‘फोरम फॉर इलेक्टोरल इंटीग्रिटी’ ने SIR के तहत बड़ी संख्या में मतदाताओं को मताधिकार से वंचित किए जाने को लेकर NHRC में याचिका दायर की

Written by sabrang india | Published on: July 25, 2026
‘फोरम फॉर इलेक्टोरल इंटीग्रिटी’ ने नेशनल ह्यूमन राइट्स कमीशन (NHRC) से चुनाव आयोग की स्पेशल इंटेंसिव रिविजन (SIR) प्रक्रिया में तत्काल हस्तक्षेप करने की अपील की है। संयुक्त राष्ट्र (UN) द्वारा जताई गई चिंताओं का हवाला देते हुए संगठन का आरोप है कि 5.2 करोड़ मतदाताओं के नाम मनमाने और बड़े पैमाने पर मतदाता सूची से हटाए गए हैं। उनका कहना है कि सुनियोजित अभियानों और अपारदर्शी AI प्रणाली के माध्यम से विशेष रूप से मुस्लिम और बंगाली नागरिकों को निशाना बनाया गया है।


Representation Image: PTI

23 जुलाई को नेशनल ह्यूमन राइट्स कमीशन (NHRC) को एक औपचारिक शिकायत सौंपी गई। इसमें चुनाव आयोग (ECI) द्वारा संचालित स्पेशल इंटेंसिव रिविजन (SIR) प्रक्रिया में तत्काल हस्तक्षेप करते हुए खुली जन-सुनवाई आयोजित करने की मांग की गई है। याचिकाकर्ताओं ने मतदाता सूची से बड़े पैमाने पर, भेदभावपूर्ण और मनमाने ढंग से नाम हटाए जाने पर गंभीर चिंता व्यक्त की है। उनका कहना है कि इसका सबसे अधिक असर मुस्लिम, बंगाली और अन्य अल्पसंख्यक समुदायों पर पड़ा है।

UN के विशेष अधिकारियों का हस्तक्षेप

शिकायतकर्ताओं के अनुसार, संयुक्त राष्ट्र (UN) पहले ही इस संकट पर चिंता जता चुका है। मई 2026 में UN के विशेषज्ञों ने भारत सरकार को पत्र लिखकर SIR प्रक्रिया से संभावित मानवाधिकार उल्लंघनों पर चिंता व्यक्त की थी। उन्होंने विशेष रूप से पश्चिम बंगाल में मुसलमानों और बंगाली अल्पसंख्यकों पर पड़ने वाले प्रभाव का उल्लेख किया था।

शिकायत में कहा गया है:

“UN ह्यूमन राइट्स काउंसिल के विशेष प्रतिवेदकों (UNSRs) ने 1 मई 2026 के संयुक्त संदेश में SIR प्रक्रिया को लेकर कई गंभीर चिंताएं औपचारिक रूप से उठाईं। यह संदेश अल्पसंख्यक मुद्दों, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा धर्म या विश्वास की स्वतंत्रता से संबंधित विशेष प्रतिवेदकों द्वारा जारी किया गया था। इसमें विशेष रूप से मुस्लिम अल्पसंख्यकों के अधिकारों के संभावित उल्लंघन और पश्चिम बंगाल में SIR प्रक्रिया को ‘विशेष चिंता’ का विषय बताया गया।”

बिहार में SIR: बड़े पैमाने पर नाम हटाने का आरोप

याचिकाकर्ताओं का कहना है कि भले ही चुनाव आयोग ने दावा किया था कि इस प्रक्रिया का उद्देश्य केवल पात्र मतदाताओं को सूची में शामिल करना था, लेकिन बिहार में 2025 के पायलट प्रोजेक्ट के दौरान गंभीर भेदभाव सामने आया। 100 दिनों से भी कम समय में लाखों मतदाताओं के नाम हटा दिए गए। आरोप है कि मुसलमानों, महिलाओं और गरीबों को विशेष रूप से निशाना बनाया गया, जबकि बहुत कम लोगों को अपने नाम हटाए जाने के खिलाफ प्रभावी अपील का अवसर मिला।

देशभर में 5.2 करोड़ नाम हटाए जाने का दावा

NHRC में दायर याचिका के अनुसार, बिहार के बाद SIR प्रक्रिया को 12 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों तक विस्तारित किया गया, जिसके परिणामस्वरूप लगभग 5.2 करोड़ नाम मतदाता सूची से हटाए गए। पश्चिम बंगाल सबसे अधिक प्रभावित रहा, जहां लगभग 91 लाख नाम हटाए गए। शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि मामूली वर्तनी संबंधी त्रुटियों के आधार पर भी वैध मतदाताओं के नाम हटाए गए और इसका सबसे अधिक असर मुस्लिम समुदाय पर पड़ा।

‘फॉर्म-7’ के जरिए सुनियोजित अभियान का आरोप

याचिका में कहा गया है कि कानून नागरिकों को ‘फॉर्म-7’ के माध्यम से मतदाता सूची में दर्ज नामों पर आपत्ति दर्ज करने की अनुमति देता है। लेकिन आरोप है कि गुजरात, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और असम में राजनीतिक दलों से जुड़े लोगों ने इस प्रक्रिया का इस्तेमाल मुस्लिम मतदाताओं के नाम हटाने के लिए सुनियोजित अभियान के रूप में किया।

अपारदर्शी AI प्रणाली के इस्तेमाल पर सवाल

हस्ताक्षरकर्ताओं के अनुसार, मतदाता डेटा में कथित अनियमितताओं की पहचान के लिए सरकार ने AI आधारित प्रणाली का उपयोग किया। उनका आरोप है कि इस प्रणाली की कार्यप्रणाली, त्रुटि दर और पक्षपात-रोधी उपायों के बारे में कोई पारदर्शिता नहीं थी, जिसके कारण लाखों लोग उचित प्रक्रिया के बिना अपने मताधिकार से वंचित हो गए।

नेताओं द्वारा ‘घुसपैठिया’ जैसी भाषा के इस्तेमाल पर आपत्ति

याचिकाकर्ताओं का कहना है कि सरकार के वरिष्ठ पदाधिकारियों ने सार्वजनिक रूप से हटाए गए मतदाताओं को अवैध प्रवासी और “घुसपैठिया” जैसे शब्दों से संबोधित किया। उनका आरोप है कि इस प्रकार की भाषा वैध भारतीय मुस्लिम नागरिकों के प्रति भेदभाव को बढ़ावा देती है और प्रशासनिक प्रक्रियाओं को प्रभावित करती है।

सुप्रीम कोर्ट की समय-सीमा पर सवाल

याचिका में कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट ने SIR प्रक्रिया पर रोक लगाने से इनकार किया और पश्चिम बंगाल के प्रभावित मतदाताओं को अपील दायर करने के लिए अत्यंत सीमित समय दिया। शिकायतकर्ताओं का तर्क है कि 34 लाख से अधिक संभावित अपीलों के मद्देनज़र यह समय-सीमा व्यावहारिक रूप से निष्पक्ष सुनवाई के लिए अपर्याप्त थी।

अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार मानकों के उल्लंघन का आरोप

याचिकाकर्ताओं का कहना है कि धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यकों के बड़े पैमाने पर नाम हटाना अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार दायित्वों का उल्लंघन है। उनका तर्क है कि मतदान और राजनीतिक प्रतिनिधित्व के अधिकार से वंचित करना मानवाधिकारों का गंभीर हनन है।

NHRC से प्रमुख मांगें

याचिकाकर्ताओं ने NHRC से अनुरोध किया है कि वह:
  • शिकायत पर औपचारिक संज्ञान लेकर इसे दर्ज करे।
  • चुनाव आयोग और संबंधित मंत्रालयों से विस्तृत रिपोर्ट मांगे।
  • मामले पर खुली ऑनलाइन जन-सुनवाई आयोजित करे।
  • चुनाव आयोग और संबंधित अधिकारियों को जवाब देने के लिए तलब करे।
  • जांच पूरी होने तक अन्य राज्यों में SIR प्रक्रिया को रोकने की अंतरिम सिफारिश करे।
  • भेदभावपूर्ण सार्वजनिक बयानों के संबंध में जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक कदम सुझाए।
  • न्याय के हित में आवश्यक अन्य आदेश और सिफारिशें जारी करे।

पेरिस सिद्धांतों के तहत NHRC की भूमिका

याचिका में यह भी उल्लेख किया गया है कि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) की स्थापना 1993 के मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम के तहत भारत की अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार प्रतिबद्धताओं के अनुरूप की गई थी। आयोग का दायित्व संयुक्त राष्ट्र के पेरिस सिद्धांतों के अनुरूप स्वतंत्र और प्रभावी मानवाधिकार संरक्षण सुनिश्चित करना है।

ज्ञापन पर हस्ताक्षर करने वाले

दस्तावेज़ के अनुसार, इस ज्ञापन पर फोरम फॉर इलेक्टोरल इंटीग्रिटी के संयोजक एम. जी. देवसहायम (सेवानिवृत्त IAS), जवाहर सरकार (सेवानिवृत्त IAS), सॉफ्टवेयर विशेषज्ञ माधव देशपांडे, RTI कार्यकर्ता वेंकटेश नायक तथा दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर डॉ. संत प्रकाश सहित कई प्रमुख नागरिकों और विशेषज्ञों ने हस्ताक्षर किए हैं।



 

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