमति नहीं दी गई है, परिवार के एक सदस्य ने बताया। रशीद को बधाई देते हुए उमर अब्दुल्ला ने एक्स पर लिखा: "मुझे नहीं लगता कि उनकी जीत से उन्हें जेल से जल्दी रिहाई मिलेगी और न ही उत्तरी कश्मीर के लोगों को वह प्रतिनिधित्व मिलेगा जिसका उन्हें अधिकार है, लेकिन मतदाताओं ने अपनी बात कह दी है और लोकतंत्र में यही मायने रखता है।"

लद्दाख में भी मोहम्मद हनीफा निर्दलीय जीते 

लद्दाख में मुस्लिम बहुल कारगिल का प्रतिनिधित्व करने वाले एक स्वतंत्र उम्मीदवार मोहम्मद हनीफा ने कांग्रेस के त्सेरिंग नामग्याल को हराया। केंद्र शासित प्रदेश के रूप में नामित होने के बाद से लद्दाख छठी अनुसूची की स्थिति और राज्य का दर्जा न दिए जाने को लेकर अशांति का केंद्र रहा है। कांग्रेस और भाजपा के बीच बौद्ध मतों के विभाजन ने हनीफा की सफलता का मार्ग प्रशस्त किया। रशीद और हनीफा के लोकसभा चुनाव जीतने के साथ ही केंद्र शासित प्रदेश में नई राजनीतिक वास्तविकताएं सामने आई हैं।

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