महाराष्ट्र में चारोटी से पालघर तक CPI (M) के नेतृत्व में हुआ विशाल लॉन्ग मार्च कलेक्टर कार्यालय पर धरने के साथ समाप्त हुआ।

वन अधिकार अधिनियम, 2006 के तहत सामुदायिक स्वामित्व अधिकारों की मांग और महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कार्यक्रम (मनरेगा) को फिर से शुरू करने की मांग को लेकर, 50,000 आदिवासी महिलाएं और अन्य किसान महाराष्ट्र में चारोटी से पालघर तक मार्च कर रहे हैं। इस मार्च की मुख्य मांगें इस प्रकार हैं: वन अधिकार अधिनियम का सख्ती से पालन; सभी मंदिर, इनाम और सरकारी जमीनें काश्तकारों के नाम करना; मनरेगा को बहाल करना; स्मार्ट मीटर योजना को रद्द करना; पेसा लागू करना; श्रम कानूनों को रद्द करना; दहानू तटीय क्षेत्र में वधावन और मुरबे बंदरगाह परियोजनाओं को रद्द करना; तथा पीने और सिंचाई के पानी, शिक्षा, रोजगार, राशन, स्वास्थ्य और अन्य सुविधाओं में बढ़ोतरी करना।
प्रदर्शनकारी मुख्य रूप से पालघर जिले के आदिवासी समुदायों से हैं। उन्होंने भूमि अधिकारों को प्रभावी ढंग से लागू करने, मनरेगा को फिर से शुरू करने, वधावन बंदरगाह को रद्द करने और पीने व सिंचाई के लिए पानी की उपलब्धता जैसी मांगों को लेकर कलेक्टर कार्यालय की ओर अपनी यात्रा शुरू की थी। माइक्रोफ़ोन पर विरोध गीत गाते हुए, CPI (M) के झंडे और बैनर लिए, नारे लगाते हुए प्रदर्शनकारी 20 जनवरी की शाम को पालघर कलेक्टर कार्यालय पहुंचे, जहां वे अपनी मांगें पूरी होने तक डेरा डालने की योजना बना रहे हैं। इनमें सबसे पुरानी और प्रमुख मांग भूमि अधिकारों को लागू करने की है। आदिवासी सदियों से जंगल और चरागाह की जमीन पर खेती करते आ रहे हैं, फिर भी वे उन ज़मीनों के मालिक नहीं हैं जिन पर वे खेती करते हैं।
वन अधिकार अधिनियम, 2006, अनुसूचित जनजातियों और अन्य पारंपरिक वनवासियों को वन भूमि और संसाधनों पर अधिकार देता है, जो पीढ़ियों से ऐसे क्षेत्रों में रह रहे हैं। ग्राम सभाएं दावे शुरू करती हैं, जिनकी पुष्टि उप-विभागीय और जिला समितियों द्वारा की जाती है, और जब तक अधिकार तय नहीं हो जाते, तब तक निवासियों को बेदखली से संरक्षण दिया जाता है। हालांकि, रैली में शामिल अधिकांश आदिवासी किसानों के दावे अब तक मंजूर नहीं हुए हैं। पिछली बार जब किसानों ने हजारों की संख्या में मार्च किया था, तो उन्होंने नासिक से मुंबई के आज़ाद मैदान तक 180 किलोमीटर की दूरी तय की थी, जिसमें कई लोग नंगे पांव चले थे। इस बार भी ऑल इंडिया किसान सभा (AIKS), सेंटर ऑफ इंडियन ट्रेड यूनियंस (CITU), ऑल इंडिया डेमोक्रेटिक विमेन एसोसिएशन (AIDWA), डेमोक्रेटिक यूथ फेडरेशन ऑफ इंडिया (DYFI), स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (SFI) और आदिवासी अधिकार राष्ट्रीय मंच (AARM) बड़ी संख्या में इस मार्च में शामिल हुए हैं। 19 जनवरी को लंबी पैदल यात्रा शुरू करने के बाद, मार्च करने वाले पालघर कलेक्ट्रेट पहुंचे, जहां उन्हें कलेक्ट्रेट परिसर के अंदर धरना देने की अनुमति नहीं दी गई। इसके बावजूद उन्होंने बाहर अनिश्चितकालीन विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया है।
सिटिज़न्स फ़ॉर जस्टिस एंड पीस ने किसानों के अधिकारों पर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय कानूनों का लंबे समय से विश्लेषण किया है। इनमें से कुछ को यहां और यहां पढ़ा जा सकता है।
इस मार्च का नेतृत्व CPI (M) पोलित ब्यूरो सदस्य और AIKS के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. अशोक धवले, पोलित ब्यूरो सदस्य और AIDWA की राष्ट्रीय महासचिव मरियम धवले, केंद्रीय समिति सदस्य, राज्य सचिव और AIKS के राष्ट्रीय संयुक्त सचिव डॉ. अजीत नवाले, केंद्रीय समिति सदस्य और CITU के राज्य सचिव विनोद निकोले, दहानू से दो बार के विधायक, राज्य सचिवालय सदस्य और AARM के राज्य संयोजक किरण गहाला सहित कई अन्य नेता कर रहे हैं। बाद में CPI (M) पोलित ब्यूरो सदस्य और AIKS के राष्ट्रीय महासचिव विजू कृष्णन भी मार्च में शामिल हुए।


पालघर पुलिस अधिकारियों के हवाले से द हिंदू की रिपोर्ट के अनुसार, करीब 30,000 प्रदर्शनकारी इस लॉन्ग मार्च में शामिल हुए। मांगों में वन अधिकार अधिनियम और पंचायतों के अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार अधिनियम (PESA) को पूरी तरह लागू करना, रोजगार उपलब्ध कराने के लिए जल जीवन मिशन योजना को फिर से शुरू करना, स्मार्ट मीटर योजना को रद्द करना, पालघर जिले की सरकारी सेवाओं में सभी रिक्त पदों पर नियुक्ति, घरकुल योजना का लाभ देना और वधावन व मुरबे बंदरगाहों के विकास को रद्द करना शामिल है।
CPI (M) की महिला विंग की राज्य सचिव प्राची हतिवलेकर ने अख़बार को बताया, “यह संघर्ष बहुत पुराना है—बंधुआ मजदूरी से लेकर अब भूमि स्वामित्व हस्तांतरण के लंबे समय से लंबित मुद्दों तक। केंद्र सरकार केवल वन अधिकार अधिनियम को कमजोर करने की कोशिश कर रही है।”
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, प्रदर्शनकारी स्मार्ट मीटर के खिलाफ भी मुखर हैं। वे चाहते हैं कि सरकार पुराने मीटर फिर से लगाए और अपने अधिकारियों को स्मार्ट मीटर न लगाने का निर्देश दे। महाराष्ट्र राज्य बिजली वितरण कंपनी लिमिटेड (MSEDCL) ने 2021 में स्मार्ट मीटर लगाए थे, जो रियल-टाइम बिजली खपत रिकॉर्ड कर डेटा कंपनी को भेजते हैं। हालांकि, इन मीटरों की बिलों में बढ़ोतरी, इंस्टॉलेशन के लिए सहमति न लेने और टैरिफ में बदलाव को लेकर पर्याप्त जानकारी न दिए जाने के कारण आलोचना की जा रही है।
स्मार्ट मीटर पर यह रिपोर्ट यहां पढ़ी जा सकती है।
यह विरोध प्रदर्शन जिले में भूमि स्वामित्व, बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स और मनरेगा में बदलाव को लेकर आदिवासी समुदायों में गहरे असंतोष को दर्शाता है। सभी प्रदर्शनकारियों ने एक स्वर में कहा कि जब तक “हमारे सभी कागज़ों पर मुहर नहीं लग जाती, हम घर नहीं जाएंगे।”
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प्रदर्शनकारी मुख्य रूप से पालघर जिले के आदिवासी समुदायों से हैं। उन्होंने भूमि अधिकारों को प्रभावी ढंग से लागू करने, मनरेगा को फिर से शुरू करने, वधावन बंदरगाह को रद्द करने और पीने व सिंचाई के लिए पानी की उपलब्धता जैसी मांगों को लेकर कलेक्टर कार्यालय की ओर अपनी यात्रा शुरू की थी। माइक्रोफ़ोन पर विरोध गीत गाते हुए, CPI (M) के झंडे और बैनर लिए, नारे लगाते हुए प्रदर्शनकारी 20 जनवरी की शाम को पालघर कलेक्टर कार्यालय पहुंचे, जहां वे अपनी मांगें पूरी होने तक डेरा डालने की योजना बना रहे हैं। इनमें सबसे पुरानी और प्रमुख मांग भूमि अधिकारों को लागू करने की है। आदिवासी सदियों से जंगल और चरागाह की जमीन पर खेती करते आ रहे हैं, फिर भी वे उन ज़मीनों के मालिक नहीं हैं जिन पर वे खेती करते हैं।
वन अधिकार अधिनियम, 2006, अनुसूचित जनजातियों और अन्य पारंपरिक वनवासियों को वन भूमि और संसाधनों पर अधिकार देता है, जो पीढ़ियों से ऐसे क्षेत्रों में रह रहे हैं। ग्राम सभाएं दावे शुरू करती हैं, जिनकी पुष्टि उप-विभागीय और जिला समितियों द्वारा की जाती है, और जब तक अधिकार तय नहीं हो जाते, तब तक निवासियों को बेदखली से संरक्षण दिया जाता है। हालांकि, रैली में शामिल अधिकांश आदिवासी किसानों के दावे अब तक मंजूर नहीं हुए हैं। पिछली बार जब किसानों ने हजारों की संख्या में मार्च किया था, तो उन्होंने नासिक से मुंबई के आज़ाद मैदान तक 180 किलोमीटर की दूरी तय की थी, जिसमें कई लोग नंगे पांव चले थे। इस बार भी ऑल इंडिया किसान सभा (AIKS), सेंटर ऑफ इंडियन ट्रेड यूनियंस (CITU), ऑल इंडिया डेमोक्रेटिक विमेन एसोसिएशन (AIDWA), डेमोक्रेटिक यूथ फेडरेशन ऑफ इंडिया (DYFI), स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (SFI) और आदिवासी अधिकार राष्ट्रीय मंच (AARM) बड़ी संख्या में इस मार्च में शामिल हुए हैं। 19 जनवरी को लंबी पैदल यात्रा शुरू करने के बाद, मार्च करने वाले पालघर कलेक्ट्रेट पहुंचे, जहां उन्हें कलेक्ट्रेट परिसर के अंदर धरना देने की अनुमति नहीं दी गई। इसके बावजूद उन्होंने बाहर अनिश्चितकालीन विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया है।
सिटिज़न्स फ़ॉर जस्टिस एंड पीस ने किसानों के अधिकारों पर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय कानूनों का लंबे समय से विश्लेषण किया है। इनमें से कुछ को यहां और यहां पढ़ा जा सकता है।
इस मार्च का नेतृत्व CPI (M) पोलित ब्यूरो सदस्य और AIKS के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. अशोक धवले, पोलित ब्यूरो सदस्य और AIDWA की राष्ट्रीय महासचिव मरियम धवले, केंद्रीय समिति सदस्य, राज्य सचिव और AIKS के राष्ट्रीय संयुक्त सचिव डॉ. अजीत नवाले, केंद्रीय समिति सदस्य और CITU के राज्य सचिव विनोद निकोले, दहानू से दो बार के विधायक, राज्य सचिवालय सदस्य और AARM के राज्य संयोजक किरण गहाला सहित कई अन्य नेता कर रहे हैं। बाद में CPI (M) पोलित ब्यूरो सदस्य और AIKS के राष्ट्रीय महासचिव विजू कृष्णन भी मार्च में शामिल हुए।


पालघर पुलिस अधिकारियों के हवाले से द हिंदू की रिपोर्ट के अनुसार, करीब 30,000 प्रदर्शनकारी इस लॉन्ग मार्च में शामिल हुए। मांगों में वन अधिकार अधिनियम और पंचायतों के अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार अधिनियम (PESA) को पूरी तरह लागू करना, रोजगार उपलब्ध कराने के लिए जल जीवन मिशन योजना को फिर से शुरू करना, स्मार्ट मीटर योजना को रद्द करना, पालघर जिले की सरकारी सेवाओं में सभी रिक्त पदों पर नियुक्ति, घरकुल योजना का लाभ देना और वधावन व मुरबे बंदरगाहों के विकास को रद्द करना शामिल है।
CPI (M) की महिला विंग की राज्य सचिव प्राची हतिवलेकर ने अख़बार को बताया, “यह संघर्ष बहुत पुराना है—बंधुआ मजदूरी से लेकर अब भूमि स्वामित्व हस्तांतरण के लंबे समय से लंबित मुद्दों तक। केंद्र सरकार केवल वन अधिकार अधिनियम को कमजोर करने की कोशिश कर रही है।”
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, प्रदर्शनकारी स्मार्ट मीटर के खिलाफ भी मुखर हैं। वे चाहते हैं कि सरकार पुराने मीटर फिर से लगाए और अपने अधिकारियों को स्मार्ट मीटर न लगाने का निर्देश दे। महाराष्ट्र राज्य बिजली वितरण कंपनी लिमिटेड (MSEDCL) ने 2021 में स्मार्ट मीटर लगाए थे, जो रियल-टाइम बिजली खपत रिकॉर्ड कर डेटा कंपनी को भेजते हैं। हालांकि, इन मीटरों की बिलों में बढ़ोतरी, इंस्टॉलेशन के लिए सहमति न लेने और टैरिफ में बदलाव को लेकर पर्याप्त जानकारी न दिए जाने के कारण आलोचना की जा रही है।
स्मार्ट मीटर पर यह रिपोर्ट यहां पढ़ी जा सकती है।
यह विरोध प्रदर्शन जिले में भूमि स्वामित्व, बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स और मनरेगा में बदलाव को लेकर आदिवासी समुदायों में गहरे असंतोष को दर्शाता है। सभी प्रदर्शनकारियों ने एक स्वर में कहा कि जब तक “हमारे सभी कागज़ों पर मुहर नहीं लग जाती, हम घर नहीं जाएंगे।”
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