मोदी सरकार ने लगातार ट्रेन टिकट के दाम बढ़ाएं हैं लेकिन रेल हादसे जारी हैं। सेफ्टी सेस जनता की जेब से पैसे निकालने का नया पैंतरा है।

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मोदी सरकार आम लोगों की जेब पर लगातार डाके डाल रही है। लोगों की आय में इजाफे के इंतजाम करने के बजाय वह उनकी जेब से पैसे निकालने के लिए नए-नए तरीके आजमा रही है।
बीजेपी सरकार के सत्ता में आने के बाद लगा था कि रेलवे की कायापलट हो जाएगी। सुरेश प्रभु को इस उम्मीद में रेल मंत्री बनाया गया कि रेलवे का इन्फ्रास्ट्रक्चर सुधरे और वह सुरक्षित यात्रा की गारंटी दे सके। लेकिन प्रभु के कार्यकाल में भारतीय रेलवे 25 बड़े-छोटे हादसों का शिकार हो चुकी है।
खराब प्रबंधन,घटिया इन्फ्रास्ट्रक्चर और सुरक्षा इंतजामों में सुधार के इंतजाम करने के बजाय सरकार ने इसके लिए आतंकियों की तोड़-फोड़ की कार्रवाइयों को जिम्मेदार ठहराना शुरू कर दिया। लेकिन अब तक इन रेल हादसों के पीछे तोड़-फोड़ की थ्योरी साबित नहीं कर पाई है। अब वह इन दुर्घटनाओं को रोकने के इंतजाम करने के लिए जनता की जेब से पैसे निकालना चाहती है।
इसके लिए वह ट्रेन टिकटों पर सेफ्टी सेस लगा कर 5000 करोड़ रुपये जुटाना चाहती है। उसका इरादा रेलवे में सुरक्षा इंतजामों के लिए एक लाख करोड़ रुपये जुटाना है। जाहिर है इसका बोझ आम रेल यात्रियों के टिकट पर पड़ेगा। ट्रेन का सफर और महंगा हो जाएगा। पिछले कुछ सालों में यात्री किराये में तरह-तरह से इजाफे के इंतजाम के बाद सरकार का यह नया पैंतरा है।
सरकार की ओर से इस मद में रेलवे को 15000 करोड़ रुपये दिए गए हैं। लेकिन रेलवे की सुरक्षा में इसका असर नहीं दिखता। अब इसके लिए ट्रेन यात्रियों से और पैसे उगाहने की कोशिश की जा रही है।
रेल यात्रियों को सुरक्षा देने के मामले में सरकार लगातार नाकाम रही है। इसके बावजूद वह रेलवे के आधुनिकीकरण के लंबे-चौड़े दावे करती है । आम ट्रेनों को वक्त और सुरक्षित चलाने के बजाय वह बुलेट ट्रेन लाने की योजना में लगी है। ट्रेनों की क्षमता बढ़ाने के बजाय वह ज्यादा लागत वाली सेवाएं शुरू कर रही है।
बेहतर होगा कि मोदी सरकार सुरक्षा सेस के नाम पर रेल यात्रा महंगी करने और लोगों की जेब पर बोझ डालने के बजाय सुरक्षित रेल यात्रा के पुख्ता इंतजाम करे। रेलवे की सुरक्षा पर वास्तविक तरीके से निवेश हो न कि बेहतर सुविधा देने का नाम पर लोगों की जेब पर डाका डाला जाए। सुरक्षित रेल सेवा देने की दिशा में सरकार दूरगामी योजना बनाने में नाकाम साबित होती दिख रही है। यही वजह है कि रेल दुर्घटनाएं बढ़ रही है। इन्हें रोकने के पुख्ता इंतजाम के बजाय वह सुरक्षा सेस के नाम पर पैसे बटोरने में लगी है।