3 मार्च, जब टीवी चैनल भारत पाकिस्तान के बीच युद्ध का माहौल बना रहे थे तब मज़दूर अधिकार संघर्ष अभियान (MASA) के आह्वान पर देश के अलग-अलग हिस्सों से हजारों मज़दूर एकजुट होकर अपनी मांगों को मनवाने के लिए दिल्ली आए हुए थे। लेकिन ये मजदूर मीडिया डिस्कोर्स से बाहर थे।

देशभर के कई हिस्सों से आए मजदूरों ने रामलीला मैदान से जंतर मंतर तक मार्च निकला। इस मार्च में मज़ूदरों के अधिकार के लिए लड़ने वाले ट्रेड यूनियन सेंटर आफ कर्नाटक, ओडिशा, भेल मजदूर ट्रेड यूनियन और मज़दूर अधिकार संघर्ष अभियान मासा सहित कई संगठन शामिल हुए।
यह मार्च नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार द्वारा श्रम कानूनों को कमजोर करने और सार्वजनिक क्षेत्र के निजीकरण के प्रयासों के खिलाफ था। सरकार द्वारा कानूनों में बदलाव कर परमानेंट नौकरी को समाप्त किया जा रहा है और ठेके की नौकरी को बढ़ावा दिया जा रहा है। मज़दूरों को 8 से 10,000 से ज़्यादा पैसे नहीं मिल पाते हैं।
इनकी मांग है कि 25,000 रुपये न्यूनतम मज़दूरी की जाए। यूनियन बनाने के अधिकार को मान्यता मिले। ठेके पर नौकरी को बढ़ावा नहीं देना चाहिए। मज़दूर भी नागरिक हैं। आंगनवाड़ी वर्कर से लेकर किसान तक नागरिक हैं मगर चुनावी चर्चा से बाहर कर दिए गए हैं।
मजदूरों की रैली रामलीला मैदान से शुरू हुई और संसद मार्ग पर समाप्त हुई। इसमें देश भर के करीब 20 राज्यों के कार्यकर्ताओं ने भाग लिया।
इनमें गुड़गांव-मानेसर (हरियाणा), नीमराणा-जयपुर (राजस्थान), रुद्रपुर-हरिद्वार (उत्तराखंड), अहमदाबाद के मुख्य औद्योगिक क्षेत्रों जैसे ऑटोमोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स, परिधान, फार्मास्यूटिकल्स और संबंधित क्षेत्रों से कुछ सबसे बड़े श्रमिक संगठनों के प्रतिनिधि भी आए। सानंद (गुजरात), पुणे-मुंबई-गोवा, चेन्नई पेरुम्बुदूर से भी श्रमिक संगठनों के प्रतिनिधियों ने इसमें भाग लिया। इस रैली में चाय बागान श्रमिक भी मौजूद थे, जिसमें दार्जिलिंग हिल्स-तराई-डुआर्स और च्ह मुक्ति संग्राम समिति, असम में चाई बागान संग्राम समिति (CBSS) शामिल थे।
मजदूरों की रैली में आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, बंगाल और झारखंड के कोयला खानों के श्रमिक भी उनकी आवाज़ों का प्रतिनिधित्व करने के लिए आए थे। हरियाणा से मनरेगा मजदूर यूनियन और निर्माण मजदूर यूनियन जैसे देश भर के ग्रामीण कार्यकर्ता भी उपस्थित थे। असंगठित क्षेत्रों के श्रमिक भी वहां मौजूद थे, जैसे गुजरात और राजस्थान के सफाई कर्मचारी, रिक्शा और ठेला पुलर्स, जरी निर्माता, बीड़ी मजदूर यूनियन, निर्माण मजदूर यूनियन, आंगनवाड़ी वर्कर्स और डोमेस्टिक वर्कर्स यूनियन।
मासा के एक स्वयंसेवक ने द न्यू इंडियन एक्सप्रेस से कहा, “आज, नवउदारवाद का दौर है और विशेष रूप से वर्तमान शासन फासीवादी ताकतों द्वारा समर्थित है, देश के मजदूरों पर कहर बरपा रहा है। हम श्रमिकों के शोषण, दमन और अपराधीकरण को देखते हैं, बेरोजगारी का दौर है और न्यूनतम मजदूरी दी जा रही है। ऐसे समय में जब चुनाव को देखते हुए युद्ध का माहौल बनाया जा रहा है तो मजदूरों को बिल्कुल ही अनदेखा कर दिया गया है ऐसे में सरकार को चेताने के लिए रैली की जरूरत थी।”

मासा पूरे देश में संघर्षरत श्रमिक संगठनों और ट्रेड यूनियनों का एक संयुक्त मंच है। इंडियन सेंटर ऑफ ट्रेड यूनियंस, ऑल इंडिया वर्कर्स काउंसिल, फेडरेशन ऑफ ट्रेड यूनियंस सहित 13 से अधिक निकायों ने "चलो दिल्ली" रैली में भाग लिया। इनका कहना था कि देश मजदूर की मेहनत से चलता है लेकिन उनकी मजदूरी से किसी को वास्ता नहीं है ऐसे में हमारी मांग है कि मजदूरों को पेंशन जैसी केंद्रीयकृत सुविधाएं दी जाएं।
ढाई साल पहले, 26 अगस्त 2016 को, 14 श्रमिक संगठनों ने दिल्ली में एकछत्र संगठन मासा बनाने की पहल शुरू की। इन संगठनों ने एक बैनर तले इकट्ठे होकर सरकार से मांग की कि 1 जनवरी 2016 से न्यूनतम मजदूरी 22000 की जाए। अनुबंध श्रम प्रणाली को समाप्त कर असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों की मांगों को माना जाए।

देशभर के कई हिस्सों से आए मजदूरों ने रामलीला मैदान से जंतर मंतर तक मार्च निकला। इस मार्च में मज़ूदरों के अधिकार के लिए लड़ने वाले ट्रेड यूनियन सेंटर आफ कर्नाटक, ओडिशा, भेल मजदूर ट्रेड यूनियन और मज़दूर अधिकार संघर्ष अभियान मासा सहित कई संगठन शामिल हुए।
यह मार्च नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार द्वारा श्रम कानूनों को कमजोर करने और सार्वजनिक क्षेत्र के निजीकरण के प्रयासों के खिलाफ था। सरकार द्वारा कानूनों में बदलाव कर परमानेंट नौकरी को समाप्त किया जा रहा है और ठेके की नौकरी को बढ़ावा दिया जा रहा है। मज़दूरों को 8 से 10,000 से ज़्यादा पैसे नहीं मिल पाते हैं।
इनकी मांग है कि 25,000 रुपये न्यूनतम मज़दूरी की जाए। यूनियन बनाने के अधिकार को मान्यता मिले। ठेके पर नौकरी को बढ़ावा नहीं देना चाहिए। मज़दूर भी नागरिक हैं। आंगनवाड़ी वर्कर से लेकर किसान तक नागरिक हैं मगर चुनावी चर्चा से बाहर कर दिए गए हैं।
मजदूरों की रैली रामलीला मैदान से शुरू हुई और संसद मार्ग पर समाप्त हुई। इसमें देश भर के करीब 20 राज्यों के कार्यकर्ताओं ने भाग लिया।
इनमें गुड़गांव-मानेसर (हरियाणा), नीमराणा-जयपुर (राजस्थान), रुद्रपुर-हरिद्वार (उत्तराखंड), अहमदाबाद के मुख्य औद्योगिक क्षेत्रों जैसे ऑटोमोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स, परिधान, फार्मास्यूटिकल्स और संबंधित क्षेत्रों से कुछ सबसे बड़े श्रमिक संगठनों के प्रतिनिधि भी आए। सानंद (गुजरात), पुणे-मुंबई-गोवा, चेन्नई पेरुम्बुदूर से भी श्रमिक संगठनों के प्रतिनिधियों ने इसमें भाग लिया। इस रैली में चाय बागान श्रमिक भी मौजूद थे, जिसमें दार्जिलिंग हिल्स-तराई-डुआर्स और च्ह मुक्ति संग्राम समिति, असम में चाई बागान संग्राम समिति (CBSS) शामिल थे।
मजदूरों की रैली में आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, बंगाल और झारखंड के कोयला खानों के श्रमिक भी उनकी आवाज़ों का प्रतिनिधित्व करने के लिए आए थे। हरियाणा से मनरेगा मजदूर यूनियन और निर्माण मजदूर यूनियन जैसे देश भर के ग्रामीण कार्यकर्ता भी उपस्थित थे। असंगठित क्षेत्रों के श्रमिक भी वहां मौजूद थे, जैसे गुजरात और राजस्थान के सफाई कर्मचारी, रिक्शा और ठेला पुलर्स, जरी निर्माता, बीड़ी मजदूर यूनियन, निर्माण मजदूर यूनियन, आंगनवाड़ी वर्कर्स और डोमेस्टिक वर्कर्स यूनियन।
मासा के एक स्वयंसेवक ने द न्यू इंडियन एक्सप्रेस से कहा, “आज, नवउदारवाद का दौर है और विशेष रूप से वर्तमान शासन फासीवादी ताकतों द्वारा समर्थित है, देश के मजदूरों पर कहर बरपा रहा है। हम श्रमिकों के शोषण, दमन और अपराधीकरण को देखते हैं, बेरोजगारी का दौर है और न्यूनतम मजदूरी दी जा रही है। ऐसे समय में जब चुनाव को देखते हुए युद्ध का माहौल बनाया जा रहा है तो मजदूरों को बिल्कुल ही अनदेखा कर दिया गया है ऐसे में सरकार को चेताने के लिए रैली की जरूरत थी।”

मासा पूरे देश में संघर्षरत श्रमिक संगठनों और ट्रेड यूनियनों का एक संयुक्त मंच है। इंडियन सेंटर ऑफ ट्रेड यूनियंस, ऑल इंडिया वर्कर्स काउंसिल, फेडरेशन ऑफ ट्रेड यूनियंस सहित 13 से अधिक निकायों ने "चलो दिल्ली" रैली में भाग लिया। इनका कहना था कि देश मजदूर की मेहनत से चलता है लेकिन उनकी मजदूरी से किसी को वास्ता नहीं है ऐसे में हमारी मांग है कि मजदूरों को पेंशन जैसी केंद्रीयकृत सुविधाएं दी जाएं।
ढाई साल पहले, 26 अगस्त 2016 को, 14 श्रमिक संगठनों ने दिल्ली में एकछत्र संगठन मासा बनाने की पहल शुरू की। इन संगठनों ने एक बैनर तले इकट्ठे होकर सरकार से मांग की कि 1 जनवरी 2016 से न्यूनतम मजदूरी 22000 की जाए। अनुबंध श्रम प्रणाली को समाप्त कर असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों की मांगों को माना जाए।