“एक भी छात्र की जान नहीं जानी चाहिए”: बॉम्बे हाईकोर्ट की सरकार को सख्त चेतावनी, आदिवासी छात्रावास आंदोलन पर 31 अगस्त को फिर सुनवाई

Written by sabrang india | Published on: August 31, 2026
पुणे के मांजरी में पिछले 17 दिनों से जारी आदिवासी छात्रों की भूख हड़ताल महाराष्ट्र सरकार द्वारा उनकी मांगें स्वीकार किए जाने के बाद 29 अगस्त को स्थगित कर दी गई।


फोटो साभार : द मूकनायक 

बॉम्बे हाईकोर्ट ने शनिवार को महाराष्ट्र सरकार को पुणे जिले के मांजरी स्थित सरकारी आदिवासी छात्रावास में भूख हड़ताल पर बैठे छात्रों को तत्काल चिकित्सा सहायता उपलब्ध कराने का निर्देश दिया। अदालत ने कहा कि जरूरत पड़ने पर छात्रों को अस्पताल में भर्ती कराया जाए और डॉक्टरों की सलाह के अनुसार उन्हें चिकित्सकीय निगरानी में भोजन भी उपलब्ध कराया जाए।

यह आदेश अशोक कावडू मेश्राम बनाम महाराष्ट्र राज्य एवं अन्य मामले की सुनवाई के दौरान दिया गया। एक्टिंग चीफ जस्टिस रविंद्र वी. घुगे और जस्टिस गौतम ए. अंखड़ की खंडपीठ ने मामले को शनिवार दोपहर तत्काल सुनवाई के लिए लिया। पीठ ने स्पष्ट किया कि छात्रों की जान बचाना सर्वोच्च प्राथमिकता है।

पीठ ने मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा, “जो छात्र उपवास पर बैठे हैं, उनका ख्याल रखा जाए। जरूरत पड़ने पर उन्हें चिकित्सा सहायता दी जाए। अगर डॉक्टर सलाह दें कि चिकित्सकीय निगरानी में उन्हें भोजन दिया जाना चाहिए, तो ऐसा भी किया जाए। हम नहीं चाहते कि एक भी छात्र की जान जाए।”

अपने आदेश में अदालत ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि वह सुनिश्चित करे कि भूख हड़ताल से प्रभावित सभी छात्रों को समय पर पर्याप्त चिकित्सा सहायता मिले। जरूरत पड़ने पर डॉक्टरों की सलाह के अनुसार उन्हें अस्पताल में भर्ती कर उचित उपचार दिया जाए। साथ ही, चिकित्सकीय सलाह के तहत आवश्यक होने पर छात्रों को चिकित्सा निगरानी में भोजन भी उपलब्ध कराया जाए।

द मूकनायक की रिपोर्ट के अनुसार, याचिकाकर्ता अशोक कावडू मेश्राम पुणे जिले के मांजरी के स्थानीय निवासी हैं, जहां सरकारी आदिवासी छात्रावास के छात्र पिछले 15 दिनों से भूख हड़ताल पर थे। याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि स्थिति बेहद गंभीर है और छात्रों की जान खतरे में है। उन्होंने चेतावनी दी कि शिकायतें अनसुनी रहीं तो विरोध पूरे महाराष्ट्र में फैल सकता है। वकील ने सरकारी आदिवासी आवासीय संस्थानों की व्यवस्थागत विफलता रेखांकित करते हुए हालिया घटनाओं का हवाला दिया: अमरावती के आश्रम स्कूल में छात्र की मृत्यु और गंभीर फूड पॉइजनिंग, ठाणे के शहापुर तालुका में 22 नाबालिग छात्रों को प्रभावित करने वाला भोजन संदूषण, तथा आवासीय छात्रावास में सांप काटने से हुई मौतें।

एडवोकेट जनरल मिलिंद साठे ने अदालत को बताया कि सरकार ने मामले में तत्काल कदम उठाए हैं। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने उसी दिन आदिवासी विकास मंत्री, विभागीय सचिवों और छात्र प्रतिनिधियों के साथ एक उच्चस्तरीय बैठक बुलाई है। साठे ने आश्वासन दिया कि बैठक के मिनट्स सोमवार 31 अगस्त को कोर्ट में पेश किए जाएंगे। मामला अगली सुनवाई के लिए 31 अगस्त को रखा गया।

छात्रों का यह आंदोलन खराब बुनियादी ढांचे, सुरक्षा संबंधी खतरों और सरकारी आदिवासी छात्रावासों व आश्रम स्कूलों से जुड़ी लंबित शिकायतों को लेकर चल रहा था। आंदोलन के बीच राहुल गांधी ने मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर छात्रों की समस्याओं का तत्काल समाधान करने की मांग की थी। इसके बाद सरकार ने मामले को गंभीरता से लेते हुए कार्रवाई शुरू की।

शनिवार शाम आदिवासी विकास मंत्री अशोक उइके ने घोषणा की कि सरकार ने छात्रों की प्रमुख मांगें स्वीकार कर ली हैं और उन्हें इस संबंध में लिखित आश्वासन भी दिया गया है। इसके बाद पुणे, नागपुर और नासिक में चल रही भूख हड़ताल समाप्त कर दी गई।

हाईकोर्ट ने छात्रों के जीवन को सर्वोपरि मानते हुए सरकार को उनकी स्वास्थ्य सुरक्षा के लिए तत्काल आवश्यक कदम उठाने का निर्देश दिया था। यही आदेश इस पूरे प्रकरण का केंद्र रहा।

महाराष्ट्र के पुणे जिले के मांजरी इलाके में आदिवासी छात्र अपनी विभिन्न मांगों को लेकर भूख हड़ताल पर बैठे थे, जो अब सरकार के आश्वासन के बाद स्थगित की गई है।

आदिवासी स्टूडेंट्स की परेशानियां

पुणे के मांजरी स्थित सरकारी आदिवासी छात्रावास समेत नागपुर और नासिक में छात्र लंबे समय से चली आ रही समस्याओं के विरोध में भूख हड़ताल पर बैठे थे। उनका आरोप था कि राज्य के आश्रम स्कूलों और आदिवासी छात्रावासों में खराब बुनियादी ढांचे, असुरक्षित परिसर, भोजन और स्वच्छता से जुड़ी समस्याओं के साथ-साथ चिकित्सा सुविधाओं की कमी को लगातार नजरअंदाज किया जा रहा है।

गढ़चिरौली के एक आवासीय स्कूल में सांप के काटने से तीन आदिवासी छात्राओं की मौत के बाद छात्रों में आक्रोश और बढ़ गया। इसके अलावा, अमरावती में फूड पॉइजनिंग से हुई मौत और ठाणे के शाहपुर में दर्जनों बच्चों के बीमार पड़ने जैसी घटनाओं ने आदिवासी छात्रावासों और आश्रम स्कूलों में सुरक्षा व्यवस्था को लेकर चिंता और गहरी कर दी।

छात्रों की प्रमुख मांगों में छात्रावास में प्रवेश के लिए तय उम्र सीमा संबंधी सरकारी परिपत्रों को रद्द करना, रिक्त पदों पर तत्काल नियुक्तियां करना और महंगाई के अनुरूप भत्ते व अन्य सुविधाएं उपलब्ध कराना शामिल था। इसके अलावा, छात्राओं के लिए सुरक्षित केंद्रीय छात्रावास की व्यवस्था, दुर्घटनाओं की स्थिति में मुआवजा और बीमा, जाति वैधता प्रमाणपत्रों का समयबद्ध निपटारा तथा सरकारी नौकरियों में अनुसूचित जनजाति आरक्षण का प्रभावी क्रियान्वयन भी उनकी प्रमुख मांगों में शामिल रहा।

यानी, छात्रों का आंदोलन केवल एक हड़ताल तक सीमित नहीं था, बल्कि यह उनके जीवन, शिक्षा और सम्मान की बुनियादी सुरक्षा से जुड़े सवालों को लेकर था।

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