जब मामला सार्वजनिक हुआ, तो सूरत नगर निगम (एसएमसी) ने इतने बड़े पैमाने पर की गई इस तोड़-फोड़ को अपनी मंजूरी प्राप्त कार्रवाई मानने से इनकार कर दिया।

फोटो साभार : पीटीआई
सूरत की नासिरनगर झुग्गी बस्ती में 100 से अधिक घरों को गिराए जाने के कुछ दिनों बाद सूरत नगर निगम (एसएमसी) ने यह पता लगाने के लिए जांच शुरू कर दी है कि इस कार्रवाई की अनुमति किसने दी थी। निगम ने स्पष्ट रूप से कहा है कि यह तोड़-फोड़ उसकी ओर से नहीं कराई गई थी, जबकि कार्रवाई भारी पुलिस बल की मौजूदगी में की गई थी।
यह तोड़-फोड़ 30 मई से 1 जून के बीच अल्पसंख्यक-बहुल इलाके में वरिष्ठ नगर निगम और पुलिस अधिकारियों की मौजूदगी में की गई। प्रभावित लोगों का आरोप है कि उन्हें न तो कोई पूर्व नोटिस दिया गया और न ही परिसर खाली करने के लिए पर्याप्त समय या चेतावनी दी गई, जबकि नियमों के तहत ऐसा करना अनिवार्य है।
मामला सामने आने के बाद आरोप लगाए गए कि निजी रियल एस्टेट डेवलपर इस भूमि को खाली कराने के पीछे हो सकते हैं, ताकि आसपास प्रस्तावित उच्च-स्तरीय आवासीय और व्यावसायिक परियोजनाओं के लिए रास्ता बनाया जा सके।
कांग्रेस नेता असलम साइकिलवाला समेत कई स्थानीय लोगों ने नगर निगम को पत्र लिखकर पूछा कि आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के निवासियों को पहले कोई नोटिस क्यों नहीं दिया गया।
जब विवाद बढ़ा, तो निगम ने इतने बड़े पैमाने पर हुई इस तोड़-फोड़ को अपनी स्वीकृति प्राप्त कार्रवाई मानने से इनकार कर दिया।
डेक्कन हेराल्ड से बातचीत में एसएमसी आयुक्त एम. नागराजन ने बताया कि यह पता लगाने के लिए जांच शुरू की गई है कि तोड़-फोड़ की कार्रवाई किसके निर्देश पर की गई। उन्होंने कहा कि नगर निगम की इस कार्रवाई में कोई भूमिका नहीं थी और उसके कुछ अधिकारी केवल भूमि सीमांकन (डिमार्केशन) के कार्य के लिए मौके पर गए थे।
इस बीच, प्रभावित लोगों में से एक अजीज हुसैन शेख ने अधिवक्ता जमीर ज़ेड. शेख के माध्यम से गुजरात हाई कोर्ट में याचिका दायर की है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि यह तोड़-फोड़ बिना किसी वैध अनुमति और कानूनी प्रक्रिया का पालन किए की गई। मामले की सुनवाई इस सप्ताह होने की संभावना है।
मंगलवार को विपक्षी कांग्रेस ने घटना की जांच की मांग करते हुए आरोप लगाया कि "यह कार्रवाई सरकार की मिलीभगत के बिना संभव नहीं थी।"
एक बयान में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अमित चावड़ा ने कहा कि यह घटना "सरकारी मिलीभगत की ओर इशारा करती है, क्योंकि पुलिस अधिकारियों की मौजूदगी में बुलडोजरों से 100 से अधिक घर गिराए गए।"
चावड़ा ने कहा, "पिछले दस दिनों से हम यह जानने की मांग कर रहे हैं कि किसके आदेश पर इतनी बड़े पैमाने पर यह तोड़-फोड़ की गई। हमारे नेता लगातार यह मुद्दा उठा रहे हैं, लेकिन अधिकारी कोई कार्रवाई नहीं कर रहे हैं। इससे संदेह पैदा होता है कि यह गैर-कानूनी कार्रवाई वरिष्ठ अधिकारियों और सत्तारूढ़ दल के प्रभावशाली लोगों के निर्देश पर की गई थी।"
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सूरत की नासिरनगर झुग्गी बस्ती में 100 से अधिक घरों को गिराए जाने के कुछ दिनों बाद सूरत नगर निगम (एसएमसी) ने यह पता लगाने के लिए जांच शुरू कर दी है कि इस कार्रवाई की अनुमति किसने दी थी। निगम ने स्पष्ट रूप से कहा है कि यह तोड़-फोड़ उसकी ओर से नहीं कराई गई थी, जबकि कार्रवाई भारी पुलिस बल की मौजूदगी में की गई थी।
यह तोड़-फोड़ 30 मई से 1 जून के बीच अल्पसंख्यक-बहुल इलाके में वरिष्ठ नगर निगम और पुलिस अधिकारियों की मौजूदगी में की गई। प्रभावित लोगों का आरोप है कि उन्हें न तो कोई पूर्व नोटिस दिया गया और न ही परिसर खाली करने के लिए पर्याप्त समय या चेतावनी दी गई, जबकि नियमों के तहत ऐसा करना अनिवार्य है।
मामला सामने आने के बाद आरोप लगाए गए कि निजी रियल एस्टेट डेवलपर इस भूमि को खाली कराने के पीछे हो सकते हैं, ताकि आसपास प्रस्तावित उच्च-स्तरीय आवासीय और व्यावसायिक परियोजनाओं के लिए रास्ता बनाया जा सके।
कांग्रेस नेता असलम साइकिलवाला समेत कई स्थानीय लोगों ने नगर निगम को पत्र लिखकर पूछा कि आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के निवासियों को पहले कोई नोटिस क्यों नहीं दिया गया।
जब विवाद बढ़ा, तो निगम ने इतने बड़े पैमाने पर हुई इस तोड़-फोड़ को अपनी स्वीकृति प्राप्त कार्रवाई मानने से इनकार कर दिया।
डेक्कन हेराल्ड से बातचीत में एसएमसी आयुक्त एम. नागराजन ने बताया कि यह पता लगाने के लिए जांच शुरू की गई है कि तोड़-फोड़ की कार्रवाई किसके निर्देश पर की गई। उन्होंने कहा कि नगर निगम की इस कार्रवाई में कोई भूमिका नहीं थी और उसके कुछ अधिकारी केवल भूमि सीमांकन (डिमार्केशन) के कार्य के लिए मौके पर गए थे।
इस बीच, प्रभावित लोगों में से एक अजीज हुसैन शेख ने अधिवक्ता जमीर ज़ेड. शेख के माध्यम से गुजरात हाई कोर्ट में याचिका दायर की है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि यह तोड़-फोड़ बिना किसी वैध अनुमति और कानूनी प्रक्रिया का पालन किए की गई। मामले की सुनवाई इस सप्ताह होने की संभावना है।
मंगलवार को विपक्षी कांग्रेस ने घटना की जांच की मांग करते हुए आरोप लगाया कि "यह कार्रवाई सरकार की मिलीभगत के बिना संभव नहीं थी।"
एक बयान में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अमित चावड़ा ने कहा कि यह घटना "सरकारी मिलीभगत की ओर इशारा करती है, क्योंकि पुलिस अधिकारियों की मौजूदगी में बुलडोजरों से 100 से अधिक घर गिराए गए।"
चावड़ा ने कहा, "पिछले दस दिनों से हम यह जानने की मांग कर रहे हैं कि किसके आदेश पर इतनी बड़े पैमाने पर यह तोड़-फोड़ की गई। हमारे नेता लगातार यह मुद्दा उठा रहे हैं, लेकिन अधिकारी कोई कार्रवाई नहीं कर रहे हैं। इससे संदेह पैदा होता है कि यह गैर-कानूनी कार्रवाई वरिष्ठ अधिकारियों और सत्तारूढ़ दल के प्रभावशाली लोगों के निर्देश पर की गई थी।"
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