भगत सिंह ने दया नहीं मांगी, सावरकर ने 10 याचिकाएं दीं: प्रपौत्र का कोर्ट में बयान

Written by sabrang india | Published on: June 17, 2026
सावरकर के प्रपौत्र सत्यकी सावरकर, जिन्होंने विपक्ष के नेता राहुल गांधी के खिलाफ आपराधिक मानहानि का मामला दायर किया है, ने अदालत में गवाही के दौरान स्वीकार किया कि जहां कई अन्य क्रांतिकारियों ने ब्रिटिश शासन के सामने दया याचिका दायर करने से इनकार किया था, वहीं विनायक दामोदर सावरकर ने ऐसी दस याचिकाएं दायर की थीं।



हिंदू महासभा से जुड़े विचारक विनायक दामोदर सावरकर ने अपनी सजा में राहत पाने के लिए औपनिवेशिक ब्रिटिश सरकार के समक्ष दस दया याचिकाएं दायर की थीं। यह बात उनके प्रपौत्र सत्यकी सावरकर ने सोमवार (15 जून) को पुणे की एक विशेष सांसद/विधायक (MP/MLA) अदालत में गवाही के दौरान कही।

उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि उसी दौर के कई अन्य स्वतंत्रता सेनानियों और क्रांतिकारियों ने अंग्रेजों के समक्ष दया याचिका दायर नहीं की थी। इस गवाही की जानकारी सबसे पहले 16 जून को लाइव लॉ ने प्रकाशित की।

सत्यकी सावरकर विशेष न्यायाधीश अमोल शिंदे की अदालत में जिरह के दौरान गवाही दे रहे थे। यह मामला कांग्रेस नेता और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी के खिलाफ दायर आपराधिक मानहानि शिकायत से जुड़ा है। शिकायत में आरोप लगाया गया है कि गांधी ने लंदन में दिए गए एक भाषण के दौरान सावरकर के बारे में मानहानिकारक टिप्पणियां की थीं।

राहुल गांधी की ओर से अधिवक्ता मिलिंद पवार जिरह कर रहे हैं।

गवाही के दौरान सत्यकी सावरकर ने कहा कि उनके परदादा को अंडमान भेजे जाने से पहले ही गदर आंदोलन से जुड़ी एक पत्रिका में "वीर" कहा गया था।

उन्होंने अदालत से कहा: "यह सच है कि सावरकर ने दस बार दया याचिका दायर की थी। यह भी सच है कि उस समय उन्हें 'वीर' कहा जाता था। दस दया याचिकाएं दायर करने के बावजूद उन्हें 'वीर' कहा गया। यह कहना सही नहीं होगा कि जिसने दस बार दया याचिका दायर की हो, उसे 'वीर' नहीं कहा जा सकता।"

उन्होंने आगे कहा: "यह सच है कि उसी दौर के क्रांतिकारियों—राजगुरु, बटुकेश्वर दत्त और अशफाकुल्ला खान—ने दया याचिका दायर नहीं की थी। यह भी सच है कि सावरकर ने सजा सुनाए जाने के लगभग एक महीने के भीतर पहली दया याचिका दायर कर दी थी।"

सत्यकी ने कहा कि उन्हें यह जानकारी नहीं थी कि भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने ब्रिटिश सरकार से स्वयं को युद्धबंदी का दर्जा देने की मांग की थी तथा किसी प्रकार की रियायत या नरमी स्वीकार करने से इनकार किया था।

उन्होंने कहा, "यह सच है कि भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त अंत तक अपनी विचारधारा और सिद्धांतों पर अडिग रहे।"

दया याचिकाओं पर अदालत में चर्चा

सत्यकी सावरकर ने अदालत को बताया कि सावरकर द्वारा दायर दसों दया याचिकाओं का रिकॉर्ड सरकारी अभिलेखों में उपलब्ध है।

हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि इन याचिकाओं की भाषा से ब्रिटिश शासन के प्रति वफादारी का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।

उन्होंने कहा: "यह सच है कि दया याचिकाएं सरकारी रिकॉर्ड में उपलब्ध हैं। यह भी सच है कि ब्रिटिश सरकार के पास दया याचिकाओं के आधार पर सजा कम करने या उसमें बदलाव करने का अधिकार था।"

सत्यकी ने दावा किया कि ब्रिटिश सरकार ने सावरकर की याचिकाएं खारिज कर दी थीं और अपने जवाब में आशंका जताई थी कि यदि उन्हें रिहा किया गया तो वे फिर से क्रांतिकारी गतिविधियों में शामिल हो सकते हैं।

उन्होंने कहा: "यह सच है कि ब्रिटिश शासन में दया याचिका दायर करना एक सामान्य कानूनी प्रक्रिया थी। केवल सावरकर ही नहीं, अन्य कैदियों ने भी ऐसी याचिकाएं दायर की थीं।"

हालांकि, उन्होंने इस बात से असहमति जताई कि सावरकर की याचिकाओं में ब्रिटिश सरकार के प्रति वफादारी जताने वाली भाषा थी।

दया याचिका दायर करना कैदी की व्यक्तिगत पसंद थी

अपनी गवाही में सत्यकी ने कहा कि दया याचिकाओं में प्रयुक्त भाषा उस समय की प्रशासनिक प्रक्रिया और प्रोटोकॉल के अनुरूप थी।

उन्होंने यह भी कहा कि क्रांतिकारियों द्वारा हथियार उठाने के पीछे अंग्रेजी शासन का दमन और अन्याय था। उनके अनुसार, सावरकर का मानना था कि यदि ब्रिटिश सरकार ने समय रहते सुधार लागू किए होते, तो कई क्रांतिकारी हिंसक रास्ता नहीं अपनाते।

कार्यवाही के दौरान अदालत ने सावरकर की एक दया याचिका का अंश भी रिकॉर्ड पर लिया, जिसमें उन्होंने शिकायत की थी कि उनके साथ अंडमान भेजे गए अन्य कैदियों को रिहा कर दिया गया, जबकि उन्हें 'क्लास-D' कैदी के रूप में रखकर कठोर दंड दिया जाता रहा।

सत्यकी ने आगे कहा: "मुझे इस बात की जानकारी नहीं है कि सावरकर ने हर याचिका के अंत में 'मैं आपका सबसे आज्ञाकारी सेवक बना रहना चाहता हूं' जैसे शब्द लिखे थे।"

उन्होंने यह भी कहा कि उनके पास ऐसी कोई विशेषज्ञ रिपोर्ट नहीं है, जो यह साबित करे कि सावरकर की याचिकाओं की भाषा केवल औपचारिकता थी या किसी विशेष रणनीति का हिस्सा।

सत्यकी ने यह भी स्वीकार किया कि किसी भी कैदी पर दया याचिका दायर करने की बाध्यता नहीं थी और यह पूरी तरह उसकी व्यक्तिगत पसंद पर निर्भर करता था।

उन्होंने कहा, "यह सही है कि कई क्रांतिकारियों ने अत्यंत कठिन परिस्थितियां झेलीं, हालांकि मुझे उन सभी कैदियों के नाम ज्ञात नहीं हैं जिन्होंने दया याचिकाएं दायर की थीं।"

मामले में सत्यकी सावरकर की जिरह अब 1 जुलाई को जारी रहेगी।

पृष्ठभूमि

मानहानि शिकायत में आरोप लगाया गया है कि राहुल गांधी ने पिछले कुछ वर्षों में विभिन्न अवसरों पर विनायक दामोदर सावरकर के बारे में कथित रूप से मानहानिकारक टिप्पणियां की हैं।

शिकायत के अनुसार, 5 मार्च 2023 को यूनाइटेड किंगडम में ओवरसीज कांग्रेस को संबोधित करते हुए गांधी ने सावरकर के बारे में कुछ टिप्पणियां की थीं, जिन्हें शिकायतकर्ता ने झूठा और दुर्भावनापूर्ण बताया है।

सत्यकी सावरकर का आरोप है कि गांधी ने जानबूझकर सावरकर की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने और उनके परिवार को मानसिक पीड़ा पहुंचाने के उद्देश्य से तथ्यहीन आरोप लगाए।

उन्होंने अपनी शिकायत के समर्थन में विभिन्न समाचार रिपोर्टें और गांधी के भाषण का यूट्यूब वीडियो भी प्रस्तुत किया है।

शिकायत में यह भी कहा गया है कि गांधी ने सावरकर पर एक ऐसी पुस्तक लिखने का आरोप लगाया था, जिसमें कथित रूप से एक मुस्लिम व्यक्ति की पिटाई का उल्लेख था, जबकि सत्यकी के अनुसार ऐसी कोई पुस्तक या घटना अस्तित्व में नहीं थी।

आपराधिक मानहानि की इस शिकायत में भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 500 के तहत अधिकतम दंड और दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 357 के तहत अधिकतम मुआवजे की मांग की गई है।

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