इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पत्रकार सत्यम वर्मा की राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (रासुका) के तहत हिरासत को चुनौती देने वाली याचिका पर केंद्र और उत्तर प्रदेश सरकार से जवाब मांगा है। वर्मा का दावा है कि 13 अप्रैल को नोएडा में हुई हिंसा के समय वह लखनऊ में थे। याचिका में यह भी कहा गया है कि प्रदर्शन से जुड़े किसी भी एफआईआर में उनका नाम दर्ज नहीं है।

पत्रकार सत्यम वर्मा. (फोटो साभार: सोशल मीडिया/फेसबुक)
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पत्रकार सत्यम वर्मा की राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (रासुका), 1980 के तहत हिरासत को चुनौती देने वाली याचिका पर केंद्र सरकार, उत्तर प्रदेश सरकार और गौतम बुद्ध नगर के जिलाधिकारी से जवाब मांगा है।
अदालत ने संबंधित पक्षों को अपना पक्ष प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है। मामले की अगली सुनवाई के दौरान सरकार और जिलाधिकारी की ओर से जवाब दाखिल किया जाना है।
ज्ञात हो कि सत्यम वर्मा को अप्रैल 2026 में नोएडा में हुए श्रमिकों के प्रदर्शन के मामले में निवारक हिरासत में लिया गया था।
द हिंदू की रिपोर्ट के अनुसार, जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस अचल सचदेव की पीठ ने बुधवार 16 सितंबर को संबंधित अधिकारियों को नोटिस जारी किया है। मामले की अगली सुनवाई 7 अक्टूबर को होगी।
उल्लेखनीय है कि सत्यम वर्मा ने अपनी याचिका में गौतम बुद्ध नगर के जिलाधिकारी की ओर से 12 मई को जारी हिरासत आदेश को चुनौती दी है। उन्होंने राज्य सरकार द्वारा उनकी हिरासत को मंजूरी देने और बाद में इसकी पुष्टि करने संबंधी आदेशों को भी चुनौती दी है।
उन्होंने इन आदेशों को रद्द करने, तत्काल रिहाई और कथित अवैध हिरासत के लिए मुआवजे की मांग की है।
याचिका में दावा किया गया है कि हिरासत आदेश में सत्यम वर्मा को 13 अप्रैल को नोएडा में हुई हिंसा की घटना वाली जगह पर मौजूद बताया गया है। हालांकि, याचिका के अनुसार, उस दिन वर्मा लखनऊ में थे।
याचिका के मुताबिक, सीसीटीवी फुटेज और कॉल डिटेल रिकॉर्ड से इस बात की पुष्टि होती है। याचिका में कहा गया है कि हसनगंज पुलिस ने उसी दिन करीब 3:30 बजे सत्यम वर्मा को हिरासत में लिया था।
‘किसी एफआईआर में नाम नहीं’
वर्मा की याचिका में आरोप लगाया गया है कि जांच अधिकारी ने सीसीटीवी फुटेज और कॉल डिटेल रिकॉर्ड हिरासत आदेश जारी करने वाले अधिकारी के समक्ष पेश नहीं किए।
याचिका के मुताबिक, वर्मा का नाम उन 11 एफआईआर में से किसी में भी दर्ज नहीं है, जिनके आधार पर उन्हें हिरासत में लिया गया है।
याचिका में वर्मा ने पुलिस हिरासत में सह-आरोपी या गवाह मंगल द्वारा दिए गए कथित बयानों को भी चुनौती दी है। इसमें कहा गया है कि इस तरह के बयानों के आधार पर निवारक हिरासत का आदेश जारी नहीं किया जा सकता।
‘आय का हिसाब दिया गया’
वर्मा ने अपनी पेशेवर आय को अधिकारियों द्वारा कथित तौर पर ‘दंगा फंडिंग’ बताए जाने पर भी आपत्ति जताई है। याचिका में कहा गया है कि अनुवादक और प्रकाशक के तौर पर उनकी आय बैंक के माध्यम से प्राप्त हुई थी और उसका पूरा विवरण आयकर रिटर्न में दर्ज किया गया था।
वर्मा का कहना है कि श्रमिकों का प्रदर्शन न्यूनतम वेतन की मांग को लेकर किया गया था। याचिका के मुताबिक, इस प्रदर्शन से सार्वजनिक व्यवस्था के लिए ऐसा कोई खतरा उत्पन्न नहीं हुआ था, जिसके आधार पर रासुका के तहत निवारक हिरासत की आवश्यकता पड़ती।
याचिका में इसी आंदोलन के सिलसिले में हिरासत में ली गईं आकृति चौधरी की हिरासत रद्द करने के हाईकोर्ट के पहले के फैसले का भी हवाला दिया गया है।
वर्मा ने 17 और 18 अप्रैल की दरम्यानी रात हुई अपनी शुरुआती गिरफ्तारी को भी चुनौती दी है। उनका आरोप है कि सादे कपड़ों में पहुंचे पुलिसकर्मियों ने उन्हें बिना गिरफ्तारी मेमो के हिरासत में लिया और उनके परिवार को भी इसकी सूचना नहीं दी।
गौरतलब है कि हाईकोर्ट में यह सुनवाई वर्मा की जमानत याचिका पर सुनवाई एक दिन के लिए टाले जाने के बाद हुई है। यह जमानत याचिका प्रदर्शन से जुड़े 11 आपराधिक मामलों में से एक से संबंधित है। राज्य सरकार ने मामले में अपनी आपत्तियां दाखिल करने के लिए अदालत से समय मांगा है।
राज्य सरकार को इस सवाल पर भी जवाब देना है कि 23 जून को जमानत पा चुके एक सह-आरोपी के मामले में समानता के आधार पर वर्मा को भी जमानत दी जा सकती है या नहीं।
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पत्रकार सत्यम वर्मा. (फोटो साभार: सोशल मीडिया/फेसबुक)
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पत्रकार सत्यम वर्मा की राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (रासुका), 1980 के तहत हिरासत को चुनौती देने वाली याचिका पर केंद्र सरकार, उत्तर प्रदेश सरकार और गौतम बुद्ध नगर के जिलाधिकारी से जवाब मांगा है।
अदालत ने संबंधित पक्षों को अपना पक्ष प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है। मामले की अगली सुनवाई के दौरान सरकार और जिलाधिकारी की ओर से जवाब दाखिल किया जाना है।
ज्ञात हो कि सत्यम वर्मा को अप्रैल 2026 में नोएडा में हुए श्रमिकों के प्रदर्शन के मामले में निवारक हिरासत में लिया गया था।
द हिंदू की रिपोर्ट के अनुसार, जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस अचल सचदेव की पीठ ने बुधवार 16 सितंबर को संबंधित अधिकारियों को नोटिस जारी किया है। मामले की अगली सुनवाई 7 अक्टूबर को होगी।
उल्लेखनीय है कि सत्यम वर्मा ने अपनी याचिका में गौतम बुद्ध नगर के जिलाधिकारी की ओर से 12 मई को जारी हिरासत आदेश को चुनौती दी है। उन्होंने राज्य सरकार द्वारा उनकी हिरासत को मंजूरी देने और बाद में इसकी पुष्टि करने संबंधी आदेशों को भी चुनौती दी है।
उन्होंने इन आदेशों को रद्द करने, तत्काल रिहाई और कथित अवैध हिरासत के लिए मुआवजे की मांग की है।
याचिका में दावा किया गया है कि हिरासत आदेश में सत्यम वर्मा को 13 अप्रैल को नोएडा में हुई हिंसा की घटना वाली जगह पर मौजूद बताया गया है। हालांकि, याचिका के अनुसार, उस दिन वर्मा लखनऊ में थे।
याचिका के मुताबिक, सीसीटीवी फुटेज और कॉल डिटेल रिकॉर्ड से इस बात की पुष्टि होती है। याचिका में कहा गया है कि हसनगंज पुलिस ने उसी दिन करीब 3:30 बजे सत्यम वर्मा को हिरासत में लिया था।
‘किसी एफआईआर में नाम नहीं’
वर्मा की याचिका में आरोप लगाया गया है कि जांच अधिकारी ने सीसीटीवी फुटेज और कॉल डिटेल रिकॉर्ड हिरासत आदेश जारी करने वाले अधिकारी के समक्ष पेश नहीं किए।
याचिका के मुताबिक, वर्मा का नाम उन 11 एफआईआर में से किसी में भी दर्ज नहीं है, जिनके आधार पर उन्हें हिरासत में लिया गया है।
याचिका में वर्मा ने पुलिस हिरासत में सह-आरोपी या गवाह मंगल द्वारा दिए गए कथित बयानों को भी चुनौती दी है। इसमें कहा गया है कि इस तरह के बयानों के आधार पर निवारक हिरासत का आदेश जारी नहीं किया जा सकता।
‘आय का हिसाब दिया गया’
वर्मा ने अपनी पेशेवर आय को अधिकारियों द्वारा कथित तौर पर ‘दंगा फंडिंग’ बताए जाने पर भी आपत्ति जताई है। याचिका में कहा गया है कि अनुवादक और प्रकाशक के तौर पर उनकी आय बैंक के माध्यम से प्राप्त हुई थी और उसका पूरा विवरण आयकर रिटर्न में दर्ज किया गया था।
वर्मा का कहना है कि श्रमिकों का प्रदर्शन न्यूनतम वेतन की मांग को लेकर किया गया था। याचिका के मुताबिक, इस प्रदर्शन से सार्वजनिक व्यवस्था के लिए ऐसा कोई खतरा उत्पन्न नहीं हुआ था, जिसके आधार पर रासुका के तहत निवारक हिरासत की आवश्यकता पड़ती।
याचिका में इसी आंदोलन के सिलसिले में हिरासत में ली गईं आकृति चौधरी की हिरासत रद्द करने के हाईकोर्ट के पहले के फैसले का भी हवाला दिया गया है।
वर्मा ने 17 और 18 अप्रैल की दरम्यानी रात हुई अपनी शुरुआती गिरफ्तारी को भी चुनौती दी है। उनका आरोप है कि सादे कपड़ों में पहुंचे पुलिसकर्मियों ने उन्हें बिना गिरफ्तारी मेमो के हिरासत में लिया और उनके परिवार को भी इसकी सूचना नहीं दी।
गौरतलब है कि हाईकोर्ट में यह सुनवाई वर्मा की जमानत याचिका पर सुनवाई एक दिन के लिए टाले जाने के बाद हुई है। यह जमानत याचिका प्रदर्शन से जुड़े 11 आपराधिक मामलों में से एक से संबंधित है। राज्य सरकार ने मामले में अपनी आपत्तियां दाखिल करने के लिए अदालत से समय मांगा है।
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