नोटिस मिलने के बाद, उन्होंने सभी जरूरी दस्तावेज जमा किए और चुनाव आयोग के निर्देशानुसार अपील करने के लिए रामपुरहाट उप-मंडल कार्यालय गए।

पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले के नलहाटी में 32 साल के एक मुस्लिम व्यक्ति अनारुल शेख ने आत्महत्या कर ली। यह घटना तब हुई जब चुनाव आयोग द्वारा मतदाता सूचियों के 'विशेष गहन पुनरीक्षण' (SIR) के दौरान उनका नाम मतदाता सूची से हटा दिया गया था।
पुलिस के अनुसार, नलहाटी नगर पालिका के वार्ड नंबर 13 के निवासी शेख, नाम हटाए जाने के बाद से गहरे मानसिक तनाव में थे। पूरक मतदाता सूची में उनके नाम के आगे "जांच के अधीन" (under adjudication) का निशान लगा दिया गया था।
मुस्लिम मिरर की रिपोर्ट के अनुसार, नोटिस मिलने के बाद, उन्होंने सभी जरूरी दस्तावेज जमा किए और चुनाव आयोग के निर्देशानुसार अपील करने के लिए रामपुरहाट उप-मंडल कार्यालय गए।
परिवार वालों ने आरोप लगाया कि इस पूरी प्रक्रिया के कारण उन पर बहुत ज्यादा मानसिक दबाव पड़ा। उन्होंने दावा किया कि घर लौटने पर, शेख ने गहरे सदमे और निराशा में जहर खा लिया।
उन्हें तुरंत नलहाटी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र ले जाया गया और बाद में एक दूसरे अस्पताल में शिफ़्ट किया गया, लेकिन रास्ते में ही उनकी मौत हो गई।
शेख के परिवार में उनकी पत्नी और दो छोटे बेटे हैं। उनकी अचानक हुई मौत से परिवार और स्थानीय समुदाय गहरे शोक में डूब गया है।
गांव वालों ने इस पर गुस्सा जाहिर करते हुए चुनाव आयोग पर आरोप लगाया कि उसने SIR प्रक्रिया के दौरान बिना किसी उचित सत्यापन या जांच-पड़ताल के ही आम नागरिकों के नाम मनमाने ढंग से हटा दिए।
स्थानीय लोगों ने आरोप लगाया कि कई असली मतदाता, खासकर समाज के कमजोर तबके से आने वाले लोग, दस्तावेज जमा करने के बावजूद इसी तरह की दिक्कतों का सामना कर रहे हैं।
उन्होंने दावा किया कि इस प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी है और इसने आम लोगों के बीच बड़े पैमाने पर डर और चिंता पैदा कर दी है।
इस घटना से इलाके में तनाव फैल गया है। स्थानीय लोगों ने चेतावनी दी है कि अगर बिना उचित प्रक्रिया के इस तरह नाम हटाए जाने का सिलसिला जारी रहा, तो वे आने वाले चुनावों का बहिष्कार कर सकते हैं।
उन्होंने SIR अभियान की निष्पक्षता पर ही सवाल उठाते हुए कहा कि यह बेकसूर लोगों की जिंदगी पर बेवजह का दबाव डाल रहा है।
इस बीच, पुलिस ने मामला दर्ज कर लिया है और मौत के सही कारण का पता लगाने के लिए शव को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया है। जांच अभी जारी है।
यह दुखद घटना पश्चिम बंगाल में SIR को लेकर बढ़ती चिंताओं का ही एक हिस्सा है, जिसके चलते पूरे राज्य में बड़े पैमाने पर नाम हटाए गए हैं और कई नामों को जांच के अधीन (adjudication) रखा गया है।
आलोचकों का तर्क है कि असली मतदाताओं को किसी भी तरह का नुकसान पहुंचने से बचाने के लिए इस अभियान को और भी ज्यादा सावधानी और संवेदनशीलता के साथ चलाने की जरूरत है।
ज्ञात हो कि पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव के बीच स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के बाद हालात ऐसे बन गए हैं कि लाखों मतदाता अपने मतदान अधिकार से वंचित होते दिखाई दे रहे हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब अपील सुनने वाले ट्रिब्यूनल ही शुरू नहीं हुए हैं, तो इन मतदाताओं को न्याय कैसे मिलेगा?
23 लाख लोग असमंजस की स्थिति में
SIR के बाद जिन मतदाताओं के नाम सूची से हटाए गए, उनमें से करीब 23 लाख लोग अब भी असमंजस की स्थिति में हैं। उनकी पहली अपील पहले ही खारिज हो चुकी है और अब उनके पास केवल अपीलीय ट्रिब्यूनल का विकल्प बचा है, जिसने अभी तक काम शुरू ही नहीं किया है।
जी सलाम की रिपोर्ट के अनुसार, सोमवार, 6 मार्च को 152 सीटों पर विधानसभा चुनाव के पहले चरण की वोटिंग से पहले अपीलों के निपटारे का आखिरी दिन है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि अभी व्यवस्था ही नहीं की गई है। इस पूरे विवाद में सबसे चौंकाने वाला मामला कारगिल युद्ध लड़ने वाले मोहम्मद दुआल अली का है। मोहम्मद दुआल अली ने भारतीय सेना के दस्तावेज जमा किए, फिर भी उनका नाम "अंडर एडजुडिकेशन" में डाल दिया गया। हैरानी की बात यह है कि उनके परिवार के तीन और सदस्यों—जिनमें दो बेटियां और एक बेटा शामिल हैं—के नाम भी इसी सूची में हैं, जबकि उनमें से एक न्यायिक अधिकारी हैं।
करगिल योद्धा का नाम नहीं
ऐसा नहीं है कि कारगिल युद्ध लड़ने वाले मोहम्मद दुआल अली ही इस स्थिति का सामना कर रहे हैं। इस मामले में कई अन्य प्रमुख हस्तियां भी शामिल हैं, जिनके वोटर कार्ड को SIR के बाद ‘संदेहास्पद’ श्रेणी में डाल दिया गया है। स्थिति यह है कि भारतीय क्रिकेटर रिचा घोष का नाम भी इस सूची में शामिल है, जबकि वह इस समय ऑस्ट्रेलिया में भारतीय टीम का प्रतिनिधित्व कर रही हैं। फिलहाल उनका नाम एडजुडिकेशन सूची में रखा गया है।
नवाब के वंशजों के नाम हटाए गए
SIR की प्रक्रिया को लेकर विवाद उस समय और गहरा गया, जब मुर्शिदाबाद के नवाब के वंशजों में से सौ से अधिक लोगों के नाम वोटर सूची से हटा दिए गए। नवाब वासेज अली मिर्जा के वंशज आज भी मुर्शिदाबाद में रहते हैं। बताया जाता है कि इस परिवार ने यहां साढ़े तीन सौ साल से अधिक समय तक शासन किया और अब उसी परिवार को अपनी पहचान के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है।
बता दें कि इसी साल जनवरी में पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले के जलांगी में मंगलवार सुबह 50 वर्षीय एक व्यक्ति की मौत हो गई। परिवार का आरोप था कि SIR से जुड़े एक नोटिस के कारण हुए अत्यधिक मानसिक तनाव की वजह से उनकी मौत हुई। पुलिस ने मीडिया को इसकी जानकारी दी।
मृतक की पहचान नवादापारा गांव के अक्सत अली मंडल के रूप में हुई। कथित तौर पर नोटिस मिलने के बाद वह घबरा गए थे। उनके छह बच्चे हैं।
द प्रिंट ने लिखा कि परिवार के सदस्यों के अनुसार, मंडल अकेले रहते थे, जबकि उनके पांच बेटे राज्य के बाहर और विदेश में काम करते हैं।
मंडल के परिवार के एक सदस्य ने कहा, “नोटिस से उन्हें बहुत अधिक चिंता हो गई थी, क्योंकि वे अपने बेटों की वापसी का इंतज़ाम करने, अधिकारियों के सामने पेश होने और ज़रूरी दस्तावेज़ प्रस्तुत करने को लेकर परेशान थे। कथित तौर पर नोटिस मिलने के कुछ ही दिनों बाद उनकी तबीयत बिगड़ गई और उन्हें सादिक़रदियार ग्रामीण अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया।”
मंडल की पत्नी शरीफा बीबी ने बताया कि नोटिस उनकी मौत से तीन दिन पहले आया था और उसके बाद से उनके पति लगातार भय में थे।
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पुलिस के अनुसार, नलहाटी नगर पालिका के वार्ड नंबर 13 के निवासी शेख, नाम हटाए जाने के बाद से गहरे मानसिक तनाव में थे। पूरक मतदाता सूची में उनके नाम के आगे "जांच के अधीन" (under adjudication) का निशान लगा दिया गया था।
मुस्लिम मिरर की रिपोर्ट के अनुसार, नोटिस मिलने के बाद, उन्होंने सभी जरूरी दस्तावेज जमा किए और चुनाव आयोग के निर्देशानुसार अपील करने के लिए रामपुरहाट उप-मंडल कार्यालय गए।
परिवार वालों ने आरोप लगाया कि इस पूरी प्रक्रिया के कारण उन पर बहुत ज्यादा मानसिक दबाव पड़ा। उन्होंने दावा किया कि घर लौटने पर, शेख ने गहरे सदमे और निराशा में जहर खा लिया।
उन्हें तुरंत नलहाटी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र ले जाया गया और बाद में एक दूसरे अस्पताल में शिफ़्ट किया गया, लेकिन रास्ते में ही उनकी मौत हो गई।
शेख के परिवार में उनकी पत्नी और दो छोटे बेटे हैं। उनकी अचानक हुई मौत से परिवार और स्थानीय समुदाय गहरे शोक में डूब गया है।
गांव वालों ने इस पर गुस्सा जाहिर करते हुए चुनाव आयोग पर आरोप लगाया कि उसने SIR प्रक्रिया के दौरान बिना किसी उचित सत्यापन या जांच-पड़ताल के ही आम नागरिकों के नाम मनमाने ढंग से हटा दिए।
स्थानीय लोगों ने आरोप लगाया कि कई असली मतदाता, खासकर समाज के कमजोर तबके से आने वाले लोग, दस्तावेज जमा करने के बावजूद इसी तरह की दिक्कतों का सामना कर रहे हैं।
उन्होंने दावा किया कि इस प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी है और इसने आम लोगों के बीच बड़े पैमाने पर डर और चिंता पैदा कर दी है।
इस घटना से इलाके में तनाव फैल गया है। स्थानीय लोगों ने चेतावनी दी है कि अगर बिना उचित प्रक्रिया के इस तरह नाम हटाए जाने का सिलसिला जारी रहा, तो वे आने वाले चुनावों का बहिष्कार कर सकते हैं।
उन्होंने SIR अभियान की निष्पक्षता पर ही सवाल उठाते हुए कहा कि यह बेकसूर लोगों की जिंदगी पर बेवजह का दबाव डाल रहा है।
इस बीच, पुलिस ने मामला दर्ज कर लिया है और मौत के सही कारण का पता लगाने के लिए शव को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया है। जांच अभी जारी है।
यह दुखद घटना पश्चिम बंगाल में SIR को लेकर बढ़ती चिंताओं का ही एक हिस्सा है, जिसके चलते पूरे राज्य में बड़े पैमाने पर नाम हटाए गए हैं और कई नामों को जांच के अधीन (adjudication) रखा गया है।
आलोचकों का तर्क है कि असली मतदाताओं को किसी भी तरह का नुकसान पहुंचने से बचाने के लिए इस अभियान को और भी ज्यादा सावधानी और संवेदनशीलता के साथ चलाने की जरूरत है।
ज्ञात हो कि पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव के बीच स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के बाद हालात ऐसे बन गए हैं कि लाखों मतदाता अपने मतदान अधिकार से वंचित होते दिखाई दे रहे हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब अपील सुनने वाले ट्रिब्यूनल ही शुरू नहीं हुए हैं, तो इन मतदाताओं को न्याय कैसे मिलेगा?
23 लाख लोग असमंजस की स्थिति में
SIR के बाद जिन मतदाताओं के नाम सूची से हटाए गए, उनमें से करीब 23 लाख लोग अब भी असमंजस की स्थिति में हैं। उनकी पहली अपील पहले ही खारिज हो चुकी है और अब उनके पास केवल अपीलीय ट्रिब्यूनल का विकल्प बचा है, जिसने अभी तक काम शुरू ही नहीं किया है।
जी सलाम की रिपोर्ट के अनुसार, सोमवार, 6 मार्च को 152 सीटों पर विधानसभा चुनाव के पहले चरण की वोटिंग से पहले अपीलों के निपटारे का आखिरी दिन है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि अभी व्यवस्था ही नहीं की गई है। इस पूरे विवाद में सबसे चौंकाने वाला मामला कारगिल युद्ध लड़ने वाले मोहम्मद दुआल अली का है। मोहम्मद दुआल अली ने भारतीय सेना के दस्तावेज जमा किए, फिर भी उनका नाम "अंडर एडजुडिकेशन" में डाल दिया गया। हैरानी की बात यह है कि उनके परिवार के तीन और सदस्यों—जिनमें दो बेटियां और एक बेटा शामिल हैं—के नाम भी इसी सूची में हैं, जबकि उनमें से एक न्यायिक अधिकारी हैं।
करगिल योद्धा का नाम नहीं
ऐसा नहीं है कि कारगिल युद्ध लड़ने वाले मोहम्मद दुआल अली ही इस स्थिति का सामना कर रहे हैं। इस मामले में कई अन्य प्रमुख हस्तियां भी शामिल हैं, जिनके वोटर कार्ड को SIR के बाद ‘संदेहास्पद’ श्रेणी में डाल दिया गया है। स्थिति यह है कि भारतीय क्रिकेटर रिचा घोष का नाम भी इस सूची में शामिल है, जबकि वह इस समय ऑस्ट्रेलिया में भारतीय टीम का प्रतिनिधित्व कर रही हैं। फिलहाल उनका नाम एडजुडिकेशन सूची में रखा गया है।
नवाब के वंशजों के नाम हटाए गए
SIR की प्रक्रिया को लेकर विवाद उस समय और गहरा गया, जब मुर्शिदाबाद के नवाब के वंशजों में से सौ से अधिक लोगों के नाम वोटर सूची से हटा दिए गए। नवाब वासेज अली मिर्जा के वंशज आज भी मुर्शिदाबाद में रहते हैं। बताया जाता है कि इस परिवार ने यहां साढ़े तीन सौ साल से अधिक समय तक शासन किया और अब उसी परिवार को अपनी पहचान के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है।
बता दें कि इसी साल जनवरी में पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले के जलांगी में मंगलवार सुबह 50 वर्षीय एक व्यक्ति की मौत हो गई। परिवार का आरोप था कि SIR से जुड़े एक नोटिस के कारण हुए अत्यधिक मानसिक तनाव की वजह से उनकी मौत हुई। पुलिस ने मीडिया को इसकी जानकारी दी।
मृतक की पहचान नवादापारा गांव के अक्सत अली मंडल के रूप में हुई। कथित तौर पर नोटिस मिलने के बाद वह घबरा गए थे। उनके छह बच्चे हैं।
द प्रिंट ने लिखा कि परिवार के सदस्यों के अनुसार, मंडल अकेले रहते थे, जबकि उनके पांच बेटे राज्य के बाहर और विदेश में काम करते हैं।
मंडल के परिवार के एक सदस्य ने कहा, “नोटिस से उन्हें बहुत अधिक चिंता हो गई थी, क्योंकि वे अपने बेटों की वापसी का इंतज़ाम करने, अधिकारियों के सामने पेश होने और ज़रूरी दस्तावेज़ प्रस्तुत करने को लेकर परेशान थे। कथित तौर पर नोटिस मिलने के कुछ ही दिनों बाद उनकी तबीयत बिगड़ गई और उन्हें सादिक़रदियार ग्रामीण अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया।”
मंडल की पत्नी शरीफा बीबी ने बताया कि नोटिस उनकी मौत से तीन दिन पहले आया था और उसके बाद से उनके पति लगातार भय में थे।
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