छात्रों को खाना खिलाने से लेकर सुप्रीम कोर्ट में लड़ाई लड़ने तक: मोहम्मद जुनैद मलिक की कहानी

Written by sabrang india | Published on: July 30, 2026
कैसे एक युवा लॉ ग्रेजुएट, जिसने छात्र प्रदर्शनकारियों को खाना खिलाने में 35 दिन बिताए, सुप्रीम कोर्ट में याचिकाकर्ता बन गया और अपने परिवार के खिलाफ गैर-कानूनी हिरासत, डराने-धमकाने और ज़बरदस्ती कार्रवाई का आरोप लगाया।

  
Image: Navbharat Times

कई हफ्तों तक मोहम्मद जुनैद मलिक दिल्ली के जंतर-मंतर पर मौजूद शांत और लगातार दिखने वाले लोगों में से एक व्यक्ति थे। कोर्ट के कागजों या राजनीतिक बयानों में उनका नाम आने से बहुत पहले ही, छात्र उन्हें बस एक युवा वॉलंटियर के तौर पर जानते थे, जो हर लंबे प्रदर्शन के बाद सबके लिए पीने का पानी, चाय और गर्म भोजन की व्यवस्था करने में सबसे आगे रहते थे। जून और जुलाई के दौरान, परीक्षा में कथित गड़बड़ियों को लेकर 'कॉकरोच जनता पार्टी' (CJP) द्वारा शुरू किए गए छात्रों और युवाओं के जबरदस्त आंदोलन ने जब जोर पकड़ा, तो मलिक की बनाई कम्युनिटी किचन भी विरोध प्रदर्शन के मंच जितनी ही जानी-पहचानी हो गई।





26 साल के मलिक लॉ ग्रेजुएट हैं और ज्यूडिशियल सर्विस की तैयारी कर रहे हैं, वे आंदोलन के आयोजकों में शामिल नहीं थे। सुप्रीम कोर्ट में दायर अपनी याचिका के अनुसार, न तो उनके पास कोई आधिकारिक पद था और न ही उन्होंने विरोध प्रदर्शन की रणनीति बनाने में कोई मदद की। उनकी भूमिका काफी सरल थी, लोगों को खाना खिलाना। फिर भी, जुलाई के आखिरी हफ्ते तक, खाना बांटने के लिए मशहूर हुए यह वॉलंटियर खुद विरोध प्रदर्शन की सबसे बड़ी कहानियों में से एक कहानी बन गए। उन्होंने पुलिस पर गैर-कानूनी हिरासत, डराने-धमकाने और अपने परिवार को परेशान करने का आरोप लगाया, ये सभी दावे अब सुप्रीम कोर्ट के सामने हैं।

कम्युनिटी किचन चलाने वाले वॉलंटियर

मलिक का कहना है कि वे पहली बार जंतर-मंतर तब पहुंचे जब उन्होंने देखा कि दिल्ली की गर्मी में विरोध प्रदर्शन के लिए डेरा डाले छात्रों के पास पीने का बुनियादी पानी भी नहीं था। जैसा कि उन्होंने 'इंडिया टुडे' को बताया, पानी की बोतलों और बिस्कुट की एक मेज से शुरू हुई यह पहल धीरे-धीरे वॉलंटियर्स द्वारा चलाई जाने वाली किचन में बदल गई, जहां चौबीसों घंटे चाय, जूस और खाने के पैकेट दिए जाते थे। उन्होंने कहा कि यह काम किसी संस्थागत फंडिंग पर नहीं, बल्कि आम लोगों द्वारा लाए गए सामान या खाने के लिए दिए गए पैसे पर चलता था।

उन्होंने 'इंडिया टुडे' से कहा, "लोग खुद आते हैं। कुछ लोग खाना लाते हैं, तो कुछ पानी। हमारा काम बस सब कुछ व्यवस्थित करना और यह सुनिश्चित करना था कि कोई भूखा न रहे।"

सुप्रीम कोर्ट में दायर उनकी याचिका के अनुसार, अगले 35 दिनों तक- 20 जून, 2026 से शुरू करके- मलिक ने हर दिन खाने और पानी के वितरण का काम संभाला। कम्युनिटी किचन के वीडियो सोशल मीडिया पर खूब वायरल हुए, जिससे उन्हें छात्रों, वॉलंटियर्स और यहां तक कि CJP के "नेताओं" से भी तारीफ मिली, जिन्होंने विरोध प्रदर्शन के दौरान सार्वजनिक रूप से उनका शुक्रिया अदा किया। ऑनलाइन आंदोलन को फ़ॉलो करने वाले कई लोगों के लिए, वे "छात्रों को खाना खिलाने वाले व्यक्ति" बन गए।

वह रात जब सब कुछ बदल गया

मलिक का कहना है कि इस चर्चा में आने की वजह से उन पर अनचाहा ध्यान भी गया। 'लाइव-लॉ' (LiveLaw) की रिपोर्ट के अनुसार, उनकी याचिका में कहा गया है कि कम्युनिटी किचन की मीडिया कवरेज के बाद, पुलिस बार-बार एक ही सवाल पूछती रही कि खाने का खर्च कौन उठा रहा था? मलिक के मुताबिक, जवाब हमेशा एक ही रहा। उनका कहना है कि खाने का खर्च लोगों के दान, वॉलंटियर्स और समर्थकों से मिला, जिन्होंने या तो पैसे ट्रांसफर किए या सीधे खाना और पानी पहुंचाया। इसके लिए कोई एक मुख्य फाइनेंसर (पैसा देने वाला) नहीं था।

मलिक की याचिका के अनुसार, 24 जुलाई की आधी रात के कुछ ही समय बाद हालात बदल गए। कुत्ते के काटने के बाद एंटी-रेबीज इंजेक्शन लगवाने के लिए राम मनोहर लोहिया अस्पताल जाने के बाद, उनका कहना है कि लौटते समय उन्हें कुछ लोगों ने रोका, जिन्होंने खुद को दिल्ली पुलिस का अधिकारी बताया। 'इंडिया टुडे' और 'द लल्लनटॉप' को दिए इंटरव्यू में मलिक ने आरोप लगाया कि उनकी और उनके साथ मौजूद लोगों की आंखों पर पट्टी बांध दी गई, उनके फोन जब्त कर लिए गए और उन्हें एक अज्ञात जगह पर ले जाया गया।

सुप्रीम कोर्ट में दायर उनकी याचिका में पूरी घटना का विस्तार से ब्योरा दिया गया है। 'लाइव-लॉ' की रिपोर्ट के मुताबिक, उन्होंने आरोप लगाया कि वे पूरी रात पुलिस की हिरासत में रहे, उन्हें अपना मोबाइल फोन अनलॉक करने के लिए मजबूर किया गया, फोन का डेटा चेक किया गया और सीनियर अधिकारियों ने उनसे बार-बार प्रोटेस्ट किचन के लिए फंडिंग के बारे में पूछताछ की। याचिका के अनुसार, पूछताछ का फोकस खाने पर कम और उन लोगों की पहचान करने पर ज्यादा था जो कथित तौर पर बड़े प्रोटेस्ट को फाइनेंस कर रहे थे। मलिक का दावा है कि अधिकारियों ने उन्हें गंभीर नतीजों की धमकी दी, जिसमें नेशनल सिक्योरिटी एक्ट (NSA) के तहत कार्रवाई की संभावना भी शामिल थी, अगर वे फंडिंग का सोर्स नहीं बताते। उनका कहना है कि उन्होंने लगातार यही जवाब दिया कि कोई छिपा हुआ फाइनेंसर नहीं था, बल्कि आम नागरिक ही प्रोटेस्ट करने वालों को खाना खिलाने में मदद कर रहे थे।

परेशान करने के आरोप

दिल्ली लौटने के बाद, मलिक ने मीडिया इंटरव्यू के दौरान कई बार भावुक हो गए और अपने काम का बचाव किया। 'इंडिया टुडे' से बात करते हुए उन्होंने कहा, "मेरे खिलाफ कोई आपराधिक मामला दर्ज नहीं है। मैं कोई अपराधी नहीं हूं। हम सिर्फ छात्रों के लिए लड़ रहे हैं।"

उन्होंने आगे कहा, "अगर किसी को खाना या पीने का पानी देना अपराध माना जाता है, तो मैं वह 'अपराध' हजार बार करूंगा।" यह बात जल्द ही उनके मामले से जुड़ी सबसे ज्यादा शेयर की जाने वाली बातों में से एक बन गई।

मलिक के आरोप सिर्फ उनकी अपनी हिरासत तक सीमित नहीं हैं। सुप्रीम कोर्ट में दी गई उनकी अर्जी में कहा गया है कि पुलिस ने उनके पिता से परिवार के बैंक खातों के बारे में पूछताछ की, परिवार के गाजियाबाद वाले घर पर छापा मारा, घर की तलाशी ली, पहचान के दस्तावेज और वित्तीय रिकॉर्ड मांगे, और मेरठ में रिश्तेदारों को हिरासत में लिया- और यह सब बिना किसी कानूनी कागजी कार्रवाई या तय प्रक्रिया का पालन किए किया गया। याचिका में तर्क दिया गया है कि इन कार्रवाइयों का मकसद उन पर दबाव डालना था ताकि वे विरोध प्रदर्शन छोड़ दें और कथित फंडिंग नेटवर्क के बारे में जानकारी दें। इन कामों को सरकारी ताकत का गलत इस्तेमाल बताते हुए, अर्ज़ी में कहा गया है कि उनके परिवार के साथ जैसा बर्ताव किया गया, वह संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत उनके अधिकारों का उल्लंघन था।

पुलिस का जवाब

पुलिस अधिकारियों ने मलिक के बयान के कई अहम हिस्सों पर असहमति जताई है। 'स्क्रॉल' की एक रिपोर्ट के मुताबिक, गाजियाबाद पुलिस ने मलिक के पिता से पूछताछ की बात तो मानी, लेकिन उन्हें गिरफ्तार करने से इनकार किया और इसे एक सामान्य पूछताछ बताया। इसी तरह, मसूरी पुलिस ने भी उन्हें छोड़ने से पहले वित्तीय स्रोतों के बारे में उनके पिता से पूछताछ करने की पुष्टि की। मेरठ पुलिस ने मलिक के किसी भी रिश्तेदार को हिरासत में लेने से इनकार किया, जबकि दिल्ली पुलिस ने कहा कि वह आरोपों की जांच कर रही है।

वॉलंटीयर से याचिकाकर्ता तक

मलिक अब सुप्रीम कोर्ट पहुंचे हैं। उन्होंने RJD सांसद मनोज कुमार झा की उस रिट याचिका में दखल देने की अर्जी (इंटरवेन्शन एप्लीकेशन) दायर की है, जो CJP विरोध प्रदर्शनों के दौरान पुलिस की कथित ज्यादतियों से जुड़ी है। एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड नेहा राठी के जरिए दायर इस अर्जी में उनके परिवार के खिलाफ और जबरदस्ती की कार्रवाई से सुरक्षा की मांग की गई है और कोर्ट से यह सुनिश्चित करने को कहा गया है कि कोई भी जांच पूरी तरह से कानून के मुताबिक हो।

शायद मलिक की कहानी का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि वह कभी भी विरोध प्रदर्शन के सार्वजनिक नेताओं में से एक नहीं थे। उन्होंने न तो भाषण दिए, न अधिकारियों से बातचीत की और न ही मार्च का नेतृत्व किया। इसके बजाय, उनकी पहचान एक बहुत ही साधारण काम से बनी- यह सुनिश्चित करना कि छात्रों को खाना और पानी मिले। हालांकि, जब विरोध प्रदर्शन कोर्ट तक पहुंचा, तो खाना बांटने के लिए याद किए जाने वाले वही व्यक्ति खुद इसके सबसे प्रमुख याचिकाकर्ताओं में से एक बन गए। मलिक की कहानी विरोध-प्रदर्शन, पुलिस की कार्रवाई और धार्मिक पहचान के आपस में जुड़े होने को लेकर कुछ असहज सवाल भी खड़े करती है। उनके अपने बयान के मुताबिक, वे न तो कोई छात्र नेता थे, न ही राजनीतिक रणनीतिकार या आंदोलन का कोई जाना-माना चेहरा; वे बस एक वॉलंटियर थे जो कम्युनिटी किचन (सामुदायिक रसोई) चला रहे थे। फिर भी, खाने के लिए फंड कौन दे रहा था, इस बारे में बार-बार पूछे जाने वाले सवालों से लेकर उनके परिवार के घर पर कथित छापेमारी तक, जांच-पड़ताल का ज्यादातर हिस्सा उन्हीं पर केंद्रित रहा। उनके मुस्लिम होने की बात को नजअंदाज करना नामुमकिन हो गया, और यह शक भी बना रहा कि उन्हें जान-बूझकर निशाना बनाया गया, जबकि उनकी भूमिका सिर्फ़ खाना और पानी मुहैया कराने तक ही सीमित थी। हालांकि यह मामला अब सुप्रीम कोर्ट के सामने है, लेकिन कई लोगों के लिए मलिक का केस इस बात का एक बड़ा उदाहरण बन गया है कि कैसे मानवीय एकजुटता का काम भी धार्मिक पहचान के नजरिए से देखे जाने पर शक के घेरे में आ सकता है।

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