दिवालिया होने के कगार पर ओनजीसी

Written by Girish Malviya | Published on: October 18, 2018
सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों अथवा उपक्रमों में सरकारी हिस्‍सेदारी को बेचने की प्रक्रिया विनिवेश कहलाती है अर्थशास्त्र के नजरिए से यदि देखा जाए तो इस प्रक्रिया के तहत सरकार घाटे में चल रहे सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों या उपक्रमों की कुछ हिस्‍सेदारी को शेयर या बांड के रूप में निजी कम्पनियों को बेचती है.

दरअसल विनिवेश का विचार आर्थिक उदारीकरण प्रक्रिया के बाद सामने आया जिसके बाद सरकार ने घाटे वाली सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों और उपक्रमों में निजी क्षेत्र की भागीदारी को बढ़ाना शुरू कर दिया. यह UPA के शासन काल मे अनेक सरकारी कंपनियों को बेचने के निर्णय सरकार ने लिए थे.

लेकिन विनिवेश की प्रक्रिया में शुरू से ही मोदी सरकार को कुछ ज्यादा ही इंटरेस्ट था यदि मोदी जी के पहले साल से शुरू किया जाए तो 2014-15 में 63,425 करोड़ रुपये विनिवेश का लक्ष्य रखा गया था लेकिन सिर्फ 31,350 करोड़ रुपये ही सरकार को हासिल हुए, 2015-16 के लिए 69,500 करोड़ रुपये का विनिवेश लक्ष्य रखा. लेकिन विनिवेश हो पाया मात्र 23,997 करोड़ रुपये का, 2016-17 में स्कोर थोड़ा बेहतर रहा,केंद्र सरकार ने 56,500 करोड़ रुपये के विनिवेश का लक्ष्य रखा था इसके मुकाबले सरकार 46,500 करोड़ रुपये का ही विनिवेश कर पाई.

नोटबन्दी ओर GST ओर बढ़ते NPA के बाद सरकार की आर्थिक स्थिति डावांडोल होने को आई थी उसे अब कही ज्यादा पैसे की जरूरत थी 2017-18 में सरकार ने 72,500 करोड़ रुपये के विनिवेश लक्ष्य के मुकाबले 11 जनवरी तक 54,337 करोड़ रुपये का विनिवेश लक्ष्य ही हासिल किया था. 11 जनवरी के बाद चालू वित्त वर्ष में तकरीबन 50 दिन बचे थे और लग रहा था कि सरकार पिछले दो साल की तरह इस साल भी अपने विनिवेश लक्ष्यों को हासिल नहीं कर पाएगी.

लेकिन मोदी सरकार ने बड़ी ग़जब की बाजीगरी दिखाई जिसे देख कर बड़े बड़े अर्थशास्त्रियों ने भी अपना सर पीट लिया उसने अपनी ही कंपनी की हिस्सेदारी अपनी ही किसी दूसरी कंपनी के हाथों बेचने की योजना बना ली, मोदी सरकार ने डूबती हुई हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉरपोरेशन लिमिटेड यानी एचपीसीएल में अपनी कुल 51 फीसदी हिस्सेदारी अपनी ही दूसरी कंपनी ऑयल ऐंड नेचुरल गैस कॉरपोरेशन यानी ओएनजीसी को बेच दी, दूसरी तरह से कहा जाए तो मोदी सरकार ने खुलेआम मनमानी करते हुए ओएनजीसी की बैलेंस शीट से कैश निकालकर अपने खजाने में डाल दिया था, इस सौदे “वर्टिकल मर्जर” कहा गया, 

यह उस वक्त तो इस प्रक्रिया से सरकार का काम चल गया लेकिन उसके इस कदम से देश की सबसे बड़ी कम्पनियों में से एक ONGC का भट्टा बैठ गया उसके पास जितना भी कैश पैसा था वही उसने सरकार को उठा कर दे दिया और ऊपर से उसने बाजार से 25 हजार कर्जा उसे उठाना पड़ा, अब हालात यह हो गए है ओएनजीसी दिवालिया होने के कगार पर पहुंच गई है. कर्मचारियों की तनख्वाह और भत्तों के भुगतान के लिए बैंकों से ओवर ड्राफ्ट लेना पड़ रहा है. इसके पहले भी मोदी सरकार ने गुजरात की सरकारी बिजली कंपनी को बचाने के लिए नवरत्न कंपनियों में से एक ओएनजीसी को जबरदस्ती ऐसा गैस ब्लॉक खरीदने पर मजबूर किया, जिसमें 20,000 करोड़ खर्च करने के बाद भी गैस नहीं मिली थी, ओएनजीसी ने ऐसी कंपनी के शेयरों के लिए आठ हजार करोड़ रुपए का भुगतान किया इस तरह से ONGC पर इस साल मार्च के अंत तक 45 हजार करोड़ का कर्ज हो गया था.

महीने 2018-19 में सरकार ने 80 हजार करोड़ विनिवेश से जुटाने का लक्ष्य रखा है एयर इंडिया जैसी बड़ी कंपनी अब तक कोई खरीदने के लिए आगे नही आया है. अब सरकार ने बड़ी कम्पनियों को कई हिस्सों में तोड़ कर बेचने की योजना बनाई है. ONGC से पवन हँस को अलग करके बेचा जा रहा है लेकिन उसे भी खरीदने को कोई तैयार नही है.

द इकॉनमिस्ट ने प्रधानमंत्री मोदी को "टिंकरर" यानी जोड़-तोड़ और जुगाड़ में माहिर मेकैनिक कहा था लेकिन सच तो यह है कि उनके ऐसे जुगाड़ों ने देश की अर्थव्यवस्था को ऐसे गड्ढे में डाला है. जहाँ से उसे वापस निकालना लगभग नामुमकिन है.

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