जामिया के छात्रों ने चुनाव के लिए सशर्त आश्वासन को ठुकराया, दो छात्रों की भूख हड़ताल जारी

Written by sabrang india | Published on: October 27, 2026
14 दिनों के आंदोलन के बाद, विश्वविद्यालय ने यूनियन के संविधान को मंजूरी मिलने के 15 दिन बाद चुनाव कराने का वादा किया है, लेकिन इस मंजूरी के लिए कोई समय-सीमा नहीं दी है और प्रदर्शनकारियों से सार्वजनिक रूप से माफी मांगने की मांग की है।

 
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जामिया मिलिया इस्लामिया में लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई छात्र यूनियन को बहाल करने की लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई है। सोमवार, 26 अक्टूबर को विश्वविद्यालय प्रशासन ने एक आदेश जारी किया, जिसमें कहा गया कि नई यूनियन के संविधान को मंजूरी मिलने के 15 दिनों के भीतर चुनाव कराए जाएंगे। लेकिन दो छात्रों, एबिन बेसिल और रेहान खान ने अपनी भूख हड़ताल खत्म करने से इनकार कर दिया। उनका कहना है कि प्रशासन उनकी मुख्य मांगों को पूरा करने में नाकाम रहा है।







रजिस्ट्रार कार्यालय द्वारा जारी यह आदेश लगभग दो हफ्तों तक चले लगातार विरोध प्रदर्शनों, भूख हड़ताल, पुलिस की तैनाती, छात्रों की हिरासत और पूरे विश्वविद्यालय परिसर में छात्रों व समर्थकों के बढ़ते दबाव के बाद आया है। इससे एक दिन पहले, छात्रों पर पुलिस अधिकारियों द्वारा हमला किए जाने का भी आरोप लगा था। फिर भी, इस आदेश ने आंदोलन को खत्म करने के बजाय, शर्तों के जरिए गतिरोध को और गहरा कर दिया है।



नोटिस के अनुसार, विश्वविद्यालय संविधान को मंजूरी मिलने के 15 दिन बाद चुनाव कराने पर सहमत हो गया है। साथ ही, विरोध प्रदर्शन के दौरान छात्रों के निलंबन और उन्हें जारी किए गए 'शो-कॉज' नोटिस (कारण बताओ नोटिस) को वापस ले लिया गया है, और सुरक्षाकर्मियों के बर्ताव की जांच का भी वादा किया गया है। हालांकि, इस आदेश में यह भी कहा गया है कि विरोध कर रहे छात्रों को प्रशासन के खिलाफ की गई कथित अपमानजनक टिप्पणियों और हरकतों के लिए सार्वजनिक रूप से माफी मांगनी होगी और सोशल मीडिया से संबंधित पोस्ट हटाने होंगे। प्रदर्शनकारी छात्रों के लिए मुख्य समस्या अभी भी बनी हुई है: प्रशासन ने संविधान का मसौदा तैयार करने और उसे मंजूरी देने के लिए कोई निश्चित समय-सीमा नहीं दी है। इसका मतलब यह है कि चुनाव कब होंगे, यह एक ऐसी प्रक्रिया पर निर्भर है जिसकी पूरी होने की कोई तारीख तय नहीं है।

इसे देखते हुए, एबिन बेसिल और रेहान खान ने अपनी भूख हड़ताल जारी रखने का फैसला किया है, क्योंकि छात्रों ने 26 अक्टूबर के आदेश में दी गई तीनों शर्तों को खारिज कर दिया है। छात्रों का आरोप है कि उन पर रात करीब 3 बजे एक समझौते पर हस्ताक्षर करने के लिए दबाव डाला गया था, जबकि विश्वविद्यालय की शर्तों में वे आश्वासन नहीं दिए गए, जिनकी छात्र मांग कर रहे थे। वाइस-चांसलर मजहर आसिफ और चीफ प्रॉक्टर के इस्तीफे की मांग पर भी कोई ध्यान नहीं दिया गया है। मुफ्ती द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार, दो छात्र अभी भी भूख हड़ताल पर हैं, जबकि जासिम खान और फैजान अपनी खराब स्वास्थ्य स्थिति के कारण इसे खत्म कर सकते हैं।

इस तरह, प्रशासन का आदेश आंदोलन का केवल आंशिक जवाब देता है। इसमें जवाबदेही, अनुशासनात्मक कार्रवाई और छात्र प्रतिनिधियों को बहाल करने की समय-सीमा जैसे अहम सवालों का कोई जवाब नहीं दिया गया है।

कैंपस में बढ़ती पाबंदियां

यह घोषणा कैंपस में दो हफ्तों से चल रहे बढ़ते तनाव के बाद आई है, जिसमें प्रशासन और सुरक्षा कर्मियों ने बार-बार आंदोलन को रोकने की कोशिश की। 'द इंडियन एक्सप्रेस' की रिपोर्ट के अनुसार, रविवार, 25 अक्टूबर को भारी सुरक्षा तैनाती के बीच 500 से अधिक छात्र विरोध प्रदर्शन के समर्थन में इकट्ठा हुए। छात्रों का आरोप है कि विरोध स्थल, लाइब्रेरी और कैंटीन तक उनकी पहुंच को सीमित कर दिया गया था, जबकि यूनिवर्सिटी के गेट बंद कर दिए गए थे और छात्रों को कैंपस में प्रवेश करने से रोका जा रहा था। यूनिवर्सिटी के अंदर और आसपास दिल्ली पुलिस, केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (CRPF), केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (CISF) और भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (ITBP) के सुरक्षा कर्मियों को तैनात किया गया था।






प्रशासन ने मौजूदा हालात और छात्रों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की जरूरत का हवाला देते हुए 24 अक्टूबर से कक्षाओं को ऑनलाइन कर दिया था। यह कदम ऐसे आरोपों के बीच उठाया गया कि प्रदर्शनकारियों को कैंपस की सुविधाओं का इस्तेमाल करने से रोका जा रहा था और सुरक्षा कर्मियों ने उनके विरोध प्रदर्शन के इंतजामों को हटाने की कोशिश की थी।

शनिवार को छात्रों ने आरोप लगाया कि यूनिवर्सिटी के एक प्रतिनिधिमंडल ने उनके टेंट हटाने की कोशिश की और भूख हड़ताल कर रहे छात्रों को उनकी मर्जी के खिलाफ अस्पताल ले जाने का प्रयास किया। इसके बाद, भूख हड़ताल पर बैठे पांच छात्र राजनीति विज्ञान विभाग (डिपार्टमेंट ऑफ पॉलिटिकल साइंस) में चले गए और खुद को अंदर बंद कर लिया, ताकि उन्हें वहां से हटाया न जा सके।

25 अक्टूबर को तनाव और बढ़ गया, जब विरोध स्थल तक पहुंचने की कोशिश कर रहे छात्र कैंपस की दीवारों पर चढ़ गए। इनमें से कुछ दीवारों के ऊपर धातु के नुकीले कांटे और छड़ें लगी हुई थीं। पाबंदियों के बावजूद छात्र मार्च निकालते रहे और नारे लगाते रहे। इस आंदोलन के दौरान ऐसे आरोप भी सामने आए कि छात्रों तक भोजन और पानी पहुंचने से रोका जा रहा था। सोमवार को जब प्रशासन ने अपना आदेश जारी किया, तब तक भूख हड़ताल कर रहे छात्रों की शारीरिक स्थिति को लेकर चिंताएं काफी गंभीर हो चुकी थीं। आंदोलन से जुड़ी जानकारी के अनुसार, विरोध प्रदर्शन के दौरान जासिम खान की तबीयत बिगड़ गई थी। उन्हें 14 तारीख की रात अस्पताल ले जाया गया था, और सोमवार तड़के वे वापस कैंपस लौट आए।





छात्रों ने यह भी आरोप लगाया कि पुलिस ने उन्हें घसीटा









बिना किसी समय-सीमा के चुनाव का वादा

जामिया के छात्रों ने 11 अक्टूबर को अपना आंदोलन शुरू किया और 12 अक्टूबर से भूख हड़ताल पर बैठ गए। उनकी मांगें थीं: जामिया मिलिया इस्लामिया छात्र संघ (JMISU) को बहाल किया जाए, चुनाव का एक निश्चित कार्यक्रम तय हो, और प्रदर्शनकारियों के खिलाफ की गई अनुशासनात्मक कार्रवाई वापस ली जाए। आंदोलन के दौरान छात्रों के साथ हुए बर्ताव का हवाला देते हुए, उन्होंने विश्वविद्यालय के चीफ प्रॉक्टर और सुरक्षा सलाहकार को हटाने की भी मांग की।

यह छात्र संघ 2006 से निष्क्रिय है, और आखिरी बार चुनाव 2005 में हुए थे। लगभग दो दशकों तक कोई निर्वाचित छात्र निकाय न होने के कारण, छात्रों की कई पीढ़ियों के पास परिसर से जुड़ी अपनी समस्याओं को उठाने के लिए कोई औपचारिक मंच नहीं रहा है।

'द इंडियन एक्सप्रेस' की 26 अक्टूबर की रिपोर्ट के अनुसार, छात्रों ने प्रशासन के इस तर्क को बार-बार खारिज कर दिया कि चुनाव कराने से पहले एक नया संविधान तैयार करना जरूरी है। उनका कहना था कि संविधान बनाने की प्रक्रिया, छात्र संघ की बहाली में एक अनिश्चितकालीन रुकावट नहीं बननी चाहिए। उन्होंने 30 नवंबर तक चुनाव कराने की मांग की थी।

वहीं, विश्वविद्यालय प्रशासन का कहना है कि इस प्रक्रिया में संविधान का मसौदा तैयार करना, मतदाता सूची बनाना और फिर चुनाव की तारीख की घोषणा करना शामिल है। एक अधिकारी ने 'द इंडियन एक्सप्रेस' को बताया कि लगभग 20 साल के अंतराल के बाद इस प्रक्रिया को जल्दबाजी में पूरा नहीं किया जा सकता, खासकर लिंगदोह समिति की सिफारिशों और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के नियमों में हुए बदलावों को देखते हुए।

हालांकि, छात्रों का कहना है कि प्रशासन ने कोई ठोस और समय-सीमा वाला वादा नहीं किया है। उन्होंने अपनी मांग के समर्थन में सुप्रीम कोर्ट के 2006 के फैसले (यूनिवर्सिटी ऑफ केरल बनाम काउंसिल ऑफ प्रिंसिपल्स, कॉलेजेज, केरल) और लिंगदोह समिति की सिफारिशों का हवाला दिया, ताकि चुनाव का एक स्पष्ट रोडमैप तैयार हो सके।

26 अक्टूबर के आदेश से भी यह विवाद सुलझा नहीं है। चुनाव की तारीख को संविधान की मंजूरी से जोड़कर—और यह बताए बिना कि यह मंजूरी कब मिलेगी-प्रशासन ने सबसे महत्वपूर्ण समय-सीमा को अपने भविष्य के फैसलों पर निर्भर कर दिया है।

विस्तृत रिपोर्ट यहां पढ़ी जा सकती है। अनुशासनात्मक कार्रवाई और माफी की मांग से असंतोष बढ़ा

इस आदेश में आंदोलन के दौरान शुरू की गई अनुशासनात्मक कार्रवाई का भी जिक्र है, लेकिन छात्रों ने दी गई राहत के दायरे पर सवाल उठाए हैं। हालांकि विरोध प्रदर्शन के दौरान जारी किए गए निलंबन (सस्पेंशन) और 'शो-कॉज' नोटिस को वापस लिया जाना है, लेकिन प्रदर्शनकारियों का कहना है कि आदेश में सभी अनुशासनात्मक कार्रवाइयों-जिसमें निष्कासन (रस्टिकेशन) और कैंपस में प्रवेश पर रोक शामिल है-को बिना किसी शर्त के वापस लेने की स्पष्ट गारंटी नहीं दी गई है।

तीसरे वर्ष के लॉ छात्र एबिन बेसिल, जो भूख हड़ताल करने वालों में शामिल थे, ने 'द इंडियन एक्सप्रेस' को बताया कि यह आदेश उन छात्रों की स्थिति के बारे में कुछ नहीं कहता जिन्हें निष्कासित कर दिया गया था या जिनके कैंपस में आने पर रोक लगा दी गई थी। उन्होंने इस मांग पर भी सवाल उठाया कि प्रदर्शनकारियों को प्रशासन की आलोचना करने के लिए सार्वजनिक रूप से माफी मांगनी चाहिए। माफी की यह शर्त विवाद का एक और बड़ा कारण बन गई है। विश्वविद्यालय ने छात्रों से कहा है कि वे प्रशासन के खिलाफ दिए गए कथित अपमानजनक बयानों, कार्यों या सोशल मीडिया पोस्ट के लिए एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में सार्वजनिक रूप से माफी मांगें। इन पोस्ट को तुरंत हटाना होगा, और विश्वविद्यालय इस बात की निगरानी करेगा कि छात्र ऐसा करते हैं या नहीं।

छात्रों ने इस शर्त को खारिज कर दिया है। उनका तर्क है कि उनका आंदोलन लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व और जवाबदेही की मांग के लिए एक शांतिपूर्ण अभियान था। माफी मांगने से इनकार करना यह दिखाता है कि प्रशासन जिस तरह से असहमति को संभाल रहा है, उसे लेकर छात्रों में गहरा असंतोष है। साथ ही, प्रशासन का यह प्रयास कि आंदोलन तभी खत्म हो जब छात्र सार्वजनिक रूप से अपनी गलती मान लें, भी विवाद का विषय है।

विश्वविद्यालय ने यह भी निर्देश दिया है कि आंदोलन को तुरंत खत्म कर दिया जाए। लेकिन एबिन और रेहान की भूख हड़ताल अभी भी जारी है, जो यह साबित करती है कि लिखित आदेश से सभी प्रदर्शनकारी सहमत नहीं हैं।

आंदोलन को राजनीतिक समर्थन मिला; गिरफ्तारियां और FIR भी हुईं

जामिया का यह आंदोलन अब केवल छात्र चुनावों के मुद्दे तक सीमित नहीं रहा है। इसे देश भर के राजनीतिक प्रतिनिधियों, पूर्व छात्रों और विश्वविद्यालय समुदायों से समर्थन मिल रहा है।

कांग्रेस सांसद इमरान मसूद को दिल्ली पुलिस ने तब हिरासत में ले लिया, जब वे प्रदर्शनकारी छात्रों से मिलने गए थे। वहीं, समाजवादी पार्टी के सांसद मोहिबुल्लाह नदवी ने आरोप लगाया कि जब वे प्रदर्शनकारियों से मिलने जा रहे थे, तो पुलिस ने उन्हें धक्का दिया और उनके साथ बदसलूकी की, जिसके बाद उन्हें हिरासत में ले लिया गया। बाद में नदवी को रिहा कर दिया गया।

'द इंडियन एक्सप्रेस' और अन्य मीडिया संस्थानों की रिपोर्ट के अनुसार, विश्वविद्यालय ने कांग्रेस सांसद इमरान मसूद और इमरान प्रतापगढ़ी के कैंपस में प्रवेश करने को लेकर उनके खिलाफ शिकायत दर्ज कराई है। इसके बाद, बिना अनुमति प्रवेश (trespass) और उससे जुड़े आचरण के आरोपों में उनके खिलाफ FIR दर्ज की गई है। ये सांसद ऐसे समय में कैंपस पहुंचे थे, जब वहां छात्र संघ को बहाल करने और अनुशासनात्मक कार्रवाई वापस लेने की मांग को लेकर आंदोलन चल रहा था।

संघर्ष जारी है

14 दिनों तक लगातार चले आंदोलन के बाद, विश्वविद्यालय का 26 अक्टूबर का आदेश एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि टकराव खत्म हो गया है। छात्र संघ के संविधान को मंजूरी देने के लिए कोई निश्चित समय-सीमा न होना, अनुशासनात्मक कार्रवाई को पूरी तरह वापस लेने को लेकर अनिश्चितता, और सार्वजनिक माफी की मांग- ये अभी भी असहमति के मुख्य बिंदु बने हुए हैं।

प्रशासन ने छात्रों से अपना विरोध प्रदर्शन खत्म करने को कहा है और चेतावनी दी है कि अगर वे प्रदर्शन स्थल खाली नहीं करते हैं, तो उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाएगी। 'मनीकंट्रोल' के अनुसार, रजिस्ट्रार ने कहा कि विश्वविद्यालय एक औपचारिक नोटिस जारी करेगा, जिसमें प्रदर्शनकारियों को सुबह 9 बजे के बाद वहां से हटने के लिए 30 मिनट का समय दिया जाएगा। इसमें छात्रों द्वारा हस्ताक्षरित उस लिखित सहमति (undertaking) का हवाला दिया गया है, जिस पर उन्होंने पहले हस्ताक्षर किए थे।

लेकिन एबिन बेसिल और रेहान खान ने अपनी भूख हड़ताल जारी रखी है। उन्होंने विश्वविद्यालय के उस आदेश को मानने से इनकार कर दिया है, जो उनकी मांगों को पूरा नहीं करता। उनका यह रुख प्रशासन की घोषणा और प्रदर्शनकारियों की उस मांग के बीच के अंतर को उजागर करता है, जिसमें वे स्पष्ट और लागू किए जा सकने वाले ठोस वादों पर जोर दे रहे हैं।

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