दहेज हत्या के आंकड़े डराने वाले: उत्तर प्रदेश और बिहार दहेज से जुड़ी मौतों में सबसे आगे, रोजाना 16 महिलाओं की जान ले रही कुप्रथा

Written by sabrang india | Published on: May 22, 2026
एनसीआरबी की रिपोर्ट के अनुसार, देशभर में साल 2024 में दहेज के कारण करीब 5,737 महिलाओं की जान गई, यानी हर दिन औसतन 15 से 16 मौतें हुईं। दहेज प्रताड़ना के चलते उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा 2,038 मौतें हुईं, वहीं 1,078 मामलों के साथ बिहार दूसरे स्थान पर रहा।


साभार : इंडिया टुडे

भोपाल की त्विषा शर्मा, ग्रेटर नोएडा की दीपिका नागर, ग्वालियर की पलक रजक और कर्नाटक की ऐश्वर्या के नाम सोशल मीडिया से लेकर मुख्यधारा की मीडिया तक चर्चा में हैं। इन युवतियों की मौत ने एक बार फिर दहेज हत्या, घरेलू हिंसा और उत्पीड़न जैसे गंभीर मुद्दों पर बहस छेड़ दी है। हालांकि, भारत में दहेज प्रथा न तो कोई नई समस्या है और न ही इसके कारण होने वाली मौतें और हत्याएं।

भारत में 1961 से दहेज प्रथा को कानूनन अपराध घोषित किया जा चुका है, लेकिन इसके बावजूद आज भी हर साल हजारों लड़कियां इस कुप्रथा की भेंट चढ़ रही हैं। दहेज के नाम पर होने वाली मौतें सिर्फ अखबारों की सुर्खियां भर नहीं हैं, बल्कि नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के आंकड़े भी इस गंभीर सामाजिक समस्या की पुष्टि करते हैं।

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक, देशभर में वर्ष 2024 के दौरान दहेज से जुड़ी घटनाओं में करीब 5,737 लोगों की जान गई। यानी औसतन हर दिन 15 से 16 महिलाएं इस कुप्रथा का शिकार हुईं।

यह आंकड़ा राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों द्वारा उपलब्ध कराए गए आधिकारिक डेटा पर आधारित है। इसमें भारतीय न्याय संहिता की धारा 80 और भारतीय दंड संहिता की धारा 304बी के तहत दर्ज मामलों को शामिल किया गया है।

राज्यवार आंकड़ों पर नजर डालें तो वर्ष 2024 में दहेज प्रताड़ना से होने वाली मौतों के मामलों में उत्तर प्रदेश सबसे ऊपर रहा, जहां 2,038 महिलाओं की जान गई। इसके बाद बिहार का स्थान रहा, जहां ऐसे 1,078 मामले दर्ज किए गए। इन दोनों राज्यों में दहेज हत्या की दर भी देश में सबसे अधिक रही। उत्तर प्रदेश में प्रति एक लाख महिला आबादी पर 1.8 मौतें दर्ज की गईं, जबकि बिहार में यह आंकड़ा प्रति एक लाख महिला आबादी पर 1.7 रहा।

मध्य प्रदेश इस सूची में तीसरे स्थान पर है, जहां दहेज प्रताड़ना से मौत के 450 मामले दर्ज किए गए। इसके बाद राजस्थान चौथे स्थान पर रहा, जहां 386 महिलाओं की मौत दर्ज की गई। वहीं, पश्चिम बंगाल पांचवें स्थान पर है, जहां इस कुप्रथा के कारण 337 महिलाओं की जान गई।

द वायर ने लिखा कि आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2017 से 2022 के बीच दहेज उत्पीड़न के कारण हर साल औसतन सात हजार महिलाओं की मौत हुई या उनकी हत्या कर दी गई। वर्ष 2022 में ऐसे मामलों की संख्या 6,450 दर्ज की गई थी। यानी उस वर्ष प्रतिदिन औसतन 18 महिलाओं ने दहेज प्रताड़ना के चलते अपनी जान गंवाई।

वर्ष 2023 और 2024 के बीच ‘भारत में आकस्मिक मौतें और आत्महत्याएं’ रिपोर्ट में दहेज से जुड़ी आत्महत्या के मामलों में लगभग 6.7 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। ऐसे मामलों की संख्या वर्ष 2023 में 1,587 थी, जो बढ़कर वर्ष 2024 में 1,693 हो गई। यह आंकड़ा देश में दहेज उत्पीड़न और दुर्व्यवहार की लगातार बनी हुई गंभीर स्थिति की ओर संकेत करता है।

वहीं, 2023 में ‘महिलाओं के खिलाफ अपराध’ से जुड़े एक अध्ययन में पाया गया कि घरेलू हिंसा की शिकायत दर्ज कराने वाली हर पांच में से तीन महिलाओं ने दहेज उत्पीड़न की भी शिकायत की थी।

ये केवल सरकारी आंकड़े हैं। महिला संगठनों और इस क्षेत्र में काम करने वाले लोगों का कहना है कि दहेज उत्पीड़न और मौत से जुड़े कई मामले पुलिस तक पहुंच ही नहीं पाते। कई बार महिला की मौत के बाद सामाजिक दबाव के कारण दोनों पक्ष अदालत के बाहर ही समझौता कर लेते हैं। यदि ऐसे मामलों को भी शामिल किया जाए, तो दहेज से होने वाली मौतों और उत्पीड़न की वास्तविक संख्या कहीं अधिक, यहां तक कि दोगुनी भी हो सकती है।

दहेज हत्या को लेकर हाल में सामने आए मामले

उल्लेखनीय है कि हाल ही में शादी के सत्रह महीने बाद 24 वर्षीय दीपिका नागर की ग्रेटर नोएडा के एक अस्पताल में 17 मई की रात मौत हो गई। पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार, उनकी तिल्ली फट गई थी, मस्तिष्क में रक्त जमाव पाया गया था, शरीर के अंदरूनी हिस्सों में रक्तस्राव हुआ था और पूरे शरीर पर कई स्थानों पर चोट के निशान मौजूद थे। इस रिपोर्ट के सामने आने के बाद उनके पति और ससुराल पक्ष पर दहेज के लिए प्रताड़ना और हिंसा के आरोप और अधिक गंभीर हो गए हैं।

पुलिस ने इस मामले में दीपिका नागर के पति और ससुर को गिरफ्तार कर लिया है। परिवार का आरोप है कि फॉर्च्यूनर गाड़ी और करीब 50 लाख रुपये नकद की मांग को लेकर उन्हें कई महीनों तक प्रताड़ित किया गया। परिजनों का यह भी आरोप है कि अंततः उन्हें छत से नीचे धक्का दे दिया गया।

पोस्टमार्टम रिपोर्ट में गंभीर चोटों की पुष्टि हुई है। चिकित्सकों ने चेहरे पर सूजन, पेट में चोट, कान से रक्तस्राव, अंदरूनी अंगों के फटने और शरीर के कई हिस्सों पर गहरे घाव होने का उल्लेख किया है। जांच एजेंसियां इस बात की पड़ताल कर रही हैं कि क्या छत से गिरने से पहले उनके साथ मारपीट की गई थी।

हालांकि, दीपिका की मौत कोई अकेली घटना नहीं है। इससे कुछ दिन पहले ही 33 वर्षीय MBA स्नातक और ‘पूर्व मिस पुणे’ त्विषा शर्मा भोपाल के कटारा हिल्स स्थित अपने ससुराल में फंदे से लटकी हुई मिली थीं। उनकी शादी वकील समर्थ सिंह से हुए अभी मुश्किल से पांच महीने ही हुए थे।

पुलिस ने इस मामले में दहेज प्रताड़ना और आत्महत्या के लिए उकसाने से संबंधित धाराओं के तहत मामला दर्ज किया है। त्विषा के पति, जो पेशे से वकील हैं, घटना के बाद से फरार बताए जा रहे हैं। वहीं उनकी सास, जो सेवानिवृत्त न्यायाधीश हैं, अंतरिम जमानत पर बाहर हैं। दूसरी ओर, त्विषा के माता-पिता और भाई लगातार शासन और प्रशासन से न्याय की मांग कर रहे हैं।

इससे पहले वर्ष 2026 की शुरुआत में जनवरी महीने में दिल्ली पुलिस की विशेष हथियार एवं रणनीति इकाई की कमांडो काजल चौधरी की कथित तौर पर अपने पति द्वारा किए गए हमले के बाद मौत हो गई थी। उनके परिवार ने भी पति पर लगातार दहेज के लिए प्रताड़ित करने के आरोप लगाए थे।

इसी तरह अगस्त 2025 में ग्रेटर नोएडा की 28 वर्षीय निक्की भाटी का मामला भी व्यापक आक्रोश का कारण बना था। आरोप था कि दहेज की मांग को लेकर उन्हें जिंदा जला दिया गया। बताया गया कि ससुराल पक्ष नकद राशि, गहने और एक स्कॉर्पियो गाड़ी लेने के बावजूद अतिरिक्त 36 लाख रुपये की मांग कर रहा था।

पुलिस शिकायत के अनुसार, निक्की के छोटे बच्चे ने इस हमले को अपनी आंखों से देखा था।

गौरतलब है कि देश में दहेज प्रथा पर रोक लगाने के लिए कई कानूनी प्रावधान मौजूद हैं, लेकिन इसके बावजूद यह कुप्रथा अब भी व्यापक रूप से जारी है। वर्ष 1961 में लागू किए गए दहेज निषेध अधिनियम के तहत दहेज लेने, देने या इसमें सहयोग करने वालों के लिए पांच वर्ष तक की सजा और 15 हजार रुपये तक के जुर्माने का प्रावधान किया गया है। इसके अलावा, दहेज प्रताड़ना, घरेलू हिंसा और दहेज हत्या से जुड़े अन्य कानूनों के तहत दोषी पाए जाने पर सात वर्ष से लेकर आजीवन कारावास तक की सजा दी जा सकती है।

भारतीय न्याय संहिता में भी दहेज हत्या और दहेज उत्पीड़न से संबंधित प्रावधानों को पहले की तरह बरकरार रखा गया है। भारतीय न्याय संहिता की धारा 80(1) के अनुसार, यदि किसी महिला की शादी के सात वर्ष के भीतर अस्वाभाविक परिस्थितियों में मृत्यु होती है, तो उसे दहेज हत्या की श्रेणी में माना जा सकता है। वहीं, धारा 80(2) के तहत ऐसे मामलों में दोषी पाए जाने पर सात वर्ष से लेकर आजीवन कारावास तक की सजा का प्रावधान किया गया है।

भारतीय न्याय संहिता की धारा 86 के तहत किसी महिला के साथ जानबूझकर की गई ऐसी किसी भी कार्रवाई को क्रूरता माना गया है, जिससे उसे आत्महत्या करने के लिए मजबूर होना पड़े या उसके शारीरिक अथवा मानसिक स्वास्थ्य को गंभीर नुकसान पहुंचने की आशंका हो।

हालांकि, तमाम कानूनी प्रावधानों के बावजूद अदालतों में न्याय मिलने में होने वाली असामान्य देरी दहेज मांगने वालों का मनोबल बढ़ाती है। कई मामलों में पर्याप्त सबूतों के अभाव में आरोपी दोषमुक्त हो जाते हैं। इसके अलावा, शुरुआती स्तर पर पुलिस पर भी ऐसे मामलों को गंभीरता से न लेने के आरोप लगातार लगते रहे हैं। ऐसे में दहेज आज भी एक ऐसी सामाजिक समस्या बनी हुई है, जिसका समाधान मौजूद होने के बावजूद उसे प्रभावी रूप से समाप्त नहीं किया जा सका है।

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