'सतलज' के खिलाफ केंद्र की कार्रवाई तेज; OTT से हटाने के आदेश के बाद फिल्म को एक हाई-लेवल कमिटी के पास भेजा गया

Written by sabrang india | Published on: July 9, 2026
आईटी एक्ट की धारा 69A का इस्तेमाल करते हुए, केंद्र सरकार ने आईटी नियमों के तहत आगे की समीक्षा होने तक 'सतलज' को ऑफलाइन करने का आदेश दिया है।

 
Image: IMDB

केंद्र सरकार ने 'सतलज' फिल्म के खिलाफ अपनी कार्रवाई तेज कर दी है। यह फिल्म मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालरा के जीवन पर आधारित है और इसमें दिलजीत दोसांझ ने मुख्य भूमिका निभाई है। सरकार ने इस फिल्म का मामला 'सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यवर्ती दिशानिर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम, 2021' के नियम 14 के तहत बनी एक हाई-लेवल इंटर-डिपार्टमेंटल कमेटी (IDC) को सौंप दिया है। यह कदम सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय (MIB) द्वारा स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म ZEE5 को 'सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम' की धारा 69A के तहत अपने प्लेटफॉर्म से फिल्म हटाने का निर्देश देने के ठीक एक दिन बाद उठाया गया है।

हिंदुस्तान टाइम्स के अनुसार, IDC अब फिल्म के कंटेंट की जांच करेगी और आगे की कार्रवाई के बारे में केंद्र सरकार को सुझाव देगी। यह कमेटी OTT प्लेटफॉर्म और डिजिटल पब्लिशर्स के लिए सरकार के निगरानी तंत्र का हिस्सा है। इसमें सूचना और प्रसारण, गृह, इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी, कानून और न्याय, रक्षा, विदेश, महिला और बाल विकास मंत्रालयों के वरिष्ठ प्रतिनिधि शामिल होते हैं, साथ ही MIB द्वारा नामित अन्य मंत्रालयों या संबंधित क्षेत्रों के विशेषज्ञ भी इसमें शामिल हो सकते हैं। इसकी अध्यक्षता संयुक्त सचिव (Joint Secretary) के पद के अधिकारी करते हैं।

यह ताजा घटनाक्रम सरकार द्वारा ZEE5 को IT अधिनियम की धारा 69A और 'सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यवर्ती दिशानिर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम, 2021' के भाग III के तहत 'सतलज' को हटाने के निर्देश के बाद हुआ है। धारा 69A केंद्र सरकार को भारत की संप्रभुता और अखंडता, राज्य की सुरक्षा, भारत की रक्षा, विदेशी देशों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध, सार्वजनिक व्यवस्था या संज्ञेय अपराधों को रोकने जैसे आधारों पर ऑनलाइन कंटेंट तक जनता की पहुंच को ब्लॉक या बंद करने का अधिकार देती है।

सिनेमाघरों में रिलीज होने वाली फिल्मों के विपरीत, जिनके लिए 'केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड' (CBFC) से सर्टिफिकेशन की जरूरत होती है, OTT प्लेटफॉर्म CBFC के अधिकार क्षेत्र से बाहर आते हैं और 2021 के IT नियमों के भाग III द्वारा शासित होते हैं। ये नियम ऑनलाइन क्यूरेटेड कंटेंट और डिजिटल समाचार के पब्लिशर्स के लिए एक रेगुलेटरी फ़्रेमवर्क बनाते हैं, जिससे सूचना और प्रसारण मंत्रालय को कुछ खास परिस्थितियों में ऑनलाइन कंटेंट के संबंध में निर्देश जारी करने की शक्ति मिलती है।

PTI और हिंदुस्तान टाइम्स द्वारा उद्धृत सरकारी सूत्रों ने बताया कि फिल्म को हटाने का निर्णय "सुरक्षा चिंताओं" और IT नियमों के तहत OTT प्लेटफॉर्म पर लागू दायित्वों के कारण लिया गया था। अधिकारियों के अनुसार, फिल्म बनाने वालों ने शुरू में 2022 में थिएटर में रिलीज के सर्टिफिकेशन के लिए CBFC को फिल्म सौंपी थी, जिसका नाम तब 'पंजाब '95' था। बताया जाता है कि बोर्ड ने सर्टिफिकेशन देने से पहले 127 कट लगाने को कहा, जो एक अभूतपूर्व मांग थी। फिल्म बनाने वालों ने इन बदलावों को मानने से इनकार कर दिया, जिसके बाद यह प्रोजेक्ट कई सालों तक रुका रहा और आखिरकार 3 जुलाई को 'सतलज' नाम से सीधे ZEE5 पर रिलीज हुआ।

अधिकारियों ने PTI को बताया कि जब फिल्म का बिना कट वाला वर्जन ऑनलाइन उपलब्ध हुआ, तो सरकार ने दखल दिया और ZEE5 को इसे हटाने का निर्देश दिया। PTI के अनुसार, एक अधिकारी ने कहा, "अगर वे थिएटर और OTT पर फिल्म रिलीज करना चाहते हैं, तो उन्हें तय नियमों का पालन करना चाहिए।"

सरकार के निर्देश के बाद, ZEE5 ने इंस्टाग्राम पर एक आधिकारिक बयान में पुष्टि की कि "मौजूदा घटनाक्रम" के कारण 'सतलज' "अगले आदेश तक भारत में उपलब्ध नहीं" रहेगी, हालांकि उन्होंने इस बारे में विस्तार से कुछ नहीं बताया। प्लेटफॉर्म ने रिलीज के बाद फिल्म को मिले जबरदस्त रिस्पॉन्स के लिए दर्शकों का शुक्रिया अदा किया। भारत में उपलब्ध न होने के बावजूद, बताया जाता है कि यह फिल्म अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ZEE5 ग्लोबल के जरिए उपलब्ध है।

इस विवाद ने सिनेमा और डिजिटल प्लेटफॉर्म को नियंत्रित करने वाले अलग-अलग रेगुलेटरी सिस्टम को भी उजागर किया है। CBFC के नए नियुक्त चेयरमैन शशि शेखर ने साफ किया कि OTT रिलीज में सर्टिफिकेशन बोर्ड की कोई भूमिका नहीं थी, और कहा कि "OTT प्लेटफॉर्म CBFC के अधिकार क्षेत्र में नहीं आते हैं।"

भारत के सबसे महत्वपूर्ण मानवाधिकार मामलों में से एक पर आधारित फिल्म

हनी त्रेहान द्वारा निर्देशित 'सतलज' पंजाब के प्रमुख मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालरा की जिंदगी पर आधारित है। खालरा ने 1984 और 1994 के बीच उग्रवाद और उग्रवाद-विरोधी कार्रवाई के दौरान पंजाब पुलिस द्वारा हजारों अज्ञात शवों के गैर-कानूनी अंतिम संस्कार का खुलासा किया था।

इन लोगों के गायब होने के मामलों का दस्तावेज तैयार करने बाद, सितंबर 1995 में खालरा को उनके घर के बाहर से अगवा कर लिया गया और वे फिर कभी जिंदा नहीं देखे गए। बाद में उनका मामला भारत में जबरदस्ती गायब करने और कस्टडी में हत्या के सबसे अहम मामलों में से एक मामला बन गया। 2005 में, पंजाब पुलिस के चार कर्मचारियों को उनके अपहरण और हत्या का दोषी ठहराया गया और 2007 में पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने उनकी सजा बढ़ाकर उम्रकैद कर दी।

खालरा के काम की ऐतिहासिक अहमियत के बावजूद, फिल्म के पूरे होने के बाद से ही इसे बार-बार रुकावटों का सामना करना पड़ा है। CBFC की ओर से 127 कट लगाने की मांग के अलावा, 'पंजाब '95' को 2023 टोरंटो इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल के ऑफिशियल लाइन-अप से भी हटा दिया गया। यह फैसला फिल्म के तय प्रीमियर से ठीक पहले लिया गया और फेस्टिवल ऑर्गनाइज़र्स ने इसके लिए कोई सार्वजनिक कारण भी नहीं बताया।

विस्तृत रिपोर्ट यहां पढ़ी जा सकती है।

सरकार द्वारा इस्तेमाल किया गया कानूनी आधार

सरकार की कार्रवाई इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी एक्ट और 2021 के आईटी रूल्स के तहत बनाए गए फ़्रेमवर्क पर आधारित है। आईटी रूल्स के पार्ट III में ऑनलाइन क्यूरेटेड कंटेंट पब्लिश करने वालों के लिए एक 'कोड ऑफ एथिक्स' (आचार संहिता) शामिल है। इस कोड के तहत पब्लिशर्स को तब खास सावधानी बरतनी होती है जब कंटेंट से भारत की संप्रभुता और अखंडता पर असर पड़ सकता हो, राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरा हो, कानून-व्यवस्था बिगड़ सकती हो, विदेशी देशों के साथ दोस्ताना रिश्तों को नुकसान पहुंच सकता हो या हिंसा भड़क सकती हो। साथ ही, समुदायों और संवेदनशील विषयों को दिखाते समय पब्लिशर्स को भारत के कई धर्मों और कई नस्लों वाले सामाजिक माहौल का भी ध्यान रखना जरूरी है।

गौर करने वाली बात है कि 'कोड ऑफ एथिक्स' के कुछ पहलुओं को अलग-अलग हाई कोर्ट में संवैधानिक चुनौतियों का सामना करना पड़ा है। बॉम्बे हाई कोर्ट ने 2021 में आईटी रूल्स के तहत सरकारी निगरानी से जुड़े कुछ प्रावधानों पर रोक लगा दी थी; मद्रास हाई कोर्ट ने बाद में कहा कि यह रोक पूरे भारत में लागू होगी। 'मिंट' की रिपोर्ट के मुताबिक, यह साफ नहीं है कि ZEE5 को कंटेंट हटाने का निर्देश देते समय केंद्र सरकार ने खास तौर पर 'कोड ऑफ एथिक्स' का सहारा लिया या यह आदेश पूरी तरह से सेक्शन 69A के तहत मिली शक्तियों पर आधारित है।

IT एक्ट के बारे में और जानकारी यहां और यहां पढ़ी जा सकती है।

राजनीतिक और सार्वजनिक विरोध

फिल्म को हटाए जाने पर राजनीतिक नेताओं, फ़िल्ममेकर्स और अभिव्यक्ति की आजादी के समर्थकों ने तीखी आलोचना की है। स्क्रॉल की रिपोर्ट के अनुसार, शिरोमणि अकाली दल के अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल ने इस फैसले को "सिर्फ सेंसरशिप" नहीं, बल्कि "हमारी सामूहिक याददाश्त, सच्चाई और अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला" बताया। उन्होंने कहा कि पंजाब को अपने इतिहास को दबाने के बजाय उसका सामना करने की इजाजत मिलनी चाहिए।

इसी तरह, AAP नेता बलतेज पन्नू ने आरोप लगाया कि इसे हटाने का मकसद नई पीढ़ी को पंजाब के अतीत के एक दर्दनाक अध्याय के बारे में जानने से रोकना था। उन्होंने दावा किया कि BJP और कांग्रेस, दोनों की ही दिलचस्पी ऐतिहासिक रिकॉर्ड को दबाने में थी।

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